बना हुआ है. जियो के सिम से बतिया रही जनता को देखकर सीधे एलजी के सेट पर रिलायंस CDMA वाला जमाना याद आता है. लै बातें… दै बातें… भर-भरकर बातें. और अब तो स्मार्टफोन का जमाना है. लौंडों को नेट का सही यूज करना भी आता है. ऐसे लौंडों की वजह से ही तो टॉरेंट वालों का करियर चल रहा है. लेकिन गुरू… अब मौज के दिन खत्म हो गए हैं. रिलायंस जियो बंद हो जाएगा.
क्या हुआ. छाती दरक गई? कलेजा हुलसने लगा. आंखें चौंधिया गईं. पर क्या बताएं मौसी… काम ही मुकेश अंबानी ने कुछ ऐसा किया है. यहां जनता देशप्रेम वाली गोटी खेल रही है और अंबानी चीन से सिम पर सिम मंगाए जा रहे हैं. खुलेआम, दिनदहाड़े, सरेराह… देशद्रोह!
पहिले आंकड़े समझो. जनवरी, 2016 के पहले ही हफ्ते में जियो के साढ़े चार लाख सिम चीन से मंगाए गए थे. मंगाए क्या गए थे, बनते ही वहीं हैं. एक तरफ मोदी जी हलकान हुए जा रहे हैं मेक इन इंडिया के प्रमोशन में, दूसरी तरफ अंबानी चीन से ऐसे-ऐसे बिन्निस कर रहे हैं. 12 जनवरी को चीन से एक और कन्साइन्मेंट आया था. उसमें फिर जियो के पांच लाख सिम आए थे. 16 जनवरी को फिर सवा चार लाख सिम आए. ये सिलसिला पूरे साल चलता रहा. अभी 28 सितंबर को ही ढाई लाख सिम आए हैं चीन से. ये देखो.
देखो, कब कित्ते सिम आए हैं चीन से (डेटा सोर्स: zauba)
अब बताओ. इस समय हर जगह देशप्रेम की लहर है. चीनी सामान का विरोध हो रहा है. कहा जा रहा है कि हम चीन का सामान खरीदकर उस पर पैसा लुटाते हैं और वो वही पैसा नवाज शरीफ को दे देता है हमारे जवानों को मारने के लिए. तो अच्छा है कि चीन का सामान खरीदा ही न जाए. बिजनेस अपनी जगह है, लेकिन देशप्रेम से बढ़कर थोड़ी न है.
अब जब ये पक्का पता चल गया है कि जियो के सिम चीन से आ रहे हैं तो पूरे भारत के देशभक्त तो इन्हें यूज करेंगे नहीं. जिन्होंने मुफत का माल समझकर ले लिया था, वो भी इसके 56 टुकड़े करके आग लगा देंगे. वैसे भी हमारे यहां देशभक्तों की कमी तो है नहीं. हर चौराहे पर चाट-पकौड़ी खाते रहते हैं देशभक्त. ऐसे में गद्दार बचे ही कितने हैं. गद्दार उतने ही बचे हैं, जितने परशुराम के सर्जिकल स्ट्राइक के बाद धरती पर ठाकुर बचे थे. ससुरा इतने सर्जिकल स्ट्राइक के बावजूद न जाने कहां से पैदा हो जाते थे.
तो ये जो छिटपुटिए गद्दार बचे हैं, इनके सहारे तो मुकेश अंबानी जियो का कारोबार चला नहीं पाएंगे. हर खेप में लाखों सिम आ रहे हैं, चीन वाली बात पता चलने के बाद तो यूज करने वाले सौ-पचास या कुछ हजार बचेंगे, तो कहां से काम चलेगा. ऐसे में कंपनी तो बंद करनी ही पड़ेगी न. अच्छा वैसे जिनके हलक से अब तक ये बात नहीं उतर रही है कि सिम चीन से आ रहे हैं वो एक फोटो और देख लें.
और अंदर की बात बताएं दोस्त. जब से मुकेश अंबानी ने लोगों को चीनी सामान का विरोध करते देखा है न, तब से उनकी हालत बड़ी दयनीय हो गई है. सुना है आज-कल दिनभर कांपते रहिते हैं. दो-चार आदमी आस-पास बिठा रखे हैं जो जियो के बढ़ते ग्राहकों की गिनती करते रहते हैं ताकि उनके होशो-हवास में कुछ सुधार हो. अब चीनी सामान के विरोध की फोटो हैं ही ऐसी कि किसी की भी जान हलक में अटक जाए. अपने यहां तो सीधे प्रधानमंत्री से बैन लगवाया जाता है. ये अलग बात है कि PMO ने सफाई देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की तरफ से ऐसा कुछ नहीं कहा गया है.
अच्छा हां, एक और बात तो बताना भूल ही गए. एक हैक्टिविस्ट ग्रुप ने खुलासा किया था कि जियो के ग्राहकों की जानकारी अमेरिका और सिंगापुर में भेजी जा रही है. देखो होता क्या है कि आप इंटरनेट पर जो भी ज्यादा देखते-सुनते हैं, उसके आधार पर ये तय किया जाता है कि आपको कौन से विज्ञापन दिखाए जाएंगे. तो आरोप यही है कि जियो अपने ग्राहकों की जानकारी बेच रही है ताकि कंपनियां अपने हिसाब से विज्ञापन दिखा सकें.
एक चीज और नहीं समझ आ रही है. जियो बेचने के विज्ञापन को डिजिटल इंडिया से जोड़ा गया था, लेकिन इसमें मेड इन इंडिया जैसा तो कुछ है ही नहीं. सिम बन रहे हैं चीन में और नेटवर्क वाले उपकरण आ रहे हैं फ्रांस और जर्मनी से. और इंडियावाले यूज कर रहे हैं फ्री में. ये मुफत वाली आदत जाएगी थोड़ी न हम लोगों की. वैसे अब क्या दिक्कत है. अब तो देशभक्त सारा काम संभाल ही लेंगे. कसम पैदा करने वाले की, देशद्रोही जियो तो बंद करवाकर ही रहेंगे. जय भद्रकाली.
10/10/2016
रिलायंस जियो बंद होने वाला है
10/04/2016
जानिये कैसे रिश्तों में दरार पैदा करता है आपका लाडला व्हाट्सअप
सदियों से प्रेम पत्रों का चलन रहा और फिर आया डिजिटल ज़माना। कलम की-पैड में बदल गए और कागज़ डिजिटर स्क्रीन में। एक सेंड बटन दबाते ही, कई दिनों में पहुंचने वाला प्रेम संदेश सेकंडों में आपके प्रेमी तक। व्हाट्सएप ने प्रेमियों की दुनिया में जैसे एक क्रांति ही लाकर रख दी। रास्ता हो या फिर दफ्तर, जैसे ही प्रेमी की याद आए बस फोन उठाया, व्हाट्सएप मैसेज टाइप किया और सीधा सेंड। व्हाट्सएप मेसेजिंग, व्हाट्सएप कॉलिंग व इसके बाकी के कई फीचर हैं। लोग व्हाट्सएप के दीवाने हैं, या कहिये इसके पूरी तरह से आदि हो चुके हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस व्हाट्सएप का आपके रिश्ते में गंभीर प्रभाव पड़ता है? ये आपके रिश्ते पर काफी भारी पड़ सकता है, चलिये बताते हैं कैसे -
●लगातार संपर्क में रहने की बाध्यता
व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का एक बड़ा नुकसान ये है कि यह आपको अपने प्रेमी व बाकी महत्वपूर्ण लोगों के साथ लगातार संपर्क में रखने के लिए बाध्य करते हैं। अगर वह हर 15 मिनट में कोई मैसेज या पोक नहीं कर कर रहा है, तो महसूस होना शुरू हो जाता है कि आप उसे ठीक से बात नहीं कर रहे हैं, या अवोइड कर रहे हैं।
●ब्लू टिक मार्क है समस्या
व्हाट्सएप का नया अपडेट ब्लू टिक मार्क ये दर्शाता है कि दूसरे व्यक्ति ने आपका मेसेज पढ़ लिया है। ये एक तरह से बड़ी समस्या का कारम है, यदि आप किसी काम में व्यस्थ हैं, लेकिन आपने अपने साथी का मेसेज पढ़ तो लिया है, लेकिन जल्दबाज़ी में जवाब देने का समय नहीं है, तो ऐसे में आपका पार्टनर भड़क जाता है। दुनिया में ऐसे भी लोग हैं, जिन्होंने ब्लू टिक मार्क की वजह से हुए विवाद के चलते तलाक भी लिये हैं।
●लास्ट सीन है खतरनाक
अगर बॉयफ्रेंड का लास्ट सीन 10:15 दिखा रहा है और एक मिनट भपर हो जाने के बाद भी उसका रिप्लाई नहीं आया तो ये लड़के के लिये एक बड़ी समस्या है। ये चीज़ एक दूसरे के मन में शक का बीज बो सकती है और ब्रेकअप की नौबत तक आ सकती है। और अगर आप लास्ट सीन छिपाते हैं तो भी आप फंसते हैं। ये 'ये ना उगल पाएं, ना निगल पाएं' वाली स्थिति होती है।
●एक दूसरे की स्वतंत्रता
दिन भर मैसेज करना किसी रिलेशनशिप की शुरुआत में तो बेहद मज़ेदार लगता है, लेकिन रेलेशन थोड़ा पुराना हो जाने के बाद ये एक बड़ा सिर दर्द बन जाता है। आपको हर मैसेज का रिप्लाई करना होता है, वरना ये समझाना होता है कि आप क्या मैसेज का रिप्लाई नहीं कर पाए/पाईं। इस तरह से आपकी निजि स्वतंत्रता की तो वाट ही लग जाती है, और रिलेशनशिप व्हाट्सएप की मेहरबानी से एक बोढ बन जाता है।
●भाषा और स्टेटस का पंगा
हम कई बार कहना कुछ चाहते हैं, लेकिन लिखने पर पढ़ने वाले को उसका मतलब कुछ और समझ आता है। इस तरह काफी मिस अंडरस्टेंडिंग पैदा होती है। वहीं आपके द्वारा डाला गया व्हाट्सएप स्टेटस भी कई बार गलत संदेश देता है और आपका साथी आपसे नाराज़ हो जाता है।
10/03/2016
व्रत वाला साबूदाना
ये तो पता ही होगा कि डॉमिनोज वाले फुल वेज पिज्जा निकाले हैं. साबूदाने वाला. पिज्जा तो आज का है, लेकिन साबूदाना काफी पहले से है. व्रत के लिए सबसे खास आइटम है. धकापेल उड़ाया जाता है. हलवा, खिचड़ी और खीर बनाकर खाई जाती है. इसलिए अब पिज्जा का छोड़ो. उसका रिव्यू तो खाने के बाद किया जाएगा. तुम साबूदाने की पोल-पट्टी सुन लो. फिर साबूदाने की खीर और हलवा और ये लेटेस्ट पिज्जा खाते रहिना. कोई हाथ तो पकड़ेगा नहीं.
एक पेड़ होता है. सागो. इसी की जड़ का गूदा निकालकर साबूदाना बनाया जाता है. केरल वाले इसको कप्पा कहते हैं. मजे की बात ये है कि ये खाया तो सबसे ज्यादा उत्तर भारत में जाता है. और पैदा होता है दक्षिण भारत में. वैसे तो स्मार्ट टेक्नॉलजी के वक्त ये दूरी कुछ नहीं है. चाहे तो कोई भी एक क्लिक में पूरी जानकारी ले ले. लेकिन कोई रिस्क नहीं लेता. कि एक तो व्रत में गिनी-चुनी चीजें खाने को मिलती हैं, उसमें से भी एक आइटम कट जाए, तो क्या बचेगा.
है तो शाकाहारी. लेकिन बनते-बनते इसकी दुर्गति हो जाती है. कचूमर निकल जाता है. कायाकल्प हो जाता है. जड़ें काटकर, ट्रकों में लादकर तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक की फैक्ट्रियों में पहुंचता है. वहां उसके साथ कांड शुरू होता है. छीलकर मेन चीज निकाल ली जाती है. वो फैक्ट्रियों में कई चक्कर घिसकर, कटकर महीन टुकड़ों में बंट जाता है. फिर उसे पानी में डालकर बड़े-बड़े खुले टैंकों में रखा जाता है. बस इसी जगह सारी छीछालेदर हो जाती है. यहां पड़ा-पड़ा वो फूलता है. सड़ता है. इसमें तमाम कीड़े पड़ जाते हैं.
वही कीड़े साबूदाने को लज़ीज़ बनाते हैं भाईसाब. बहुत दिनों तक उन खुली टंकियों में रखने के बाद उसे दानेदार बनाते हैं. पॉलिश करते हैं और बोरों में भरकर पैकिंग के लिए भेज देते हैं. जो मन्नू किराना स्टोर पर पहुंचता है. वहां से आपके घर, किचन से होकर प्लेट में.
वैसे खास बात ये है कि ये मांसाहारी नहीं होता. अमा कीड़ों के न हड्डियां होती हैं न मांस, न खून. तो वो चाहे जित्ता पड़ा हो, मांसाहारी नहिये होगा. लेकिन अगर डिस्कवरी चैनल वाले बेर ग्रिल्स नहीं हो. और कीड़े में प्रोटीन नजर नहीं आता, घिन आती है खाने में, तो ये आपके लिए नहीं है. अगर व्रत रखते हुए अंतर्यामी दुर्गे को साबूदाना खाकर चकमा दे रहे हो तो वो तुमको त्रिशूल भोंक देंगी.
9/23/2016
2 दिन तक व्हाट्सएप पर चाहे जो कर लो, उसके बाद के लिए ये पढ़ लो
25 सितंबर तक का आपका सारा डाटा सेफ है और ये फेसबुक के साथ शेयर नहीं होगा. यही फैसला है. हाई कोर्ट ने कह दिया है. अगर यूजर 25 सितंबर से पहले अपना अकाउंट हटा देते हैं तो व्हाट्सएप्प को यूजर के डाटा को पूरी तरह से सर्वर से डिलीट करना होगा. हाई कोर्ट ने इसके अलावा केंद्र सरकार को कहा है. सुनो तय करो कि इंटरनेट मैसेजिंग ऐप्स को कैसे कानूनी नियम कायदे से रेगुलेट किया जाए.
अब क्योंकि ज्यादातर को इस फैसले का मतलब तो नहीं ही समझ आया होगा. इसलिए ऐसा समझो कि हाई कोर्ट के इस ऑर्डर के बाद व्हाट्सएप्प के कष्ट-मरों के लिए बड़ा खतरा होगा. खतरा ये कि व्हाट्सएप्प की नई प्राइवेसी पालिसी जो 25 सितंबर से लागू हो रही है. उसके बाद यूजर का डाटा और पर्सनल इंफो कभी भी फेसबुक के साथ शेयर हो सकता है.
व्हाट्सएप अपने यूजर का नंबर फेसबुक से शेयर करेगा. जिससे व्हाट्सएप चलाने वालों को फेसबुक से और चुने हुए ऐड मिलेंगे. ये एड फेसबुक पर होंगे. कंपनी कहती है कि फेसबुक को दिया गया नंबर सेफ रहेगा. व्हाट्सएप कहता है कि इस शेयरिंग से फेसबुक मैपिंग होवेगी. बेहतर फ्रेंड सजेशन और ज्यादा सटीक ऐड यूजर्स को मिलेंगे.
ये याचिका कर्मण्य सिंह सरीन और श्रेया सेठी ने दायर की थी. वो कहते हैं ये नए चोंचले 7 जुलाई 2012 की प्राइवेट पॉलिसी के खिलाफ है. 25 अगस्त 2016 में इस पॉलिसी में संशोधन किया गया. व्हाट्सएप डाटा शेयर कर रहा है , जो यूजर से धोखे जैसा है. कोर्ट से कहा गया था इस के खिलाफ कुछ करिए.
8/29/2016
सेंधा नमक भारत से कैसे गायब कर दिया गया
सेंधा नमक वात, पित्त और कफ को दूर करता है
आप सोच रहे होंगे की ये सेंधा नमक बनता कैसे है ? आइये आज हम आपको बताते हैं कि नमक मुख्य कितने प्रकार होते हैं !
एक होता है समुद्री नमक दूसरा होता है काला नमक और तीसरा सेंधा नमक (rock slat)
सेंधा नमक बनता नहीं है पहले से ही बना बनाया है। पूरे उत्तर भारतीय उपमहाद्वीप में खनिज पत्थर के नमक को ‘सेंधा नमक’ या
सैन्धव नमक’, लाहोरी नमक आदि आदि नाम से जाना जाता है।जिसका मतलब है ‘सिंध या
सिन्धु के इलाक़े से आया हुआ। वहाँ नमक के बड़े बड़े पहाड़ है सुरंगे है,वहाँ से ये नमक आता है मोटे मोटे टुकड़ो मे होता है आजकल पीसा हुआ भी आने लगा है ।यह ह्रदय के लिये उत्तम, दीपन और पाचन मे मदद रूप, त्रिदोष शामक, शीतवीर्य अर्थात ठंडी तासीर वाला, पचने मे हल्का है । इससे पाचक रस बढते हैं। तों अंत आप ये समुद्री नमक के चक्कर से बाहर निकले काला नमक ,सेंधा नमक प्रयोग करे ,क्यूंकि ये प्रकति का बनाया है ईश्वर का बनाया हुआ है और सदैव याद रखे इंसान जरूर शैतान हो सकता है लेकिन भगवान कभी शैतान नहीं होता।
हुआ ये कि जब ग्लोबलाईसेशन के बाद बहुत सी विदेशी कंपनियो( कैपटन कुक ) ने नमक बेचना शुरू किया तब ये सारा खेल शुरू हुआ। अब समझिए खेल क्या था ,खेल ये था कि विदेशी कंपनियो को नमक बेचना है और बहुत मोटा लाभ कमाना है और लूट मचानी है तो पूरे भारत मे एक नई बात फैलाई गई कि आयोडीन युक्त नामक खाओ ,आयोडीन युक्त नमक खाओ ! आप सबको आयोडीन की कमी हो गई है !
दुनिया के 56 देशों ने अतिरिक्त आयोडीन युक्त नमक 40 साल पहले बेन कर दिया अमेरिका मे नहीं है जर्मनी मे नहीं है फ्रांस मे नहीं ,डेन्मार्क मे नहीं , यही बेचा जा रहा है डेन्मार्क की सरकार ने 1956 मे आयोडीन युक्त नमक बैन कर दिया क्यों उनकी सरकार ने कहा हमने मे आयोडीन युक्त नमक खिलाया (1940 से 1956 तक ) अधिकांश लोग नपुंसक हो गए,जनसंख्या इतनी कम हो गई कि देश के खत्म होने का खतरा हो गया।उनके वैज्ञानिको ने कहा कि आयोडीन युक्त नमक बंद करवाओ तो उन्होने बैन लगाया और शुरू के दिनो मे जब हमारे देश मे ये आयोडीन का खेल शुरू हुआ इस देश के बेशर्म नेताओ ने कानून बना दिया कि बिना आयोडीन युक्त नमक बिक नहीं सकता भारत मे वो कुछ समय पूर्व किसी ने कोर्ट मे मुकदमा दाखिल किया और ये बैन हटाया गया।
सेंधा नमक के उपयोग से रक्तचाप और बहुत ही गंभीर बीमारियों पर नियन्त्रण रहता है ।! क्योंकि ये अम्लीय नहीं ये क्षारीय है (alkaline ) क्षारीय चीज जब अमल मे मिलती है तो वो न्यूटल हो जाता है ! और रक्त अमलता खत्म होते ही शरीर के 48 रोग ठीक हो जाते हैं ये नमक शरीर में पूरी तरह से घुलनशील है और सेंधा नमक की शुद्धता के कारण आप एक और बात से पहचान सकते हैं कि उपवास ,व्रत मे सब सेंधा नमक ही खाते है तो आप सोचिए जो समुंदरी नमक आपके उपवास को अपवित्र कर सकता है वो आपके शरीर के लिए कैसे लाभकारी हो सकता है ? सेंधा नमक शरीर मे 97 पोषक तत्वो की कमी को पूरा करता है। इन पोषक तत्वो की कमी ना पूरी होने के कारण ही लकवे (paralysis ) का अटैक आने का सबसे बढ़ा जोखिम होता है सेंधा नमक के बारे में आयुर्वेद में बोला गया है कि यह आपको इसलिये खाना चाहिए क्योंकि सेंधा नमक वात, पित्त और कफ को दूर करता है। यह पाचन में सहायक होता है और साथ ही इसमें पोटैशियम और मैग्नीशियम पाया जाता है जो हृदय के लिए लाभकारी होता है। यही नहीं आयुर्वेदिक औषधियों में जैसे लवण भाष्कर, पाचन चूर्ण आदि में भी प्रयोग किया जाता है।
ये जो समुद्री नमक है आयुर्वेद के अनुसार ये तो अपने आप मे ही बहुत खतरनाक है ! क्योंकि कंपनियाँ इसमे अतिरिक्त आयोडीन डाल रही है । अब आयोडीन भी दो तरह का होता है एक तो भगवान का बनाया हुआ जो पहले से नमक मे होता है , दूसरा होता है industrial iodine ।ये बहुत ही खतरनाक है तो समुद्री नमक जो पहले से ही खतरनाक है उसमे कंपनिया अतिरिक्त industrial iodine डाल के पूरे देश को बेच रही है जिससे बहुत सी गंभीर बीमारियां हम लोगो को हो रही है । ये नमक मानव द्वारा फ़ैक्टरियों मे निर्मित है ।
आदि गंभीर बीमारियो का भी कारण बनता है । इसका एक कारण ये है कि ये नमक अम्लीय (acidic) होता है ! जिससे रक्त अम्लता बढ़ती है और रक्त अमलता बढने से ये सब 48 रोग आते है । ये नमक पानी कभी पूरी तरह नहीं घुलता हीरे (diamond ) की तरह चमकता रहता है इसी प्रकार शरीर के अंदर जाकर भी नहीं घुलता और अंत इसी प्रकार किडनी से भी नहीं निकल पाता और पथरी का भी कारण बनता है और ये नमक नपुंसकता और लकवा (paralysis ) का बहुत बड़ा कारण है समुद्री नमक से सिर्फ शरीर को 4 पोषक तत्व मिलते है ! और बीमारिया जरूर साथ मे मिल जाती है !
पांच हजार साल पुरानी आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में भी भोजन में सेंधा नमक के ही इस्तेमाल की सलाह दी गई है। भोजन में नमक व मसाले का प्रयोग भारत, नेपाल, चीन, बंगलादेश और पाकिस्तान में अधिक होता है। आजकल बाजार में ज्यादातर समुद्री जल से तैयार नमक ही मिलता है। जबकि 1960 के दशक में देश में लाहौरी नमक मिलता था। यहां तक कि राशन की दुकानों पर भी इसी नमक का वितरण किया जाता था। स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होता था। समुद्री नमक के बजाय सेंधा नमक का प्रयोग होना चाहिए।
8/27/2016
बॉयफ्रेंड के बावजूद लड़कियां इसलिए करती है दूसरे लड़कों के साथ बेवफ़ाई
लड़कियां अपने बॉयफ्रेंड के होते हुए भी दूसरे लड़कों के साथ प्यार भरी बातें करती नजर आतीं हैं। जानें इसका कारण...
किसी भी रिलेशनशिप में प्यार और विश्वास का होना बहुत जरूरी है, लेकिन कई बार सुनने को मिलता है कि फलां शख्स अपने पार्टनर को छोड़कर किसी अन्य के साथ फ्लर्ट कर रहा है। ऐसा सिर्फ लड़के ही नहीं बल्कि लड़कियां भी करतीं हैं। लड़कियां अपने बॉयफ्रेंड के होते हुए भी दूसरे लड़कों के साथ प्यार भरी बातें करती नजर आतीं हैं। यदि आपके साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा है तो हैरान नहीं हों। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं।
इनमें से एक ये हो सकता है कि कई लड़कियों को औरों के मुकाबले थोड़ा ज्यादा केयर व अटेंशन चाहिए होता है। यदि उन्हें अपने बॉयफ्रेंड से ये नहीं मिलता तो वो दूसरे लड़कों की तरफ खिंचने लगती हैं। ऐसे कई और कारण हो सकते हैं जिन्हें जान लेना आपके लिए मददगार साबित हो सकता है और आप अपनी गर्लफ्रेंड को खोने से बच सकते हैं।
कई बार लोग रिश्ते में ताजगी बनाए रखने के लिए भी ऐसा करते हैं और फ्लर्ट करने को अच्छा भी मानते हैं। हो सकता है आपकी पार्टनर सिर्फ मस्ती-मजाक कर रही हो तो पहले सारी बातें जान लेना ही बेहतर है।
कहीं आपकी पार्टनर आपके होते हुए भी खुद को अकेला तो महसूस नहीं करती। कई बार लड़कियां असुरक्षा की भावना में आकर भी ऐसा कर बैठती हैं।
अगर आपकी गर्लफ्रेंड बहुत ज्यादा अटेंशन मांगती है तो आपको उसका बहुत ज्यादा ख्याल रखने और प्यार देने की जरूरत है क्योंकि ऐसे स्वभाव की लड़कियां कभी नहीं बदलती हैं।
चौथा कारण ये हो सकता है कि आप रोमांटिक नहीं हैं इसलिए आपकी पार्टनर आपको बोरिंग इंसान समझती है। कई बार ऐसी समस्या भी फ्लर्ट करने का कारण बन जाती है।
अगर आपकी पार्टनर आपको जलाने के लिए ऐसा करती है तो फिर आपको परेशान होने की जरूरत नहीं क्योंकि वह आपका ध्यान अपनी तरफ खींचने के लिए ऐसा कर रही है।
कई बार तो लड़कियां अपना रिश्ता खत्म करने के लिए भी ऐसा करती हैं।
8/25/2016
आखिर कैसे एक जनजाति विशेष के देवता श्रीकृष्ण हिंदू धर्म के परम ईश्वर बन गए?
आखिर कैसे एक जनजाति विशेष के देवता श्रीकृष्ण हिंदू धर्म के परम ईश्वर बन गए?
कृष्ण की कहानी वृष्णिवंशी जनजाति के नायक के तौर पर शुरू होती है और अंत होने तक यहां उन्हें विष्णु के अवतार के साथ ही परम ईश्वर भी मान लिया जाता है।
हिंदू धर्मग्रंथों में जितने भी देवी-देवताओं का जिक्र मिलता है, उनमें श्रीकृष्ण सबसे लोकप्रिय हैं. ग्वालों के बालगोपाल, प्रेम के देवता, धर्म के उपदेशक और एक योद्धा भी. उनकी पूरी कहानी (इसे कृष्णगाथा भी कह सकते हैं) में कई असमान तत्वों का सामंजस्यपूर्ण और सुसंगत मेल है. कृष्ण की कहानी 800 साल के लंबे अंतराल में विकसित हुई है. लेकिन दिलचस्प बात है कि कहानी का यह विकास उल्टे क्रम में हुआ है. पहले यहां पांडवों के मित्र और द्वारका के संस्थापक के रूप में युवा कृष्ण सामने आते हैं. फिर गायें चराने वाले ग्वालों के गोपाल और ग्वालिनों के साथ रास रचाने वाले प्रेम के प्रतीक कृष्ण का वर्णन आता है.
कृष्ण की कहानी यादवों से ही संबंधित वृष्णिवंशी जनजाति के नायक के तौर पर शुरू होती है. और अंत होने तक उन्हें विष्णु के अवतार के साथ ही परम ईश्वर भी मान लिया जाता है.
कृष्ण का सबसे पहला जिक्र छठी शताब्दी ईसापूर्व ‘छंदोग्य उपनिषद’ में मिलता है. इसमें उन्हें एक साधु और उपदेशक बताया गया है.
वासुदेव और कृष्ण
ब्रिटेन में लैंकास्टर विश्वविद्यालय के धार्मिक अध्ययन विभाग में मानद शोधकर्ता रहीं फ्रीडा मैशे ने एक किताब लिखी है, ‘कृष्ण; ईश्वर या अवतार? कृष्ण और विष्णु के बीच संबंध’. इसमें वे लिखती हैं कि कृष्ण-वासुदेव, पहले सतवत और वृष्णिवंशी यादवों के नायक हुआ करते थे. जिन्हें समय के साथ-साथ देवता मान लिया गया. फिर दोनों एक-दूसरे के समानार्थी हो गए, एक हो गए.
कृष्ण का सबसे पहला जिक्र छठी शताब्दी ईसापूर्व ‘छंदोग्य उपनिषद’ में मिलता है. इसमें उन्हें एक साधु और उपदेशक बताया गया है. साथ ही, देवकीपुत्र के रूप में भी उनका उल्लेख है. चौथी शताब्दी ईसापूर्व में पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ (संस्कृत व्याकरण का ग्रंथ) में कृष्ण को एक देव की तरह पेश किया गया. साथ ही, वृष्णिवंशी यादव जनजाति के बारे में भी विस्तार से बताया गया, जिससे कृष्ण जुड़े हुए थे. मौर्य राजदरबार में ग्रीस के दूत रहे मेगास्थनीस की किताब ‘इंडिका’ में बताया गया है कि किस तरह शूरसेनियों (वृष्णिवंशी यादवों की ही एक शाखा) ने मथुरा में कृष्ण की देवता की तरह पूजा करना शुरू की. इस तरह चौथी शताब्दी ईसापूर्व में कृष्ण-वासुदेव न सिर्फ नायक से देवता के रूप में परिवर्तित हुए, बल्कि काफी लोकप्रिय भी हो चुके थे.
विष्णु रूप कृष्ण
दूसरी शताब्दी ईसापूर्व तक वैदिक पूजा पद्धति कठोर हो चुकी थी और उसके धार्मिक संस्कार महंगे. इसी दौरान सम्राट अशोक के समर्थन और प्रचार कार्य से ऊर्जा पाकर बौद्ध दर्शन अपना आधार बढ़ाता जा रहा था. इसी बीच, बड़े पैमाने पर विदेशी आक्रमणकारियों (जैसे शक आदि) का भारत में आना भी शुरू हो गया. उनके लिए बौद्ध दर्शन और अन्य प्रचलित साम्प्रदायिक मत ज्यादा मुफीद थे. ऐसे में, पुरोहित वर्ग के अधिकार और असर में कमी आने लगी. निचले वर्णों की आर्थिक स्थिति भी बेहतर हुई और उन्होंने वर्ण व्यवस्था को चुनौती देना शुरू कर दी. और जैसा कि सुवीरा जायसवाल अपनी किताब ‘वैष्णववाद की उत्पत्ति और विकास’ में लिखती हैं, ‘ब्राह्मणों ने कृष्ण-वासुदेव के भक्ति-पंथ पर कब्जा कर लिया. वे कृष्ण को नारायण-विष्णु का स्वरूप बताने लगे. इसके पीछे उनका मकसद संभवत: सामाजिक आचार-व्यवहार में ब्रह्मणत्व का अधिकार और प्रभुत्व एक बार फिर से स्थापित करना था.’ यहां जिक्र करना दिलचस्प होगा कि नारायण और विष्णु भी पहले अलग देवों की तरह पूजे जाते थे. बाद में दोनों को एक ही मान लिया गया.
महाभारत में तमाम जगहों पर उस असमंजस या दुविधा का भी जिक्र मिलता है कि किसी अनार्य जनजातीय देव (कृष्ण) को परमेश्वर का दर्जा कैसे दिया जाए.
यानी इस काल में कृष्ण-वासुदेव का नारायण-विष्णु के साथ घालमेल हो गया. उन्हें महाभारत के युद्ध के नायक का दर्जा मिला. साथ ही भगवद् गीता का उपदेश देने वाले उपदेशक के रूप में भी मान्यता मिली. हालांकि महाभारत में ही तमाम जगहों पर उस असमंजस या दुविधा का भी जिक्र मिलता है कि किसी अनार्य जनजातीय देव (कृष्ण) को परमेश्वर का दर्जा कैसे दिया जाए. इसीलिए शुरू-शुरू में कृष्ण-वासुदेव का विवरण नारायण-विष्णु के अंशावतार के रूप में ही दिया जाता है.
बाल कृष्ण
इस तरह, पहली शताब्दी ईसापूर्व तक कृष्ण की पूजा सिर्फ उनके युवा स्वरूप में ही होती थी. वे पांडवों के मित्र, एक उपदेशक, वृष्णिवंशी यादवों के नायक और विष्णु के अंशावतार माने जा चुके थे. लेकिन उनकी महागाथा में एक सबसे अहम चीज अब भी नदारद थी. वह था- उनका बचपन, जिसका आज तक सबसे ज्यादा जिक्र होता है. मगर कालांतर में जब कृष्ण को अभीर (अहीर) जनजाति के देव का दर्जा मिला तो यह कमी भी पूरी हो गई. कृष्ण के साथ गोपाल (गाय चराने और पालने वाले) का मेल भी हो गया. हालांकि यह अब तक साफ नहीं है कि अभीर जनजाति भारतीय उपमहाद्वीप की ही मूल निवासी थी या किसी और जगह से आकर यहां बसी थी. लेकिन इतना साफ है कि ईस्वी की पहली शताब्दी में यह जनजाति सिंधु घाटी के निचले इलाकों में निवास करती थी और बाद में पलायन कर सौराष्ट्र (अब गुजरात) में जा बसी. शक और सातवाहन के शासनकाल में यह जनजाति राजनीतिक रूप से भी सक्रिय हुई.
वृष्णिवंशी यादवों और अभीरों में काफी समानताएं थीं. खासकर दोनों समाजों में महिलाओं को जिस तरह की मान्यता दी जाती थी. संभवत: इन्हीं समानताओं की वजह से वृष्णिवंशियों के कृष्ण-वासुदेव को अभीरों का आराध्य भी मान लिया गया. उदाहरण के लिए दो प्रसंग सामने रखे जा सकते हैं. पहला- महाभारत में अर्जुन को कृष्ण अपनी बहन का हरण कर लेने की सलाह देते हैं. इसके पक्ष में दलील देते हैं कि इस तरह धर्म की रक्षा होगी. लेकिन साथ ही वे शायद यह संकेत भी देते हैं कि महिलाओं का हरण करना वृष्णिवंशियों की सामान्य परंपरा रही होगी. इसी तरह, कृष्ण के श्रीधाम सिधारने के बाद जब अर्जुन अपनी छत्रछाया में वृष्णिवंशी महिलाओं को लेकर मथुरा की ओर जाते हैं, तो उनके काफिले पर अभीरों का हमला हो जाता है. और अभीर हमलावर उस काफिले में शामिल कई महिलाओं का अपहरण कर लेते हैं.
पहली से पांचवीं शताब्दी ईस्वी तक विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण जैसे महाकाव्यों ने टूटी हुई उन कड़ियों को जोड़ने का काम किया, जिनसे कृष्ण-वासुदेव और विष्णु-नारायण को समग्र रूप से एक ही रूवरूप में स्थापित किया जा सके.
बहरहाल, कृष्ण-वासुदेव को अभीरों के देव की मान्यता मिलते ही गोपियों के साथ उनके हास-परिहास-रास की कहानियां और प्रसंग भी सामने आने लगते हैं. चूंकि अभीर खानाबदोश किस्म की जनजाति थी, इसलिए उनकी संस्कृति में महिलाओं-पुरुषों के लिए ज्यादा उन्मुक्तता का माहौल था. अभीरों में उन्मुक्तता की यही संस्कृति कृष्ण की रासलीलाओं का आधार भी बनी.
परमेश्वर-कृष्ण
हम जानते हैं कि कृष्ण की कहानी में कृष्ण-गोपाल का सम्मिश्रण बाद में हुआ. क्योंकि महाभारत की मूल कहानी में कहीं भी कृष्ण के बचपन का जिक्र नहीं मिलता. चौथी शताब्दी ईस्वी में जब परिशिष्ट या उपबंध के रूप में महाभारत के साथ हरिवंश पुराण का जोड़ हुआ, तब कृष्ण-अभीर की पहचान को एक सुनिश्चित आकार मिला. इस तरह, पहली से पांचवीं शताब्दी ईस्वी तक विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण जैसे महाकाव्यों ने टूटी हुई उन कड़ियों को जोड़ने का काम किया, जिनसे कृष्ण-वासुदेव और विष्णु-नारायण को समग्र रूप से एक ही रूवरूप में स्थापित किया जा सके.
इस तरह, कृष्ण की जो कहानी अब सामने आती है, उसके मुताबिक, वे यादव क्षत्रियों (एक योद्धा जाति) के कुल में पैदा हुए. उनके पिता का नाम वसुदेव था, इसी आधार पर उनका एक नाम वासुदेव भी पड़ गया. उनका मामा कंस आततायी था, उन्हें मारना चाहता था, इसलिए उसके डर से उन्हें रातों-रात चोरी-छिपे ले जाकर अभीरों के संरक्षण में (नंद नामक गोप के घर) छोड़ आया गया. इसके बाद इस गाथा में समय के साथ-साथ गोपियों के प्रेमी, अर्जुन के सारथी और गीता में धर्म का उपदेश देने वाले उपदेशक के तौर पर कृष्ण परिपक्व होते हैं. और इस तरह कृष्णगाथा आखिरकार पूरी होती है. इसके बाद जनजातीय समुदाय के देवता को परम ईश्वर मानने को लेकर महाभारत में शुरू-शुरू दिखी दुविधा भी खत्म हो जाती है. और छठी शताब्दी ईस्वी में लिखी गई भागवत पुराण में उन्हें परमपिता परमेश्वर का दर्जा मिल जाता है.
रुचिका शर्मा
साभार
सत्याग्रह डॉट कॉम