आज से 36 साल पहले की बात है ये. दिन था 23 जून 1980 का. सुबह का वक्त. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के घर से एक गाड़ी बाहर निकली. हरे रंग की मेटाडोर. चला रहे थे उनके छोटे बेटे संजय गांधी. अमेठी से सांसद. और एक महीने पहले ही कांग्रेस के महासचिव बने. मगर संजय को अपनी सत्ता और शक्ति के लिए इन पदों की दरकार नहीं थी. सब जानते थे कि पिछले पांच बरस से वही कांग्रेस के सर्वेसर्वा थे.
बहरहाल. संजय घर से निकले. जल्दी में मां को बाय भी नहीं बोला. बेटा वरुण सो रहा था. 3 महीने 10 दिन का बच्चा. पत्नी मेनका उसे संभालने में लगी थीं.
संजय पहुंचे एक किलोमीटर दूर सफदरजंग एयरपोर्ट. यहां उनका इंतजार कर रहे थे दिल्ली फ्लाइंग क्लब के चीफ इन्स्ट्रक्टर सुभाष सक्सेना. और एक मशीन. लाल रंग की शोख चिड़िया. एक नया एयरक्राफ्ट. पिट्स एस 2 ए. हल्का इंजन. कलाबाजी खाने के लिए मुफीद विंग्स.
बस एक चीज मुफीद नहीं थी. संजय का रवैया. सियासत की तरह फ्लाइंग में भी वह दुस्साहस की हद तक लापरवाह और जोखिम लेने वाले थे. अकसर सुरक्षा नियमों को तोड़ते थे. कहने वाले तो ये भी कहते हैं कि जूतों के बजाय कोल्हापुरी चप्पलों में ही प्लेन उड़ाने लग जाते थे. संजय की मां इंदिरा को तमाम ब्यूरोक्रेट्स और नेताओं ने इस बारे में बताया था. मगर बात संजय की थी. जिसकी जिद के आगे पहले भी एक बार बेबस मां ने पूरे देश को रेहन रख दिया था. यहां तो सिर्फ कुछ नियमों भर की बात थी.
मगर नहीं, बात दो जिंदगियों की थी. जो सुबह 7.15 बजे उड़ान भर चुकी थीं. कुछ ही मिनटों में वह अशोका होटल के ऊपर गोल नाच रहे थे. एयरक्राफ्ट अपने नाम के मुताबिक काम दे रहा था. लेकिन 10 मिनट बीतने के बाद संजय इसे खतरनाक निचाई पर लाकर गोते खिलाने लगे. और उसके भी कुछ मिनटों के बाद उनका नियंत्रण खत्म हो गया.
और फिर घर्र घर्र की आवाज करता हुआ डिप्लोमैटिक एनक्लेव में संजय गांधी के घर से कुछ ही मिनटों की एरियल दूरी पर पिट्स क्रैश कर गया.
15 मिनट में मौके पर एंबुलैंस और एयरक्राफ्ट पहुंचे. डालियां काटी गईं. प्लेन के मलबे के बीच से संजय और सुभाष की लाश निकाली गई. ब्रेन हैमरेज के चलते दोनों की मौके पर ही मौत हो गई थी. उन्हें वहीं स्ट्रैचर पर लाल कंबल से ढंक रख दिया गया. कुछ ही मिनटों में वहां पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पहुंचीं. अपने सचिव आरके धवन के साथ. कार से उतरते ही इंदिरा दौड़ने लगीं. फिर कुछ संभलीं. मगर बेटे की शकल देखने के बाद फूट फूट कर रोने लगीं.
इंदिरा को संभालने वाला कोई नहीं था. उनकी ताकत छोटा बेटा और राजनीतिक उत्तराधिकारी संजय एक लाश बन चुका था. संजय की बीवी मेनका घर पर थी. बड़ा बेटा राजीव, बहू सोनिया और उनके बच्चे राहुल और प्रियंका इटली में छुट्टियां मना रहे थे.
पूरा देश सकते में था. सब अपने अपने ढंग से संजय को याद कर रहे थे. विरोधी दलों के लिए वह इमरजेंसी का खलनायक था. जिसकी पहली जिद थी जनता कार बनाना. मारूति के नाम से. और इस सपने के लिए मां इंदिरा ने बैकों की तिजोरियां खुलवा दीं. सरकार की हर मुमकिन मदद दी. कार फिर भी नहीं बनी. मगर बेटा तब तक सरकारें बनाने बिगाड़ने में लग गया था. इमरजेंसी के दौरान उसने कभी सेंसरशिप की आड़ में पत्रकारों को धमकाया. तो कभी पूरी की पूरी फिल्म की रील ही जलवा दी. तुर्कमान गेट पर मलिन बस्ती हटाने के लिए गोलियां चलीं. नसबंदी कार्यक्रम के लिए जबरदस्ती की गई.
मगर पब्लिक जबर थी. मसट्ट मारे बैठी रही. और जब बारी आई. तो ऐसा पलटवार किया कि मां इंदिरा रायबरेली से और बेटा संजय अमेठी से बुरी तरह चुनाव हार गए.
इसके बाद शुरू हुआ ट्रायल का दौर. संजय गांधी पर एक के बाद एक मुकदमे लदने लगे. उनका तमाम वक्त पेशी में बीतता. मगर इसे भी संजय ने शक्ति प्रदर्शन का जरिया बना लिया. अदालतों में उनके बाहुबली युवा समर्थकों का हूजूम जुटता. ऐसा लगता गोया कोर्ट रूम नहीं संजय का दरबार सज रहा हो.
एक रोज 11 महीने की सुनवाई के बाद दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट के जज वोहरा ने उन्हें
किस्सा कुर्सी का मामले में एक महीने की सजा सुना दी. और इसके बाद जमानत भी नहीं दी. संजय गांधी, जो एक साल पहले तक देश के हर खड़कते पत्ते को इजाजत देता था, दिल्ली की जेल में था. कुछ रोज बाद उन्हें ऊपरी कोर्ट से जमानत मिली.
समय बदला. लोग बदले. सत्ता बदली और संजय भी बदले.
1980 के चुनाव में उन्होंने मम्मी को वापस पीएम बनाने के लिए सब पत्ते सही फेंके. युवाओं को जमकर टिकट बांटे गए. जनता, सत्तारूढ़ जनता पार्टी के बंटरबांट से तंग थी. कांग्रेस केंद्र में वापस लौटी. और लौटा संजय का रसूख. वह पहला और इकलौता चुनाव भी तभी जीते. अमेठी से ही. जल्द ही उन्होंने मम्मी को एक काम के लिए राजी कर लिया. 9 ऐसे राज्यों में जहां कांग्रेस सत्ता में नहीं थी, विधानसभा भंग करने का फैसला किया गया. कहा गया कि देश ने नया जनादेश दिया है. इन्हें भी नए सिरे से इसे मानना होगा. चुनाव हुए तो 8 राज्यों में कांग्रेस सत्ता में वापस लौटी. इसका श्रेय भी संजय को दिया गया. उन्होंने सभी जगह अपने लोगों को सीएम की कुर्सी पर बैठाया.
संजय के राज्यारोहण की तैयारी शुरू हो चुकी थी. वह अपना राजनीतिक कौशल जाहिर कर चुके थे. ये तय था कि अब कांग्रेस में वही होगा जो संजय चाहेंगे. इसलिए तमाम बूढ़े पुराने नेता भी घुटने मोड़कर दंडवत करने लगे थे. मुख्यमंत्रियों को तो अपनी ऑक्सीजन ही यहीं से मिलती थी.
और तब अचानक संजय चल बसे. सबके समीकऱण हिल गए. मगर जल्द ही समझ आ गया कि संजय के बाद बारी राजीव गांधी की है. जो नहीं समझे, वे संजय की नाराज विधवा मेनका गांधी संग हो लिए. मेनका ने संजय विचार मंच नाम से पार्टी बनाई. अलग चुनाव लड़ा. 1984 में अमेठी से राजीव को चुनौती देने पहुंचीं और खेत रहीं. मगर जनता दल के उदय के साथ उनकी किस्मत भी चमकी. बाद में वह बीजेपी में आ गईं. और बेटा वरुण भी कमल सहारे खिलने की कोशिशों में लगा है.
संजय गांधी की मौत भी उनकी जिंदगी की तरह थी. अचानक. क्रूर. सबको चौंकाने वाली.
और उनका जनाजा उनके राजनीतिक कद की गवाही दे रहा था. हर राज्य का मुख्यमंत्री चिता के 200 मीटर के दायरे में मौजूद था. दिल्ली में मौजूद हर देश का प्रतिनिधि कतार लगा कर खड़ा था. रेडियो पर प्रोटोकॉल तोड़ते हुए शोक धुन बज रही थी. अगले रोज यानी 24 जून को मद्रास में पूर्व राष्ट्रपति वीवी गिरि का भी निधन हुआ था. मगर उस तरफ किसका ध्यान होता.
संजय ने आखिरी बार अपनी तरफ पूरा ध्यान खींचा. और चले गए. मारुति बनाने की चाह रखने वाला मारुति नंदन की तरह हवा में उड़ना चाह रहा था. मगर वो ईश्वर थे. उन्हें गिरने का भय नहीं होता. ये इंसान था. जिसके अंत के लिए एक चूक काफी थी.
7/10/2016
पेड़ काटकर उतारी गई थी इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी की लाश!
देश की हर ATM लाइन में दिखते हैं ये 15 लोग
ATM बनाए गए बैंक की लाइन में खपने वाला वक़्त बचाने को. लेकिन ATM के कॉन्सेप्ट ने हमारे आस-पास के लोगों को भी बदल दिया. ATM जाते वक्त आदमी थोड़ा सतर्क हो जाता है और थोड़ा शक्की. अगली बार आप पैसे निकालने जाएं तो नजर घुमाकर देखिएगा. ये 15 लोग हर एटीएम के बाहर खड़े मिलेंगे.
1. फुरसतिए
वे लोग जो ATM के सामने फुरसत में वक़्त बिताते हैं. उन्हें देख लगता है नानी के घर गर्मी की छुट्टी मेें आए हैं. हमको पता है. एसी के मजे लेने के लिए आते हैं ये जंतु.
2. शक्की मिजाज
कुछ लोग अपने अगल-बगल खड़े लोगों को घूरते हैं. उन्हें लगता है कि बाकी लोग, लोग नहीं गुंडे हैं. लुटेरे हैं. और जैसे ही हम पइसा निकालेंगे ये तमंचा सटाकर लूट लेंगे. ऐसे लोग जब मेरी तरफ देखते हैं तो लगता है कि महीने में एकाध दफा दाढ़ी बना लेना कितना जरूरी होता है.
3. भुलक्कड़ बुद्धू
ख़ुदा-न-ख़ास्ता किसी भले दिन जल्दी में हुए तो आपसे ठीक पहले वाले भाई साहब को अपना पासवर्ड भूल जाता है.
4. हड़बड़ चंद
एक बंदा इतना हड़बड़ाया सा पैसे निकाल रहा होता है, जैसे उसे सत्तर के दशक की फिल्मों वाले किसी डॉक्टर ने कह के भेजा है, ‘अगर आप आधे घंटे में डेढ़ लाख रुपयों का बंदोबस्त कर सकें, तभी हम आपके भाई की जान बचा सकते हैं.’
5. सीखने-सिखाने को आतुर
एक वो जोड़ा होता है जिसमे पहला खुद एक बार पैसे निकालकर दिखाता है और फिर दूसरे को यही दोहराने को कहता है. दो-तीन रीटेक के बाद ट्यूटोरियल ख़त्म होता है. 15 मिनट बाद किसी गहरी खाई में कूद पड़ने का जी करता है जब दोनों कुल जमा तीन सौ रुपये निकाल के मशीन छोड़ते हैं.
6. बहुतै केयरलेस
ऐसे ही किसी ATM पर आपका सामना उस लड़की से होता है जो पैसे निकालने के बाद अक्सर अपना कार्ड मशीन में ही भूल जाती है. यहीं आपको जिज्ञासुओं के दर्शन भी होते हैं ये वो शख्स होता है जो एक बार पैसे निकालने से पहले और दूसरी बार पैसे निकालने के बाद बैलेंस चेक करता है.
7. भयभीत
एक वो सयाने से अंकल होते हैं जो इतना डर-डरकर हर बटन दबाते हैं कि कहीं कोई गलत बटन दबा देने पर उनके पैसे किसी और के अकाउंट में न चले जाएं.
8. बेसब्र
ऐसे लोग भी आते हैं जिन्हें इतना सब्र नहीं होता कि पैसे निकल आने दें. इनका बस चले तो पैसे निकलने की जगह से हाथ डालकर गड्डी बटोर लें.
9. कैमरा फ्रेंडली
एक वो जिन्हें ATM और पैसों से ज्यादा रुचि सामने लगे कैमरे में होती है. ये कैमरे की ओर देखते हुए छोटा-मोटा सा ऑडिशन ही दे डालते हैं. इन्हें लगता है कैमरे की दूसरी तरफ आदित्य चोपड़ा और अनुराग कश्यप ही बैठे हैं.
10. बेरहम
एक वो जो ATM से ट्रांजैक्शन की रसीद निकलते ही उसे बिन में ऐसे मसलकर फेंकते हैं मानो एक्स-गर्लफ्रेंड का वैलेंटाइंस डे पर दिया ‘लव यू फॉरेवर’ वाला कार्ड हो.
11. बटोरू चंद
दूसरे वो जो ATM से ट्रांजैक्शन की रसीद निकलते ही उसे पर्स में ऐसे संभालकर रखते हैं मानो अगली बार वो पर्ची मंगतराम पंसेरी की दुकान पर दिखाने के बदले आधा पाव आमचूर में दस रुपए छूट मिलेगी.
12. प्रोग्रामिंग एक्सपर्ट
कुछ लोग अपने व्यवहार से एटीएम ऑपरेट करने में इतनी दक्षता दिखाते हैं,कि उन्हें देखकर लगता है एटीएम से पैसे नहीं निकाल रहे बल्कि जावा में प्रोग्रामिंग कर रहे हैं.
13. पलटू
एक वो जो इस तरह से बार-बार पलटकर पीछे देखता है मानो सकल ब्रह्मांड का ध्यान इस वक़्त सिर्फ उस पर ही लगा हो. इन्हें देख शक होता है कहीं ये CIA के एजेंट तो नहीं जो ATM से पैसों की बजाय हथगोले निकालने आए हैं.
14. कैंसल प्रेमी
वहीं एक शख्स ऐसा होता है,जिसका सारा ध्यान कैंसल दबाने में लगा होता है. आपको जल्दी हो और अगला भीतर कैंसल पर कैंसल दबाए जा रहा हो. तो ऐसा लगता है मानो किसी क़त्ल के बाद अगला फिंगरप्रिंट मिटा रहा है.
15 . पूछताछ को आतुर
इन सबसे जूझकर, बचकर और छूटकर आप पैसे निकालते हैं और जैसे ही बाहर निकलते हैं आपका सामना उस लड़के से होता है जो हर बाहर आने वाले से एक ही सवाल कर रहा होता है. “चल रहा है न?”
7/09/2016
जाकिर नाइक : एक खतरनाक मजहबी कट्टरपंथी जो कुतर्कों में निर्मल बाबा से भी मीलों आगे है
बांग्लादेश में हुए आतंकी हमलों से एक भारतीय नागरिक का भी नाम जुड़ रहा है. कहा जा रहा है कि इन हमलों में इस भारतीय की भी अप्रत्यक्ष भूमिका हो सकती है. यह नाम है इस्लामिक धर्म गुरु डॉक्टर जाकिर नाईक का. कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार ढाका में बीस लोगों को मौत के घाट उतारने वाले आतंकियों में से कुछ जाकिर नाइक से प्रभावित थे. इन आरोपों को इसलिए भी बल मिल रहा है क्योंकि जाकिर नाइक पर पहले भी लोगों को भड़काने और धर्म के नाम पर गुमराह करने जैसे आरोप लगते रहे हैं.
मुंबई में रहने वाले 50 वर्षीय जाकिर नाइक के पिता एक मनोचिकित्सक थे और बड़े भाई एक डॉक्टर. एक साक्षात्कार में जाकिर बताते हैं कि उनकी अम्मी उन्हें क्रिस्चियन बर्नार्ड जैसा बड़ा डॉक्टर बनते देखना चाहती थी. साउथ अफ़्रीकी मूल के डॉक्टर क्रिस्चियन बर्नार्ड ही थे जिन्होंने दुनिया का पहला सफल हार्ट-ट्रांसप्लांट किया था. जाकिर नाइक डॉक्टर तो बने लेकिन डॉक्टरी की पढ़ाई के दौरान ही उनके आदर्श डॉक्टर बर्नार्ड की जगह एक अन्य साउथ अफ़्रीकी बन गए - इस्लामी उपदेशक शेख अहमद दीदात.
कई लोगों को उनकी यही खूबी सबसे ज्यादा आकर्षित करती है कि वे अपने तर्कों को सिर्फ कुरआन या हदीस ही नहीं बल्कि बाइबिल से लेकर वेद, पुराण, गीता और उपनिषद तक के उदाहरण देकर सही साबित करते हैं.
अहमद दीदात से मिलने के बाद जाकिर ने उनके कई भाषण और तर्क सुनें और अंततः उन्हीं की राह पर आगे बढ़ने का फैसला कर लिया. 1991 में जाकिर नाईक ने ‘इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन’ नाम की एक संस्था शुरू की. इस संस्था के बैनर तले उन्होंने इस्लाम और कुरआन पर लोगों से चर्चा करना शुरू किया. 15-20 लोगों के साथ शुरू हुआ इस्लाम पर सवाल-जवाब का यह सिलसिला इतनी तेजी से बढ़ा कि देखते ही देखते जाकिर नाईक के श्रोताओं की संख्या हजारों में जा पहुंची.
इसके बाद नाइक कई मंचों से भी लोगों को संबोधित करने लगे और उनके श्रोता हजारों से लाखों में हो गए. आज उनके श्रोताओं की संख्या करोड़ों में है और इसका मुख्य कारण है ‘पीस टीवी’ जिसे जाकिर नाइक ने साल 2006 में शुरू किया था. यह चैनल दुबई से चलाया जाता है.
जाकिर नाइक की तरफ लाखों लोगों के इतनी तेजी से आकर्षित होने का मुख्य कारण यह है कि वे हर सवाल का जवाब धार्मिक ग्रंथों के हवाले से देते हैं. सिर्फ मुस्लिम धर्म ग्रंथ ही नहीं बल्कि तमाम अन्य धर्मों के दर्जनों ग्रंथ भी जाकिर नाईक ने कंठस्थ कर लिए हैं. वे किसी भी सवाल के जवाब में इन ग्रंथों का हवाला देते हुए उससे संबंधित पेज और पैरा नंबर तक बता डालते हैं.
कई लोगों को उनकी यही खूबी सबसे ज्यादा आकर्षित करती है कि वे अपने तर्कों को सिर्फ कुरआन या हदीस ही नहीं बल्कि बाइबिल से लेकर वेद, पुराण, गीता और उपनिषद तक के उदाहरण देकर सही साबित करते हैं
लेकिन दिलचस्प यह है कि इतना पढ़े-लिखे होकर इतनी पोथियां पढने और रटने के बाद भी जाकिर नाइक अक्सर ऐसे कुतर्क करते हैं कि निर्मल बाबा भी शर्मा कर पानी भरने लग जाएं. वही निर्मल बाबा जो समोसे की चटनी का रंग बदलने से कृपा आने की बात कहते हैं.
ओसामा बिन लादेन के बारे में पूछे जाने पर कुछ साल पहले उनका कहना था कि वे बिन लादेन को आतंकवादी नहीं मानते. बल्कि उन्होंने यह भी कहा था कि जो भी इस्लाम के दुश्मन के खिलाफ लड़ रहा है, मैं उसके साथ हूं.
जाकिर नाइक धर्मग्रंथों का हवाला देते हुए कभी बीवी को पीटने को जायज़ बताते हैं, कभी समलैगिकों को और इस्लाम त्यागने वालों को सजा-ए-मौत देने की बात करते हैं, कभी कहते हैं कि महिलाएं यदि ताउम्र कुंवारी रहीं तो वे वेश्यावृति की ओर बढ़ जाती हैं और कभी कहते हैं कि सुवर का मीट खाने वाले लोग वाइफ-स्वापिंग करने लगते हैं.
जाकिर नाइक के इन ‘निर्मल बाबा पछाड़’ तर्कों पर विस्तार से चर्चा करने से पहले उनसे जुड़े कुछ ऐसे विवादों के बारे में जानते हैं जिनके चलते उन पर आतंकवादियों को प्रेरित करने जैसे गंभीर आरोप लगते रहे हैं. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना कल्बे जव्वाद एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘जो व्यक्ति यज़ीद की हिमायत कर रहा हो उससे ज़्यादा दहशतगर्द का हामी कौन हो सकता है. यज़ीद ने इमाम हुसैन को शहीद किया, उसकी हिमायत जाकिर नाइक कर रहे हैं. इसका मतलब है कि वे दहशतगर्दी की हिमायत कर रहे हैं.’
जाकिर नाइक आतंकवाद पर दिए गए अपने कई बयानों के चलते भी विवादों में घिर चुके हैं. ओसामा बिन लादेन के बारे में पूछे जाने पर कुछ साल पहले उनका कहना था कि वे बिन लादेन को आतंकवादी नहीं मानते. बल्कि उन्होंने यह भी कहा था कि ‘जो भी इस्लाम के दुश्मन के खिलाफ लड़ रहा है, मैं उसके साथ हूं. अगर लादेन अमेरिका को आतंकित कर रहा है, जो खुद आतंकवादी है तो मैं उनके साथ हूं.’ इसके साथ ही उनका कहना था कि हर मुसलमान को आतंकवादी होना चाहिए.
जाकिर नाइक के ऐसे ही कई विवादास्पद तर्कों के चलते उन पर समय-समय पर प्रतिबंध भी लगते रहे हैं. दारुल उलूम देवबंद भी उनके खिलाफ फतवा जारी कर चुका है और बरेलवी सुन्नी मुस्लिम, शिया मुस्लिम और सूफी मुस्लिम भी कई बार उनके खिलाफ सरकार से शिकायत कर चुके हैं. उत्तर प्रदेश सरकार कई बार जाकिर नाईक के कार्यक्रमों पर रोक लगा चुकी है और 2012 में यूपीए सरकार ने उनके ‘पीस टीवी’ पर भी प्रतिबंध लगा दिया था. भारत के कुछ हिस्सों में ही नहीं बल्कि कई अन्य देशों में भी जाकिर नाइक को प्रतिबंधित किया जा चुका है जिनमें ब्रिटेन, कनाडा और मलेशिया प्रमुख हैं.
इंटरनेट पर जाकिर नाइक से जुड़ा एक वीडियो आसानी से मिल जाता है जिसमें उनके एक भाषण की समीक्षा करते हुए बताया गया कि है कैसे उन्होंने 5 मिनट के वीडियो में 25 गलत हवाले दिए.
बात-बात पर धर्मग्रंथों का हवाला देने की जो कला जाकिर नाइक का सबसे बड़ा आकर्षण है, उस पर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं. कई लोग यह दावा कर चुके हैं कि जाकिर नाईक अक्सर इन ग्रंथों का गलत और झूठा संदर्भ देते हैं. इंटरनेट पर जाकिर नाईक से जुड़ा एक वीडियो आसानी से मिल जाता है जिसमें उनके एक भाषण की समीक्षा करते हुए बताया गया कि है कैसे उन्होंने 5 मिनट के वीडियो में 25 गलत हवाले दिए. ऐसे कई वीडियो और भी हैं जिनमें लोग उनसे उनकी गलत तकरीरों का जवाब मांग रहे हैं और वे इन सवालों से बचते नज़र आ रहे हैं. इसके साथ ही उन पर इस्लाम की गलत व्याख्या के आरोप भी लगते रहे हैं. ऐसे कई मुस्लिम संगठन और धर्मगुरु हैं जो जाकिर नाइक से इत्तेफाक नहीं रखते और उन्हें समाज के लिए खतरा बताते हैं.
जाकिर नाइक की बातों में कई विरोधाभास भी साफ़ नज़र आते हैं. मसलन, ओसामा बिन लादेन को वे इसलिए आतंकवादी नहीं मानते क्योंकि वे उसे व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानते थे. उनका कहना है कि वे बिना रिसर्च के कोई भी टिप्पणी नहीं करते इसलिए वे बिना रिसर्च के ओसामा को आतंकवादी नहीं मानेंगे. जो व्यक्ति दुनिया के सभी प्रमुख धर्मों पर रिसर्च कर चुका हो और तमाम धर्मग्रंथों को कंठस्थ कर चुका हो वह यदि इतनी सी बात न जान सके कि लादेन आतंकवादी था या नहीं, तो इसे उसके व्यक्तित्व का विरोधाभास ही कहा जाएगा.
ऐसे ही विरोधाभास जाकिर नाइक में तब भी नज़र आते हैं जब वे खुद को एक मेडिकल डॉक्टर और विज्ञान का ज्ञाता बताते हैं लेकिन घोर अवैज्ञानिक तर्क (कुतर्क) देने लगते हैं. विभिन्न सवालों पर दिए गए उनके ऐसे ही कुछ अजीबोगरीब कुतर्कों पर एक नज़र डालते हैं:
सुवर का मीट खाने वाले बीवियों की अदला-बदली करने लगते हैं
इस्लाम में सुवर का मीट खाना क्यों हराम है? इस सवाल के जवाब में जाकिर नाइक सबसे पहले तो अपने हर जवाब की तरह उन ग्रंथों और उनके पेज और पैरा नंबर बताते हैं जहां-जहां सुवर के मीट को ‘हराम’ बताया गया है. इसके बाद वे कहते हैं कि चूंकि सुवर गंदगी खाता है लिहाजा उसका मीट खाने से 70 तरह की बीमारियां हो सकती हैं. साथ ही सुवर खाने के नैतिक और मनोवैज्ञानिक परिणामों के बारे में वे बताते हैं, ‘साइंस आज ये कहती है कि सुवर इस प्रथ्वी का सबसे बेशर्म जानवर है. वो एक अकेला जानवर है जो अपने दोस्तों को बुलाता है, अपनी बीवी के साथ संभोग करने के लिए और देखकर खुश होता है. साइंस कहती है कि जो आप खाते हैं उसका असर आपके बर्ताव में होता है. अमेरिका में अधिकतर लोग सुवर खाते हैं. इसलिए वहां अक्सर डांस पार्टियों के बाद वाइफ-स्वैपिंग’ होती है. यानी बीवियों की अदला-बदली.’
बीवी को मारना जायज है, लेकिन इसके निशान नहीं रहने चाहिए
बीवी को पीटने के सवाल पर कुछ समय पहले एक साक्षात्कार में जाकिर नाईक का कहना था, ‘कुरआन अंतिम विकल्प के तौर पर बीवी पर हाथ उठाने को कहती है. लेकिन हलके से, जैसे कि उसे रुमाल से मार रहे हों. और हां, इस मार के कोई निशान नहीं रहने चाहिए.’
दो औरतों की गवाही और एक मर्द की गवाही बराबर है
जाकिर नाइक कुरआन का हवाला देते हुए कहते हैं कि वित्तीय मामलों में या हत्या के मामलों में मर्दों की गवाही को ही वरीयता दी गई है. वे कहते हैं कि यदि गवाही के लिए दो मर्द न हों तो फिर एक मर्द और दो महिलाएं हो सकती हैं. यानी दो महिलाओं की गवाही और एक मर्द की गवाही समान है. उनके अनुसार वित्तीय मामलों की समझ मर्दों को ही बेहतर होती है और हत्या जैसे मामले में महिलाएं घबरा कर भूल कर सकती हैं. लिहाजा इस तरह के मामलों में दो महिलाओं की गवाही को एक मर्द की गवाही के बराबर माना गया है.
इस्लामिक देशों में न तो किसी अन्य धर्म का प्रचार हो सकता है न ही कोई मंदिर बन सकता है
यह पूछे जाने पर कि जैसे भारत में सभी धर्मों के प्रचार की छूट है वैसे ही इस्लामिक देशों में भी क्या सभी धर्मों के प्रचार-प्रसार की छूट नहीं होनी चाहिए, जाकिर नाइक कहते हैं, ‘मान लीजिये आप एक स्कूल खोलना चाहते हैं. इसके लिए आपको गणित के एक टीचर की जरूरत है. क्या आप ऐसे व्यक्ति को टीचर नियुक्त कर लेंगे जो कहता हो कि दो और दो पांच होता है? आप नहीं करेंगे क्योंकि आप जानते हैं कि गणित में दो और दो सिर्फ चार होता है. ठीक इसी तरह इस्लामिक देश जानते हैं कि धर्म के मामले में सिर्फ इस्लाम ही सही है. बाकी सब गलत है. तो जैसे आप गलत गणित पढ़ाने वाले को कभी टीचर नहीं रखेंगे वैसे ही इस्लामिक देश कभी भी गलत धर्म पढ़ाने वाले को अनुमति नहीं देंगे.’
इस्लाम त्यागने वालों और समलैंगिकों को मौत की सजा हो
जाकिर नाईक बताते हैं कि इस्लाम में धर्म त्यागने वालों के लिए मौत की सजा का प्रावधान है जो कि बिलकुल सही है. वे कहते हैं कि जैसे राष्ट्र से गद्दारी करने वाले को मौत की सजा देना जायज़ है वैसे ही धर्म से गद्दारी करने वाले को भी मौत की सजा जायज है. समलैंगिकों को मौत की सजा दिए जाने की वकालत भी जाकिर नाइक हदीस, कुरआन और बाइबिल के जिक्र के साथ करते हैं. जाकिर नाईक यह भी चाहते हैं कि भारत के सभी कानून इस्लाम के अनुसार हो जाएं. वे कहते हैं कि शरिया के अनुसार सजाएं होने से भारत में अपराध कम होंगे.
मुस्लिम मर्द बहुविवाह न करें तो लाखों महिलाएं ‘सार्वजनिक संपत्ति’ बन जाएंगी
जाकिर नाइक मानते हैं मुस्लिम मर्दों द्वारा बहुविवाह करना मर्द और औरत, दोनों के हित में है. वे कहते हैं कि मर्द प्राकृतिक रूप से ‘बहुविवाही’ होता है. इसलिए यदि उसकी एक से ज्यादा बीवियां होंगी तो वह अपनी बीवी को धोखा नहीं देगा. वे कहते हैं, ‘यदि हर मर्द की शादी सिर्फ एक महिला से होगी तो अमेरिका में लगभग तीन करोड़ महिलाएं, ब्रिटेन में 40 लाख, जर्मनी में 50 लाख और रूस में 90 लाख महिलाएं कुंवारी ही रह जाएंगी. तब ऐसी महिलाओं के पास सिर्फ दो ही विकल्प बचेंगे, या तो उन्हें किसी शादीशुदा मर्द से शादी करनी होगी या ‘सार्वजनिक संपत्ति’ बनना होगा.’
मंदिर का प्रसाद खाना या मेरी क्रिसमस बोलना हराम है
जाकिर नाइक कहते हैं कि कई मुस्लिम लोग अपने हिन्दू साथियों का मान रखने के लिए मंदिर का प्रसाद ‘बिस्मिल्लाह’ बोलते हुए खा लेते है, लेकिन ऐसा करना गलत है और कुरआन इसकी अनुमति नहीं देती. साथ ही वे कहते हैं मुसलमानों को ‘मेरी क्रिसमस’ नहीं बोलना चाहिए क्योंकि यह जीसस को भगवान् का बेटा मानने के समान है और किसी मुसलमान के लिए ऐसा करना ‘ईशनिंदा’ है.
महिलाएं ताउम्र कुंवारी रहे तो वेश्यावृत्ति में चली जाएंगी
महिलाओं के कुंवारे रहने का विरोध करते हुए जाकिर नाइक कहते है, ‘मैं एक मेडिकल डॉक्टर हूं इसलिए जानता हूं कि एक महिला कभी भी ताउम्र कुंवारी नहीं रह सकती. यदि वह रहती है तो उसे वैश्यावृति में जाने को मजबूर होना पड़ेगा.’
गोद लिए हुए बच्चे से अजनबी जैसा बर्ताव करना चाहिए
जाकिर नाइक के अनुसार मुस्लिम लोग बच्चे गोद तो ले सकते हैं लेकिन ऐसे बच्चों को इस्लामिक कानून कोई अधिकार नहीं देता. वे यह भी कहते हैं कि ऐसे बच्चों को माता-पिता के रूप में अपना नाम देना भी इस्लाम में गलत है. साथ ही जब ऐसा बच्चा बड़ा हो जाए तो घर की सभी महिलाओं को उससे अजनबी जैसा बर्ताव करना चाहिए और उसकी मौजूदगी में महिलाओं को हिजाब लेना चाहिए.
गैर-मुस्लिम लोग जन्नत नहीं नरक में जाते हैं
जाकिर नाइक से जब यह पूछा गया कि यदि कोई गैर मुस्लिम सारी उम्र दान-पुण्य का कार्य करे, कोई पाप न करे और मानवता की भलाई के लिए अपने प्राण तक त्याग दे तो क्या तब भी वो जन्नत में नहीं जाएगा? इसके जवाब में जाकिर नाइक कहते हैं, ‘मान लीजिये आपको दसवीं क्लास की परीक्षा देनी है. इस परीक्षा में आपके कुल पांच विषय हैं. यदि आप चार विषयों में पूरे सौ अंक हासिल कर लेते हैं और एक विषय में फेल हो जाते हैं तो क्या आप दसवीं क्लास पास कर पाएंगे? ठीक उसी तरह जन्नत जाने के लिए इस्लाम में विश्वास सबसे महत्वपूर्ण है. जिसे इस्लाम में विश्वास नहीं है, वह चाहे कितनी भी भलाई करे, जन्नत नहीं जा सकता.’
इन तमाम तकरीरों को देते हुए जाकिर नाइक अलग-अलग धर्मग्रंथों का हवाला जरूर देते हैं जिससे कई लोग उनकी बातों को तर्कसंगत मानने लगते हैं और उनके मुरीद भी होते हैं. लेकिन जानकारों की मानें तो यही वह पहलू भी है जिसके चलते उनके जैसे व्यक्ति समाज के लिए बेहद खतरनाक हो जाते हैं. आज के समाज में जहां व्हाट्सएप और फेसबुक पर फैलाए गए झूठे संदेशों को ही इतना विश्वसनीय मान लिया जाता है कि उनके कारण सांप्रदायिक दंगे तक हो जाते हैं, उस समाज में जाकिर नाइक जैसे व्यक्ति जब धर्मग्रंथों के नाम, पेज नंबर और पैराग्राफ नंबर के साथ अपनी कोई भी बात कहते हैं तो स्वाभाविक है कि कई लोगों को प्रभावित कर जाते हैं.
वे सीधे-सीधे आतंकवाद को बढ़ावा न भी देते हों लेकिन ऊपर लिखी उनकी बातों से साफ़ है कि वे धार्मिक-कट्टरपंथ को जरूर बढ़ावा देते हैं. सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू उनके बारे में कहते हैं, ‘मैं नहीं मानता कि जाकिर नाईक एक आतंकवादी है, वह एक धार्मिक कट्टरपंथी है लेकिन यह धार्मिक कट्टरपंथ ही आतंकवाद को जन्म देता है.
सौजन्य से
सत्याग्रह.कॉम