12/02/2016

इस सर्वे के मुताबिक नोटबंदी के बाद पढ़े-लिखे 56 फीसदी वोटरों ने छोड़ा पीएम मोदी का साथ

जहां एक ओर देश के पीएम नरेन्द्र मोदी और भाजपा नोटबंदी के फैसले पर जनता का साथ होने का दावा कर रहे हैं। वहीं उनके इन दावों की एक अंग्रेजी अखबार के सर्वे ने पोल खोल कर सामने रख दी है। यदि उस अखबार के ऑन लाइन सर्वे की मानें तो 56 फीसदी जनता पीएम मोदी के नोट बंदी निर्णय के खिलाफ और केवल 29 फीसदी ही जनता उनके समर्थन मे खड़ी है। फिलहाल यह सर्वे घट-बढ़ भी सकता है।

बताते चलें नोटबंदी के 21 दिन बाद देश की जनता की राय जानने के लिये अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक ऑन लाइन सर्वे शुरु किया है। जिसमें देश की जनता से तीन सवालों पर उनकी राय मांगी गई थी।

इन सवालों में

पहला सवाल नोटबंदी का फैसला अच्छा और सही से ढंग से लागू हुआ।

दूसरा, अच्छा फैसला लेकिन सही ढंग से लागू नही हुआ।

तीसरा सवाल, खराब फैसला और बेकार तरीके से लागू हुआ है।

इस अखबार के ऑन लाईन सर्वे की मानें तो देश के पढा-लिखा तबका जो भाजपा का वोट बैंक कहा जाता है उस जनता ने आज तक हुए सर्वे में जो राय दी है। वह राय मोदी एप्स के द्वारा कराये गये सर्वे के उलट है। जनता द्वारा दी गई राय से स्थिति काफी कुछ स्पष्ट हो रही है। इस सर्वे के मुताबिक 56 फीसदी लोगों ने अपनी राय देते हुए नोटबंदी के फैसले को खराब और बेकार तरीके से लागू होना बताया है।

इसके अलावा 15 फीसदी जनता ने अपनी राय देते हुये पीएम मोदी के इस फैसले को अच्छा और सहीं ढंग से लागू न होना बताया।

वहीं केवल 29 फीसदी जनता ने पीएम मोदी के इस फैसले को अच्छा और सही ढंग से लागू होना बताया है।

यदि इस अखबार के ऑनलाइन सर्वे की माने तो पीएम मोदी के साथ केवल 29 फीसदी लोग ही खड़े हुए है।

अब सोइये पांच सौ हज़ार के नोटों के बिस्तर पर

नोट बंदी को तीन हफ्ते बीत चुके हैं। अब चौथा हफ़्ता शुरू हो चुका है। बैंकों की हालत जो सुधरने की बात थी। जो इस हफ्ते और बिगड़ ही रही है। क्या? नहीं बिगड़ रही? एक काम करो गुरु जाई के तनिक बैंक की लाईन में लग के देखो। और जो वहां जाने का बखत नहीं मिल रहा हो तो तनिक एटीएम में ही लग के देख लें। मार हो रहा है। हर रोज। बिल्डिंग के बाहर वाले एटीएम में रोज रात यही बवाल कट रहा है। खैर, जो होना था सो हुआ। अब सुनिए काम की बात।

जिस पैसे के लिए दिन रात एक करके आप भाग दौड़ रहे थे। गलती से भीग जाए तो दो-दिन तक हाथ में प्रेस लिए बैठे रहते थे। उन नोटों का हो क्या रहा है। अभी तक आरबीआई के पास। 8 ट्रिलियन पुराने 500 और 1000 के नोट जमा हो चुके हैं। 8 ट्रिलियन का मतलब जानते हैं। मतलब होता है लगभग 8 लाख करोड़। मुश्किल ये था कि इन नोटों का हो क्या।

अभी तक आरबीआई इन नोटों को जलाने और डंप करने के बारे में सोच रही थी। लेकिन केरल के आरबीआई ब्रांच ने इसका एक और उपाय ढूंढ लिया है। वो अब इन नोटों को एक हार्डबोर्ड बनाने वाली कंपनी को दे रहे हैं। जो इन्हें लकड़ी की भूसी के साथ मिला के जमा देंगे। और ये बोर्ड बन जाएगा।

हां, आपके दिमाग में चल रहा होगा कि कंपनी कहीं नोटों को अपने कारीगरों में बांट दे तब क्या होगा? तो लल्ला आरबीआई वाले इतने बेवक़ूफ़ नहीं  हैं। वो नोटों को पहले रद्दी बना दे रहे हैं। इसके बाद उसे फैक्ट्री वालों को दिया जा रहा है।

कंपनी का नाम है। वेस्टर्न इंडिया प्लाईवुड। बहुत ही पुरानी कंपनी है। इनके एमडी का कहना है कि शुरू में बहुत दिक्कत जा रही थी। क्योंकि नोटों का जो पेपर होता है। उसे पल्प बनाना बहुत मुश्किल था। लेकिन कंपनी के इंजीनियर लोगों ने रास्ता ढूंढ निकाला। होते ही खुराफ़ाती हैं ये इंजीनियर। लिख के रख लो कांग्रेस पार्टी का ट्विटर अकाउंट हैक करने वाला भी इंजीनियर ही होगा।

खैर, आप लाइन में लगिए। भारत मात की जय बोलिए। उधर बंगलुरु में 4 करोड़ से ज्यादा के नोट इनकम टैक्स ने पकड़े हैं। एकदम कड़कड़ीया नोट सब। भारत माता की जय।

संकलन
न्यूज़ मिडिया,समाचार पत्र .

12/01/2016

कौन थे वो दो लोग, जिन्होंने 1984 में भाजपा को दो सीटें दिलाई थीं?

अभी पंजाब और उत्तर प्रदेश में चुनाव हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरा जोर लगा रहे हैं भारत के हर राज्य में भाजपा की सरकार बनाने के लिये. केंद्र सहित कई राज्यों में भाजपा की सरकार है. कांग्रेस सिमट रही है. ये सारा डेवलपमेंट पिछले ढाई सालों में हुआ है. 2014 चुनाव में भाजपा बहुमत से सरकार में आई. 6 अप्रैल 1980 को अपना स्थापना के 34 वर्षों बाद. खूब सेलिब्रेशन हुआ.

इसमें ये बात भी याद आई कि जब भाजपा ने अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ा था 1980 में तो अपनी पार्टी से नहीं लड़ा. बल्कि जनता पार्टी से उम्मीदवार खड़े किये गये थे. 1984 में पहली बार भाजपा ने अपने कमल निशान से चुनाव लड़ा. पर उस वक्त कांग्रेस की लहर थी. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जनता की भावनाएं राजीव गांधी के साथ थीं. राजीव ने इसके लिये कोई कसर भी नहीं छोड़ी. विपक्षियों के खिलाफ बड़े-बड़े लोगों को उतारा गया. अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ राजघराने के माधवराव सिंधिया और हेमवती नंदन बहुगुणा के खिलाफ अमिताभ बच्चन को उतारा गया. प्रचार में कोई कमी नहीं छोड़ी गई. इस लहर में कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने 415 सीटें जीत लीं. भाजपा को दो मिलीं.

पर कौन थे ये दोनों लोग जो इस लहर में भी जीत गये? अटल बिहारी वाजपेयी भी हार गये थे. सारे बड़े नेता हार गये थे.

ये दोनों लोग थे- ए के पटेल जो गुजरात के मेहसाणा से जीते और दूसरे थे सी जे रेड्डी जो आंध्र प्रदेश के हनमकोंडा से जीते थे.

ए के पटेल

डॉक्टर थे. MBBS. गुजरात असेंबली में 1975 से 1984 तक सदस्य रहे थे. वीजापुर सीट से. 1984 के चुनाव में मेहसाणा में इंदिरा गांधी के खिलाफ नाराजगी थी. पटेल पॉवर दिखाई गई क्योंकि लोगों के मन में था कि सरदार पटेल को इंदिरा ने उचित सम्मान नहीं दिया था. मेहसाणा पटेलों के वर्चस्व का इलाका है. यहां के पटेल बाकी जगहों के लोगों से धनी हैं. डायमंड कटिंग सूरत में होता है. पॉलिशिंग सौराष्ट्र के पटेल करते हैं. पर सबसे खतरे वाला काम कूरियर का होता है. वो मेहसाणा के पटेल करते हैं. संयोग से इंदिरा गांधी की मौत 31 अक्टूबर को हुई और ये दिन सरदार पटेल का जन्मदिन है. ए के पटेल की इमेज क्लीन थी. वो जीत गये.

पर बाद में नरेंद्र मोदी से उनकी झंझट हो गई. नरेंद्र मोदी का होमटाउन वाडनगर भी मेहसाणा में ही आता है. झंझट के बाद पटेल का करियर डूब गया. 1999 में वो चुनाव हार गये. कहा कि नरेंद्र मोदी ने ही हरवाया है चुनाव. बाद में कांग्रेस ने यहां से पटेल उम्मीदवार खड़ा करना शुरू किया. और अब सीट उनके पास है. जैसा कि यहां के लोग कहते हैं. पार्टी नहीं यहां तय होता है कि दो पटेलों में से कौन ज्यादा काबिल पटेल है.

ए के पटेल 1984, 1989, 1991, 1996 और 1998 में लोकसभा पहुंचे. 2000 से 2006 तक राज्यसभा में रहे. 1998 में मिनिस्टर ऑफ स्टेट रहे. केमिकल्स और फर्टिलाइजर के.

अभी गुजरात के मुख्यमंत्री हैं विजय रूपानी. 2007 में ये गुजराज भाजपा के प्रवक्ता हुआ करते थे. 2007 में ही विजय ने घोषणा की कि ए के पटेल को पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण बाहर किया जा रहा है.

चेंदूपातला जंगा रेड्डी

वारंगल के हनमकोंडा से. आंध्र प्रदेश की विधानसभा में 1967-72, 1978-83 और 1983-84 तक रहे. 1984 में लोकसभा का चुनाव हनमकोंडा से लड़े. यहां उनके विपक्षी थे आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और भविष्य के प्रधानमंत्री नरसिंहा राव. और यहां पर सी जे रेड्डी ने राव को हरा दिया. राव के खिलाफ वारंगल में सेंटिमेंट बना हुआ था. लोग नाराज थे कि राव ने कुछ किया ही नहीं था.

आन्ध्र प्रदेश में कांग्रेस की करारी हार हुई थी. 1982 में NTR ने आंध्र की राजनीति में हीरो वाली एंट्री मारी थी. 300 फ़िल्में बनाया हुआ हीरो तेलुगु सेल्फ-रेस्पेक्ट को आधार बनाकर चीफ मिनिस्टर बन गया. 1983 में NTR ओपन हार्ट सर्जरी करने अमेरिका गए. इसी बीच आंध्र के गवर्नर ने अपने पॉवर का बेजा इस्तेमाल करते हुए NTR को हटाकर उनकी ही पार्टी के पूर्व कांग्रेस भास्कर राव को मुख्यमंत्री बना दिया. NTR तुरंत लौटे. अपने समर्थकों को लेकर गवर्नर के पास गए. एक महीने तक ड्रामा चला. खरीद-बिक्री रोकने के लिए एक महीने तक अपने विधायकों को फाइव-स्टार माहौल में छुपाकर रखा गया. हार कर इंदिरा ने रामलाल को हटाकर भविष्य के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा को गवर्नर बना दिया. उन्होंने NTR को फिर चीफ मिनिस्टर बनाया. तो कांग्रेस के खिलाफ सेंटिमेंट बना हुआ था. कांग्रेस के छः पूर्व कैबिनेट मिनिस्टर आंध्र से ही आते थे. चुनावों में वो सारे हारे.

पहले मास्टर हुआ करते थे रेड्डी. खेती की. सोशल कामों में आये. फिर राजनीति में आ गये. शुरूआत से ही तेलंगाना सत्याग्रह आंदोलनों में भाग लेते रहे. केरल तक के आंदोलनों में जाकर प्रोटेस्ट करते रहे. 1970 में बांग्लादेश को बनाने के पक्ष में दिल्ली में आंदोलन किया. गिरफ्तार हुए. इमरजेंसी के दौर में गिरफ्तार हुए. 1984 में गोल्डन टेंपल में आर्मी के घुसने को लेकर भी आंदोलन किया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल रहे.

पर बाद में आंध्र प्रदेश में बीजेपी ही उखड़ गई. वहां की राजनीति बदल गई. और रेड्डी का करियर रुक गया.

संकलन
न्यूज़ मिडिया,समाचार पत्र

11/30/2016

भूल चूक लेनी देनी, अब मरहम की प्रतीक्षा


          इरादे नेक हो सकते हैं। लक्ष्य भी निश्चित रूप से सही हैं। काले धन, भ्रष्टाचार और सीमा पार से नकली नोट की घुसपैठ एवं आतंकवादियों की गतिविधियों के विरुद्ध संपूर्ण भारत एकमत है। प्रधानमंत्री ने 500 और 1000 के पुराने करेंसी नोट को तत्काल प्रभाव से अवैध करार देने का फैसला इन मुद्दों से जोड़ा है।

वहीं इस निर्णय को लागू करने में रही कमियों, गड़बड़ियों, गंभीर असुविधाओं, अमीर की अपेक्षा दैनन्दिन आजीविका कमाने वाले गरीबों की गंभीर वित्तीय समस्या अब तक सरकार को भी कुछ हद तक समझ में आ जानी चाहिए थी। जमीनी राजनीति करने वाले भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को भी कार्यकर्ताओं एवं समर्थकों से समस्याओं का अहसास हुआ होगा। प्रधानमंत्री ही नहीं भाजपा अध्यक्ष की पृष्ठभूमि गुजरात की है। गुजरात सहित विभिन्न प्रदेशों के बाजारों में एक पट्टी लिखी दिखाई पड़ती है- 'भूल-चूक लेनी देनी।’ प्रतिपक्ष भी जानता है कि नोटबंदी का ऐतिहासिक फैसला अब वापस नहीं हो सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोची समझी राजनीतिक रणनीति के तहत अपने कार्यकाल की आधी अवधि के बाद अपने लोकप्रिय चुनावी वायदे को पूरा करने के लिए यह तोप चलाई है। इस राजनीतिक-आर्थिक गोलाबारी ने सबको हिला दिया है। वहीं साधन संपन्न उद्यमी, व्यापारी, संस्थान, बैंक से जुड़े लोग तात्कालिक गुबार के बाद आर्थिक क्रांति की नई रोशनी की आशा संजोए हुए हैं। खासकर शहरी नई पीढ़ी का बड़ा वर्ग डिजिटल लेन-देन को पसंद करता है। सरकार कैशलेस अर्थव्यवस्था को यथाशीघ्र लागू करना चाहती है। वहीं बैंकों में निजी या व्यावसायिक लेन-देन बढ़ने एवं इस नोटबंदी से जमा विपुल राशि आने पर भाजपा सरकार कुछ विकास एवं कारोबारी के लिए नए महत्वपूर्ण वित्तीय घोषणाएं कर सकी है।

नए वित्तीय वर्ष (2017-18) के आम बजट में वित्तीय सुधारों, करों में राहत, जी. एस. टी. लागू करने के लाभ, उद्योग धंधों के लिए ब्याज दरों में कमी के प्रावधान की गुंजाइश बन सकती है। लेकिन यह स्मरण रखना होगा कि हर आंदोलन और क्रांति के बाद करोड़ों लोगों की अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं। चुनावी वायदों और उन पर आंशिक अमल के बाद भी सूखे गले की प्यास की तरह चाह बढ़ जाती है। भारत की जनता बहुत धैर्यवान है। यह 'आशा पर आकाश टिका है’ वाली स्थिति को गले उतारती रहती है।

नोटबंदी ने गली-मोहल्ले से लेकर राजमार्गों, छोटे-छोटे कल-कारखानों, दुकानों इत्यादि में काम करने वाले मजदूरों के लिए बड़ी संख्या में रोजी-रोटी का संकट पैदा कर दिया  है। उन्हें काम देने वाले लघु-मध्यम उद्यमियों के लिए भी तात्कालिक वित्तीय संकट और उलझन की स्थिति है। भारत सरकार के छठे आर्थिक सेंसेस (2013-14) के अनुसार देश में लगभग 5 करोड़ 80 लाख लघु निजी व्यापारिक संस्थान हैं, जिनमें करीब 13 करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है। पिछले दो वर्षों में इसमें वृद्धि की अनुमानित संख्या 15 से 17 करोड़ बताई जाती है। नोटबंदी से उनके दु:ख-दर्द की दास्तां सड़कों पर देखी-सुनी जा रही है। इस कष्ट के बावजूद लाखों भोले-भाले लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर प्रश्न चिह्न नहीं लगा रहे हैं। दूरदराज के गांवों-खेतों-खलिहानों में काम करने वालों को भी संघर्ष की आदत है। कभी प्रकृति से लड़ना होता है, कभी पुरानी सामाजिक कुरीतियों अथवा बदलती अर्थव्यवस्था की चुनौतियों से निपटना होता है। उन्हें तो छोटे-बड़े नोट और सिक्कों का हिसाब भी दूसरों से समझना पड़ता है। कभी इलाके के दबंग साहूकारों से मदद या ज्यादती झेलनी पड़ी, तो कभी सहकारी आंदोलन में उपजे कई नेताओं अथवा अधिकारियों द्वारा रिश्वतखोरी एवं धमकियों का सामना करना पड़ा। इसलिए भ्रष्टाचार से मुक्ति के हर अभियान में हिंदुस्तान का आम आदमी झंडा लिए खड़ा रहता है। लेकिन अब उसे जयकार के साथ सरकारी खजाने से बजट में अच्छी राहत की उम्मीद है।

जैसा भी हो काला या सफेद धन-अरबों रुपया बैंकों में आ गया है। जन-धन के खाते में तो उसने नाम मात्र की राशि जमा की। मतलब, वह भी अपनी मेहनत की कमाई थी। गरीब को गैस की सब्सिडी भी तभी मिल सकती है, जब उसके पास किसी मकान मालिक से किराए के कमरे का प्रमाण हो या अधिकृत कॉलोनी में काई कच्चा-पक्का मकान होने पर आधार कार्ड बना हो। बहरहाल, उसे मजदूरी बढ़ने, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और इलाज की अच्छी मुफ्त सुविधा, दुकान या कारोबार के लिए इंस्पेक्टर राज से मुक्ति और बैंक से कर्ज लेने पर ब्याज-दरों में कमी जैसी कामनाएं हैं। आप पूंजी निवेश अमेरिका, यूरोप, चीन, रूस या खाड़ी के देशों से लाएं, अधिकाधिक लोगों को रोजगार दिलवाने की व्यवस्था करवाएं। फिलहाल तो बेरोजगारी ही बढ़ती गई है। बैंक से कर्ज पर ब्याज दरों में कमी का दूसरा असर निम्न या मध्यम वर्ग द्वारा जमा की गई धनराशि पर मिलने वाले ब्याज की दरों में भी कटौती होगी। चिंता यही है कि बैंकों की तिजोरी बड़ी कंपनियों के लिए खुलती जाए और पेंशनभोगी लोगों अथवा बचत करने वाली महिलाओं को घाटा हो जाए। नई क्रांति के बहुत पेंच हैं। इनकम टैक्स, जी.एस.टी. ही नहीं हर राज्य में समय-समय पर नए शुल्क लगते रहते हैं। मतलब सरकार को रेगिस्तानी पहाड़ से भी मीठे पानी की गंगा लानी है। सरकार कोशिश करती रहे, लोग भूल-चूक भी माफ करते रहेंगे।

सौजन्य से
न्यूज़ मिडिया,समाचार पत्र.

नोटबंदी से छाएगी मंदी? ख़र्च करें सैलरी, वरना जा सकती है नौकरी..!

अमेरिका में अगर लोग बचत करने लगें और भारत में लोग खर्च करने लगे तो इन दोनों देशों की अर्थव्यवस्था चमकने लगेगी। हालांकि पिछले दो दशक में भारतीयों की खर्च करने की आदत बढ़ी है, लेकिन नोटबंदी ने एक बार फिर लोगों की बचत बढ़ा दी है। नोटबंदी के बाद से अब तक बैंकों के पास 8.11 लाख करोड़ रुपया जमा हुआ है, जबकि नए नोटों के साथ जनता ने करीब 2.5 लाख करोड़ रुपया बैंकों से निकाला है, यानी कुल नोटबंदी का 18 फ़ीसदी रुपया ही बाज़ार में घूम रहा है। ऐसे में इस रुपये की घूमने की गति बढ़ाना नौकरी बचाने के लिए जरूरी है। दिख रहा है कि कैश की किल्लत ने लोगों की खर्च करने की क्षमता को ना सिर्फ कम किया है, बल्कि खर्च करने की उनकी इच्छा पर भी लगाम लगा दी है।

हालांकि ऐसा बिल्‍कुल भी नहीं है कि खर्च करने के अवसर नहीं हैं, या खर्च करने के लिए पैसे नहीं हैं। डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड या फिर इंटरनेट बैंकिंग के ज़रिए नौकरीपेशा आदमी बड़े मज़े से खर्च कर सकता है। लोग ख़र्च करें इस खातिर लगभग सभी रिटेल चेन स्टोर, शॉपिंग मॉल्स, रेस्तरां और ब्रांडेड सामान बेचनेवाले स्टोर्स छोटे-मोटे डिस्काउंट स्कीम्स भी लेकर आए हैं, मगर ग्राहक है कि सीढ़ियां चढ़ने को राजी नहीं है।

नोटबंदी के पहले दो हफ्ते सकुचाने के बाद इस हफ्ते मैंने 12 हज़ार रुपये की शॉपिंग की, जिसमें से की 6 हज़ार रुपये का एक ब्रांडेड ट्रैवल सूटकेस खरीदा, आम दिनों में वही सूटकेस मुझे करीब 12 हज़ार रुपये का पड़ता। नोटबंदी से मेरी तनख्वाह या कार्ड के ज़रिए खर्च करने की क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ा – असर पड़ा तो मेरी सोच पर, जिसने मुझे करीब दो हफ्ते तक शॉपिंग मॉल से दूर रखा। यह अनजाना डर उन तमाम 8 करोड़ लोगों में है, जो संगठित क्षेत्र की नौकरी में हैं। लेकिन वो कहते हैं ना, जो डर गया वो मर गया और अगर पहली दिसंबर को तनख्वाह मिलने के बाद भी आपने अपने खर्चों को पहले की तरह नहीं किया तो आपकी नौकरी पर भी संकट आ सकता है।

दरअसल, इसे इस तरह समझिए कि अर्थव्यवस्था में एक व्यक्ति का ख़र्च ही दूसरे व्यक्ति की आय बनता है, तो सीधे शब्दों में अगर हम सबने अपने खर्च कम करने शुरु कर दिए तो अर्थव्यवस्था में मंदी आएगी और उसका असर पक्का हमारी आमदनी और नौकरी पर पड़ेगा। अब इसी बात को दूसरी तरह ऐसे समझिए कि आखिर 100 रुपये की कीमत कितनी है? आप कहेंगे 100 रुपये की कीमत 100 रुपये है, लेकिन मैं कहूंगा कि 100 रुपये की कई हज़ार– कई लाख या कई करोड़ रुपये हो सकती है, और वह इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी जेब में रखा सौ रुपया कितनी तेज़ी से आपकी जेब से निकलकर किसी दूसरे तीसरे चौथे और हज़ारों-लाखों-करोड़ो लोगों की जेब का सफ़र तय करता है। यानी की सौ रुपये का एक नोट जितनी तेजी से जेब बदलेगा, या यूं कहें कि बार-बार खर्च होगा, वह उतनी ही बार किसी दूसरे व्यक्ति की आमदनी बनेगा, वह उतनी ही बार 100 रुपये कीमत का सामान या सेवा का उत्पादन करेगा और यूं अर्थवस्वस्था में उसका योगदान, लगातार बढ़ता ही जाएगा।

यकीनन, जिस डिजिटल रुपये वाली अर्थव्यवस्था में देश कदम रख रहा है, उसमें रुपये के घूमने की गति बढ़ जाएगी और जितने वक्त में कैश का एक सौदा होता था, उतने वक्त में ही डिजिटल मनी के सैकड़ों सौदे हो सकेंगे। ठीक वैसे ही जैसे पहले चिठ्ठी के ज़रिए संदेश एक हफ्ते में पहुंचता था और फिर ई-मेल और अब चैट के ज़रिए संदेश रिअल टाइम में पहुंच जाता है। इससे संवाद करने की हमारी शक्ति बढ़ी है। जैसे डिजिटल मैसेजिंग एप्स के ज़रिए संदेश भेजने के अलावा लाइव वीडियो कॉल भी हो रहा है, ठीक वैसे ही डिजिटल इकोनॉमी में ना सिर्फ सौदे तेज़ी से होंगें, उनमें पारदर्शिता और कारोबार में गुणवत्ता भी आएगी।

दरअसल, नोटबंदी से बाज़ार में मौजूद रोकड़ा या कैश, या यूं कहें कि साक्षात नोट की कमी भले ही हो गई है, मगर रुपया कम नहीं हुआ है। यह रुपया आपके बैंक में सुरक्षित है, और आपका ही है और आप जब चाहें जितना चाहें जैसे जिसपर चाहें खर्च करें, मगर क्‍योंकि फिलहाल नए नोटों की कमी है और आप अपना पैसा डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग या पेटीएम जैसे डिजिटल बटुए के ज़रिए खर्च कर सकते हैं।

इधर, अलग-अलग विशेषज्ञ अलग-अलग आंकड़े दे रहे हैं कि नोटबंदी से देश की जीडीपी या सकल घरेलू उत्पाद में 2 से 3 फ़ीसदी की गिरावट आएगी और सालाना विकास दर भी घटेगी। ऐसा तभी होगा जब नोट या रोकड़ा की कमी से लोग कम खर्च करेंगे और छोटे मध्यम तथा लघु उद्योगों में काम करने वाले करीब 40 करोड़ असंगठित क्षेत्र के लोगों की आय पर इसका असर पड़ेगा।

मेरे पत्रकार मित्र यतीश राजावत ने अपने एक ताज़ा लेख में कहा है कि अर्थव्यस्था में मंदी ना आए, इसके लिए सरकार को भी खर्च करना होगा और उसे ऐसा तुरंत ही करना पड़ेगा। आमतौर पर सरकार बजट में खर्च के प्रावधान करती है। मगर यह एक असामान्य परिस्थिति है और सरकार को तुरंत ऐसे कदम उठाने होंगे जिससे उन तमाम क्षेत्रों में तेज़ी आए जिनपर नोटबंदी का सीधा असर पड़ा है मसलन, ट्रेड, टूरिज़्म, लॉजिस्टिक, रियल स्टेट, ज्वैलरी और छोटे तथा लघु उद्योग।

दरअसल, इन सभी क्षेत्रों पर नोटबंदी का असर अभी अगले साल भर तक नज़र आएगा ऐसे में सरकार को विदेशी निवेश लाने तथा सामाजिक क्षेत्र एवं आधारभूत क्षेत्र में निवेश को प्राथमिकता देनी होगी। खर्च करने की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी सिर्फ आम जनता पर ही नहीं, बल्कि सरकार पर है ताकि बाज़ार का उत्साह और व्यापार का उत्साह बढ़े। अगर नोटबंदी का मतलब खर्चबंदी बन गई तो समझो कि नौकरी गई, आपकी भी और सरकार की भी।

11/29/2016

30 दिसंबर तक बदल सकती है नोटबंदी की कहानी

एक देश के रूप में मनी लॉन्ड्रिंग की हमारी क्षमता पर एक मजबूत केंद्र सरकार और एक कमजोर केंद्रीय बैंक, दोनों ही कुछ ज्यादा भरोसा करते दिख रहे हैं। डीमॉनेटाइजेशन के ऐलान से रद्द हुए 14.5 लाख करोड़ रुपये के करंसी नोटों में से करीब 8 लाख करोड़ रुपये के नोट बैंकों में जमा हो चुके हैं। आने वाले हफ्तों में घोषित और अघोषित करंसी का कुछ और हिस्सा वैध बैंक डिपॉजिट्स में आ जाएगा। सरकार और आरबीआई ने संभवत: इस कैलकुलेशन के साथ यह बड़ा अभियान शुरू नहीं किया था।

शुरुआती समीकरण बेहद आसान था।
करीब 4-5 लाख करोड़ रुपये बैंकों में आएंगे, जिन्हें सरकारी प्रयास से सामने आए काले धन के रूप में दिखाया जाएगा और बाद में यह रकम आरबीआई की देनदारी से घटा दी जाएगी जिससे बैंकों को नए सिरे से पूंजी दी जा सकेगी, अफोर्डेबल हाउसिंग प्रोजेक्ट्स को स्पॉन्सर किया जा सकेगा और फिस्कल डेफिसिट कम किया जा सकेगा। बैन करंसी में से कुछ तो शायद कभी भी डिपॉजिट में नहीं बदलेगी, लेकिन सरकारी गलियारों में आशंका पैदा हो रही है कि आंकड़ा कम रह सकता है।

सरकार के लिए यह कोई खुशनुमा नतीजा नहीं होगा।
14.5 लाख करोड़ रुपये का कुछ हिस्सा अगर डिपॉजिट्स में बदल भी जाए तो इसका अर्थ या तो यह होगा कि भारी-भरकम बेनामी कैश को इधर-उधर कर दिया गया या फिर ब्लैक मनी का बड़ा हिस्सा कैश के रूप में नहीं है। इससे विपक्ष को हथियार मिल जाएगा। कांग्रेस और वाम दल इस प्वाइंट को हाथ से नहीं जाने देंगे।

विपक्ष कर सकता है सवाल
इसे देखते हुए सरकार ने अब इनकम डिक्लेयरेशन स्कीम जैसी एक योजना का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत नोटबंदी का ऐलान होने के बाद बैंकों में जमा की गई अनअकाउंटेड रकम का अगर कोई खुलासा करे तो टैक्स, पेनाल्टी और सरचार्ज के रूप में कुल 50 पर्सेंट भुगतान करने और अनअकाउंटेड रकम का 25 पर्सेंट हिस्सा एक सरकारी स्कीम में चार वर्षों के लिए बिना ब्याज के जमा करने पर उसे मुकदमे का सामना नहीं करना होगा।

सीताराम येचुरी और उनके दोस्तों ने अगर भांप लिया कि इस आईडीएस-2 से अनअकाउंटेड कैश रखने वालों को बचने का रास्ता दिया जा रहा है तो वे हंगामा कर सकते हैं। हालांकि छिपाई गई नकदी को कोई भी बैंक अकाउंट में तब तक नहीं रखने वाला है, जब तक फाइनेंस मिनिस्ट्री यह वादा न करे कि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट और एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट के लोग पीछा नहीं करेंगे। विपक्ष यह सवाल कर सकता है कि डीमॉनेटाइजेशन के बाद भी अगर आईडीएस-2 ही लाना था तो 50 दिनों के लिए लोगों को मुश्किल में क्यों झोंका गया?

RBI के पास सीमित विकल्प
अगर आईडीएस-2 का मकसद मुश्किल पिच पर फंसी सरकार को बचाना है तो आरबीआई के मॉनेटरी एक्शन से उसके उलझन में फंसे होने का पता चलता है। साथ ही, यह बात भी सामने आ रही है कि बैंक डिपॉजिट्स में उम्मीद से ज्यादा उछाल से निपटने में आरबीआई को दिक्कत हो रही है। आरबीआई ने बैंकों को निर्देश दिया है कि 16 सितंबर से 11 नवंबर के बीच आए समूचे डिपॉजिट को वे उसे सौंप दें।

बॉन्ड प्राइसेज में उछाल और बचत करने वालों के रिटर्न में गिरावट के बीच अचानक उठाए गए इस कदम का मकसद बैंकों से एक्स्ट्रा फंड सोखना है, लेकिन इससे शेयर मार्केट में वोलैटिलिटी बढ़ सकती है।

30 दिसंबर तक बैंकों में आने वाली करंसी की मात्रा डीमॉनेटाइजेशन के इस पूरे किस्से का चेहरा बदल सकती है। अगर इसका अधिकांश हिस्सा बैंकों में जाता है तो डीमॉनेटाइजेशन का असल मतलब काले धन पर वार नहीं, बल्कि फाइनेंशियल इन्क्लूजन हो जाएगा। अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है कि कहानी कौन सा मोड़ लेगी। अभी तो इसकी स्क्रिप्ट आंधी की स्पीड से बदल रही है।

न्यूज़ मिडिया

11/28/2016

मेहमान हमारे भगवान, नोट बंदी ने इन विदेशी मेहमानों को भी मजबूर किया मदद मांगने की लिये

अतिथि देवो भव और ग्राहक हमारा भगवान होता है, इन दोनों वाक्यों को एक में मिक्स कर दो तो एक विदेशी सैलानी तैयार होता है. एक तो वो दूर देश से आया मेहमान है. दूसरा वो हमारा कस्टमर भी है. तो वो भगवान का होल स्क्वायर होता है. लेकिन इन सैलानियों पर भी नोटबंदी की मार पड़ गई है. राजस्थान में दो टूरिस्ट ग्रुप्स के पास दिल्ली वापस आने के पैसे नहीं बचे. तो उन्होंने पैसे कमाने के लिए भीड़ का मनोरंजन किया.

ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और फ्रांस के 10- 12 लोगों के दो ग्रुप. शनिवार को पुष्कर में गऊ घाट के पास स्ट्रीट परफॉरमेंस करते दिखे. लड़के म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट बजाते और लड़कियां एक्रोबेटिक स्टंट्स करते. हाथ में “You can help us” और “Money problem” वाले पोस्टर पकड़े थे. वहां आने जाने वाले लोग इनकी प्रॉब्लम समझे और काफी हेल्प कर भी दी.

ये लोग 8 नवंबर को इंडिया आए थे. पुष्कर मेला देखने. उसी रात हजार पनसौव्वा नोट बंद हो गए. 14 तारीख को मेला खत्म हो गया. अब इनको घूम घामकर वापस जाना है. उसके लिए दिल्ली जाना है. वहां एटीएम में पैसा नहीं हैं. तो कोई रास्ता बचा नहीं. फिर इस रास्ते से तकरीबन 2600 रुपए कमाए.

हिंदुस्तान टाइम्स को फ्रेंच टूरिस्ट एडेलेन ने बताया. शुक्रवार को मैं और मेरा एक दोस्त तीन घंटे एसबीआई के एटीएम की लाइन में लगे रहे. लेकिन हमारी बारी आई तो पैसा खतम हो गया. नत्थू शर्मा यहां 45 साल से रह रहे हैं. छोटी सी दुकान है. कहा कि इतने सालों में पहली बार देख रहा हूं कि मेहमानों को पैसा पाने के लिए गली में परफॉर्म करना पड़ा.