11/06/2016

लड़कों को भरे शरीर वाली लड़कियां अच्छी लगती हैं, थोड़ा वजन बढ़ा लो'

हर संडे जब भी कॉलम लिखने बैठती हूं, औरतों के बारे में सोचती हूं, तो सबसे पहले मां की याद आती है. हर दोपहर पापा का टिफिन तैयार होकर जाता. गरमागरम. हर दोपहर दादाजी और हम बच्चे लंच करने बैठते. मां किचन से गरम-गरम फुल्के निकालकर लातीं. दादाजी का नियम था, प्लेट में रोटी गरम-गरम आए. जब पिछली रोटी का आखिरी निवाला मुंह में जाए, तभी अगली रोटी आंच से उठाकर प्लेट में रखी जाए. जब दादाजी (और घर के बाकी लोग) खा चुकते, तब मां के खाने का नंबर आता.

कभी-कभी ऐसा दिन भी आता कि कोई अचानक घर पर टपक पड़ता या फिर घर के बाकी लोग ही ज्यादा खा लेते. खाना कम पड़ जाता. कभी दाल, कभी सब्जी. तो जो भी बचता, मां उसे खा लेती. पिछली रात के बचे हुए खाने के साथ. इसमें कोई बेचारगी नहीं रहती कि बचा-खुचा खाने को मिल रहा है. ये एक आदत सी थी. एक माना हुआ सच सा था कि मां को आखिर में ही खाना है.

मैं परिवारों के बीच ज्यादा नहीं रही हूं, पर शायद हर जॉइंट फैमिली में ऐसा ही होता होगा. कम से कम अपने रिश्तेदारों के बारे में तो कह ही सकती हूं कि बहुएं सबको खिलाकर खाने बैठती हैं. अपनी जानकारी में मैंने ऐसा कोई घर नहीं देखा, जहां मां की पसंद का खाना बनता हो. असल में मालूम ही नहीं होता कि मां की पसंद है क्या. क्योंकि, हर बार मम्मी बच्चों से ही आकर पूछती हैं, ‘क्या खाओगे’. जो बच्चे कहते हैं, वही बन जाता है. कभी सब्जियां न हों, तो परवल और लौकी भी बन जाते हैं. लेकिन, कभी यूं नहीं होता कि मां कहे, आज ‘मुझे’ राजमा खाने का मन है, राजमा बनाती हूं. या फिर पुरुष पत्नी से, या बच्चे मां से पूछें, ‘आज क्या खाने का मन है?’

हमारे घरों में खाना और उससे मिलने वाले पोषण का केंद्र कभी औरतें नहीं होतीं. दूध, मेवे और फल अगर घर में आते हैं, तो इसलिए कि बच्चे खाएंगे. अगर आपके घर में ऐसा होता है, तो आपको बधाई.

लेकिन यहां बात सिर्फ परिवार के स्ट्रक्चर के अंदर औरत के स्थान की नहीं है. बात ये है कि औरतें अपनी हेल्थ के बारे में कितना और किस तरह सोचती हैं. जब सोचती हैं तो इसके मायने क्या होते हैं. क्या स्वस्थ रहना एक समाज के तौर पर हमारा और हमारी औरतों का लक्ष्य है?

नहीं.

बीते दिनों अपने डॉक्टर से हुई एक रेगुलर सी मीटिंग में उसने मुझसे पूछा, ‘तुम्हारा वज़न तो नहीं बढ़ा है?’ मैंने कहा ‘हां, 2 किलो बढ़ गया है’. डॉक्टर का झट से जवाब आया, ‘वजन मत बढ़ने दो. ये लड़कियों की सेल्फ-एस्टीम के लिए बड़ा खराब होता है.’

सेल्फ एस्टीम. यानी खुद पर भरोसा. लड़कियों का वजन बढ़ने पर खुद पर भरोसा, खुद पर कॉन्फिडेंस क्यों टूटता है? इसलिए कि वो ‘अस्वस्थ’ हो जाएंगी? नहीं. बल्कि इसलिए कि वो भद्दी दिखेंगी.

मोटी लड़कियों को लेकर एक अजीब सी अस्वीकार्यता है लोगों के मन में. वजन ज्यादा होगा, तो अच्छी नहीं दिखोगी. वजन ज्यादा होगा, तो शादी नहीं होगी. वजन ज्यादा होगा, तो लोग हंसेंगे. कभी किसी को ये कहते नहीं सुना कि वजन ज्यादा होगा, तो हॉर्मोन्स पर फर्क पड़ेगा. पीरियड के साइकिल पर फर्क पड़ेगा, जिससे दिमाग पर असर पड़ेगा. वजन ज्यादा होगा, तो स्ट्रेस बढ़ेगा. शुगर बढ़ सकती है. ब्लड प्रेशर या दिल की तकलीफ हो सकती है. प्रेग्नेंसी में दिक्कतें आ सकती हैं. पीरियड या प्रेग्नेंसी के समय पाइल्स का खतरा हो सकता है.
और जो चुनिंदा लड़कियां फिटनेस को लेकर जागरूक रहती हैं, उनसे बार-बार पूछा जाता है, ‘तुम तो मोटी नहीं लगती, फिर जिम क्यों जाती हो?’ या फिर, ‘तुम्हें एक्सरसाइज की क्या जरूरत है?’ ‘तुम इतनी ओवरवेट तो नहीं लगतीं?’

पॉपुलर कल्चर (पढ़ें बॉलीवुड या मॉडलिंग) में अक्सर लड़कियों की फिटनेस को उनके दुबले होने से जोड़ा जाता है. जिम में घुसती हूं, तो चारों तरफ वॉलपेपर में एक्ट्रेसेस की तस्वीरें दिखती हैं. हेल्थ मैगज़ीनों के कवर पर एक्ट्रेसेस की तस्वीरें दिखती हैं. लड़कियों को बताया जाता है कि फलां एक्ट्रेस ने किस तरह एक महीने में या एक साल में इतने किलो घटा लिए. और देखो, अब वो कितनी सुंदर लगती हैं. ‘सुंदरता’ और ‘सेक्स अपील’ की इस दुनिया में कभी औरतों को इस बारे में नहीं बताया जाता कि वजन घटाने (या बढ़ाने) के टारगेट में उनकी सेहत में कितना सुधार हो गया. वजन घटाना एक कॉस्मेटिक की तरह है. इस्तेमाल करो और सुंदर हो जाओ.

कमाल की बात ये है कि जो लड़कियां अंडरवेट हैं, उनसे लोग कम ही पूछते हैं कि वजन बढ़ाने के बारे में क्या सोचा है. बल्कि हर दूसरी लड़की ये जरूर कह जाती हैं कि तुम्हारी पतली कमर देखकर जलन होती है. और अगर वजन बढ़ाने की सलाह मिलती भी है, तो ये कहकर कि इतनी दुबली लड़कियां मर्दों को अच्छी नहीं लगतीं. मर्दों को थोड़ा भरे शरीर वाली लड़कियां अच्छी लगती हैं. इस पूरी बातचीत में सेहत घास चरने चली जाती है. और मैं बात कर रही हूं पढ़ी-लिखी, औसत कमाई वाले घरों से आने वाली लड़कियों की.
हम एक अमीर देश नहीं हैं. लाखों बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, लेकिन सिर्फ बच्चे ही नहीं, उनकी मांएं भी कुपोषण का शिकार हैं. और इसीलिए बच्चे कमजोर पैदा होते हैं. ये बात है उस तबके की, जो पौष्टिक खाना अफोर्ड नहीं कर सकते. लेकिन जिस तबके के लोग घर में सुकून से दो वक़्त का खाना खा भी रहे हैं, वहां भी सारे पोषण का केंद्र या तो पुरुष हैं, या बच्चे. और अगर पिछड़ी मानसिकता वाले घरों की बात करें, तो बच्चों में भी महज लड़के.

ऐसे में हमारे कल्चर में शामिल व्रतों की परंपरा औरतों की सेहत में और चार-चांद लगा देती है. उन औरतों की, जिनके कमजोर कंधों पर सदियों की बेतुकी परम्पराओं को ढोने की जिम्मेदारी है.

थोड़ा दिमाग लगाकर सोचिए. आपके इस शरीर को, जो हर महीने खून बहाता है, जो बच्चे पैदा करने के पहले 9 महीने उन्हें पोषण देता है, जो मीनोपॉज के बाद कमजोर होने लगता है, उसे ‘परम्पराओं’ और ‘सुंदरता’ की जरूरत है, या पोषण की.

सौजन्य से
प्रतीक्षा

11/03/2016

मदर टेरेसा को तो जानते हो, इंडिया के 'फादर टेरेसा' के बारे में पता है?

5 सितम्बर 2016 को मदर टेरेसा को संत की उपाधि मिल गई. संत टेरेसा ने इंडिया के लिए क्या किया, कितना किया. सिर्फ अपने स्वार्थ  और लोगों का धर्म बदलवाने के लिए किया. या वाकई सच्चे दिल से लोगों की सेवा की. इस मुद्दे पर हर किसी की अपनी-अपनी राय हो सकती है. लेकिन ‘मदर टेरेसा’ सिर्फ एक नाम नहीं है. खुद एक उपाधि बन चुका है. पाकिस्तान के अब्दुल सत्तार एधी को पाकिस्तानी ‘फादर टेरेसा’ कहा जाता था. क्योंकि वो भी लोगों की बिना किसी स्वार्थ के सेवा करते थे. इंडिया में भी एक ऐसा आदमी था. जो उम्र के 104 साल तक बेसहारा लोगों के लिए चंदा इकठ्ठा करता रहा. जब मरा तो पूरे राज्य ने मातम मनाया था.

राम लाल भल्ला लाहौरवाले. बंटवारे के बाद हिंदुस्तान आ गए थे. तब से अपनी पत्नी के साथ अमृतसर में ही रहते थे. पंजाब में 84 के दंगों में बहुत लोग मारे गए थे. मरे हुए लोगों के रिश्तेदारों, खासकर औरतों की हालत बहुत खराब थी. पंजाब में आतंकवाद भी बहुत बढ़ रहा था. राम लाल भल्ला फ्रीडम फाइटर थे. सन 86 से राम लाल ने पैसे इकट्ठे करने शुरू किए. उन औरतों और बच्चियों के लिए, जिनके पास रोज़ के खाने के लिए भी पैसे नहीं थे.

जब राम लाल गलियों से गुज़रते थे. चिल्लाते थे. दान मांग रिहा है राम लाल भल्ला लाहौरवाला विधवा औरतां ते बसहारा बच्चियों दे लाई. (राम लाल भल्ला लाहौरवाला दान विधवा औरतों और बेसहारा बच्चियों के लिए दान मांग रहा है)
उनकी आवाज़ सुनकर दुकानदार और लोग उनके पास इकट्ठे हो जाते थे. उनको पैसे देते थे. दया से नहीं. इज्ज़त से. हर बार पैसे मिलने पर राम लाल कहते थे ‘शुक्रिया, दाता.’
अपनी शुरुआती पेंशन के दो हिस्से भी उन्होंने इसी के लिए दे दिए थे. अपने पास केवल उतने ही पैसे रखते जितना उनके रोज के खर्चे के लिए जरूरी होता. लोगों को उन पर इतना भरोसा था कि वो ज्यादा से ज्यादा पैसे देते थे. पता था कि ये पैसे ज़रूरतमंद के पास तक पहुंचेंगे ज़रूर. लेकिन ये सब इतना आसान नहीं था. आतंकवादियों ने राम लाल को धमकियां दी थीं. 87 में तो उनको उठा भी ले गए थे. इतना पीटा था कि उन्हें बाएं कान से सुनाई देना बंद हो गया था. जब पूछा गया कि वो ये सब कब तक करते रहेंगे. उन्होंने कहा था मरते दम तक.

21 जून 1999 में उनकी डेथ हो गई. अमृतसर में. उस वक़्त उनकी उम्र 104 साल थी. मरने के कुछ ही दिन पहले तक वो घूम-घूम कर चंदा इकठ्ठा करते रहे थे. उन्होंने टोटल 25 लाख रुपए इकट्ठे किये थे. पूरा पंजाब उनकी मौत का ग़म मना रहा था. पंजाब के उस वक़्त के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने भी ‘फादर टेरेसा’ की मौत पर दुःख जताया था. और वो औरतें और बच्चियां राम लाल भल्ला को बहुत सारा शुक्रिया दे रही थीं, जिनको उन्होंने जिंदगी जीने का नया तरीका दिया था.

11/02/2016

शादी का विकल्प नहीं बन सकता फिर भी हमारे यहां लिव-इन फलफूल क्यों रहा है?

आधुनिक समाज में यह पहली बार हो रहा है जब लड़कियां भी अपनी यौन ज़रूरतों को समझ रही हैं और शादी में बंधे बिना लिव-इन के माध्यम से उनको पूरा कर रही हैं.

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशन के समर्थन में बोलते हुए कहा कि जब दो युवा लोग साथ रहना चाहते हैं तो इसमें गलत क्या है? सुप्रीम कोर्ट का यह बयान सिर्फ कानूनी राय नहीं है बल्कि शहरी युवाओं के एक बड़े तबके की सोच भी है. आज भारतीय समाज में परंपरागत शादियों के साथ-साथ प्रेम विवाहों की संख्या भी काफी बढ़ चुकी है इसके बावजूद लिव-इन रिलेशनशिप या सहजीवन संबंध महानगरीय युवाओं में एक बड़े तबके की पसंद बनता जा रहा है. ‘लिव-इन’ यानी लड़के-लड़की का बिना शादी के पति-पत्नी की तरह साथ में रहना.

यह संबंध कई सवालों को जन्म देता है. मसलन, जब समाज में प्रेम विवाह करके मनचाहे जीवनसाथी के साथ रहने का विकल्प खुल गया है तो फिर लिव-इन क्यों पनप रहा है? लड़के-लड़कियां शादी के बजाय लिव-इन के लिए ज्यादा सहज क्यों हैं? और यह भी कि क्या लिव-इन शादी का विकल्प बन रहा है?

पहले यह देखना ज़रूरी है कि लोग शादी करते क्यों है? दुनियावी अर्थों में सीधे-सीधे समझें तो किसी भी इंसान को शादी से मुख्यरूप से तीन चीजें मिलती हैं; साथ, सेक्स और बच्चा. यूं तो शादी, लड़के-लड़की, दोनों की जिंदगी को बदलती है, लेकिन आमूल-चूल बदलाव लड़की की जिंदगी में आते हैं. यूं कह सकते हैं कि कई मामलों में शादी के बाद लड़की की परिस्थितियां पहले की तुलना में लगभग 180 डिग्री का घुमाव ले लेती हैं. शादी से मिलने वाली इन तीनों बुनियादी चीजों को पाने के लिए अक्सर ही लड़कियों को अपनी सोच, पसंद-नापसंद, आज़ादी, आदतों को छोड़ना या बदलना और कई अनचाही चीजों को अपनाना पड़ता है. शादी का मुहूर्त निकलते ही अंतहीन ज़िम्मेदारियां अक्सर लड़की के ही पाले आ जाती हैं.

उम्र, वक्त, कैरियर और ज़रूरत का तकाज़ा ऐसा होता है कि लिव-इन के रिश्ते में जाना लड़के-लड़की दोनों को ही समय और ऊर्जा की बचत लगता है.

इस लेन-देन की सौदेबाज़ी के बिना शादी का लड्डू खाने को नहीं मिलता. लेकिन शादी से मिलने वाली तीन में से दो सुविधाएं (साथ और सेक्स) लिव-इन में बिना किसी शर्त या सौदेबाज़ी के मिल जाती हैं! शादी के इन साइड इफेक्टस के कारण शहरी लड़कियां लिव-इन के प्रति ज्यादा आकर्षित हो रही हैं.

सीधे-सीधे कहा जाए तो करियर के चरम पर शादी के साथ मुफ्त में मिलने वाली ज़िम्मेदारियों से बचने और शादी से मिलने वाली सुविधाएं पाने का एकमात्र तरीका है लिव-इन. उम्र, वक्त, कैरियर और ज़रूरत का तकाज़ा ऐसा होता है कि लिव-इन के रिश्ते में जाना लड़के-लड़की दोनों को ही समय और ऊर्जा की बचत लगता है. कई बार महंगे किराए के फ्लैट को शेयर करना, घर से दूर किसी सहयोगी की कमी, साथी मिलने से आत्मविश्वास और सुरक्षा के अहसास में बढ़ोतरी आदि भी लिव-इन में जाने के कारण बनते हैं.

बड़े शहरों और महानगरों में तेज़ी से प्रचलित होने के बावजूद लिव-इन भारतीय समाज में शादी के विकल्प के तौर पर नहीं उभरा है. ऐसे जोड़े अभी भी अपवाद ही होंगे जो तमाम उम्र लिव-इन में ही रहना चाहते हों. कई बार लिव-इन में जी रहे लड़की-लड़के दोनों को पता होता है कि वे शादी घरवालों की ही मर्ज़ी से करेंगे. ऐसा भी होता है कि इस संबंध में रह रहे लड़का-लड़की चाहते हैं कि उनका लिव-इन का साथी ही जीवन साथी बने, लेकिन ऐसा देखा गया है कि ज्यादातर इस रिश्ते की उम्र बहुत छोटी होती है. कहा जा सकता है कि भारत में लिव-इन शादी का विकल्प तो नहीं, बल्कि शादी से पहले के पड़ाव के रूप में प्रचलित हो रहा है.

हमारे समाज में शादी से अलग भी एक-तरफा यौन संबंधों का अस्तित्व हमेशा से रहा है. ऐसे पुरुषों की संख्या हर कालखंड में पर्याप्त रही है जिन्होंने सदा ही अपनी अतिकामेच्छा को जैसे-तैसे पूरा किया है. समाज ने भी पुरुषों की यौनेच्छा पूर्ति के तमाम तरीकों पर मौन सहमति दी़ है. लड़कियों के पास अपनी सामान्य यौनेच्छा की पूर्ति के लिए भी नहीं के बराबर विकल्प रहे हैं. ज़्यादातर महिलाओं ने अक्सर ही शादी के बाहर और भीतर थोपे गए यौन संबंधों को झेला है. शादी में अकसर बलात् बनाए जाने वाले यौन संबंधों के बरक्स, लिव-इन सहमति के संबंधों को जगह दे रहा है.

भारत में लिव-इन को 1999 में तब पहली बार मान्यता मिली जब अदालत ने कहा कि दो व्यस्क लोगों का साथ रहना और संबंध बनाना गैरकानूनी नहीं है.

आधुनिक समाज में यह पहली बार हो रहा है जब लड़कियां भी अपनी यौन ज़रूरतों को समझ रही हैं और शादी में बंधे बिना भी लिव-इन के माध्यम से उनको पूरा कर रही हैं. लिव-इन एक तरफ जहां लड़कियां को ढेर सारी आज़ादी के साथ आनंद देता है, वहीं साथ में कई परेशानियां के रूप में इस आज़ादी की कीमत भी वसूल लेता है.

भारत में लिव-इन शादी का स्थाई विकल्प न होने के बावजूद भी, शादी का एक अस्थाई विकल्प बनकर तो उभरा ही है. यह भी कहा जा सकता है कि लिव-इन के माध्यम से समाज का एक तबका आधुनिक समय में आदिम युग के यौन व्यवहार की तरफ लौट रहा है. दुनियाभर के समाज बहुत सारी चीज़ों में अतीत की तरफ वापसी कर रहे हैं. ज़्यादातर पुराने चलन अब फैशन बनकर लौट रहे हैं. अब कई जगहों पर मिट्टी के घर बनाए और सराहे जा रहे हैं. जल संरक्षण की भी पुरानी तकनीकों को ज्यादा कारगर माना जा रहा है. चिकित्सा शास्त्र में भी प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद की मांग फिर तेजी से बढ़ रही है. कई तरह के तनावों से भरी दुनिया अब योग और ध्यान की प्राचीन पद्धतियों की तरफ लौट रही है.

सेक्स के मामले में भी समाज का एक वर्ग उस पुराने समय में लौट रहा है, जहां शादी नहीं थी लेकिन बहु-यौनसंबंध सामान्य बात थी. यह बात सिर्फ लिव-इन के मामले से ही साबित नहीं होती बल्कि यूरोप आैर अमेरिकी समाज को देखें तो आज के समय में बहुत सारे शहरी पति-पत्नी विवाहेतर संबंध रखते हैं. इंटरनेट ने इस काम में बहुत ज्यादा सहयोग किया है.

सेक्स के मामले में भी समाज का एक वर्ग उस पुराने समय में लौट रहा है, जहां शादी नहीं थी लेकिन बहु-यौनसंबंध सामान्य बात थी. यह बात सिर्फ लिव-इन के मामले से ही साबित नहीं होती बल्कि यूरोप आैर अमेरिकी समाज को देखें तो आज के समय में बहुत सारे शहरी पति-पत्नी विवाहेतर संबंध रखते हैं. इंटरनेट ने इस काम में बहुत ज्यादा सहयोग किया है.

गर्भनिरोधकों और गर्भपात की आधुनिक सुविधाओं के साथ लड़कियां बिना कोई शर्त रखे या माने इस संबंध को जी रही हैं. निःसंदेह सभी रिश्तों की अपनी चुनौतियां होती हैं, लिव-इन की भी हैं. लेकिन लिव इन को नाजायज़, अवैध और संस्कृति विरूद्ध मान लेने भर से यह रिश्ता खत्म तो बिल्कुल नहीं होगा. इस रिश्ते की जटिलता और चुनौतियां कम करने के लिए ज़रूरी है कि बिना किसी पूर्वाग्रह के इस पर बात की जाए.

सब फोन चार्ज के किस्से जितने देखो उतने कम

माना स्मार्टफोन लाइफलाइन है भाई. इसके बिना जीने से अच्छा है लंगोटा मारकर जंगल चले जाएं. बैराग्य ओढ़ लें. कमोड पर भी जो चीज साथ नहीं छोड़ती उसका नाम मोबाइल है दोस्त. लेकिन वही मोबाइल जान का दुश्मन बन जाता है अगर उसकी बैटरी खत्म हो जाए. सोचो किसी थकाऊ पकाऊ से रिश्तेदार के बगल में बैठे हो. वो अपनी रामकथा सुनाने में तुम्हारे कानों को गला के चुआ देने पर उतारू है. उसकी मार से तुमको तुम्हारा मोबाइल बचाए है. अचानक उसकी बैटरी चुक जाए. गुस्सा बहुत आएगा न. लेकिन ये जानते हुए भी कि बैटरी चुक जाएगी, तुम उसको चार्ज नहीं किए थे. कुछ अफवाहें तुम्हारे अंदर ठोंक के भर दी गई हैं. उनका जाला साफ करने का वक्त आ गया है. आओ हम बताते हैं बैटरी कैसे चार्ज करोगे तो फायदे में रहोगे.

1.
कुछ एक्स्ट्रा सयाने लोग बताते हैं कि थोड़ी थोड़ी देर पर बैटरी चार्ज करोगे तो वो खराब हो जाएगी. उसकी उम्र कम पड़ जाएगी. ऐसा कुछ न है भैया. कहीं निकलने से पहले उसको डबोडब्ब ऊपर तक भर लो. बैटरी एकदम चुके तब चार्ज करने से अच्छा है थोड़ी देर पहले ही खोंस दो चार्जर.

2.
एक सलाह कुछ ज्ञान का कीड़ा दिमाग में पाले लोग देते हैं कि सुनो, एकदम दो या चार परसेंट बैटरी बचे तो पिन खोंसना. नहीं तो बैटरी खराब हो जाएगी. उनकी बात मानकर फोन के मरने का इंतजार करते रहते हो तो चेत जाओ. ये बहुत बड़ा झूठ है साब. दरअसल लीथियम बैटरी का लोएस्ट स्ट्रेस लेवल होता है. उस पर पहुंचने से पहले बैटरी चार्ज कर लेनी चाहिए. नहीं तो वो हो जाएगा कि बैटरी की जिंदगी कम हो जाएगी.

3.
रात में सारी बैटरी चूस के अंतिम नोटिफिकेशन तक कमेंट करके जो मोबाइल चार्जिंग में लगाते हो. और सुबह निकालते हो. ये मोबाइल को गुप्त रोग दे देगा बताए देते हैं. जैसे खुद दिन भर भूखे रहने के बाद रात भर नहीं खाते रहते, वैसे ही फोन के ऊपर भी दया करो.

4.
हमेशा फुल्ल चार्जिंग के जुगाड़ में न रहो. कुछ लोगों को जैसे दीवार देखकर पेशाब लग आती है. वैसे ही बिजली का सॉकेट देखकर चार्जिंग की चाह लग जाती है. वो दौड़कर चार्जर ठांस देते हैं. भले बैटरी 70 परसेंट चार्ज हो. ये जान लो कि बैटरी कभी फुल चार्ज नहीं करना. 100 परसेंट चार्ज बैटरी भी अपनी उम्र खुद खा लेती है.

5.
चार्जिंग करने के दौरान फोन गरम हो जाता है? ओह, महंगा वाला आईफोन है. पहले तो सॉरी. उसे सिर्फ फोन कहने के लिए. अब सुनो जुगाड़. उसका कवर निकाल दो. उसको थोड़ी राहत मिलेगी. कवर निकाल के ही चार्ज करना अब. जब फोन धूप में रखा हो चार्ज होने के लिए. कभी कभी ऐसी सिचुएशन आ जाती है भाई. तब उसको कवर से न निकालना.

10/31/2016

खर्च के मामले में पिछली पीढ़ी से अलग है मिलेनियल्स का मिजाज

साल 1975 में फिल्म दीवार में एंटी-हीरो का किरदार निभाने वाले अमिताभ बच्चन का यह डायलॉग मशहूर है कि 'आज मेरे पास बंगला है, प्रॉपर्टी है, बैंक बैलेंस है, गाड़ी है...।' वह डायलॉग उस वक्त पैसे से खरीदी जा सकने वाली चीजों से जुड़ी चाहतों का एक संकेत था। उसमें दिक्कत सिर्फ एक थी कि उदारीकरण के दौर से पहले के उस भारत में मकान, प्रॉपर्टी, ऑटोमोबिल्स हासिल करना और यहां तक कि बैंक खाते खोलना आसान नहीं था। मिडल क्लास तब संयम, सादगी और रोजगार की सुरक्षा पर काफी जोर देता था।

अब 2016 में आएं। 27 साल की पूर्णिमा बाली गुड़गांव में एक डिजिटल ऐड एजेंसी में काम करती हैं। बाली की यह चौथी जॉब है। वह सालाना 10 लाख रुपये कमाती हैं और अपने पैरंट्स के साथ रहती हैं, जो 'दीवार' वाली पीढ़ी के हैं। बाली कहती हैं, 'मेरे पास बंगला नहीं है, प्रॉपर्टी भी नहीं है और न ही गाड़ी है।' बाली कहती हैं, 'हम पिछली पीढ़ी जैसे नहीं हैं।' उनका कहना है कि वह उन चीजों पर खर्च करना पसंद करती हैं, जिनसे उन्हें तुरंत संतोष मिले। जैसे देश-विदेश में सैर-सपाटा, शॉपिंग और डांस क्लास और मार्शल आर्ट्स जैसी हॉबीज। बाली अगले महीने न्यू जीलैंड जाने वाली हैं। यह इस साल विदेश में सैर वाली उनकी दूसरी ट्रिप होगी।

दरअसल, बाली 1981 से 2000 के बीच जन्मी जेनरेशन वाई यानी मिलेनियल्स से ताल्लुक रखती हैं। 2021 तक भारत में 20 से 35 साल की उम्र वालों की संख्या कुल आबादी का 64% से ज्यादा होने का अनुमान है। ऐसे में मिलेनियल्स खरीदारी और खर्च के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव लाएंगे। मनोवैज्ञानिक इस पीढ़ी को 'राइट नाउ' जेनरेशन कहते हैं। बेंगलुरु की साइकॉलजिस्ट अन्ना चांडी का कहना है, 'यह पीढ़ी कोई सामान अपने पास रखने की फीलिंग पाने के बजाय अनुभवों को तरजीह देती है।' चांडी का कहना है कि भारत के मिलेनियल्स का जोर ट्रैवल पर है और वे आंट्रप्रन्योर बनना चाहते हैं।

28 साल के अयांग्शु लाहिड़ी के लिए मकान खरीदना प्राथमिकता नहीं है। बेंगलुरु में अपनी पत्नी के साथ किराए के मकान में रहने वाले ग्राफिक डिजाइनर लाहिड़ी का कहना है, 'ओनरशिप से ज्यादा महत्वपूर्ण है एक्सेस।' लाहिड़ी की यह तीसरी जॉब है और उनका ऐनुअल पैकेज 8 लाख रुपये से ज्यादा है। यह पूछने पर कि 'ईजी ईएमआई' पर वह मकान क्यों नहीं खरीद रहे और हर महीने किराया क्यों चुका रहे हैं, लाहिड़ी कहते हैं, 'ऐसी चीज पर पैसा क्यों खर्च करें, जिससे लाइफ में ज्यादा वैल्यू ऐड न हो रही हो?'

उन्होंने कहा कि 90 के दशक में लेदर जैकेट्स, रॉक म्यूजिक, कारें और मकान स्टेटस सिंबल हुआ करते थे, लेकिन ये मेरी लिस्ट में नहीं हैं। लाहिड़ी बताते हैं कि उनके पिता कुछ पैसा बैंक एफडी में निवेश करने की सलाह देते हैं, लेकिन लाहिड़ी की सोच अलग है। उनका कहना है, 'भविष्य के लिए पूरी जिंदगी बचत करने में गुजार देने के बजाय मैं फैंसी लाइफस्टाइल पसंद करता हूं।' हालांकि किसी भी मुश्किल के लिए वह थोड़ी बचत कर रहे हैं।

मिलेनियल्स के ऐसे रुख से मार्केटर्स को हैरानी नहीं है। मार्केटिंग और ब्रैंड कंसल्टेंट स्मिता सरमा रंगनाथन का कहना है, 'यही जेनरेशन तो ऊबर और एयरबीएनबी जैसी कंपनियों को रफ्तार दे रही है।' गोल्डमैन सैक्स ने 2013 में अमेरिकी मिलेनियल्स पर एक स्टडी की। रिपोर्ट में कहा गया कि पिछली पीढ़ी जिन चीजों पर जोर देती थी, उन्हें नई पीढ़ी तवज्जो नहीं दे रही और बड़ी खरीदारियों को या तो यह टाल रही है या कर ही नहीं रही है।

कारों का ही मामला लें। सर्वे में शामिल 30% लोगों ने कहा कि वे कार नहीं खरीदना चाहते। जरूरतों की वरीयता के हिसाब से मकान 40% लोगों के लिए जरूरी है, लेकिन 30% की प्राथमिकता में यह नहीं है। लग्जरी बैग्स को 30% लोग महत्वपूर्ण मानते हैं, लेकिन बड़ी प्राथमिकता में शामिल नहीं करते। बड़ी खरीदारियों से परहेज करने वाली इस प्रवृत्ति ने रेंटर जेनरेशन को जन्म दिया है, जो किराए पर सेवाएं और चीजें लेने में सहूलियत महसूस करती है।

बेंगलुरु में रहने वाले पति-पत्नी शिल्पी शर्मा और दीपांकर गौड़ किराए के मकान में रहते हैं और उन्होंने फ्रिज, टीवी और वॉशिंग मशीन जैसे कन्ज्यूमर ड्यूरेबल्स को भी किराए पर लिया है। एचआर मैनेजर शिल्पी कहती हैं, 'किराए के सामान को हटाकर आप दूसरा बेहतर सामान किराए पर आसानी से ले सकते हैं।' शिल्पी का कहना है कि मिलेनियल्स निवेश और खरीदारी के मामले में अच्छी जानकारी के साथ कदम बढ़ाते हैं। उनका कहना है कि मिलेनियल्स की परचेजिंग पावर पर शक नहीं किया जाना चाहिए और मामला अफोर्डेबिलिटी का नहीं, बल्कि प्रायॉरिटी का है। उन्होंने कहा कि उनकी और उनके पति की कुल सैलरी 12 लाख रुपये से ज्यादा है।

कन्ज्यूमर ड्यूरेबल रेंटिंग प्लेटफॉर्म Guarented के को-फाउंडर हर्षवर्द्धन रैकवार कहते हैं कि शिल्पी जैसे कन्ज्यूमर रेंटिंग के बिजनस को रफ्तार दे रहे हैं। पिछले साल अक्टूबर में शुरू हुई Guarented ने इस साल अगस्त में कलारी कैपिटल से 3.4 करोड़ रुपये जुटाए हैं। इसके 95% ग्राहक 21 से 35 साल के बीच के हैं। भारत सहित कई देशों के 7,700 मिलेनियल्स पर किए गए डेलॉयट के पांचवें ऐनुअल सर्वे के मुताबिक भारत के 52% मिलेनियल्स अगले दो वर्षों में अपने एंप्लॉयर्स को छोड़ने की चाहत रखते हैं। यह सर्वे इसी साल किया गया था। अगर 2020 तक मौका मिलने की बात तो ऐसे लोगों का आंकड़ा 76% है।

10/30/2016

आप अपने मोबाइल फ़ोन के बिना कितनी देर रह सकते हैं

कई बार ऐसा होता है, आपके मोबाइल फ़ोन की घंटी बजती है. या फ़ोन आपकी जेब में वाइब्रेट करता है. आप तुरंत अपना फ़ोन निकाल कर देखते हैं. कोई कॉल नहीं. कोई मैसेज नहीं. लेकिन आपने तो एकदम साफ़ सुना था. कोई भूत-वूत तो कॉल नहीं किया था?  ज़रूर कान बज रहे होंगे. ये जो हुआ ना आपके साथ अभी-अभी, इसमें टेंशन वाली बात नहीं है. इसको कहते हैं फैंटम फ़ोन सिंड्रोम. अरे, घबराने वाली कोई बात नहीं है. ये कोई बीमारी नहीं है. खाली इसका नाम ही इतना भारी है. कि अच्छा-भला आदमी सोचे कौन सा रोग लग गया बैठे-बिठाए.

क्योंकि आप और हम रोबोट बन चुके हैं

आप अपने मोबाइल फ़ोन के बिना कितनी देर रह सकते हैं ? एक-दो-तीन घंटे? मिनट? लेकिन उस दौरान भी तो आपका मन अपने फ़ोन में ही लगा रहता है. क्या है कि आजकल के टाइम में हम लोग बहुत बिज़ी लोग हैं. एक से एक इम्पोर्टेन्ट कॉल आते हैं. हर समय फ़ोन पर टिपिर-टिपिर चैट करते हैं. जेब में जो फ़ोन रखा है वो हमारे शरीर का हिस्सा ही बन जाता है. और हम लोग उसके गुलाम. हमारे दिमाग में जब कोई बात चल रही होती है. हमको लगता रहता है कि इस ख़ास बात से जुड़ा कोई कॉल आएगा. इसीलिए बार-बार फील होता है कि फ़ोन अब बजा कि तब. और हम अपना फ़ोन निकाल कर बार-बार चेक करते रहते हैं.

जब आप बहुत स्ट्रेस या टेंशन में होते हैं. तब भी लगता है कि फ़ोन बज रहा है. वो इसलिए क्योंकि आप उस जगह, उस माहौल से भाग जाना चाहते हैं. और फ़ोन पर किसी अपने से बात करना आपको उस टेंशन से दूर करने का जरिया लगता है. लेकिन असल में ये एंग्जायटी की निशानी है.

दिमाग में हो जाता है शॉर्ट सर्किट

ये हैं दिमाग के अन्दर के तार
ये हैं दिमाग के अन्दर के तार PTI
कभी टीवी या कंप्यूटर को खुला हुआ देखा है? कितने सारे तार लगे होते हैं उसके अन्दर. दिमाग भी भाईसाब बिलकुल वैसा ही है. लेकिन दिमाग जो है वो दुनिया के हर हार्डवेयर से ज्यादा समझदार चीज़ है. उसके पास याददाश्त वाला बक्सा भी होता है.तो कभी-कभी दिमाग का कोई तार अचानक से करंट भेज देता है. करंट जाकर याददाश्त वाली खिड़की खड़खड़ा देता है. हमारी अपनी रिंगटोन उस याददाश्त वाले बक्से में सेव होती है. ऐसा लगता है हमने अपनी ही रिंगटोन सुनी. एक तेज़ झटके के करंट की वजह से वाइब्रेशन भी महसूस हो जाती हैं.

ये कोई अजूबा नहीं है. ना ही भूत आपको फ़ोन करके ये बोलने वाला है ‘तुम अशुद्ध हो, तुम सड़ चुके हो’. ये बस आपका दिमाग है. और हां आप अकेले नहीं हो जिसके साथ ऐसा होता है. दुनिया भर के 90 परसेंट लोग अपनी रिंगटोन सुनते हैं. अपने फ़ोन के वाइब्रेशन महसूस करते हैं. साइंटिस्ट लोग कहते हैं कि जो इतनी सारी दिमागी बीमारियां बढ़ रही हैं. उनका एक कारण फ़ोन का एडिक्शन है.

अच्छा अगर हो सके तो एक बार ये एक्सरसाइज़ करके देखो. अपने फ़ोन से दूर कितने घंटे रह सकते हो. बिना किसी कॉल या मैसेज की परवाह किए बिना. बता रहे हैं बहुत अच्छा लगता है.