12/13/2016

मोदी सरकार ने दबा रखी है दलित छात्रों की 8,000 करोड़ की छात्रवृत्ति

देश में अनुसूचित जाति के मेधावी छात्रों की स्कॉलरशिप के 8000 करोड़ रुपए मोदी सरकार पर बकाया हैं। शोसल जस्टिस एवं एम्पॉवरमेंट मिनिस्ट्री को यह रकम चुकानी है। लेकिन यह उसके सालाना योजनागत खर्च से भी अधिक है। मेधावी छात्रों के लिए मैट्रिक के बाद स्कॉलरशिप केंद्र की प्राथमिकता वाली योजनाओं में से एक है। इसके तहत छात्रों की ओर से किए गए खर्च के लिए सहायता दी जाती है।

आपके बता दें कि देश की राज्य सरकारें विभिन्न योजनाओं के तहत अनुसूचित जाति के मेधावी छात्रों को मैट्रिक के बाद स्कॉलरशिप देती हैं। इस रकम की भरपाई केंद्र सरकार की सोशल जस्टिस एंड एम्पावरमेंट मिनिस्ट्री की ओर से की जाती है। अनुसूचित जातियों के कल्याण के जुड़ी योजनाओं के लिए यह नोडल मिनिस्ट्री है।

केंद्र सरकार पिछले कुछ समय से अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए इस स्कॉलरशिप की रकम को रिअम्बर्स करने में नाकाम रही है और अब बकाया रकम बढ़कर 8,000 करोड़ पहुंच गई है। राज्यों को इस वर्ष के लिए बकाया रकम का अभी तक भुगतान नहीं किया गया है। इसके अलावा पिछले वर्ष की बकाया रकम को चुकाने के लिए अतिरिक्त फंड की जरूरत है।


सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत ने इस बाबत इकनॉमिक टाइम्स से बात करते हुए कहा, 'हम इस समस्या को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। सिस्टम में सुधार के लिए राज्यों से बात की जा रही है। उन्हें डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर के जरिए स्कॉलरशिप का भुगतान करना चाहिए। इसके अलावा राज्यों को विभिन्न इंस्टीट्यूशंस की फीस में बड़े अंतर पर भी विचार करने की जरूरत है।'

गहलोत ने कहा कि स्कॉलरशिप का मुद्दा वित्त मंत्रालय के सामने उठाया गया है। सोशल जस्टिस एंड एम्पावरमेंट मिनिस्ट्री का योजनागत बजट 6,500 करोड़ रुपए का है। इसमें से 4,667 करोड़ रुपए सितंबर के अंत तक जारी कर दिया है। लेकिन, स्कॉलरशिप की 8,000 करोड़ रुपए बकाया रकम को चुकाने के लिए अतिरिक्त फंड आवंटित करने की जरूरत है।

8,000 करोड़ रुपए में से 5,400 करोड़ रुपए 2015-16 के फाइनेंशियल ईयर तक का एरियर है और यह मौजूदा फाइंनेंशियल ईयर के लिए जरूरत का एक तिहाई है। एरियर को चुकाने के लिए एक्सपेंडिचर फाइंनेंस कमेटी को एक नोट भेजा गया है। सोशल जस्टिस एंड फाइंनेंस मिनिस्ट्री ने फाइंनेंस मिनिस्ट्री से कहा है कि 5,400 करोड़ रुपए तुरंत जारी करने की जरूरत है।

इस बारे में एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना था, स्कॉलरशिप स्कीम के तहत अधिक खर्च की वजह फ्रॉड भी है क्योंकि एक व्यक्ति दो-तीन जगहों से स्कॉलरशिप ले रहा है। मिनिस्ट्री ने राज्यों से डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर के जरिए स्कॉलरशिप देने को कहा है। इससे वास्तविक मेधावी छात्रों को स्कॉलरशिप देना सुनिश्चित किया जा सकेगा।

12/08/2016

सिर्फ एक महीने में पेट अंदर करे


सिर्फ 29 दिन में करें तोंद अंदर

तोंद को अंदर करना या पेट और कमर की चर्बी घटाना कोई मुश्किल काम नहीं। यह बहुत आसान है। लेकिन व्यक्ति के भीतर संकल्प और मन को काबू में करने की इच्छाशक्ति नहीं है इसलिए यह कार्य बहुत ही मुश्किल नजर आता है।

अब हम आपको बताएंगे कि किस तरह योग के मात्र एक आसन से आप अपनी तोंद को आश्चर्यजनक रूप से 29 दिन में पूरी तरह से समाप्त कर सकते हैं। बस, चाहिए दृढ़ इच्छाशक्ति… तो क्या करना होगा आपको? आगे पढ़िए आसन को बताने से पूर्व कुछ जरूरी हिदायत

यदि आप किसी गंभीर रोग से ग्रस्त हैं, पेट संबंधी किसी बीमारी से जूझ रहे हैं या आप रीढ़ संबंधी रोग से ग्रस्त हैं, तो आप यह आसन कतई न करें। अगर आपकी पीठ या कंधों में चोट हो या आप उच्च रक्तचाप के शिकार हों तब भी यह आसन न करें।

यदि आप चाय, कॉफी, रोटी, मटन, चिकन, फास्ट फूड, जंक फूड, नूडल्स, सॉफ्ट ड्रिंक, सोडा, सेव, मैदे, बेसन, दूध आदि से बने हुए खाद्य पदार्थ छोड़ने के लिए तैयार हैं तो यह आसन आपके लिए है। आपको मात्र 29 दिनों तक ज्यूस, फल, सब्जी, ड्राय फ्रूट और स्मूदी का सेवन ही करना होगा।

आप पेट साफ करने के लिए इसबगोल की भूसी का सेवन करें, प्रतिदिन नींबू रस पीएं या इसी तरह के किसी प्राकृतिक उपाय को अपनाएं। यह इसलिए कि आपके पेट को पहले नरम बनाना जरूरी है तभी यह अंदर हो पाएगा।

कुंभकासन (Kumbhkasana) : कुंभकासन और चतुरंग दंडासन के मिले-जुले रूप को आजकल पश्‍चिम में प्लंक (plank) कहा जाता है। प्लंक को हिन्दी में काष्ठफलक कहा जाता है। प्लंक के नाम से योगासन ही किए जाते हैं। इस आसन को फलकासन कहते हैं जो सूर्य नमस्कार की एक स्टेप है।

यह आसन देखने में आसान है, लेकिन करने में कठिन। इसे योग का सबसे असरदार आसन माना जाता है। 1 से 2 मिनट के लिए आप प्लंक या फलकासन मुद्रा में नहीं रह सकते हैं, लेकिन आपको शुरुआत में 1 मिनट रहना चाहिए। फिर धीरे-धीरे आप समय बढ़ाएं और इसे 5 मिनट तक ले जाएं। चित्र में दिखाए गए सबसे नीचे वाला चित्र प्लंक योगासन है। आप इसी मुद्रा में पहले 10 सेकंड फिर समय बढ़ाते हुए एक मिनट तक स्थिर रहें। पुनश्च: कि फिर धीरे-धीरे आप समय बढ़ाएं और इसे 5 मिनट तक ले जाएं।
आप प्लंक योग नहीं कर पाए तो कुंभकासन योग करें जो चित्र में दिखाए गए पहले नंबर का चित्र है।

विधि : सबसे पहले शवासन में सोते हुए मकरासन में लेट जाएं। अब अपनी कोहनी और हाथ के पंजे को भूमि कर रखें। फिर छाती, पेट, कम और पुष्ठिका को उपर उठाते हुए पैर के पंजे सीधे कर दें। इस स्थिति में आपके शरीर का बल या वजन पूर्णत: हाथ के पंजे, कोहनी और पैर के पंजों पर आ जाएगा। अप गर्दन सहित रीढ़ की हड्डी को सीधा करें। इस स्थिति में रीढ़ सीधी रेखा में होना चाहिए। बिल्कुल एक लकड़ी का तख्ते या पल्ले जैसी।

इस तरह की समझे : चटाई पर पेट के बल लेट जाएं। अब अपनी हथेलियों को अपने चेहरे के आगे रखें और पैरों को इस तरह मोड़ें कि पंजे जमीन को धकेल रहे हों। अब हाथ को आगे की तरफ पुश करें और अपनी पुष्टिका को हवा में उठाएं। आपके पैर जमीन से यथासंभव सटे होने चाहिए और गर्दन ढीली होनी चाहिए। इसे अधोमुख स्वानासन के नाम से भी जाना जाता है। यहां तक पहुंचने के बाद सांस अंदर लें और अपने धड़ को इस तरह नीचे ले जाएं कि आपकी बांहों का बल जमीन पर लग रहा हो ताकि आपकी छाती और कंधे, सीधा उन पर टिके हों। इस मुद्रा में तब तक रहें, जब तक कि सहज हो। आसन से बाहर आने के लिए सांस छोड़ें और आराम से शरीर को फर्श पर लेटने दें।
अब यदि आप चाहें तो भुजंगासन, शलभासन, नौकासन, उष्ट्रासन, धनुरासन भी कर सकते हैं। उत्तम भोजन के साथ यदि आप यह आसन 29 दिनों बाद भी जारी रखेंगे तो जीवन में कभी तोंद नहीं निकलेगी और कभी किसी भी प्रकार का रोग नहीं होगा। आपकी काया निरोगी बनी रहेगी।

ये आपकी बाहों, कंधों, पीठ, पुष्टिकाओं, जंघाओं को तो मजबूत करेगा ही सही, साथ ही यह बहु‍त तेजी से आपके पेट और कमर की चर्बी को हटाकर तोंद को समाप्त कर देगा। शरीर में मजबूत एब्स के लिए यह आसन बेहतरीन है।

यह आसन पेट और गुदा संबंधी कई रोग में लाभदायक है। इससे सेक्स पॉवर में बढ़ोतरी होती है। छाती, फेंफड़े और लिवर मजबूत को यह आसन मजबूत करता है।

मूत्र विकार में भी यह आसन आपकी सहायता करता है। किडनी संबंधी रोग में भी यह लाभदायक है। पाचन क्रिया इससे मजबूत होती है और कब्ज जैसी बीमारियों दूर हो जाती है।

12/05/2016

प्रधानमंत्री मोदी ने माना, नोटबंदी बहुत बड़ी भूल थी

प्रधानमंत्री मोदी ने माना, नोटबंदी बहुत बड़ी भूल थी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) के साथ 19 नवंबर को एक मीटिंग में कहा कि बिना सोचे समझे नोटबंदी द्वारा 1000 और 500 के नोटो को बंद करके उन्होने एक बहुत बड़ी भूल कर दी।

नरादा की खबर के अनुसार, चंद्रशेखर राव पीएम से नोटबंदी के बाद तेलंगाना में नए नोट ना होने से हो रही भारी परेशानी बताने के लिए मिले थे। नोटबंदी के बाद से तेलंगाना के हालात बहुत खराब थे जिसका असर हैदराबाद समेत पूरे राज्य पर पड़ रहा था। पुराने नोट बदलने के लिए कतारों में बहुत लोग खड़े थे जिसके बाद से पैसा बहुत जल्दी खत्म हो रहा था।

मोदी और चंद्रशेखर के बीच मीटिंग 25 मिनट के लिए होनी तय थी। लेकिन ये मीटिंग पूरे एक से डेढ़ घंटे के लिए चली चंद्रशेखर राव ने कहा कि औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों में स्थिति बुरी तरह से प्रभावित हो रही थी।

चंद्रशेखर ने पीएम से तेलंगाना में इस तरह के एक अनिश्चित स्थिति को देखते हुए कहा कि, राज्य केंद्र को करों और अन्य राजस्व के अपने हिस्से का भुगतान करने में सक्षम नहीं होगा।

चंद्रशेखर द्वारा की गई सूचीबद्ध शिकायतों के बाद प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया नोटबंदी अपने आप में एक बड़ी भूल थी। और उन्हे इसे शुरू करने से पहले बहुत अधिक ध्यान देना चाहिए था। एक सूत्र ने इस मीटिंग के बारे में बताया कि हालांकि प्रधानमंत्री ने कहा कि चीजें जल्दी ही सुधरनी चाहिए।

प्रधानमंत्री ने चंद्रशेखर से नोटबंदी को सार्वजनिक रूप से इस कदम का समर्थन करने को कहा। मोदी ने चंद्रशेखर को आश्वासन दिया कि नितिन गडकरी, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री, और पीयूष गोयल, बिजली मंत्री, संकट से उबरने में मदद करने के लिए राज्य में नई परियोजनाओं की घोषणा करेंगे।

मोदी और चंद्रशेखर राव की बैठक इतनी लंबी चली कि पीएम से मिलने का इंतज़ार कर रहे सेना प्रमुख जनरल दलबीर सुहाग को कहा गया कि कुछ जरूरी परिस्थितियों के कारण प्रधानमंत्री से मिलना संभव नहीं है।

ये पहला अवसर है जब मोदी ने नोटबंदी पर अपनी गलती स्वीकरा की है। वरना प्रधानमंत्री मोदी ने सार्वजनिक रूप से नोटबंदी का पूरी तरह से बचाव किया है। इस कदम के खिलाफ विरोध करने वालों को पीएम ने भष्ट्र कहकर पुकारा है ।

इजरायल से एक शीर्ष अर्थशास्त्री, जो प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकारों में है, उन्होंने मोदी से कहा था कि निर्णय काफी गलत था। कई भारत और विदेश के विशेषज्ञों ने निर्णय की निंदा की है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नोटबंदी घोषणा पर अभूतपूर्व कवरेज सिर्फ भारतीय मीडिया तक ही सीमित नहीं थी। 500 रुपये और 1000 रुपये के नोटों को बंद करने के इस कदम का दुनिया भर की मीडिया कवरेज में बोलबाला रहा है।

टीवी चैनलों ने बड़े पैमाने पर इस खबर को कवर किया लंदन के समाचार पत्र, न्यूयॉर्क और वाशिंगटन ने अपने संपादकीय में नोटबंदी के लिए कटु लेख लिखे थे।

लंदन के दा गार्जियन अखबार ने इस कदम को तानाशाही का एक असफल प्रयोग बताया, ब्लूमबर्ग ने इसे मोदी की एक भारी गलती करार दिया।

यहाँ इन विदेशी मीडिया की टिप्पणियों के संपादकीय का एक स्नैपशॉट है।

लंदन दा गार्जियन

अमीर को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, काला धन का अधिकतर भाग शेयर, सोना और रियल एस्टेट के रुप में परिवर्तित कर दिया है। लेकिन गरीब, जो देश की 1.3 अरब लोगों की आबादी में हैं सबसे अधिक प्रभावित होंगे। जिनके आम तौर पर बैंक खाते नहीं है और अक्सर नकद में भुगतान करते हैं। इस नीति के एक हफ्ते के अंदर ही कम से कम एक दर्जन से अधिक लोगों की जान जाने का दावा किया गया है। सरकार का कहना है कि यह समस्या को सुलझाने के लिए सप्ताह का समय लगेगा।

श्री मोदी की योजना तानाशाही की असफल प्रयोगों के समान है जिसके परिणाम स्वरुप मुद्रास्फीति, मुद्रा पतन और बड़े विरोध प्रदर्शन सामने आए है। श्री मोदी जी ने भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए ये अभियान चलाया है। लेकिन  बेहतर होता यदि सरकार ने अपने पुरानी कर प्रणाली को नवीनतम बनाया होता।

न्यूयॉर्क टाइम्स

नकदी भारत में राजा है। यहा 78 प्रतिशत लेनदेन में नकद का प्रयोग होता है। कई लोगों के पास बैंक खाते या क्रेडिट कार्ड नही है और यहां तक कि जो लोग डेबिट या क्रेडिट कार्ड का उपयोग करते हैं। उन्हे अक्सर नकद का उपयोग करना पड़ता है। क्योंकि कई व्यवसायों के भुगतान के लिए नकदी ही चलती है।

नोट बदलने की इस योजना ने अर्थव्यवस्था को उथल-पुथल में डाल दिया है।  बैंकों में पुराने नोटो को बदलने के लिए मजबूर लोग लम्बी कतारों में खड़े हैं। एक व्यक्ति ने टाइम्स को बताया कि एक बैंक ने उसे नोट बदलने के लिए मना कर दिया क्योकी उसके पास सरकार द्वारा जारी पहचान कार्ड नहीं था जो पुराने नोट जमा करने के लिए आवश्यक है । उसे उम्मीद थी कि नोट बदलवाने के इंतजार में लगे उसके परिवार को कोई चैरिटी खाना खिलाएगी।

ब्लूमबर्ग- मोदी की बड़ी गलती

शुरु में ये पीएम मोदी का मास्टर स्ट्रोक लगा था लेकिन बाद में ये एक बड़ी गलती जैसा लगने लगा।

मोदी के हाल के भाषण नोटबंदी के विषय पर एकदम बेतुके रहे। एक ओर वो नोटबैन की तकलीफ़ पर हँसते हुए दिखे और दूसरी और भारत पर अपने “बलिदान” के लिए रोते दिखे और चेतावनी दी कि कुछ लोग अपनी लूट की रक्षा के लिए उनकी हत्या कर सकते है।

एक सप्ताह में क्या बदल गया है? खैर, एक के लिए, यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार इसकी योजना बनाने में जल्दबाज़ी में सवार थी। अब जब कि भारत की मुद्रा का 86 प्रतिशत वैध नहीं है, केंद्रीय बैंक ने नोट मुद्रित करने के लिए काफी संघर्ष किया है।

वाशिंगटन पोस्ट

एक शोध रिपोर्ट में बैंकिंग की दिग्गज कंपनी एचएसबीसी ने भविष्यवाणी की है कि उपभोक्ता वस्तुओं के आयात गिर जाएेंगे लेकिन सोने की मांग से भरपाई हो सकती है। क्योंकि अस्थिर भारतीय अपने धन को स्टोर करने के तरीके देखते हैं।

नोटबंदी का प्रभाव दो साल के लिए रह सकता है। मंदी के दौर में देश चला रहे हैं और भारतीयों को प्रेरित कर रहे है यूरो या अमरीकी डॉलर के रूप में मुद्राओं में धन रखें।

12/02/2016

इस सर्वे के मुताबिक नोटबंदी के बाद पढ़े-लिखे 56 फीसदी वोटरों ने छोड़ा पीएम मोदी का साथ

जहां एक ओर देश के पीएम नरेन्द्र मोदी और भाजपा नोटबंदी के फैसले पर जनता का साथ होने का दावा कर रहे हैं। वहीं उनके इन दावों की एक अंग्रेजी अखबार के सर्वे ने पोल खोल कर सामने रख दी है। यदि उस अखबार के ऑन लाइन सर्वे की मानें तो 56 फीसदी जनता पीएम मोदी के नोट बंदी निर्णय के खिलाफ और केवल 29 फीसदी ही जनता उनके समर्थन मे खड़ी है। फिलहाल यह सर्वे घट-बढ़ भी सकता है।

बताते चलें नोटबंदी के 21 दिन बाद देश की जनता की राय जानने के लिये अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक ऑन लाइन सर्वे शुरु किया है। जिसमें देश की जनता से तीन सवालों पर उनकी राय मांगी गई थी।

इन सवालों में

पहला सवाल नोटबंदी का फैसला अच्छा और सही से ढंग से लागू हुआ।

दूसरा, अच्छा फैसला लेकिन सही ढंग से लागू नही हुआ।

तीसरा सवाल, खराब फैसला और बेकार तरीके से लागू हुआ है।

इस अखबार के ऑन लाईन सर्वे की मानें तो देश के पढा-लिखा तबका जो भाजपा का वोट बैंक कहा जाता है उस जनता ने आज तक हुए सर्वे में जो राय दी है। वह राय मोदी एप्स के द्वारा कराये गये सर्वे के उलट है। जनता द्वारा दी गई राय से स्थिति काफी कुछ स्पष्ट हो रही है। इस सर्वे के मुताबिक 56 फीसदी लोगों ने अपनी राय देते हुए नोटबंदी के फैसले को खराब और बेकार तरीके से लागू होना बताया है।

इसके अलावा 15 फीसदी जनता ने अपनी राय देते हुये पीएम मोदी के इस फैसले को अच्छा और सहीं ढंग से लागू न होना बताया।

वहीं केवल 29 फीसदी जनता ने पीएम मोदी के इस फैसले को अच्छा और सही ढंग से लागू होना बताया है।

यदि इस अखबार के ऑनलाइन सर्वे की माने तो पीएम मोदी के साथ केवल 29 फीसदी लोग ही खड़े हुए है।

अब सोइये पांच सौ हज़ार के नोटों के बिस्तर पर

नोट बंदी को तीन हफ्ते बीत चुके हैं। अब चौथा हफ़्ता शुरू हो चुका है। बैंकों की हालत जो सुधरने की बात थी। जो इस हफ्ते और बिगड़ ही रही है। क्या? नहीं बिगड़ रही? एक काम करो गुरु जाई के तनिक बैंक की लाईन में लग के देखो। और जो वहां जाने का बखत नहीं मिल रहा हो तो तनिक एटीएम में ही लग के देख लें। मार हो रहा है। हर रोज। बिल्डिंग के बाहर वाले एटीएम में रोज रात यही बवाल कट रहा है। खैर, जो होना था सो हुआ। अब सुनिए काम की बात।

जिस पैसे के लिए दिन रात एक करके आप भाग दौड़ रहे थे। गलती से भीग जाए तो दो-दिन तक हाथ में प्रेस लिए बैठे रहते थे। उन नोटों का हो क्या रहा है। अभी तक आरबीआई के पास। 8 ट्रिलियन पुराने 500 और 1000 के नोट जमा हो चुके हैं। 8 ट्रिलियन का मतलब जानते हैं। मतलब होता है लगभग 8 लाख करोड़। मुश्किल ये था कि इन नोटों का हो क्या।

अभी तक आरबीआई इन नोटों को जलाने और डंप करने के बारे में सोच रही थी। लेकिन केरल के आरबीआई ब्रांच ने इसका एक और उपाय ढूंढ लिया है। वो अब इन नोटों को एक हार्डबोर्ड बनाने वाली कंपनी को दे रहे हैं। जो इन्हें लकड़ी की भूसी के साथ मिला के जमा देंगे। और ये बोर्ड बन जाएगा।

हां, आपके दिमाग में चल रहा होगा कि कंपनी कहीं नोटों को अपने कारीगरों में बांट दे तब क्या होगा? तो लल्ला आरबीआई वाले इतने बेवक़ूफ़ नहीं  हैं। वो नोटों को पहले रद्दी बना दे रहे हैं। इसके बाद उसे फैक्ट्री वालों को दिया जा रहा है।

कंपनी का नाम है। वेस्टर्न इंडिया प्लाईवुड। बहुत ही पुरानी कंपनी है। इनके एमडी का कहना है कि शुरू में बहुत दिक्कत जा रही थी। क्योंकि नोटों का जो पेपर होता है। उसे पल्प बनाना बहुत मुश्किल था। लेकिन कंपनी के इंजीनियर लोगों ने रास्ता ढूंढ निकाला। होते ही खुराफ़ाती हैं ये इंजीनियर। लिख के रख लो कांग्रेस पार्टी का ट्विटर अकाउंट हैक करने वाला भी इंजीनियर ही होगा।

खैर, आप लाइन में लगिए। भारत मात की जय बोलिए। उधर बंगलुरु में 4 करोड़ से ज्यादा के नोट इनकम टैक्स ने पकड़े हैं। एकदम कड़कड़ीया नोट सब। भारत माता की जय।

संकलन
न्यूज़ मिडिया,समाचार पत्र .

12/01/2016

कौन थे वो दो लोग, जिन्होंने 1984 में भाजपा को दो सीटें दिलाई थीं?

अभी पंजाब और उत्तर प्रदेश में चुनाव हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरा जोर लगा रहे हैं भारत के हर राज्य में भाजपा की सरकार बनाने के लिये. केंद्र सहित कई राज्यों में भाजपा की सरकार है. कांग्रेस सिमट रही है. ये सारा डेवलपमेंट पिछले ढाई सालों में हुआ है. 2014 चुनाव में भाजपा बहुमत से सरकार में आई. 6 अप्रैल 1980 को अपना स्थापना के 34 वर्षों बाद. खूब सेलिब्रेशन हुआ.

इसमें ये बात भी याद आई कि जब भाजपा ने अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ा था 1980 में तो अपनी पार्टी से नहीं लड़ा. बल्कि जनता पार्टी से उम्मीदवार खड़े किये गये थे. 1984 में पहली बार भाजपा ने अपने कमल निशान से चुनाव लड़ा. पर उस वक्त कांग्रेस की लहर थी. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जनता की भावनाएं राजीव गांधी के साथ थीं. राजीव ने इसके लिये कोई कसर भी नहीं छोड़ी. विपक्षियों के खिलाफ बड़े-बड़े लोगों को उतारा गया. अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ राजघराने के माधवराव सिंधिया और हेमवती नंदन बहुगुणा के खिलाफ अमिताभ बच्चन को उतारा गया. प्रचार में कोई कमी नहीं छोड़ी गई. इस लहर में कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने 415 सीटें जीत लीं. भाजपा को दो मिलीं.

पर कौन थे ये दोनों लोग जो इस लहर में भी जीत गये? अटल बिहारी वाजपेयी भी हार गये थे. सारे बड़े नेता हार गये थे.

ये दोनों लोग थे- ए के पटेल जो गुजरात के मेहसाणा से जीते और दूसरे थे सी जे रेड्डी जो आंध्र प्रदेश के हनमकोंडा से जीते थे.

ए के पटेल

डॉक्टर थे. MBBS. गुजरात असेंबली में 1975 से 1984 तक सदस्य रहे थे. वीजापुर सीट से. 1984 के चुनाव में मेहसाणा में इंदिरा गांधी के खिलाफ नाराजगी थी. पटेल पॉवर दिखाई गई क्योंकि लोगों के मन में था कि सरदार पटेल को इंदिरा ने उचित सम्मान नहीं दिया था. मेहसाणा पटेलों के वर्चस्व का इलाका है. यहां के पटेल बाकी जगहों के लोगों से धनी हैं. डायमंड कटिंग सूरत में होता है. पॉलिशिंग सौराष्ट्र के पटेल करते हैं. पर सबसे खतरे वाला काम कूरियर का होता है. वो मेहसाणा के पटेल करते हैं. संयोग से इंदिरा गांधी की मौत 31 अक्टूबर को हुई और ये दिन सरदार पटेल का जन्मदिन है. ए के पटेल की इमेज क्लीन थी. वो जीत गये.

पर बाद में नरेंद्र मोदी से उनकी झंझट हो गई. नरेंद्र मोदी का होमटाउन वाडनगर भी मेहसाणा में ही आता है. झंझट के बाद पटेल का करियर डूब गया. 1999 में वो चुनाव हार गये. कहा कि नरेंद्र मोदी ने ही हरवाया है चुनाव. बाद में कांग्रेस ने यहां से पटेल उम्मीदवार खड़ा करना शुरू किया. और अब सीट उनके पास है. जैसा कि यहां के लोग कहते हैं. पार्टी नहीं यहां तय होता है कि दो पटेलों में से कौन ज्यादा काबिल पटेल है.

ए के पटेल 1984, 1989, 1991, 1996 और 1998 में लोकसभा पहुंचे. 2000 से 2006 तक राज्यसभा में रहे. 1998 में मिनिस्टर ऑफ स्टेट रहे. केमिकल्स और फर्टिलाइजर के.

अभी गुजरात के मुख्यमंत्री हैं विजय रूपानी. 2007 में ये गुजराज भाजपा के प्रवक्ता हुआ करते थे. 2007 में ही विजय ने घोषणा की कि ए के पटेल को पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण बाहर किया जा रहा है.

चेंदूपातला जंगा रेड्डी

वारंगल के हनमकोंडा से. आंध्र प्रदेश की विधानसभा में 1967-72, 1978-83 और 1983-84 तक रहे. 1984 में लोकसभा का चुनाव हनमकोंडा से लड़े. यहां उनके विपक्षी थे आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और भविष्य के प्रधानमंत्री नरसिंहा राव. और यहां पर सी जे रेड्डी ने राव को हरा दिया. राव के खिलाफ वारंगल में सेंटिमेंट बना हुआ था. लोग नाराज थे कि राव ने कुछ किया ही नहीं था.

आन्ध्र प्रदेश में कांग्रेस की करारी हार हुई थी. 1982 में NTR ने आंध्र की राजनीति में हीरो वाली एंट्री मारी थी. 300 फ़िल्में बनाया हुआ हीरो तेलुगु सेल्फ-रेस्पेक्ट को आधार बनाकर चीफ मिनिस्टर बन गया. 1983 में NTR ओपन हार्ट सर्जरी करने अमेरिका गए. इसी बीच आंध्र के गवर्नर ने अपने पॉवर का बेजा इस्तेमाल करते हुए NTR को हटाकर उनकी ही पार्टी के पूर्व कांग्रेस भास्कर राव को मुख्यमंत्री बना दिया. NTR तुरंत लौटे. अपने समर्थकों को लेकर गवर्नर के पास गए. एक महीने तक ड्रामा चला. खरीद-बिक्री रोकने के लिए एक महीने तक अपने विधायकों को फाइव-स्टार माहौल में छुपाकर रखा गया. हार कर इंदिरा ने रामलाल को हटाकर भविष्य के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा को गवर्नर बना दिया. उन्होंने NTR को फिर चीफ मिनिस्टर बनाया. तो कांग्रेस के खिलाफ सेंटिमेंट बना हुआ था. कांग्रेस के छः पूर्व कैबिनेट मिनिस्टर आंध्र से ही आते थे. चुनावों में वो सारे हारे.

पहले मास्टर हुआ करते थे रेड्डी. खेती की. सोशल कामों में आये. फिर राजनीति में आ गये. शुरूआत से ही तेलंगाना सत्याग्रह आंदोलनों में भाग लेते रहे. केरल तक के आंदोलनों में जाकर प्रोटेस्ट करते रहे. 1970 में बांग्लादेश को बनाने के पक्ष में दिल्ली में आंदोलन किया. गिरफ्तार हुए. इमरजेंसी के दौर में गिरफ्तार हुए. 1984 में गोल्डन टेंपल में आर्मी के घुसने को लेकर भी आंदोलन किया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल रहे.

पर बाद में आंध्र प्रदेश में बीजेपी ही उखड़ गई. वहां की राजनीति बदल गई. और रेड्डी का करियर रुक गया.

संकलन
न्यूज़ मिडिया,समाचार पत्र