2/19/2017

'त्याग का गुणगान कर आप अपनी मां को बेवकूफ बनाते हैं'

आटा सानते वक़्त मां जिस तरह सूखे आटे का पहाड़ बना, उसमें गड्ढा कर, धीरे से पानी गिराती थीं, वो जादुई होता था. फिर कुछ ही समय में वो आटा रोटी में तब्दील हो जाता. सूखे आटे का रोटी बन जाना जैसे एक असंभव काम था. जिसे सिर्फ मां ही कर सकती थी. बेतरतीबी से बंधे हुए मां के जूड़े से हमेशा बाल की एक पतली से लट छूट जाया करती जो पसीने से गर्दन में चिपकी रहती. हमारे नीची छत वाले किचन में रोटियां सकते हुए गर्मी बढ़ जाती और मां पसीने से नहा उठती. सब काम निपटा कर मां सुलाने आती. उनके ठंडे, गुलगुले पेट को छूना भी जादुई था.

पर कोई मां से पूछता, उनके लिए इसमें कुछ भी जादुई नहीं था. पेट के मुलायम होने के पीछे एक कहानी थी, बच्चा पैदा करने वाले दर्द, और उसके बाद की गई सर्जरी की. पेट की ठंडक में उनका सूखा हुआ पसीना था जो उन्होंने काम करते हुए बहाया था.
ये सिर्फ एक मां की कहानी नहीं है. मांएं हर घर में होती हैं. हमारे ‘संस्कारी’ परिवारों के अंदर, रोटियां बेलतीं, बच्चे पैदा करतीं. बहू बनतीं, पत्नियां बनतीं. और अपनी मां की सिखाई हुई बातों से अपने पति के घर को जोड़तीं.

जब आप छोटे थे, आप उनकी कद्र नहीं करते. फिर आप बड़े होते हैं. तो पाते हैं आप कितने गलत थे. मां ने आपके लिए कितने त्याग किए. फिर आप कृतज्ञ महसूस करते हैं. मां को गिफ्ट भेजते हैं. उनके लिए पिता से लड़ जाते हैं. उनको साथ तस्वीरें खींचते हैं. मदर्स डे मनाते हैं. तमाम बड़े-बड़े कवियों की मां पर लिखी कविताएं अपनी मां को भेजते हैं. उनके हर त्याग को सलाम करते हुए. और इस तरह आप उनके त्याग को सही ठहरा देते हैं. आपकी मां खुश होती हैं कि उनके त्याग का फल उन्हें मिल गया.

कुछ ऐसे भी होते हैं जो कहते हैं, मां के लिए एक दिन क्यों, सारे दिन मां के होते हैं. और इस तरह तमाम माओं के त्याग जस्टिफाई हो जाते हैं. पुरानी मांएं नई माओं के लिए मिसाल बन जाती हैं.
मां की बड़ाई करना मानो एक फेटिश है. ये आपको खुशी देता है. अगर आप पुरुष हैं, तो समाज में इज्जत कमाने का श्योरशॉट तरीका है मां की इज्जत करना. क्योंकि आप मर्द होते हुए भी मां को समझते हैं, इसे एक बड़ी बात की तरह देखा जाता है.

सोशल मीडिया पर मां के साथ तस्वीर लगा कर आपका मॉरल लेवल ऊंचा हो जाता है. मां जितनी बूढ़ी, मॉरल लेवल उतना ज्यादा. फिर अगर आप नेता या देश के प्रधानमंत्री हैं, तो बात ही क्या हो. लोग कहेंगे, देखो इतना बिजी होते हुए भी मां के लिए समय निकाल लेता है.
मां से थोड़ा कम मॉरल लेवल बहन का होता है. इसीलिए ‘घर में मां बहन नहीं हैं क्या’ कह किसी भी मर्द को आसानी से शर्मिंदा किया जा सकता है. या उसको ‘मां की गाली’ दे कर गुस्सा निकाला जा सकता है. वहीं अपने भाषण में ‘औरतों’ की जगह ‘माताओं और बहनों’ का प्रयोग कर एक ‘ज्यादा’ इज्जतदार आदमी बना जा सकता है. ये शब्द आपको लोगों का फेवरेट बनाते हैं.

मां आपके लिए एक मॉरल शब्द है, क्योंकि आप उसके साथ मॉरल जोड़ देते हैं. जिस मां के बारे में आप फेसबुक पर लिख रहे होते हैं, वो आपको पैदा करने वाली, आपसे प्रेम करने वाली, आपके लिए त्याग करने वाली मां होती है. क्या आप उस मां के बारे में बाखुशी लिख सकते हैं जो अपनी मर्ज़ी से मां नहीं बनी? या जो शादी के पहले प्रेगनेंट हुई? जिसने अबॉर्शन कराया? जो रेप की वजह से मां बनी? क्या आप उस मां की तारीफ़ करते हैं जिसके बच्चे के बाप का पता नहीं होता? जो सेक्स वर्क करने के कारण मां बनी? या जिसने बच्चा पैदा कर अनाथालय में छोड़ दिया? या जिसे दो देशों में युद्ध के समय दुश्मनों ने गैंगरेप कर मां बना दिया? क्या आप सोचते हैं कि जिस वक़्त आपकी मां प्रेगनेंट हुई, उसने प्रेगनेंट होना प्लान भी किया था या नहीं?
आप नहीं सोचते. क्योंकि आप मां होने को सेक्स से जोड़कर नहीं देख पाते. क्योंकि मां का मॉरल लेवल जितना बड़ा होता है, सेक्स का उतना ही कम. बल्कि सेक्स का कोई मॉरल लेवल होता ही नहीं है. जबकि आपकी पैदाइश ही सेक्स के कारण होती है.

आपके दिमाग में मातृत्व की एक छवि है. कि मां दर्द सहन कर आपको दुनिया में लाई. उसने आपको पाल-पोसकर बड़ा किया. क्या आप उस मातृत्व को समझते हैं, जब घर छोड़ कर बाहर पढ़ने आई एक लड़की अपनी सहेली के सीने पर फूट-फूटकर रोती है. और उसकी सहेली उसे चिपका लेती है. जब किसी सस्ते होटल या किसी सीले हुए किराए के कमरे में एक प्रेमी अपनी प्रेमिका से मिलता है और अपना सारा पुरुषत्व गला कर खुद को अपनी प्रेमिका के सीने पर छोड़ देता है. उसकी प्रेमिका उसके सर पर हाथ फेरते हुए जिस मातृत्व को महसूस करती है, उसे समझते हैं आप? नहीं, क्योंकि वो आपके मॉरल खांचे में फिट नहीं होता. उन मूल्यों पर खरा नहीं उतरता जिसकी नींव पर मदर्स डे खड़ा होता है.

जब आप औरतों को पढ़ाने की बात करते हैं, तो ये तर्क देते हैं कि पढ़ी-लिखी लड़की, एक बेहतर मां बनेगी. अपने बच्चों को पढ़ाएगी. और देश की सेवा के लिए बेहतर बच्चे जनेगी. जब आप एक लड़के की पढ़ने की बात करते हैं, तो क्या आप कहते हैं कि वो बेहतर बाप बनेगा?
आज जब मैं आटा सानने बैठती हूं, मुझे मां की याद आती है. लहसुन छीलते हुए मां की उंगलियों से आने वाली महक याद आती है. पार्टी करते वक़्त मां की याद नहीं आती. क्योंकि मां को कभी पार्टियों में झूमते नहीं देखा.

मां, तुम ‘त्याग की मूर्ति’ नहीं, भोली थीं, डरपोक थीं

आपने जब भी मां को याद किया, उसके त्याग को याद किया. लेकिन कभी सवाल किया कि वो ये सारे त्याग क्यों करती रही? क्यों उसने अपनी मर्ज़ी का खाना नहीं बनाया? क्यों उसने कभी नहीं कहा मैं सिर्फ तब खाना बनाउंगी, जब जी करेगा. क्यों उसने सर पर पल्लू रखने पर सवाल नहीं उठाया? क्यों अपनी सास की हर बात मानती रही? क्यों नौकरों की तरह अपने पति की सेवा करती रही? क्यों सबको खिलाकर ही खाया? क्यों कभी नहीं कहा, बहुत भूख लगी है, ज़रा चाट खा कर आती हूं? उसने क्यों अपने जीवन को वैसे नहीं जिया, जैसे आप जी रहे हैं?

क्यों आप अपनी मां से नहीं कहते, मां, तुम भोली थीं. तुम दूसरी मांओं की तरह डरपोक थीं. जो तुमने जिया नहीं.
जितनी बार आप उसके त्याग का गुणगान करते हैं, आप अपनी मां को बेवकूफ बनाते हैं. और सिर्फ आपने ही नहीं, दुनिया की तमाम होने वाली मांओं को भी. उन मांओं की बेइज्जती करते हैं, जो आपके मॉरल खांचे में फिट नहीं होतीं. उन औरतों की बेइज्जती करते हैं जो मां नहीं बनना चाहतीं.

संकलन 

न्यूज़ मिडिया,समाचार पत्र

आपका
पं. एल.के.शर्मा
अधिवक्ता,लेखक,प्रद्यापक,समाजसेवी।

2/17/2017

'मैं धारक को मूर्ख बनाने का वचन देता हूं'


'मैं धारक को मूर्ख बनाने का वचन देता हूं'

नोटबंदी हुए 100 से कुछ ज़्यादा दिन हो गए हैं. हालांकि प्रधानमंत्री ने 50 दिन मांगे थे. लेकिन हालात हैं कि सामान्य होने का नाम नहीं ले रहे हैं. न लोगों के लिए, न रिजर्व बैंक और सरकार के लिए. नोटबंदी के फैसले और उसे लागू करने के तरीके पर लगातार सवाल उठाए गए. नोटबंदी का एजेंडा जिस तरह कालेधन से ई-पेमेंट पर आया, उससे लोगों को ये भी लगा कि उन्हें मूर्ख बनाने की कोशिश हुई. अब एक मीडिया रिपोर्ट आई है जिसके मुताबिक इस बात की संभावना है कि रिजर्व बैंक ने रघुराम राजन के गवर्नर रहते उर्जित पटेल के दस्तखत वाले नोट छाप दिए हों.

हर नोट एक कागज़ का टुकड़ा बस होता है. इसकी कीमत उस गारंटी से होती है जो केंद्र सरकार देती है. ‘ मैं धारक को…’ वाली लाइन के नीचे रिजर्व बैंक गवर्नर का दस्तखत इस बात की तस्दीक करता है. एक गवर्नर के कार्यकाल में छपने वाले नोटों पर उसके दस्तखत होते हैं.

गवर्नर पद के लिए उर्जित का नाम 21 अगस्त को सामने आया था. उन्होंने गवर्नर पद का चार्ज 4 सितंबर को लिया. लेकिन ‘हिंदुस्तान टाइम्स’  के हवाले से खबर है कि रिज़र्व बैंक के दो प्रेस में 2000 के नोट छापने के ‘प्रारंभिक कदम’ 22 अगस्त 2016 को ही उठाए लिए गए थे. इस तरह कम से कम कुछ नोटों पर रघुराम राजन के दस्तखत होने चाहिए थे.

एक बात ये भी है कि रिजर्व बैंक को 2000 के नए नोटों को छापने की अनुमति केंद्र सरकार ने 7 जून 2016 को ही दे दी थी. इसके बाद नई सीरीज़ छापने की तैयारी शुरू कर दी थी. आमतौर पर नए नोट छापने का आदेश मिलते ही प्रेस में छपाई शुरू हो जाती है. ये सब खुद रिजर्व बैंक ने दिसंबर में एक संसद समीति को बताया था.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट में एक बात और सामने आई है. 500 के नए नोटों की छपाई 23 नवंबर को ही शुरू हुई. साफ है कि नोटबंदी की घोषणा के वक्त सरकार (और रिज़र्व बैंक का भी) ध्यान केवल 2000 के नोट छापने पर था. इस से बाज़ार में चिल्लर की जो कमी हुई, उस पर पर्याप्त लिखा जा चुका है.

इस बात से दो महत्वपू्र्ण सवाल खड़े होते हैंः

पहला ये कि क्या नोटों पर पटेल के दस्तखत होने से किसी नियम की अनदेखी हुई?

दूसरा ये कि रघुराम राजन का जाना तय होने के बाद बड़े लंबे समय तक इस बात पर संशय था कि उनकी जगह कौन लेगा. राजन के रिटायर होने की तारीख के बहुत नज़दीक आने पर ही उर्जित का नाम सामने आया. यदि मीडिया रिपोर्ट में जताई संभावना वाकई में सच है तो क्या सरकार ने गवर्नर पद की अपनी पसंद जानबूझ कर लोगों से छुपाई? ऐसा क्यों हुआ?

रिज़र्व बैंक एक महत्वपूर्ण संस्था है जिसके काम करने के तरीके पर पिछले दिनों कई प्रश्न उठे हैं. खासकर इस बात पर कि कहीं बैंक सरकार के प्रभाव में तो काम नहीं कर रहा, जिसका डर जताया जा रहा है.

ग्रीन कार्ड के लिए हर सप्ताह 3 भारतीय खर्च कर रहे 5 लाख डॉलर

ग्रीन कार्ड के लिए हर सप्ताह 3 भारतीय खर्च कर रहे 5 लाख डॉलर

अमेरिका में रहने और वहां की जिंदगी जीने के सपने को पूरा करने के लिए औसतन हर सप्ताह 3 भारतीय 5 डॉलर खर्च कर रहे हैं। यह पैसा ईबी-5 इन्वेस्टर वीजा प्रोग्राम के तहत ग्रीन कार्ड पाने के लिए खर्च किया जा रहा है। ईबी-5 विदेशी नागरिकों और उनके परिवार (उनके 21 साल तक के बच्चे) को ग्रीन कार्ड और स्थायी रेजिडेंसी उपलब्ध कराता है।

ग्रीन कार्ड और स्थायी रेजिडेंसी पाने के दो तरीके हैं। पहला, 10 लाख डॉलर के निवेश के साथ बिजनस शुरू करना और कम से कम 10 लोगों के लिए फुल टाइम रोजगार पैदा करना। दूसरा तरीका सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त ईबी-5 बिजनस में 5 लाख डॉलर यानी 3.4 करोड़ रुपये का निवेश करना और ग्रामीण क्षेत्र में 10 या उससे अधिक लोगों को फुल टाइम जॉब देना।

एलसीआर कैपिटल पार्टनर्स के सह-संस्थापक रोहेलियो कासरेस ने बताया, 'हमने छोटे से वक्त में 210 निवेशकों को जोड़ा है और इसमें 42 भारतीय हैं। ईबी-5 प्रोग्राम के लिए बियान, रिलायंस, आदित्य बिड़ला और मैककिन्सी के टॉप एक्जक्युटिव ने भी अपनी रुचि दिखाई है। वे नहीं चाहते कि उनके बच्चे अमेरिका में नौकरी के लिए अनिश्चतता का सामना करें।' एलसीआर कैपिटल पार्टनर्स इन्वेस्ट ऐंड इमिग्रेशन कंसल्टेंसी है जो निवेशकों के पैसे डंकिन डोनट्स और फोर सीजन्स में निवेश करता है।

वह बताते हैं कि मौजूदा समय में ईबी-5 के लिए यह हड़बड़ी दो वजहों से है,पहला ट्रंप प्रशासन द्वारा एच-1बी पर नई नीति को लाने के संकेत देने और अप्रैल में ईबी-5 वीजा प्रोग्राम का एक्सपायर हो जाना है। पिछले सप्ताह यूनाइटे स्टेट्स सिटिजनशिप ऐंड इमिग्रेशन सर्विसेज (यूएससीआईएस) ने ईबी-5 निवेशकों के वीजा प्रोग्राम में बदलाव का प्रस्ताव रखा है, जिसमें निवेश की राशि 5 लाख डॉलर से 13.5 लाख डॉलर बढ़ाया जाना भी शामिल है।

कासरेस ने बताया, 'कुछ सालों में यूएस वीजा के लिए अन्य विकल्प कम हुए हैं। हर साल भारतीयों के ईबी-5 के तहत मिलने वाले ग्रीन कार्ड की संख्या में करीब 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।' बता दें कि अगर निवेश के बावजूद अगर लोगों के लिए रोजगार का सृजन नहीं हो पाता तो ग्रीन कार्ड रिजेक्ट किए जाने का भी प्रावधना है। निवेश के दो साल के भीतर ही निवेशकों को वीजा अप्रूव कर दिया जाता है। 2015 में 8,156 चीनी नागरिकों को वीजा जारी किया गया था, जबकि उसी अवधि में सिर्फ 111 भारतीयों को ही वीजा मिल पाया है।
संकलन
न्यूज़ मिडिया समाचार पत्र

प्रस्तुति
पं. एल.के.शर्मा
(अधिवक्ता)

2/15/2017

चाहे दीवाली के हों या असली, रॉकेट तो दक्षिण भारत में ही बनते हैं


        भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) के रॉकेट विज्ञान से संबंधित 20 सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से 14 दक्षिण भारत में हैं

चाहे दीवाली के हों या असली, रॉकेट तो दक्षिण भारत में ही बनते हैं

    हैदर अली और उनके बेटे टीपू सुल्तान के राज के दौरान मैसूर की रियासत और अंग्रेजों के बीच चार युद्ध हुए थे. चौथे युद्ध के बाद मैसूर पर अंग्रेजों का शासन हो गया था. लेकिन पहले तीन युद्ध ऐसे रहे जिनमें अंग्रेजी फौज को काफी नुकसान उठाना पड़ा. इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि मैसूर की सेना के पास रॉकेट थे. इनसे वह दो किलोमीटर दूर तक दुश्मन सेना को निशाना बना सकती थी. इतिहासकारों के मुताबिक युद्ध में रॉकेट तकनीक का इस्तेमाल दुनिया में सबसे पहले (1780 में) दक्षिण भारत की इसी रियासत में हुआ.

संयोग है कि आज भी जब हम भारत में किसी रॉकेट के प्रक्षेपण की खबर सुनते हैं तो वह भी दक्षिण (केरल के थुंबा या आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा) से ही आती है. बुधवार को भी ऐसा ही हुआ जब इसरो ने श्रीहरिकोटा से एक साथ 104 उपग्रह छोड़ने का कारनामा किया और इस मामले में बाकी दुनिया को मीलों पीछे छोड़ दिया. इससे पहले यह रिकॉर्ड रूस के नाम था जिसने 2014 में एक साथ 37 उपग्रहों को प्रक्षेपित किया था

बीती जनवरी में गूगल लूनर एक्स प्राइज की घोषणा हुई तो पता चला कि इसमें से एक पुरस्कार बैंगलोर की इंडस नाम की निजी कंपनी को मिला है. यानी सरकारी संस्थानों के साथ दक्षिण भारत के निजी संस्थान भी इस मामले में पीछे नहीं हैं

रॉकेट विज्ञान में कोई शोध या नई खोज हो तब भी हमें दक्षिण भारत के ही किसी शहर का नाम सुनाई देता है. और तो और, बीती जनवरी में गूगल लूनर एक्स प्राइज (गूगल द्वारा चांद पर उतरने की तकनीक के विकास से जुड़ी एक प्रतियोगिता) की घोषणा हुई तो पता चला कि इसमें एक पुरस्कार बैंगलोर की इंडस नाम की निजी कंपनी को मिला है.

यानी सरकारी संस्थानों के साथ दक्षिण भारत के निजी संस्थान भी इस मामले में पीछे नहीं है. सरकारी संस्थानों की बात करें तो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) के 20 सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से 14 दक्षिण के राज्यों में ही हैं. रॉकेट निर्माण से लेकर परीक्षण, लॉन्च और ट्रेकिंग के सबसे महत्वपूर्ण केंद्र इसी क्षेत्र में हैं. इन सब की बदौलत दक्षिण भारत पूरी दुनिया में रॉकेट विज्ञान का हब बन चुका है. वैसे एक दिलचस्प बात यह भी है कि शिवकाशी नाम का वह मशहूर शहर भी दक्षिण भारत में ही है जहां दीवाली के रॉकेट बनते हैं.

लेकिन क्या वजह रही कि उत्तर भारत इस मामले में पिछड़ गया? दरअसल दक्षिण भारत में अंतरिक्ष संस्थानों के विकास के पीछे इतिहास, विज्ञान और सहूलियत, इन तीनों का मिलाजुला योगदान है. साथ ही इसमें इसरो की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण रही है.

बात 1962 शुरू होती है. तब मशहूर वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा की सलाह पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए एक समिति बनाई थी. इंडियन नेशनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च यानी इंकोस्पार नाम की इस समिति के प्रमुख विक्रम साराभाई का पहला काम था कि वे ऐसी जगह की खोज करें जहां से विदेशों से मिले प्रायोगिक रॉकेट छोड़े जा सकें. वैज्ञानिक नियमों के हिसाब से इस काम के लिए वे जगहें सबसे उपयुक्त होती हैं जहां से मैग्नेटिक इक्वेटर लाइन गुजरती हो. भारत में ये क्षेत्र देश के दक्षिणी हिस्से में हैं. यही वजह है कि एक अदद प्रक्षेपण केंद्र की खोज भाभा व साराभाई को केरल ले गई. इस तरह से रॉकेट विज्ञान के क्षेत्र में थुंबा के एक महत्वपूर्ण केंद्र बनने की शुरूआत हुई और इसे रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र के रूप में विकसित किया गया.

भारत को उस समय अमेरिका, सोवियत संघ और फ्रांस से प्रायोगिक रॉकेट मिले थे. थुंबा में इनके प्रायोगिक प्रक्षेपण भारतीय वैज्ञानिकों का अनुभव बढ़ाने में काफी मददगार साबित हुए. अब इन वैज्ञानिकों को स्वदेशी रॉकेटों का परीक्षण करना था. 1969 में इंकोस्पार का नाम औपचारिक रूप से इसरो कर दिया गया. स्वदेशी रॉकेटों के विकास का काम इसी की कमान में होना था.

थुंबा प्रक्षेपण केंद्र में शुरूआत में रॉकेट साइकिल से ढोकर ले जाए जाते थे
थुंबा प्रक्षेपण केंद्र में शुरूआत में रॉकेट साइकिल से ढोकर ले जाए जाते थे
ब रॉकेटों से जो सेटेलाइट छोड़े जाने थे उनके लिए इसरो को पूर्वी तट पर एक बड़े लॉन्चिंग पैड की जरूरत थी. इसके लिए चेन्नई से 100 किलोमीटर उत्तर में श्रीहरिकोटा का चयन किया गया. यह इस लिहाज से भी ठीक था कि इसके एक तरफ बंगाल की खाड़ी है तो दूसरी तरफ जंगल. यदि रॉकेट छोड़ने के बाद यहां कोई दुर्घटना हो भी जाए तो जानमाल के नुकसान की आशंका कम से कम है.

इसके बाद केरल के ही तिरुवअनंतपुरम में लिक्विड प्रॉपल्शन सेंटर की स्थापना हुई. इसका नाम बाद में विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (वीएसएससी) कर दिया गया. अब जो रॉकेट इंजन वीएसएससी में बनने थे उनके परीक्षण के लिए पास ही कोई सेंटर बनाने की जरूरत थी तो इसके लिए तमिलनाडु का महेंद्रगिरी चुन लिया गया.

इन सभी केंद्रों से प्रशासनिक तालमेल के लिए बैंगलोर में इसरो का मुख्यालय बन गया. श्रीहरिकोटा और वीएसएससी से इसकी समान दूरी है. बाद में जैसे-जैसे इसरो का विकास हुआ उससे जुड़े दूसरे संस्थान भी बैंगलोर के आसपास ही खुलने लगे जैसे इसरो टेलिमेट्री ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क हेडक्वार्टर और इसरो सेटेलाइट सेंटर आदि.

जो भी रॉकेट इंजन वीएसएससी में बनने थे उनके परीक्षण के लिए पास ही कोई सेंटर बनाने की जरूरत थी. इसके लिए तमिलनाडु का महेंद्रगिरी चुना गया

इसरो से संबद्ध बड़े संस्थानों में डीप स्पेस ट्रेकिंग सेंटर सबसे नया है. इसकी स्थापना 2008 में हुई थी. यह भी दक्षिण भारत यानी कर्नाटक के ब्याललु में बनाया गया है. इस जगह बहुत कम आबादी है और यहां इलेक्ट्रो मैग्नेटिक डिस्टरबेंस भी न्यूनतम है. हैदराबाद में रिमोट सेंसिंग का मुख्य केंद्र बनाया गया क्योंकि यह नए संस्थानों से भी समान दूरी पर स्थित है.

ऐसा नहीं कि उत्तर भारत इस लिहाज से बिल्कुल ही अछूता है. लेकिन यहां इसरो के जो भी संस्थान हैं वे मुख्य रूप से बुनियादी अनुसंधान और पेलोड के निर्माण का काम करते है. अहमदाबाद की फिजिकल रिसर्च लैबोरेटरी में एस्ट्रो फिजिक्स के उच्च अनुसंधान होते हैं. शहर के ही दूसरे संस्थान- स्पेस एप्लीकेशन सेंटर में सेटेलाइट और दूसरे पेलोड का निर्माण किया जाता है. भोपाल में इसरो ने एक ट्रेकिंग सेंटर स्थापित किया है.

दक्षिण भारत में इन संस्थानों के विकास को इस बात से भी जोड़ा जाता है कि ये पाकिस्तान और चीन से काफी दूर हैं. हालांकि बैलेस्टिक मिसाइलों के इस दौर में अब यह दूरी मायने नहीं रखती लेकिन, 1970 के दशक में यह एक महत्वपूर्ण वजह जरूर रही होगी.

इसरो ने अपनी विकास यात्रा विदेशों से आयातित ऐसे रॉकेटों के प्रेक्षेपण से शुरू की थी जो 60 किमी से ऊपर नहीं जा पाते थे. लेकिन आज वह भूस्थैतिक कक्षा (36,000 किमी की ऊंचाई) और मंगल की कक्षा तक में सेटेलाइट भेज चुका है. ये उपलब्धियां उत्तर-दक्षिण, और पूरब-पश्चिम के सभी भारतीयों में समान रूप से गर्व की भावना पैदा करती हैं. यानी जमीन पर जो कुछ भी दिखे आखिर में हमारे रॉकेट विज्ञान ने देश को क्षेत्रीयता से ऊपर उठाने का ही काम किया है.

संकलन
न्यूज़ मिडिया,समाचार पत्र।
पं. एल.के.शर्मा
(अधिवक्ता) राज.उच्च.न्यायालय,जोधपुर।
satyagrah.com

1/06/2017

"राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ" की असली जन्मकुण्डली

             आर.एस.एस., यानी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खुद को एक सांस्कृतिक संगठन व “सच्चे देशभक्तों” का संगठन बताता है। उसका दावा है कि उसकी विचारधारा हिन्दुत्व और “राष्ट्रवाद” है। उनके राष्ट्र की परिभाषा क्या है यह आर.एस.एस. की शाखाओं में प्रचलित “प्रार्थना” और “प्रतिज्ञा” से साफ़ हो जाता है। अपनी “प्रार्थना” और “प्रतिज्ञा” में संघी हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति और हिन्दू समाज की रक्षा की बात करते हैं। स्पष्ट है कि धर्मनिरपेक्षता और जनवाद में इनका कोई यक़ीन नहीं है। 

हिन्दू समाज की भी संघियों की अपनी अपनी परिभाषा है। हिन्दुओं से इनका मतलब मुख्य और मूल रूप से उच्च जाति के हिन्दू पुरुष हैं। संघी ‘मनुस्मृति’ को भारत के संविधान के रूप में लागू करना चाहते थे। वही ‘मनुस्मृति’ जिसके अनुसार एक इंसान की जाति ही तय करती है कि समाज में उसका स्थान क्या होगा और जो इस बात की हिमायती है कि पशु, शूद्र और नारी सभी ताड़न के अधिकारी हैं। 

आर.एस.एस. का ढाँचा लम्बे समय तक सिर्फ़ पुरुषों के लिए ही खुला था। संघ के “हिन्दू राष्ट्र” की सदस्यता उच्च वर्ण के हिन्दू पुरुषों के लिए ही खुली है; बाकियों को दोयम दर्जे की स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए; यानी, कि मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों, स्त्रियों आदि को। संघ के तमाम कुकृत्यों पर चर्चा करना यहाँ हमारा मक़सद नहीं है क्योंकि उसके लिए तो एक वृहत् ग्रन्थ लिखने की ज़रूरत पड़ जायेगी। हमारा मक़सद है उन सभी कुकृत्यों के पीछे काम करने वाली विचारधारा और राजनीति का एक संक्षिप्त विवेचन करना। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा क्या है? अगर संघ के सबसे लोकप्रिय सरसंघचालक गोलवलकर और संस्थापक हेडगेवार के प्रेरणा-स्रोतों में से एक मुंजे की जुबानी सुनें तो संघ की विचारधारा स्पष्ट तौर पर फ़ासीवाद है। गोलवलकर ने अपनी पुस्तकों ‘वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइण्ड’ और ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में स्पष्ट शब्दों में इटली के फांसीवाद और जर्मनी के नात्सीवाद की हिमायत की। हिटलर ने यहूदियों के सफाये के तौर पर जो ‘अन्तिम समाधान’ पेश किया, गोलवलकर ने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है और लिखा है कि हिन्दुस्तान में भी हिन्दू जाति की शुद्धता की हिफ़ाज़त के लिए इसी प्रकार का ‘अन्तिम समाधान’ करना होगा। 

संघ का सांगठनिक ढांचा भी मुसोलिनी और हिटलर की पार्टी से हूबहू मेल खाता है। इटली का फ़ासीवादी नेता मुसोलिनी जनतंत्र का कट्टर विरोधी था और तानाशाही में आस्था रखता था। मुसोलिनी के मुताबिक “एक व्यक्ति की सरकार एक राष्ट्र के लिए किसी जनतंत्र के मुकाबले ज़्यादा असरदार होती है।” फ़ासीवादी पार्टी में ‘ड्यूस’ के नाम पर शपथ ली जाती थी, जबकि हिटलर की नात्सी पार्टी में ‘फ़्यूहरर’ के नाम पर। संघ का ‘एक चालक अनुवर्तित्व’ जिसके अन्तर्गत हर सदस्य सरसंघचालक के प्रति पूर्ण कर्मठता और आदरभाव से हर आज्ञा का पालन करने की शपथ लेता है, उसी तानाशाही का प्रतिबिम्बन है जो संघियों ने अपने जर्मन और इतावली पिताओं से सीखी है। 

संघ ‘कमाण्ड स्ट्रक्चर’ यानी कि एक केन्द्रीय कार्यकारी मण्डल, जिसे स्वयं सरसंघचालक चुनता है, के ज़रिये काम करता है, जिसमें जनवाद की कोई गुंजाइश नहीं है। यही विचारधारा है जिसके अधीन गोलवलकर (जो संघ के सबसे पूजनीय सरसंघचालक थे) ने 1961 में राष्ट्रीय एकता परिषद् के प्रथम अधिवेशन को भेजे अपने सन्देश में भारत में संघीय ढाँचे (फेडरल स्ट्रक्चर) को समाप्त कर एकात्म शासन प्रणाली को लागू करने का आह्वान किया था। 

संघ मज़दूरों पर पूर्ण तानाशाही की विचारधारा में यक़ीन रखता है और हर प्रकार के मज़दूर असन्तोष के प्रति उसका नज़रिया दमन का होता है। यह अनायास नहीं है कि इटली और जर्मनी की ही तरह नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में मज़दूरों पर नंगे किस्म की तानाशाही लागू कर रखी है। अभी हड़ताल करने पर कानूनी प्रतिबन्ध तो नहीं है, लेकिन अनौपचारिक तौर पर प्रतिबन्ध जैसी ही स्थिति है; श्रम विभाग को लगभग समाप्त कर दिया गया है, और श्री मान मोदी खुद बोलते है कि गुजरात में उसे श्रम विभाग की आवश्यकता नहीं है! ज़ाहिर है-मज़दूरों के लिए लाठियों-बन्दूकों से लैस पुलिस और सशस्त्र बल तो हैं ही! 

जर्मनी और इटली में भी इन्होंने पूँजीपति वर्ग की तानाशाही को सबसे बर्बर और नग्न रूप में लागू किया था और यहाँ भी उनकी तैयारी ऐसी ही है। जर्मनी और इटली की ही तरह औरतों को अनुशासित करके रखने, उनकी हर प्रकार की स्वतन्त्रता को समाप्त कर उन्हें चूल्हे-चौखट और बच्चों को पैदा करने और पालने-पोसने तक सीमित कर देने के लिए संघ के अनुषंगी संगठन तब भी तत्पर रहते हैं, जब भाजपा शासन में नहीं होती। श्रीराम सेने, बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद् के गुण्डे लड़कियों के प्रेम करने, अपना जीवन साथी अपनी इच्छा से चुनने, यहाँ तक कि जींस पहनने और मोबाइल इस्तेमाल करने तक पर पाबन्दी लगाने की बात करते हैं। यह बात अलग है कि यही सलाह वे कभी सुषमा स्वराज, वसुन्धरा राजे, उमा भारती, या मीनाक्षी लेखी को नहीं देते जो कि औरतों को गुलाम बनाकर रखने के मिशन में उनके साथ खड़ी औरतें हैं! 

गोलवलकर ने स्वयं औरतों के बारे में ऐसे विचार व्यक्त किये हैं। उनके विचारों पर अमल हो तो औरतों का कार्य “वीर हिन्दू पुरुषों” को पैदा करना होना चाहिए! राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जहाँ तक बात इनके “राष्ट्रवादी” होने की है, तो भारतीय स्वतन्त्र संग्राम के इतिहास पर नज़र डालते ही समझ में आ जाता है कि यह एक बुरे राजनीतिक चुटकुले से ज़्यादा और कुछ भी नहीं है। संघ के किसी भी नेता ने कभी भी ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ अपना मुँह नहीं खोला। जब भी संघी किसी कारण पकड़े गए तो उन्होंने बिना किसी हिचक के माफ़ीनामे लिख कर, अंग्रेजी हुकूमत के प्रति अपनी वफ़ादारी साबित की है। स्वयं पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपयी ने भी यही काम किया था। संघ ने किसी भी ब्रिटिश साम्राज्यवाद विरोधी आन्दोलन में हिस्सा नहीं लिया। ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के दौरान संघ ने उसका बहिष्कार किया। संघ ने हमेशा ब्रिटिश शासन के प्रति अपनी वफ़ादारी बनायी रखी और देश में साम्प्रदायिकता फैलाने का अपना काम बखूबी किया। वास्तव में साम्प्रदायिकता फैलाने की पूरी साज़िश तो ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के ही दिमाग़ की पैदावार थी और ‘बाँटो और राज करो’ की उनकी नीति का हिस्सा थी। लिहाज़ा, संघ के इस काम से उपनिवेशवादियों को भी कभी कोई समस्या नहीं थी। ब्रिटिश उपनिवेशवादी राज्य ने भी इसी वफ़ादारी का बदला चुकाया और हिन्दू साम्प्रदायिक फ़ासीवादियों को कभी अपना निशाना नहीं बनाया। 

आर.एस.एस. ने हिन्दुत्व के अपने प्रचार से सिर्फ़ और सिर्फ़ साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ हो रहे देशव्यापी आन्दोलन से उपजी कौमी एकजुटता को तोड़ने का प्रयास किया। ग़ौरतलब है कि अपने साम्प्रदायिक प्रचार के निशाने पर आर.एस.एस. ने हमेशा मुसलमानों, कम्युनिस्टों और ट्रेड यूनियन नेताओं को रखा और ब्रिटिश शासन की सेवा में तत्पर रहे। संघ कभी भी ब्रिटिश शासन-विरोधी नहीं था, यह बात गोलवलकर के 8 जून, 1942 में आर.एस.एस. के नागपुर हेडक्वार्टर पर दिए गए भाषण से साफ़ हो जाती है – “संघ किसी भी व्यक्ति को समाज के वर्तमान संकट के लिये ज़िम्मेदार नहीं ठहराना चाहता। जब लोग दूसरों पर दोष मढ़ते हैं तो असल में यह उनके अन्दर की कमज़ोरी होती है। शक्तिहीन पर होने वाले अन्याय के लिये शक्तिशाली को ज़िम्मेदार ठहराना व्यर्थ है।…जब हम यह जानते हैं कि छोटी मछलियाँ बड़ी मछलियों का भोजन बनती हैं तो बड़ी मछली को ज़िम्मेदार ठहराना सरासर बेवकूफ़ी है। प्रकृति का नियम चाहे अच्छा हो या बुरा सभी के लिये सदा सत्य होता है। केवल इस नियम को अन्यायपूर्ण कह देने से यह बदल नहीं जाएगा।” अपनी बात को स्पष्ट करने के लिये इतिहास के उस कालक्रम पर रोशनी डालेंगे जहाँ संघ की स्थापना होती है। यहीं संघ की जड़ों में बसी प्रतिक्रियावादी विचारधारा स्पष्ट हो जाएगी। 

आर.एस.एस. की स्थापना 1925 में नागपुर में विजयदशमी के दिन हुई थी। केशव बलिराम हेडगेवार आर.एस.एस. के संस्थापक थे। भारत में फ़ासीवाद उभार की ज़मीन एक लम्बे अर्से से मौजूद थी। आज़ादी के पहले 1890 और 1900 के दशक में भी हिन्दू और इस्लामी पुनुरुत्थानवादी ताकतें मौजूद थी पर उस समय के कुछ प्रगतिवादी राष्ट्रवादी नेताओं के प्रयासों द्वारा हिन्दू व इस्लामी पुनरुत्थानवादी प्रतिक्रियावाद ने कोई उग्र रूप नहीं लिया। फ़ासीवादी उभार की ज़मीन हमेशा पूँजीवादी विकास से पैदा होने वाली बेरोज़गारी, गरीबी, भुखमरी, अस्थिरता, असुरक्षा, और आर्थिक संकट से तैयार होती है। भारत ब्रिटिश साम्राज्य का उपनिवेश था। यहाँ पूँजीवाद अंग्रेज़ों द्वारा आरोपित औपनिवेशक व्यवस्था के भीतर पैदा हुआ। एक उपनिवेश होने के कारण भारत को पूँजीवाद ब्रिटेन से गुलामी के तोहफ़े के तौर पर मिला। भारत में पूँजीवाद किसी बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के ज़रिये नहीं आया। इस प्रकार से आये पूँजीवाद में जनवाद, आधुनिकता, तर्कशीलता जैसे वे गुण नहीं थे जो यूरोप में क्रान्तिकारी रास्ते से आये पूँजीवाद में थे। इस रूप में यहाँ का पूँजीपति वर्ग भी बेहद प्रतिक्रियावादी, अवसरवादी और कायर किस्म का था जो हर प्रकार के प्रतिक्रियावाद को प्रश्रय देने को तैयार था। आज़ादी के बाद यहाँ हुए क्रमिक भूमि सुधारों के कारण युंकरों जैसा एक पूँजीवादी भूस्वामी वर्ग भी मौजूद था। गाँवों में भी परिवर्तन की प्रक्रिया बेहद क्रमिक और बोझिल रही जिसने संस्कृति और सामाजिक मनोविज्ञान के धरातल पर प्रतिक्रिया के लिए एक उपजाऊ ज़मीन मुहैया करायी। निश्चित तौर पर, उन्नत पूँजीवादी देशों में भी, जहाँ पूँजीवादी जनवादी क्रान्तियाँ हुई थीं, फासीवादी उभार हो सकता है और आज हो भी रहा है। लेकिन निश्चित तौर पर फासीवादी उभार की ज़मीन उन समाजों में ज़्यादा मज़बूत होगी जहाँ आधुनिक पूँजीवादी विकृति, रुग्णता, बर्बादी और तबाही के साथ मध्ययुगीन सामन्ती बर्बरता, निरंकुशता और पिछड़ापन मिल गया हो।

 भारत में ऐसी ज़मीन आज़ादी के बाद पूँजीवादी विकास के शुरू होने के साथ फासीवादी ताक़तों को मिली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिन्दुत्ववादी फासीवाद इसी ज़मीन पर पला-बढ़ा है। आज जब पूँजीवाद अपने संकट का बोझ मज़दूर वर्ग और आम मेहनतकश आबादी पर डाल रहा है और महँगाई, बेरोज़गारी और भूख से उन पर कहर बरपा कर रहा है, तो जनता के आन्दोलन भी सड़कों पर फूट रहे हैं। चाहे वह मज़दूरों के आन्दोलन हों, ठेके पर रखे गये शिक्षकों, नर्सों और अन्य कर्मकारों के आन्दोलन हों, या फिर शिक्षा और रोज़गार के अधिकार के लिए छात्रों-युवाओं के आन्दोलन हों। यदि कोई क्रान्तिकारी विकल्प न हो तो पूँजीवाद के इसी संकट से समाज में उजड़ा हुआ टुटपुँजिया पूँजीपति वर्ग और लम्पट सर्वहारा वर्ग फ़ासीवादी प्रतिक्रिया का आधार बनते हैं। 

 ब्रिटिश भारत में भी फांसीवादी विचारधारा का सामाजिक आधार इन्हीं वर्गों के ज़रिये पैदा हुआ था। भारत के महाराष्ट्र में ऐसा टटपूँजिया वर्ग मौजूद था। महाराष्ट्र के व्यापारी और ब्राह्मण ही आर.एस.एस. का शुरुआती आधार बने। 1916 के लखनऊ समझौते और खिलाफ़त आन्दोलन के मिलने से धार्मिक सौहार्द्र की स्थिति बनी रही। परन्तु इस दौरान भी ‘हिन्दू महासभा’ जैसे हिन्दू साम्प्रदायिक संगठन मौजूद थे। गाँधी द्वारा असहयोग आन्दोलन के अचानक वापस लिए जाने से एक हताशा फैली और ठहराव की स्थिति आयी। इतिहास गवाह है कि ऐसी हताशा और ठहराव की स्थितियों में ही प्रतिक्रियावादी ताक़तें सिर उठाती हैं और जनता को ‘गलत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं’ जैसा कि भगतसिंह ने कहा था। भारत का बुर्जुआ वर्ग एक तरफ़ साम्राज्यवाद से राजनीतिक स्वतन्त्रता चाहता था, तो वहीं वह मज़दूरों और किसानों के जाग जाने और विद्रोह का रास्ता अख्‍त़ियार करने से लगातार भयभीत भी रहता था। इसीलिए गाँधी ने कभी मज़दूरों को संगठित करने का प्रयास नहीं किया; उल्टे जब गुजरात के मज़दूरों ने गाँधी का जुझारू तरीके से साथ देने की पेशकश की तो गाँधी ने उन्हें शान्तिपूवर्क काम करने की हिदायत दी और कहा कि मज़दूर वर्ग को राजनीतिक तौर पर छेड़ा नहीं जाना चाहिए। यही कारण था कि असहयोग आन्दोलन के क्रान्तिकारी दिशा में मुड़ने के पहले संकेत मिलते ही गाँधी ने कदम पीछे हटा लिये और अंग्रेज़ों से समझौता कर लिया। 

भारतीय रुग्ण पूँजीपति वर्ग का राजनीतिक चरित्र ही दोहरा था। इसलिए उसने पूरी स्वतन्त्रता की लड़ाई में कभी आमूलगामी रास्ता अख्‍त़ियार नहीं किया और हमेशा ‘दबाव-समझौता-दबाव’ की रणनीति अपनायी ताकि जनता की क्रान्तिकारी पहलकदमी को निर्बन्ध किये बिना, एक समझौते के रास्ते एक पूँजीवादी राजनीतिक स्वतन्त्रता मिल जाये। गाँधी और कांग्रेस की यह रणनीति भी भारत में फासीवाद के उदय के लिए ज़िम्मेदार थी। मिसाल के तौर पर असहयोग आन्दोलन के वापस लिये जाने के बाद जो हताशा फैली उसी के कारण प्रतिक्रियावादी ताक़तें हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोड़ने में सफल हुईं। एक तरफ़ इस्लामी कट्टरपंथ तो दूसरी ओर हिन्दू पुनरुत्थानवाद की लहर चल पड़ी। सावरकर बंधुओं का समय यही था। आर.एस.एस. की स्थापना इन्हीं सब घटनाओं की पृष्ठभूमि में हुई। संघ के संस्थापक हेडगेवार संघ के निर्माण से पहले कांग्रेस के साथ जुड़े थे। 1921 में ख़िलाफ़त आन्दोलन के समर्थन में दिए अपने भाषण की वजह से उन्हें एक साल की जेल हुई। आर.एस.एस. के द्वारा ही छापी गयी उनकी जीवनी “संघवृक्ष के बीज” में लिखा है कि जेल में रहते हुए स्वतंत्रता संग्राम में हासिल हुए अनुभवों ने उनके मस्तिष्क में कई सवाल पैदा किये और उन्हें लगा कि कोई और रास्ता ढूँढा जाना चाहिए। इसी किताब में यह भी लिखा हैं कि हिन्दुत्व की ओर हेडगेवार का रुझान 1925 में शुरू हुआ। बात साफ़ है, जेल जाने के पश्चात जो “बौद्धिक ज्ञान” उन्हें हासिल हुआ उसके बाद उन्होंने आर.एस.एस. की स्थापना कर डाली। हेडगेवार जिस व्यक्ति के सम्पर्क में फ़ासीवादी विचारों से प्रभावित हुए वह था मूंजे। मूंजे वह तार है जो आर.एस.एस. के संस्थापक हेडगेवार और मुसोलिनी के फ़ासीवादी विचारों से संघ की विचारधारा को जोड़ता है। मज़ि‍र्आ कसोलरी नामक एक इतालवी शोधकर्ता ने आर.एस.एस. के संस्थापकों और नात्सियों व इतालवी फ़ासीवादियों के बीच के सम्पर्कों पर गहन शोध किया है। कसोलरी के अनुसार हिन्दू राष्ट्रवादियों की फ़ासीवाद और मुसोलिनी में रुचि कोई अनायास होने वाली घटना नहीं है, जो केवल चन्द लोगों तक सीमित थी, बल्कि यह हिन्दू राष्ट्रवादियों, ख़ासकर महाराष्ट्र में रहने वाले हिन्दू राष्ट्रवादियों के इतालवी तानाशाही और उनके नेताओं की विचारधारा से सहमति का नतीजा था। इन पुनरुत्थानवादियों को फ़ासीवाद एक “रूढ़िवादी क्रान्ति” के समान प्रतीत होता था। इस अवधारणा पर मराठी प्रेस ने इतालवी तानाशाही की उसके शुरुआती दिनों से ही खूब चर्चा की। 1924-1935 के बीच आर.एस.एस. से करीबी रखने वाले अखबार ‘केसरी’ ने इटली में फ़ासीवाद और मुसोलिनी की सराहना में कई सम्पादकीय और लेख छापे। जो तथ्य मराठी पत्रकारों को सबसे अधिक प्रभावित करता था वह था फ़ासीवाद का “समाजवाद” से उद्भव, जिसने इटली को एक पिछड़े देश से एक विश्व शक्ति के रूप में परिवर्तित कर दिया। 

अपने सम्पादकियों की एक श्रृंखला में केसरी ने इटली के उदारवादी शासन से तानाशाही तक की यात्रा को अराजकता से एक अनुशासित स्थिति की स्थापना बताया। मराठी अखबारों ने अपना पर्याप्त ध्यान मुसोलिनी द्वारा किये गए राजनीतिक सुधारों पर केन्द्रित रखा, ख़ास तौर पर संसद को हटा कर उसकी जगह ‘ग्रेट कॅाउंसिल ऑफ़ फ़ासिज़्म’ की स्थापना। इन सभी तथ्यों से यह साफ़ हो जाता है कि 1920 के अन्त तक महाराष्ट्र में मुसोलिनी की फ़ासीवादी सत्ता अखबारों के माध्यम से काफ़ी प्रसिद्धि प्राप्त कर रही थी। फ़ासीवाद का जो पहलू हिन्दू राष्ट्रवादियों को सबसे अधिक आकर्षक लगा वह था समाज का सैन्यकरण जिसने एक तानाशाह की अगुवाई में समाज का रूपान्तरण कर दिया था। इस लोकतंत्र-विरोधी व्यवस्था को हिन्दू राष्ट्रवादियों द्वारा ब्रिटिश मूल्यों वाले लोकतंत्र के मुकाबले एक सकारात्मक विकल्प के रूप में देखा गया। पहला हिन्दू राष्ट्रवादी जो फ़ासीवाद सत्ता के सम्‍पर्क में आया वह था हेडगेवार का उस्ताद मुंजे। मुंजे ने संघ को मज़बूत करने और उसे देशव्यापी संस्था बनाने की अपनी इच्छा व्यक्त की, जो जगजाहिर है। 1931 फ़रवरी-मार्च के बीच मूंजे ने राउण्ड टेबल कान्फ्रेंस से लौटते हुए यूरोप की यात्रा की, जिस दौरान उसने मुसोलिनी से मुलाकात भी की। मूंजे ने रोम में इतालवी फ़ासीवादियों के मिलिट्री कॅालेज – फ़ासिस्ट अकेडमी ऑफ़ फिजिकल एजुकेशन, सेंट्रल मिलिट्री स्कूल ऑफ़ फ़िजिकल एजुकेशन और इन सबमें से सबसे महत्वपूर्ण बलिल्ला और एवां गारडिस्ट आर्गेनाइजेशन के गढ़ों को जाकर बहुत बारीकी से देखा। इससे मुंजे बहुत प्रभावित हुआ। ये स्कूल या कॉलेज शिक्षा के केंद्र नहीं थे बल्कि मासूम बच्चों और लड़कों के दिमागों में ज़हर गोलकर, उनका ‘ब्रेनवॉश’ करने के सेण्टर थे। यहाँ 6 वर्ष से 18 वर्ष की आयु के युवकों की भर्ती कर उन्हें फ़ासीवादी विचारधारा के अधीन करने के पूरे इंतज़ाम थे। आर.एस.एस. का यह दावा कि इसका ढाँचा हेडगेवार के काम और सोच का नतीजा था एक सफ़ेद झूठ है क्योंकि संघ के स्कूल व अन्य संस्थाएँ और खुद संघ का पूरा ढाँचा इतावली फ़ासीवाद पर आधारित है। और उनसे हूबहू मेल खाता है। भारत वापस आते ही, मुंजे ने हिन्दुओं के सैन्यीकरण की अपनी योजना ज़मीन पर उतारनी शुरू कर दी। पुणे पहुँच कर मुंजे ने “द मराठा” को दिए एक साक्षात्कार में हिन्दू समुदाय के सैन्यीकरण के सम्बन्धों में निम्नलिखित बयान दिया, “नेताओं को जर्मनी के युवा आन्दोलन, बलिल्ला और इटली की फ़ासीवादी संगठनों से सीख लेनी चाहिए।” मुंजे और आर.एस.एस. की करीबी और इनकी फ़ासीवादी विचारधारा की पुष्टि 1933 में ब्रिटिश सूत्रों में छपी खुफ़िया विभाग की रिपोर्ट से हो जाती है। इस रिपोर्ट का शीर्षक था “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर टिप्पणी” जिसमें संघ के मराठी भाषी क्षेत्रों में पुर्नगठन का ज़िम्मेदार मुंजे को ठहराया गया है। इस रिपोर्ट में आर.एस.एस. के चरित्र, इनकी गतिविधियों के बारे में कहा था कि – “यह कहना सम्भवतः कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा कि संघ भविष्य में भारत के लिए वह बनना चाहता है जो फ़ासीवादी इटली के लिए हैं और नात्सी लोग जर्मनी के लिए हैं।” (नेशनल आर्काइव ऑफ़ इण्डिया) 1934 में मुंजे ने अपनी एक संस्था “भोंसला मिलिट्री स्कूल” की नींव रखी, उसी साल मुंजे ने “केन्द्रीय हिन्दू सैन्य शिक्षा समाज’, जिसका मुख्य उद्देश्य हिन्दुओं के सैन्य उत्थान और हिन्दू युवाओं को अपनी मातृभूमि कि रक्षा करने योग्य बनाना था, की बुनियाद भी रखी। जब भी मुंजे को हिन्दू समाज के सैन्यकरण के व्यावहारिकता का उदहारण देने की ज़रूरत महसूस हुई तो उसने इटली की सेना और अर्द्धसेना ढाँचे के बारे में जो स्वयं देखा था, वह बताया। मुंजे ने बलिल्ला और एवां गार्डिस्टों के सम्बन्ध में विस्तारित विवरण दिए। जून 1938 में मुम्बई में स्थित इतावली वाणिज्य दूतावास ने भारतीय विद्यार्थियों को इतालवी भाषा सिखने के लिए भर्ती शुरू की, जिसके पीछे मुख्य उद्देश्य युवाओं को इटली के फ़ासीवादी प्रचार का समर्थक बनाना था। मारिओ करेली नाम के एक व्यक्ति को इस कार्य के लिए रोम से भारत भेजा गया। भर्ती किये गए विद्यार्थियों में से एक माधव काशीनाथ दामले, ने करेली के सुझाव के बाद मुसोलिनी की पुस्तक “फ़ासीवाद का सिद्धांत” का मराठी में अनुवाद किया और उसे 1939 में एक श्रृंखलाबद्ध तरीके से लोहखंडी मोर्चा (आयरन फ्रण्ट) नामक पत्रिका में छापा गया। महाराष्ट्र में फैले फ़ासीवादी प्रभाव का एक और उदाहरण एम.आर. जयकर, जो हिन्दू महासभा के एक प्रतिष्ठित नेता थे, द्वारा गठित ‘स्वास्तिक लीग’ थी। 1940 में नात्सियों के असली चरित्र के सामने आने के साथ इस लीग ने खुद को नात्सीवाद से अलग कर लिया। ओरिजीत सेन का कार्टून 1930 के अन्त तक, आर.एस.एस. की पैठ महाराष्ट्र के ब्राह्मण समाज में बन गयी थी। हेडगेवार ने मुंजे के विचारों से सहमति ज़ाहिर करते हुए, संघ की शाखाओं में फ़ासीवादी प्रशिक्षण की शुरुआत की। लगभग इसी समय विनायक दामोदर सावरकर, जिसके बड़े भाई राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापकों में से एक थे, ने जर्मनी के नात्सियों द्वारा यहूदियों के सफ़ाये को सही ठहराया और भारत में मुसलमानों की “समस्या” का भी यही समाधान सुझाया। जर्मनी में “यहूदी प्रश्न’ का अन्तिम समाधान सावरकर के लिए मॉडल था। संघियों के लिए राष्ट्र के सबसे बड़े दुश्मन थे मुसलमान! ब्रिटिश साम्राज्य उनकी निन्दा या क्रोध का कभी पात्र नहीं था। आर.एस.एस. ऐसी गतिविधियों से बचता था जो अंग्रेजी सरकार के खिलाफ़ हों। संघ द्वारा ही छपी हेडगेवार की जीवनी जिसका ज़िक्र पहले भी लेख में किया जा चुका है, में ‘डाक्टर साहब’ की स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका का वर्णन करते हुए बताया गया है कि संघ स्थापना के बाद ‘डाक्टर साहब’ अपने भाषणों में हिन्दू संगठन के सम्बन्ध में ही बोला करते थे। सरकार पर प्रत्यक्ष टीका न के बराबर रहा करती थी। हेडगेवार ने मृत्यु से पहले गोलवलकर को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। गोलवलकर 1940 से 1973 तक संघ के सुप्रीमो रहे। गोलवलकर के ही नेतृत्व में संघ के वे सभी संगठन अस्तित्व में आये जिन्हें हम आज जानते हैं। गोलवलकर ने संघ की फ़ासीवादी विचारधारा को एक सुव्यवस्थित रूप दिया और इसकी पहुँच को महाराष्ट्र के ब्राह्मणों से बाहर निकाल अखिल भारतीय संगठन का रूप दिया। संघ ने इसी दौरान अपने स्कूलों का नेटवर्क देश भर में फैलाया। संघ की शाखाएँ भी गोलवलकर के नेतृत्व में पूरे देश में बड़े पैमाने पर फैलीं। यही कारण है कि संघ के लोग उन्हें गुरु जी कहकर सम्बोधित करते हैं। इनके किये-धरे पर लिखना हो तो पूरी किताब लिखी जा सकती है। और कई अच्छी किताबें मौजूद भी हैं परन्तु हमारा यह मकसद नहीं था। हमारा यहाँ सिर्फ़ यह मकसद था कि यह दिखाया जाए कि संघ का विचारधारात्मक, राजनीतिक और सांगठनिक ढाँचा एक फ़ासीवादी संगठन का ढाँचा है। इसकी विचारधारा फ़ासीवाद है। 

अपने को राष्ट्रवादी कहने वाले और इटली व जर्मनी के फासीवादियों व नात्सियों से उधार ली निक्कर, कमीज़ और टोपी पहन कर इन मानवद्रोहियों ने देश और धर्म के नाम पर अब तक जो उन्माद फैलाया है वह फ़ासीवादी विचारधारा को भारतीय परिस्थितियों में लागू करने का नतीजा है। भारतीय संस्कृति, भारतीय अतीत के गौरव, और भाषा आदि की दुहाई देना तो बस एक दिखावा है। संघ परिवार तो अपनी विचारधारा, राजनीति, संगठन और यहाँ तक कि पोशाक से भी पश्चिमपरस्त है! और पश्चिम का अनुसरण करने में भी इसने वहाँ के जनवादी और प्रगतिशील आदर्शों का अनुसरण करने की बजाय, वहाँ की सबसे विकृत, मानवद्रोही और बर्बर विचारधारा, यानी कि फासीवाद-नात्सीवाद का अनुसरण किया है। हमारा मक़सद ‘संस्कृति’, ‘धर्म’ और ‘राष्ट्रवाद’ की दुहाई देने वाले इन फासीवादियों की असली जन्मकुण्डली को आपके सामने खोलकर रखना था, क्योंकि पढ़ी-लिखी आबादी और विशेषकर नौजवानों का एक हिस्सा भी देशभक्ति करने के महान उद्देश्य से इन देशद्रोहियों के चक्कर में फँस जाता है। इसलिए ज़रूरी है कि इनके पूरे इतिहास को जाना जाय और समझा जाय कि देशप्रेम, राष्ट्रप्रेम से इनका कभी लेना-देना था ही नहीं ना आज है । यह देश में पूँजीपतियों की नंगी तानाशाही लागू करने के अलावा और कुछ नहीं करना चाहते।

(लेखिका दिशा छात्र संगठन की कार्यकर्ता हैं।
यह आर्टिकल ahwanmag.com/ से साभार लिया गया है।)

प्रस्तुति
पं. एल.के.शर्मा
(अधिवक्ता)

12/27/2016

2016: भारत मूर्खता का इतिहास वर्ष!

2016: भारत मूर्खता का इतिहास वर्ष!

इसलिए कि दौड़ती-फुदकती आर्थिकी को झटके में बैठा देना विश्व इतिहास के पैमाने में एक राष्ट्र-राज्य का अपने पांव कुल्हाड़ी मारना है। दुनिया हैरान है। बौद्धिकता और आर्थिकी के वैश्विक थिंक टैंक के पैमाने पर एक राष्ट्र-राज्य के इस तरह अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारने को न तो तर्कसंगत समझा जा रहा है और न इससे भारत निर्माण बूझा जा रहा है। बिजनेस की वैश्विक पत्रिका फॉर्ब्स के प्रधान संपादक स्टीव फॉर्ब्स ने इस शीषर्क से लेख लिखा – What India Has Done To Its Money Is Sickening And Immoral, यानी ‘भारत ने अपनी मुद्रा के साथ जो किया वह बीमार बनाने वाला और अनैतिक’ है।

स्टीव का तर्क है कि लोग अपनी मेहनत से उत्पादन करते है। उसका प्रतिनिधि उसका पैसा है। व्यक्ति का अर्जन उसकी मुद्रा, करेंसी है। सरकार अर्जन नहीं करती है, जनता करती है। सो, पैसा उसकी अर्जित प्रोपर्टी है। तभी भारत में जो हुआ है वह जनता की ंंंप्रोपर्टी पर डाका है, और ऐसा बेशर्मी से, बिना किसी प्रोसेस की आड़ रख कर हुआ है। यह वैसे ही है जैसे 1970 के दशक में इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी में जोर जबरदस्ती नसबंदी और नाजियों ने ‘जनसंख्या आधिक्य’ के हवाले अनैतिक कुकर्म किया था। भारत आज विध्वंसक-चरम स्थिति का वह उदाहरण है, जहां नकदी विरोधी पागलपन अर्थशास्त्र और सरकार को बहा दे रहा है!

सोचें, ये वाक्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आज के भारत की क्या इमेज लिए हुए है? अपने को गूढ़, बतौर निष्कर्ष वाली टिप्पणी लंदन की वैश्विक पत्रिका ‘द इकोनोमिस्ट’ की लगी। उसने लिखा कि आर्थिकी के मुद्रा का प्रबंधन किसी भी सरकार का सर्वाधिक महत्वपूर्ण काम होता है। मौद्रिक (करेंसी) औजार का क्लमजी याकि लचर उपयोग अत्यधिक जोखिमपूर्ण होता है। अर्थशास्त्री जॉन एम किन्स ने भी 1919 में लेनिन की लिखी इस बात की ताकीद की थी कि समाज के विद्यमान आधार को ध्वस्त करने का निश्चित, तयशुदा तरीका यदि कोई है तो वह करेंसी को डिबॉच (हराम) बनाने का है! विश्वास बहुत अमूल्य और नाजुक होता है।
क्या यहीं 2016 में भारत राष्ट्र-राज्य की मूर्खता की आधार थीसिस नहीं है? आठ नवंबर 2016 को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच सौ और एक हजार रुपए के नोट रद्द कर भारत की आर्थिकी, सवा सौ करोड़ लोगों के उसके अर्जन, उसके पैसे में जो अमूल्य-नाजुक विश्वास था, उसे क्या खत्म नहीं किया? भारत ने दुनिया को जताया है कि मौद्रिक औजार का सरकार का उपयोग लचर ही नहीं है, बल्कि हर मायने में मूर्खतापूर्ण, अनैतिक, जी मितला कर उलटी करा देने वाला है। न अमल का रोडमैप, न अमल का प्रबंधन, न उद्देश्य की प्राप्ति और न भविष्य की दृष्टि का कोई प्रमाण! भारत सरकार, रिजर्व बैंक, बैंकिंग व्यवस्था सब की जग हंसाई और परिणाम कुल मिला कर यह कि सात-सवा सात फीसदी की फुदकती आर्थिकी जमीन पर ठहरी, ठिठकी हुई!
इस बात के वैश्विक पैमाने पर जितने अर्थ हैं उससे अधिक गहरे अर्थ हमारे लिए, हमारे संदर्भ में हैं। आखिर सवा सौ करोड़ लोग आज भले न सोचें, साल बाद, पांच साल बाद, बीस साल या सौ साल बाद इतिहास क्या सोचेगा? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के इतिहास में अपना नाम निश्चित ही दर्ज करा लिया है। इतिहास में यहीं लिखा जाएगा कि भारत दुनिया का वह अनहोना देश है, जहां मध्यकाल में तुगलक नाम का राजा था तो आधुनिक काल में नरेंद्र मोदी नाम का प्रधानमंत्री बना और दोनों ने देश की करेंसी खत्म कर, जनता के अर्जित पैसे को लूटा। बरबादी कराई। दौड़ रहे देश को बैठा दिया। करेंसी में अमूल्य-नाजुक विश्वास को तोड़ कर!
हां, अमूल्य और नाजुक विश्वास का जुमला बहुत अहम है। भारत का समाज परंपरा और वर्तमान की जिन धाराओं की जमीन पर बना है उसमें पैसे को ले कर जनमानस का विश्वास गहरे पैठा रहा है। इसके मनोविज्ञान में दस तरह की बाते हैं। महिलाओं ने पेट काट, सबसे बचा कर अपनी बचत बनाई तो ऐसा इस विश्वास के चलते था कि यहीं तो उसकी सुरक्षा है। उसका कमाया, बचाया पैसा है। उसका है इसलिए हमेशा उसका रहेगा। मतलब कभी अमान्य नहीं हो सकता।
तभी, दुनिया सोच रही होगी कि जो देश, जिस देश की सरकार अपने लोगों के साथ ऐसा अनैतिक, डाके मारने वाला व्यवहार कर सकती है तो उस देश में जा कर काम धंधा करना क्या सुरक्षित होगा? दुनिया का विश्वास भारत से, उसकी सरकार की मूर्खता से टूटा है। इकोनोमिस्ट ने जो लिखा है उसका अर्थ यहीं है कि किसी देश के होने, चलने और उसके बनने में विश्वास की पूंजी अमूल्य और नाजुक होती है। उसे आठ नवंबर के दिन नरेंद्र मोदी ने अपनी सनक में, बिना सोचे-समझे जैसे खत्म किया है उससे इस देश का आम मानस सालों-साल उबर नहीं पाएगा। वक्त गुजरने के साथ लगातार धारणा बनेगी, पैठेगी, इतिहास में दर्ज होगी कि वह कैसा 2016 का वर्ष था, जिसमें भारत ने, उसकी सरकार ने मूर्खता का अकल्पनीय, अनैतिक फैसला किया।

बहरहाल, इतिहास की कसौटी पर 2016 के नोटबंदी फैसले पर विचार हो। भारत की जिंदा आर्थिकी में से 86 प्रतिशत नोटों वाला खून सोख लेने जैसा काम क्या इतिहास में किसी और देश में हुआ है? नहीं हुआ है। रूस, जिंबाब्वे जैसे जो उदाहरण हैं वे दिवालिया दशा, या सोवियत संघ के बिखरने जैसी दशा में नई करेंसी, आर्थिकी को रीबूट करने के लिए थे। वैसी स्थितियों में भारत आठ नवंबर को नहीं था। हां, उसकी आर्थिकी में काले धन वाले मगरमच्छ थे पर मगरमच्छों का रूप रियल एस्टेट, सोने-चांदी-जेवरात-विदेशी बैंकों में डॉलर या एफआईआई निवेश आदि का था। पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जन-जन के तालाब में छुपे काले धन के मगरमच्छों पर वार करके यह सनक पाली कि इससे लोगों के बीच के मोटे सेठ पकड़े जाएंगे। लोग वाह करेंगें। तभी एक झटके में नकद करेंसी वाली आर्थिकी के भाखड़ा नांगल बांध से 86 फीसदी पानी सोख उसे खाली करा दिया, इस उम्मीद में कि मगरमच्छ एक्सपोज होंगे, पकड़े जाएंगे।

वह हुआ नहीं। सो, आज भारत का भाखड़ा बांध सूखा पड़ा है। तालाब, सागर सूखा है और मगरमच्छ जैसे पहले गायब थे वैसे आज भी ओझल हैं। ये बैंक मैनेजरों, सिस्टम के जरिए पानी से निकल जमीन रास्ते जंगलों में लुप्त हो गए है। बेचारी जनता याकि मछलियां लाचार, बेबस तड़प रही हैं, मर रही हैं। न जनता को जीने का पानी मिल रहा है और न बिजली बन रही है। आर्थिकी के चक्के जाम हैं।

क्या ऐसा प्रयोग अमेरिका सोच सकता है? जान लें वहां भी आर्थिकी में काले धन का हिस्सा है। अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, इटली, स्वीडन सब काला धन लिए हुए हैं तभी तो बोफोर्स से ले कर तमाम हथियार सौदों की यहीं से रिश्वत विदेशी बैंकों में जाती है।

पर ये देश अर्थशास्त्र के कायदे में, याकि करेंसी के प्रति विश्वास को अमूल्य बनाए रखने को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। इन्हें पता है कि विश्वास टूटा तो देश का नागरिक हो या विदेशी निवेशक सभी का व्यवहार बदलेगा। मूल बात विश्वास की है। इसका आम नागरिक के, इंसान के जीवन में जैसा महत्व होता है वैसे ही राष्ट्र-राज्य भी विश्वास पर बनते-बिगड़ते हैं। इसमें नंबर एक पैरामीटर, प्रतीक करेंसी होती है। उसके प्रबंधन में खेल या मूर्खता वैसी हो ही नहीं सकती जैसी 2016 के भारत में हुई है।

इसलिए कोई माने या न माने, अपना मानना है कि इतिहास में 2016 का वर्ष भारत की मूर्खता के इतिहास वर्ष के रूप में सदैव उल्लेखित रहेगा। इसलिए भी कि 2016 का असर 2017 में होगा तो 2018 में भी। एक बार जब विश्वास टूटा है तो लोगों के घायल हो कर बैठने से ले कर देशी-विदेशी निवेशकों की अनास्था में क्या कुछ होगा, यह आने वाले साल बताएंगे। लोगों की बदहाली और आर्थिकी की बरबादी का प्रारंभ तो 2017 से होना है!
आप नहीं मानते? वक्त अपने को सही साबित करेगा।

संकलन
न्यूज़ मिडिया,समाचार पत्र
पं. एल.के.शर्मा