7/09/2016

जाकिर नाइक : एक खतरनाक मजहबी कट्टरपंथी जो कुतर्कों में निर्मल बाबा से भी मीलों आगे है

बांग्लादेश में हुए आतंकी हमलों से एक भारतीय नागरिक का भी नाम जुड़ रहा है. कहा जा रहा है कि इन हमलों में इस भारतीय की भी अप्रत्यक्ष भूमिका हो सकती है. यह नाम है इस्लामिक धर्म गुरु डॉक्टर जाकिर नाईक का. कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार ढाका में बीस लोगों को मौत के घाट उतारने वाले आतंकियों में से कुछ जाकिर नाइक से प्रभावित थे. इन आरोपों को इसलिए भी बल मिल रहा है क्योंकि जाकिर नाइक पर पहले भी लोगों को भड़काने और धर्म के नाम पर गुमराह करने जैसे आरोप लगते रहे हैं.

मुंबई में रहने वाले 50 वर्षीय जाकिर नाइक के पिता एक मनोचिकित्सक थे और बड़े भाई एक डॉक्टर. एक साक्षात्कार में जाकिर बताते हैं कि उनकी अम्मी उन्हें क्रिस्चियन बर्नार्ड जैसा बड़ा डॉक्टर बनते देखना चाहती थी. साउथ अफ़्रीकी मूल के डॉक्टर क्रिस्चियन बर्नार्ड ही थे जिन्होंने दुनिया का पहला सफल हार्ट-ट्रांसप्लांट किया था. जाकिर नाइक डॉक्टर तो बने लेकिन डॉक्टरी की पढ़ाई के दौरान ही उनके आदर्श डॉक्टर बर्नार्ड की जगह एक अन्य साउथ अफ़्रीकी बन गए - इस्लामी उपदेशक शेख अहमद दीदात.

कई लोगों को उनकी यही खूबी सबसे ज्यादा आकर्षित करती है कि वे अपने तर्कों को सिर्फ कुरआन या हदीस ही नहीं बल्कि बाइबिल से लेकर वेद, पुराण, गीता और उपनिषद तक के उदाहरण देकर सही साबित करते हैं.
अहमद दीदात से मिलने के बाद जाकिर ने उनके कई भाषण और तर्क सुनें और अंततः उन्हीं की राह पर आगे बढ़ने का फैसला कर लिया. 1991 में जाकिर नाईक ने ‘इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन’ नाम की एक संस्था शुरू की. इस संस्था के बैनर तले उन्होंने इस्लाम और कुरआन पर लोगों से चर्चा करना शुरू किया. 15-20 लोगों के साथ शुरू हुआ इस्लाम पर सवाल-जवाब का यह सिलसिला इतनी तेजी से बढ़ा कि देखते ही देखते जाकिर नाईक के श्रोताओं की संख्या हजारों में जा पहुंची.
इसके बाद नाइक कई मंचों से भी लोगों को संबोधित करने लगे और उनके श्रोता हजारों से लाखों में हो गए. आज उनके श्रोताओं की संख्या करोड़ों में है और इसका मुख्य कारण है ‘पीस टीवी’ जिसे जाकिर नाइक ने साल 2006 में शुरू किया था. यह चैनल दुबई से चलाया जाता है.

जाकिर नाइक की तरफ लाखों लोगों के इतनी तेजी से आकर्षित होने का मुख्य कारण यह है कि वे हर सवाल का जवाब धार्मिक ग्रंथों के हवाले से देते हैं. सिर्फ मुस्लिम धर्म ग्रंथ ही नहीं बल्कि तमाम अन्य धर्मों के दर्जनों ग्रंथ भी जाकिर नाईक ने कंठस्थ कर लिए हैं. वे किसी भी सवाल के जवाब में इन ग्रंथों का हवाला देते हुए उससे संबंधित पेज और पैरा नंबर तक बता डालते हैं.

कई लोगों को उनकी यही खूबी सबसे ज्यादा आकर्षित करती है कि वे अपने तर्कों को सिर्फ कुरआन या हदीस ही नहीं बल्कि बाइबिल से लेकर वेद, पुराण, गीता और उपनिषद तक के उदाहरण देकर सही साबित करते हैं

लेकिन दिलचस्प यह है कि इतना पढ़े-लिखे होकर इतनी पोथियां पढने और रटने के बाद भी जाकिर नाइक अक्सर ऐसे कुतर्क करते हैं कि निर्मल बाबा भी शर्मा कर पानी भरने लग जाएं. वही निर्मल बाबा जो समोसे की चटनी का रंग बदलने से कृपा आने की बात कहते हैं.
ओसामा बिन लादेन के बारे में पूछे जाने पर कुछ साल पहले उनका कहना था कि वे बिन लादेन को आतंकवादी नहीं मानते. बल्कि उन्होंने यह भी कहा था कि जो भी इस्लाम के दुश्मन के खिलाफ लड़ रहा है, मैं उसके साथ हूं.
जाकिर नाइक धर्मग्रंथों का हवाला देते हुए कभी बीवी को पीटने को जायज़ बताते हैं, कभी समलैगिकों को और इस्लाम त्यागने वालों को सजा-ए-मौत देने की बात करते हैं, कभी कहते हैं कि महिलाएं यदि ताउम्र कुंवारी रहीं तो वे वेश्यावृति की ओर बढ़ जाती हैं और कभी कहते हैं कि सुवर का मीट खाने वाले लोग वाइफ-स्वापिंग करने लगते हैं.

जाकिर नाइक के इन ‘निर्मल बाबा पछाड़’ तर्कों पर विस्तार से चर्चा करने से पहले उनसे जुड़े कुछ ऐसे विवादों के बारे में जानते हैं जिनके चलते उन पर आतंकवादियों को प्रेरित करने जैसे गंभीर आरोप लगते रहे हैं. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना कल्बे जव्वाद एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘जो व्यक्ति यज़ीद की हिमायत कर रहा हो उससे ज़्यादा दहशतगर्द का हामी कौन हो सकता है. यज़ीद ने इमाम हुसैन को शहीद किया, उसकी हिमायत जाकिर नाइक कर रहे हैं. इसका मतलब है कि वे दहशतगर्दी की हिमायत कर रहे हैं.’

जाकिर नाइक आतंकवाद पर दिए गए अपने कई बयानों के चलते भी विवादों में घिर चुके हैं. ओसामा बिन लादेन के बारे में पूछे जाने पर कुछ साल पहले उनका कहना था कि वे बिन लादेन को आतंकवादी नहीं मानते. बल्कि उन्होंने यह भी कहा था कि ‘जो भी इस्लाम के दुश्मन के खिलाफ लड़ रहा है, मैं उसके साथ हूं. अगर लादेन अमेरिका को आतंकित कर रहा है, जो खुद आतंकवादी है तो मैं उनके साथ हूं.’ इसके साथ ही उनका कहना था कि हर मुसलमान को आतंकवादी होना चाहिए.

जाकिर नाइक के ऐसे ही कई विवादास्पद तर्कों के चलते उन पर समय-समय पर प्रतिबंध भी लगते रहे हैं. दारुल उलूम देवबंद भी उनके खिलाफ फतवा जारी कर चुका है और बरेलवी सुन्नी मुस्लिम, शिया मुस्लिम और सूफी मुस्लिम भी कई बार उनके खिलाफ सरकार से शिकायत कर चुके हैं. उत्तर प्रदेश सरकार कई बार जाकिर नाईक के कार्यक्रमों पर रोक लगा चुकी है और 2012 में यूपीए सरकार ने उनके ‘पीस टीवी’ पर भी प्रतिबंध लगा दिया था. भारत के कुछ हिस्सों में ही नहीं बल्कि कई अन्य देशों में भी जाकिर नाइक को प्रतिबंधित किया जा चुका है जिनमें ब्रिटेन, कनाडा और मलेशिया प्रमुख हैं.

इंटरनेट पर जाकिर नाइक से जुड़ा एक वीडियो आसानी से मिल जाता है जिसमें उनके एक भाषण की समीक्षा करते हुए बताया गया कि है कैसे उन्होंने 5 मिनट के वीडियो में 25 गलत हवाले दिए.
बात-बात पर धर्मग्रंथों का हवाला देने की जो कला जाकिर नाइक का सबसे बड़ा आकर्षण है, उस पर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं. कई लोग यह दावा कर चुके हैं कि जाकिर नाईक अक्सर इन ग्रंथों का गलत और झूठा संदर्भ देते हैं. इंटरनेट पर जाकिर नाईक से जुड़ा एक वीडियो आसानी से मिल जाता है जिसमें उनके एक भाषण की समीक्षा करते हुए बताया गया कि है कैसे उन्होंने 5 मिनट के वीडियो में 25 गलत हवाले दिए. ऐसे कई वीडियो और भी हैं जिनमें लोग उनसे उनकी गलत तकरीरों का जवाब मांग रहे हैं और वे इन सवालों से बचते नज़र आ रहे हैं. इसके साथ ही उन पर इस्लाम की गलत व्याख्या के आरोप भी लगते रहे हैं. ऐसे कई मुस्लिम संगठन और धर्मगुरु हैं जो जाकिर नाइक से इत्तेफाक नहीं रखते और उन्हें समाज के लिए खतरा बताते हैं.

जाकिर नाइक की बातों में कई विरोधाभास भी साफ़ नज़र आते हैं. मसलन, ओसामा बिन लादेन को वे इसलिए आतंकवादी नहीं मानते क्योंकि वे उसे व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानते थे. उनका कहना है कि वे बिना रिसर्च के कोई भी टिप्पणी नहीं करते इसलिए वे बिना रिसर्च के ओसामा को आतंकवादी नहीं मानेंगे. जो व्यक्ति दुनिया के सभी प्रमुख धर्मों पर रिसर्च कर चुका हो और तमाम धर्मग्रंथों को कंठस्थ कर चुका हो वह यदि इतनी सी बात न जान सके कि लादेन आतंकवादी था या नहीं, तो इसे उसके व्यक्तित्व का विरोधाभास ही कहा जाएगा.

ऐसे ही विरोधाभास जाकिर नाइक में तब भी नज़र आते हैं जब वे खुद को एक मेडिकल डॉक्टर और विज्ञान का ज्ञाता बताते हैं लेकिन घोर अवैज्ञानिक तर्क (कुतर्क) देने लगते हैं. विभिन्न सवालों पर दिए गए उनके ऐसे ही कुछ अजीबोगरीब कुतर्कों पर एक नज़र डालते हैं:

सुवर का मीट खाने वाले बीवियों की अदला-बदली करने लगते हैं
इस्लाम में सुवर का मीट खाना क्यों हराम है? इस सवाल के जवाब में जाकिर नाइक सबसे पहले तो अपने हर जवाब की तरह उन ग्रंथों और उनके पेज और पैरा नंबर बताते हैं जहां-जहां सुवर के मीट को ‘हराम’ बताया गया है. इसके बाद वे कहते हैं कि चूंकि सुवर गंदगी खाता है लिहाजा उसका मीट खाने से 70 तरह की बीमारियां हो सकती हैं. साथ ही सुवर खाने के नैतिक और मनोवैज्ञानिक परिणामों के बारे में वे बताते हैं, ‘साइंस आज ये कहती है कि सुवर इस प्रथ्वी का सबसे बेशर्म जानवर है. वो एक अकेला जानवर है जो अपने दोस्तों को बुलाता है, अपनी बीवी के साथ संभोग करने के लिए और देखकर खुश होता है. साइंस कहती है कि जो आप खाते हैं उसका असर आपके बर्ताव में होता है. अमेरिका में अधिकतर लोग सुवर खाते हैं. इसलिए वहां अक्सर डांस पार्टियों के बाद वाइफ-स्वैपिंग’ होती है. यानी बीवियों की अदला-बदली.’
बीवी को मारना जायज है, लेकिन इसके निशान नहीं रहने चाहिए
बीवी को पीटने के सवाल पर कुछ समय पहले एक साक्षात्कार में जाकिर नाईक का कहना था, ‘कुरआन अंतिम विकल्प के तौर पर बीवी पर हाथ उठाने को कहती है. लेकिन हलके से, जैसे कि उसे रुमाल से मार रहे हों. और हां, इस मार के कोई निशान नहीं रहने चाहिए.’
दो औरतों की गवाही और एक मर्द की गवाही बराबर है
जाकिर नाइक कुरआन का हवाला देते हुए कहते हैं कि वित्तीय मामलों में या हत्या के मामलों में मर्दों की गवाही को ही वरीयता दी गई है. वे कहते हैं कि यदि गवाही के लिए दो मर्द न हों तो फिर एक मर्द और दो महिलाएं हो सकती हैं. यानी दो महिलाओं की गवाही और एक मर्द की गवाही समान है. उनके अनुसार वित्तीय मामलों की समझ मर्दों को ही बेहतर होती है और हत्या जैसे मामले में महिलाएं घबरा कर भूल कर सकती हैं. लिहाजा इस तरह के मामलों में दो महिलाओं की गवाही को एक मर्द की गवाही के बराबर माना गया है.
इस्लामिक देशों में न तो किसी अन्य धर्म का प्रचार हो सकता है न ही कोई मंदिर बन सकता है

यह पूछे जाने पर कि जैसे भारत में सभी धर्मों के प्रचार की छूट है वैसे ही इस्लामिक देशों में भी क्या सभी धर्मों के प्रचार-प्रसार की छूट नहीं होनी चाहिए, जाकिर नाइक कहते हैं, ‘मान लीजिये आप एक स्कूल खोलना चाहते हैं. इसके लिए आपको गणित के एक टीचर की जरूरत है. क्या आप ऐसे व्यक्ति को टीचर नियुक्त कर लेंगे जो कहता हो कि दो और दो पांच होता है? आप नहीं करेंगे क्योंकि आप जानते हैं कि गणित में दो और दो सिर्फ चार होता है. ठीक इसी तरह इस्लामिक देश जानते हैं कि धर्म के मामले में सिर्फ इस्लाम ही सही है. बाकी सब गलत है. तो जैसे आप गलत गणित पढ़ाने वाले को कभी टीचर नहीं रखेंगे वैसे ही इस्लामिक देश कभी भी गलत धर्म पढ़ाने वाले को अनुमति नहीं देंगे.’
इस्लाम त्यागने वालों और समलैंगिकों को मौत की सजा हो

जाकिर नाईक बताते हैं कि इस्लाम में धर्म त्यागने वालों के लिए मौत की सजा का प्रावधान है जो कि बिलकुल सही है. वे कहते हैं कि जैसे राष्ट्र से गद्दारी करने वाले को मौत की सजा देना जायज़ है वैसे ही धर्म से गद्दारी करने वाले को भी मौत की सजा जायज है. समलैंगिकों को मौत की सजा दिए जाने की वकालत भी जाकिर नाइक हदीस, कुरआन और बाइबिल के जिक्र के साथ करते हैं. जाकिर नाईक यह भी चाहते हैं कि भारत के सभी कानून इस्लाम के अनुसार हो जाएं. वे कहते हैं कि शरिया के अनुसार सजाएं होने से भारत में अपराध कम होंगे.

मुस्लिम मर्द बहुविवाह न करें तो लाखों महिलाएं ‘सार्वजनिक संपत्ति’ बन जाएंगी
जाकिर नाइक मानते हैं मुस्लिम मर्दों द्वारा बहुविवाह करना मर्द और औरत, दोनों के हित में है. वे कहते हैं कि मर्द प्राकृतिक रूप से ‘बहुविवाही’ होता है. इसलिए यदि उसकी एक से ज्यादा बीवियां होंगी तो वह अपनी बीवी को धोखा नहीं देगा. वे कहते हैं, ‘यदि हर मर्द की शादी सिर्फ एक महिला से होगी तो अमेरिका में लगभग तीन करोड़ महिलाएं, ब्रिटेन में 40 लाख, जर्मनी में 50 लाख और रूस में 90 लाख महिलाएं कुंवारी ही रह जाएंगी. तब ऐसी महिलाओं के पास सिर्फ दो ही विकल्प बचेंगे, या तो उन्हें किसी शादीशुदा मर्द से शादी करनी होगी या ‘सार्वजनिक संपत्ति’ बनना होगा.’

मंदिर का प्रसाद खाना या मेरी क्रिसमस बोलना हराम है
जाकिर नाइक कहते हैं कि कई मुस्लिम लोग अपने हिन्दू साथियों का मान रखने के लिए मंदिर का प्रसाद ‘बिस्मिल्लाह’ बोलते हुए खा लेते है, लेकिन ऐसा करना गलत है और कुरआन इसकी अनुमति नहीं देती. साथ ही वे कहते हैं मुसलमानों को ‘मेरी क्रिसमस’ नहीं बोलना चाहिए क्योंकि यह जीसस को भगवान् का बेटा मानने के समान है और किसी मुसलमान के लिए ऐसा करना ‘ईशनिंदा’ है.
महिलाएं ताउम्र कुंवारी रहे तो वेश्यावृत्ति में चली जाएंगी
महिलाओं के कुंवारे रहने का विरोध करते हुए जाकिर नाइक कहते है, ‘मैं एक मेडिकल डॉक्टर हूं इसलिए जानता हूं कि एक महिला कभी भी ताउम्र कुंवारी नहीं रह सकती. यदि वह रहती है तो उसे वैश्यावृति में जाने को मजबूर होना पड़ेगा.’
गोद लिए हुए बच्चे से अजनबी जैसा बर्ताव करना चाहिए
जाकिर नाइक के अनुसार मुस्लिम लोग बच्चे गोद तो ले सकते हैं लेकिन ऐसे बच्चों को इस्लामिक कानून कोई अधिकार नहीं देता. वे यह भी कहते हैं कि ऐसे बच्चों को माता-पिता के रूप में अपना नाम देना भी इस्लाम में गलत है. साथ ही जब ऐसा बच्चा बड़ा हो जाए तो घर की सभी महिलाओं को उससे अजनबी जैसा बर्ताव करना चाहिए और उसकी मौजूदगी में महिलाओं को हिजाब लेना चाहिए.
गैर-मुस्लिम लोग जन्नत नहीं नरक में जाते हैं
जाकिर नाइक से जब यह पूछा गया कि यदि कोई गैर मुस्लिम सारी उम्र दान-पुण्य का कार्य करे, कोई पाप न करे और मानवता की भलाई के लिए अपने प्राण तक त्याग दे तो क्या तब भी वो जन्नत में नहीं जाएगा? इसके जवाब में जाकिर नाइक कहते हैं, ‘मान लीजिये आपको दसवीं क्लास की परीक्षा देनी है. इस परीक्षा में आपके कुल पांच विषय हैं. यदि आप चार विषयों में पूरे सौ अंक हासिल कर लेते हैं और एक विषय में फेल हो जाते हैं तो क्या आप दसवीं क्लास पास कर पाएंगे? ठीक उसी तरह जन्नत जाने के लिए इस्लाम में विश्वास सबसे महत्वपूर्ण है. जिसे इस्लाम में विश्वास नहीं है, वह चाहे कितनी भी भलाई करे, जन्नत नहीं जा सकता.’
इन तमाम तकरीरों को देते हुए जाकिर नाइक अलग-अलग धर्मग्रंथों का हवाला जरूर देते हैं जिससे कई लोग उनकी बातों को तर्कसंगत मानने लगते हैं और उनके मुरीद भी होते हैं. लेकिन जानकारों की मानें तो यही वह पहलू भी है जिसके चलते उनके जैसे व्यक्ति समाज के लिए बेहद खतरनाक हो जाते हैं. आज के समाज में जहां व्हाट्सएप और फेसबुक पर फैलाए गए झूठे संदेशों को ही इतना विश्वसनीय मान लिया जाता है कि उनके कारण सांप्रदायिक दंगे तक हो जाते हैं, उस समाज में जाकिर नाइक जैसे व्यक्ति जब धर्मग्रंथों के नाम, पेज नंबर और पैराग्राफ नंबर के साथ अपनी कोई भी बात कहते हैं तो स्वाभाविक है कि कई लोगों को प्रभावित कर जाते हैं.
वे सीधे-सीधे आतंकवाद को बढ़ावा न भी देते हों लेकिन ऊपर लिखी उनकी बातों से साफ़ है कि वे धार्मिक-कट्टरपंथ को जरूर बढ़ावा देते हैं. सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू उनके बारे में कहते हैं, ‘मैं नहीं मानता कि जाकिर नाईक एक आतंकवादी है, वह एक धार्मिक कट्टरपंथी है लेकिन यह धार्मिक कट्टरपंथ ही आतंकवाद को जन्म देता है.
सौजन्य से
सत्याग्रह.कॉम

7/08/2016

जन-धन योजना बनी मुसीबत, खातों को ऐक्टिव रखने के लिए बैंक खुद डाल रहे पैसा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जन-धन योजना की शुरुआत बडे़ जोर-शोर से की थी, लेकिन अब यही जन-धन खाते बैंकों के लिए मुसीबत का सबब बन गए हैं। बैंक अधिकारियों की मानें तो भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के दबाव के चलते 'जीरो बैलेंस' पर खुले इन खातों को ऐक्टिव रखने के लिए बैंकों की तरफ से खुद पैसे डाले जा रहे हैं। बाकायदा हर खाताधारक के नाम एक-एक रुपये के वाउचर काटे गए हैं। इस खर्च को रोजमर्रा के चाय-पानी के खर्च में समायोजित किया जा रहा है।

बैंक अधिकारियों के मुताबिक, जन-धन खाते मुसीबत बन गए हैं। जीरो बैलैंस पर खाते खोले गए, लेकिन एक भी पैसा जमा नहीं हुआ। खातों को ऐक्टिव रखने का दबाव बैंकों पर इस कदर है कि अपनी जेब से पैसे डालकर जीरो बैलेंस का ठप्पा हटाया जा रहा है। भारतीय स्टेट बैंक के एक अधिकारी ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया, 'दो लाख रुपये की बीमा और पांच हजार रुपये के ओवरड्राफ्ट के लालच में पूरे देश में 11 करोड़ से ज्यादा जन-धन खाते खुल चुके हैं। इनमें से चार करोड़ से ज्यादा खातों में एक भी पैसा नहीं है।'

अधिकारी ने बताया कि जीरो बैलेंस होने की वजह से उन खातों को न तो बीमा का लाभ मिल रहा है और न ही ओवरड्राफ्ट का। ऐसे खातों को सक्रिय करने के लिए आरबीआई का जबर्दस्त दबाव है। दबाव के आगे बैंक भी मजबूर हैं। पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) के एक सीनियर अधिकारी ने बताया कि खाता खुलवाने के बाद आधे खाताधारकों ने दोबारा बैंक का मुंह नहीं देखा।

उन्होंने कहा, 'पांच हजार रुपये ओवरड्राफ्ट के लालच में खुलवाए गए खातों में जब पैसा नहीं आया तो उनका मोह भंग हो गया। ऐसे खाताधारकों को कई बार पत्र भेजे जा चुके हैं, लेकिन कुछ असर नहीं पड़ा। अब ये खाते बैंक मैनेजरों के लिए सिरदर्द बन गए हैं।' अधिकारियों की मानें तो इस मुसीबत को टालने के लिए बैंक मैनेजर जीरो बैलेंस वाले जन-धन खातों में रुपये डाल रहे हैं। इस काम में पूरा स्टाफ लगा है। बाकायदा हर खाताधारक के नाम एक-एक रुपये के वाउचर काटे गए हैं। इस खर्च को रोजमर्रा के चाय-पानी के खर्च में समायोजित किया जा रहा है।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस योजना की तारीफ करते रहते हैं। वह यह भी दावा करते हैं कि आजादी के बाद पिछले दो वर्षों के भीतर जितने खाते खुले हैं, उतने खाते कभी नहीं खुले। उन्होंने तो यहां तक कहा था कि जन-धन खातों से देश के खजाने में 35 हजार करोड़ रुपये एकत्र हुए हैं, लेकिन बैंक अधिकारी बताते हैं कि इस योजना की सच्चाई कुछ और ही है।

7/07/2016

मोबाइल मोनिया जानिए आपके लिए कितना खतरनाक है स्मार्ट फोन

स्मार्टफोन ने आज लाइफ को आसान बना दिया है। किसी भी काम को स्मार्टफोन से करना बड़ा सरल हो गया है।  युवा तो स्मार्टफोन से हमेशा चिपके रहते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि इस मोबाइल हैंडसेट को आप हर वक्त अपने साथ रखते हैं वह आपके शरीर और दिमाग के लिए कितना खतरनाक है। वह आपके लिए 'साइलेंट किलर' है। यह बात वैज्ञानिक रिसर्च में साबित हुई। सिर्फ दिल, दिमाग नहीं बल्कि पूरे शरीर के लिए स्मार्टफोन खतरनाक है। आइए जानते हैं स्मार्टफोन से मानव शरीर को होने वाले खतरों के बारे में।

हाथ और उंगलियों के लिए खतरनाक :  स्मार्टफोन पर देर तक वेब ब्राउजिंग, टेक्स्ट, चैटिंग आदि हाथों के लिए नुकसानदेह है। स्मार्टफोन का ज्यादा प्रयोग करने से हाथ, मुट्ठी, उंगलियों और कलाई और बाजुओं को कई प्रकार की परेशानियां होना आम है। इसे टेक्स्ट ब्लॉक कहा जाता है। स्मार्ट फोन के ज्यादा इस्तेमाल से हाथ की मांसपेशियों और हड्डियों में जकड़न, दर्द, सूजन और कमजोरी जैसी परेशानी आती है।

गर्दन और रीढ़ के लिए परेशानी : स्मार्ट फोन पर लगातार नीचे की ओर देखने से सिर के वजन का दबाव गर्दन में दर्द का कारण बनता है। देर तक गर्दन को झुकाने से स्लिप डिस्क या सर्वाइकल स्पाइंडिलाइसिल की आशंका बढ़ जाती है।

स्मार्टफोन लैपटॉप पर टाइप करते हुए अक्सर गर्दन और सिर को आगे की ओर जाते हैं।  इस पर भी दबाव बढ़ जाता है। स्मार्ट फोन की टेक्स्ट सुविधा से देर तक टाइप करना आसान है, लेकिन इसका असर गर्दन की मांसपेशियों पर पड़ता है और उनमें दर्द बढ़ता है।

7/06/2016

कभी स्कूटर से चलने वाले 12 वीं पास अदने से आदमी अडानी कैसे हुए 60 हजार करोड़ के मालिक


किस्मत और सत्ता से नजदीकियों के दम पर एक अदना सा आदमी कैसा देश के सबसे अमीर लोगों में से एक हो जाता है, यह जानना हो तो अडानी को पढ़िए।
कभी अपने दोस्त मलय महादेविया को पीछे बैठाकर ग्रे कलर की बजाज स्कूटर से अहमदाबाद की गली-चौराहे नापते फिरने वाले गौतम अडानी को इसका अंदाजा कतई नहीं रहा होगा कि एक दिन उन पर छप्पर फाड़कर  धनवर्षा होगी। जिससे वे 55 से 60 हजार करोड़ का भारी-भरकम साम्राज्य खड़ा कर लेंगे। उनके क्रोनी कैपिटलिज्म(पूंजीवादी सांठगांठ) का खेल इस कदर सफल होगा कि वे  अनिल अंबानी जैसे दिग्गज को भी देश के टॉप-10 कारोबारियों की लिस्ट से निकालकर बाहर कर देंगे। मगर हाथ की लकीरों में दम हो और 12 साल सीएम और फिर पीएम राज मे मोदी का साथ मिले। भाजपा की सरकार न रहे भी रहे तो कांग्रेस में कमलनाथ व एनसीपी के शरद पवार जैसे खैरख्वाह आप पर मेहरबान हो जाएं तो कुछ भी संभव है। जिससे बिजनेस की दुनिया का पहलवान बनने से आपको कोई रोक नहीं सकता। फोर्ब्स ने तो अंबानी की संपत्ति करीब दस अरब डॉलर से ज्यादा आंकी है।
जी हां बिल्कुल फिल्मी कहानी है देश में सबसे अप्रत्याशित तरीके से खरबपति बनने वाले बहुधंधी गौतम अडानी की।
18 साल में घर छोड़ मुंबई भागे अडानी
गौतम अडानी के दिमाग में हमेशा रातोंरात अमीर बनने के सपने आते थे। 12 वीं पास होते ही बीकाम करने के लिए अहमदाबाद के कॉलेज में दाखिला लिया। मगर मन नहीं लगा तो 18 साल की उम्र में अहमदाबाद में पिता शांतिलाल के कपड़ों का व्यापार छोड़कर मुंबई भाग निकले। यहां हीरे की कंपनी महिंद्रा ब्रदर्स में महज तीन सौ रुपये पगार पर अडानी काम करने लगे। दिमाग तो था ही इधर-उधर से कुछ पैसा जुटा तो 20 साल की उम्र में ही हीरे का ब्रोकरेज आउटफिट खोलकर बैठ गए। किस्मत ने साथ दिया और पहले ही साल कंपनी ने लाखों का टर्नओवर किया। फिर भाई मनसुखलाल के कहने पर अडानी मुंबई से अहमदाबाद आकर भाई की प्लास्टिक फैक्ट्री में काम करने लगे। पीवीसी इंपोर्ट का सफल बिजनेस शुरू हुआ। डेंटिस्ट प्रीति से उन्होंने शादी रचा ली। दोस्त मलय महादेविया को अपने साथ साये की तरह इसलिए अडानी रखते थे क्योंकि कम पढ़ाई के कारण उनकी अंग्रेजी खराब थी। अफसर व कारोबारियों से धारा प्रवाह अंग्रेजी में बिजनेस डील करने में परेशानी होती थी। अडानी की यह खूबी कही जाएगी कि उन्होंने अपनी कंपनियों में आज भी मलय को बड़े पद दे रखे हैं।
1988 में गौतम ने डाली अपने अडानी ग्रुप की नींव
जब प्लास्टिक कारोबार से पूंजी इकट्ठा हुई तो 1988 में गौतम ने अडानी एक्सपोर्ट लिमिटेड की नींव शुरू की। यह कंपनी पॉवर व एग्रीकल्चर कमोडिटीज के सेक्टर में काम करने लगी। गौतम अडानी के पेशेवर हुनर ने तीन साल में ही कंपनी के पैर जमा दिए। इस बीच धीरे-धीरे एक्सपोर्ट का कारोबार गति पकड़ता रहा। अडानी के बारे में बताया जाता है कि एक बार उनकी कंपनी के एकाउंटेंट ने कोई बड़ी गलती कर दी, जिससे लाखों का नुकसान होने पर उसने बिना कुछ कहे-सुने अडानी के सामने इस्तीफा रख दिया। इस्तीफा हाथ में लेकर अडानी ने फाड़ दिया। कहा कि तुम्हें  गलती का अहसास हो गया, यही बहुत है। अब तुम दोबारा गलती नहीं करोगे। अगर तुम्हें रिलीव कर दूंगा तो नुकसान मेरा हुआ और यहां से गलती से जो सीखे हो उसका फायदा दूसरे कंपनी को मिलेगा। इससे पता चलता है कि अडानी किस तरह बिजनेस कार्यकुशलता रखते हैं।
गुजरात दंगे से मोदी के करीबी हुए अडानी
हर किसी के मन में हमेशा उत्सुकता रही कि किसी को भी आमतौर पर भाव नहीं देने वाले मोदी अडानी के मामले में पिघल क्यों जाते हैं। दरअसल जब 2002 में गुजरात का दंगा हुआ तो कारोबार को भारी नुकसान पहुंचने से उद्योगपतियों ने मोदी की आलोचना शुरू की। इस काम में सबसे आगे रहाऔद्यौगिक संगठन कन्फडरेशन आफ इंडियन इंडस्ट्रीज(सीआईआई)। तब गौतम अडानी इकलौते उद्योगपति थे, जो मोदी के साथ चट्टान की तरह खड़े रहे। यही नहीं अडानी ने तब गुजरात व देश के अन्य कारोबारियों के साथ लाबिंग कर गुजरात में मुश्किल हालात के बीज भी निवेश करने के लिए राजी किया। क्योंकि मोदी आलोचकों को दिखाना चाहते थे कि वे दंगे के बाद भी राज्य में कारोबार को फिर से खड़ा करने का माद्दा रखते हैं। जब सीआईआई ने इस पर अडंगा डालने की कोशिश की तो अडानी ने उसके समानांतर नयासंगठन खड़ा करने की चेतावनी दे डाली। तब से मोदी अडानी के मुरीद हो गए। गुजरात सरकार पर अडानी को कौड़ियों के भाव महंगी जमीनें व बंदरगाह देने के आरोप लगे। मोदी से अडानी की नजदीकियां इतनी हैं कि  जब व्हॉटर्न स्कूल आफ बिजनेस ने मोदी का नाम एक बार मुख्य वक्ता के रूप में हटा दिया तो इस आयोजन के सबसे बड़े स्पांसर के रूप में रहे अडानी ने तत्काल आयोजन से हाथ खींच लिए। यानी मोदी के संकट के समय हमेशा अडानी खड़े रहे।
मोदी सीएम रहे तो खूब विदेशी मुद्रा बटोरी, पीएम बने तो पूंजी बढ़ी
जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाया था तभी से गौतम अडानी की अडानी इंटरप्राइजेज, अडानी पोर्ट और अडानी पावर का कुल बाजार पूंजी में चौंकाने वाले रूप से 85.35 प्रतिशत का इजाफा हुआ था। जबकि उस समय सेंसेक्स में बमुश्किल से 14.76 प्रतिशत ही बढ़ोत्तरी हुई थी। इससे पहले 2003-04 में जब मोदी गुजरात में सीएम रहे तो अडानी ने विदेशी पूंजी मुद्रा कमाने में रिकार्ड तोड़ दिया। दो सौ प्रतिशत से  ज्यादा मुनाफा कमाया। अहम बात रही कि तब उनका 76.50 करोड़ डॉलर का कारोबार रहा जो मोदी के पीएम बनने पर दस अरब डॉलर तक पहुंच गया। हर साल करीब तीस हजार करोड़ रुपये का अडानी ग्रुप का टर्नओवर है।
आस्ट्रेलिया से लेकर दुनिया के 28 देशों में कारोबार
करीब 30 चीजों में अडानी का कारोबार आज आस्ट्रेलिया सहित दुनिया के 28 देशों तक फैल गया है। कोयला खनन, बिजली, पोर्ट, अनाज, तेल मुख्य बिजनेस हैं। आस्ट्रेलिया से अडानी ने 15.5 अरब डॉलर का कोयला खनन का प्रोजेक्ट भी रसूख के दम में हाल में हथियाने में सफलता हासिल की। उन्हें आस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड में बंदरगाह भी आवंटित हो चुका है। यही नहीं कोयला उतारने का दुनिया का सबसे बड़ा बंदरगाह मुंरदा भी अडानी के कब्जे में है। जिसमें निजी रेल लाइन व निजी हवाई जहाज पट्टी का अडानी विस्तार कर रहे हैं। 

श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक झूठा देशभक्त

RSS/BJP ने फ़िलहाल अपने अव्वल नंबर के देशभक्त 'वीर' सावरकर की स्तुति काफ़ी हद तक कम करदी है। इस की सब से बड़ी वजह यह है की इस 'वीर' की असली कहानी दुनिया के सामने आगई है ।  हिंदुत्व के इस 'वीर' ने अंग्रेज़ हुक्मरानों से एक बार नहीं बल्कि पांच बार (1911, 1913, 1914, 1918 और 1 920 में) रिहाई पाने के लिए माफ़ी-नामे लिखे जिन में अपने क्रांतिकारी इतिहास के लिए माफ़ी मांगी और आगे अंग्रेज़ी राज का वफ़ादार बने रहने का आश्वासन दिया। अंग्रेज़ हकूमत ने इस 'वीर' के माफ़ी-नामों को स्वीकारते हुवे 50 साल की क़ैद में से 37 साल की कटौती कर दी।

हिंदुत्व टोली के नए 'देश-भक्त'  डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी (1901-1953) हैं। वे स्वतंत्रता-पूर्व हिन्दू-महासभा में सावरकर के बाद सब से अहम नेता थे और यह मानते थे की हिन्दुस्तान केवल हिन्दुओं के लिए है। वे 1944 में हिन्दू-महासभा के मुखिया भी रहे। आज़ादी के बादवे देश के पहले अंतरिम मंत्री मंडल, जिस के मुखिया जवाहरलाल नेहरू थे, में उद्योग और रसद मंत्री थे। उन्हों ने अप्रैल 1950 में नेहरू से पाकिस्तान से किस तरह के सम्बन्ध हैं पर विरोध होने की वजह से इस्तीफ़ा दे दिया था। इस्तीफ़े के बाद उन्होंने आरएसअस का हाथ थाम लिया और उस के आदेश पर आरएसअस के एक राजनैतिक अंग, भारतीय जन संघ की स्थापना की और इस के पहले अध्य्क्ष भी बने। उनकी  मृत्यु 23 जून 1953 को श्रीनगर, जम्मू व कश्मीर के एक जेल में हुई जहां उन्हें उस क्षेत्र में प्रवेश निषेध आदेश के बावजूद दाख़िल होने के लिए गिरफ़्तार करके रख्खा गया था।

2015 तक इन की मृत्यु  के दिन को "द धारा 370 समाप्त करो दिवस' और 'कश्मीर बचाओ दिवस " के रूप में मनाया जाता था लेकिन इस साल (2016 में) इन का दर्जा बढ़ा कर इन्हें देश का 'एक निस्स्वार्थ देशभक्त' (A Selfless Patriot of India) घोषित कर दिया गया। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी कितने महान 'निस्स्वार्थ देशभक्त' थे इसे पर्खने के लिए हमें निम्नलिखित सच्चाइयों पर ग़ौर करना होगा।

(1) डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के स्वतंत्रता-संग्राम में हिस्सेदारी का कोई प्रमाण नहीं है।

अगर देश-भक्त होने का  मतलब है की किसी ने अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ लड़ाई में हिस्सा लिया हो, दमन सहा हो और किसी भी तरह का त्याग किया हो तो यह जानकर ताजुब्ब नहीं होना चाहिए कि मुखर्जी ने आज़ादी की लड़ाई में कभी भी और किसी भी तरह से भाग नहीं लिया। ना ही तो स्वयं मुखर्जी की लेखनी में ना ही उस समय के सरकारी या ग़ैर-सरकारी दस्तावेज़ों और ना ही हिन्दुत्वादी संगठनों के समकालीन अभिलेखागार में उन की आज़ादी की लड़ाई में हिस्सेदारी का कोई ज़िक्र मिलता है। इस के विपरीत आज़ादी की लड़ाई के विरुद्ध किए गए उन के अनगिनित कारनामों का वर्णन ज़रूर मिलता है। आज़ादी से पहले के दस्तावेज़ इस सच्चाई को बार-बार रेखांकित करते हैं कि कैसे इस 'निस्स्वार्थ देशभक्त' ने अंग्रेज़ों की सेवा की और सांझी आज़ादी की लड़ाई को धार्मिक आधार पर विभाजित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। वे जीवन भर सावरकर के मुरीद रहे जो मुस्लिम लीग की तरह हिन्दुओं और मुसलमानों को दो अलग राष्ट्र मानते थे।

(2 ) भारत छोड़ो आंदोलन 1942 में मुखर्जी बंगाल की मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा की मिली-जुली सरकार में उप-मुख्य मंत्री थे।

जब जुलाई 1942 में गांधीजी के नेतृत्व में कांग्रेस ने अगस्त 8 से अंग्रेज़ों भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान किया तब मुखर्जी बंगाल की मुस्लिम लीग के नेतृत्व वाली सरकार , जिस में हिन्दू महासभा भी शामिल थी , के वित्त मंत्री थे और साथ में उप-मुख्य मंत्री भी। इस आंदोलन की घोषणा के साथ ही कांग्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया गया, कांग्रेस के तमाम बड़े नेता जिन में गांधीजी, नेहरू, मौलाना आज़ाद, सरदार पटेल शामिल थे बन्दी बना लिए गए, पूरा देश एक जेल में बदल गया और हज़ारों लोग इस जुर्म में पुलिस और सेना की गोलियों से भून दिए गए की वे तिरंगे झंडे को लहराते हुवे सार्वजनिक स्थानों से गुज़रना चाह रहे थे। हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों जैसे की हिन्दू महासभा व आरएसएस और मुस्लिम  राष्ट्रवादी संगठन, मुस्लिम लीग कांग्रेस दुवारा छेड़े गए भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध नहीं किया बल्कि इस को कुचलने के लिए अंग्रेज़ शासकों को हर प्रकार से मदद करने का फैसला लिया। जब देश में किसी भी प्रकार की राजनीतिक गतविधि पर पाबंदी थी उस समय हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग को एक साथ मिलकर बंगाल, सिँध और NWFP में साझा सरकारें चलाने की अनुमति दी गई। अंग्रेज़ों के दमनकारी विदेशी राज को बनाए रखने  में सहायता हेतु इस शर्मनाक गठबंधन को महामंडित करते हुवे हिन्दू महासभा के अध्यक्ष सावरकर ने 1942 के हिन्दू महासभा के कानपुर अधिवेशन को सम्बोधित करते हुवे बताया कि

"वेवहारिक राजनीति में भी हिन्दू महासभा जानती है कि हमें बुद्धिसम्मत समझौतों के ज़रिये आगे बढ़ना चाहिए। हाल ही में सिंध की सच्चाई को देखें, यहां सिंध हिन्दू महासभा ने निमंत्रण के बाद मुस्लिम लीग के साथ मिली-जुली सरकार चलने की जिम्मेदारी ली। बंगाल का उदहारण भी सब को पता है। उदंड लीगी (अर्थात मुस्लिम लीग) जिन्हें कांग्रेस अपनी तमाम आत्मसमर्पणशीलता के बावजूद  रख सकी, हिन्दू महासभा के साथ संपर्क में आने पर तर्क संगत समझौतों और सामाजिक सम्बन्धों के लिए तैयार हो गए और वहां की मिली-जुली मिस्टर फजलुल हक़ के प्रधानमंत्रित्व और महासभा के क़ाबिल और मान्य नेता श्यामाप्रसाद मुकर्जी के नेतृत्व में दोनों समुदायों के फ़ायदे के लिए एक साल तक सफलतापूर्वक चली।"

(3) बंगाल के उप-मुख्यमंत्री रहते हुवे मुखर्जी ने अंग्रेज़ गवर्नर को चिट्ठी दुवारा भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने के लिए हर संभव मदद का आश्वासन दिया।

मुखर्जी ने एक शर्मनाक काम करते हुवे बंगाल के अंग्रेज़ गवर्नर को जुलाई 26, 1 942 में एक सरकारी पत्र के दुवारा इस देश भर में चल रहे आंदोलन को शुरू होने से पहले ही कुचलने का आह्वान करते हुवे लिखा:
"अब मुझे उस स्तिथि के बारे में  बात करनी है जो कांग्रेस दुवारा छेड़े गए व्यापक आंदोलन के मद्देनज़र पैदा होगी।युद्ध [दूसरा विश्व युद्ध] के दिनों में जो भी  आम लोगों की भावनाएं भड़काने की कोशिश करेगाजिस से बड़े पैमाने पर दंगे या असुरक्षा फैले उसका हर हाल में सत्ताधारी सरकार दुवारा प्रतिरोध करना ही होगा।"

(4) मुखर्जी ने भारत छोड़ो आंदोलन के कुचलने को सही ठहरया और अंग्रेज़ शासकों को देश का मुक्तिदाता बताया।

मुखर्जी ने बंगाल की मुस्लिम लीग-हिन्दू महासभा साझी सरकार की ओर से बंगाल के अंग्रेज़ गवर्नर को लिखी चिट्ठी में अंग्रेज़ हकूमत को प्रांत का मुक्तिदाता बताते हुवे उसे भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने के लिए कई क़दम भी सुझाए:

"प्रशन यह है की बंगाल में भारतछोड़ोआंदोलन से कैसे निपटा जाए? राज्य का शासन इस तरह चलाया जाए की कोंग्रेस की तमाम कोशिशों के बावजूद यह आंदोलन बंगाल में क़दम जमाने में कामयाब न हो सके। हमारे लिए विशेषकर उत्तरदायी मंत्रिओं के लिए जनता को यह समझाना संभव होना चाहिए की आज़ादी जिस के लिए कांग्रेस ने आंदोलन शुरू किया है वह पहले से ही जन-प्रतिनिधिओं  को प्राप्त है। कुछ मामलों में आपातकालीन हालात की वजह से यह सीमित हो सकती है। भारतीयों को अंग्रेज़ों पर भरोसा करना चाहिए, ब्रिटेन के वास्ते नहीं,
इस लिए नहीं के इस से ब्रिटेन को कुछ फायदा होग, बल्कि प्रांत की आज़ादी और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए।"

(5) हिन्दू महासभा के प्रमुख नेता के तौर पर मुखर्जी ने उस समय अंग्रेज़ी सेना के लिए देश भर में 'भर्ती कैंप' लगाए जब सुभाष चन्दर बोस 'आज़ाद हिंद सेना' दुवारा देश को आज़ाद कराना चाहते थे।

एक और शर्मनाक घटनाक्रम में 'वीर' सावरकर और मुखर्जी के नेतृत्व वाली हिन्दू महासभा ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेज़ सरकार को पूर्ण समर्थन देने का फ़ैसला किया। याद रहे की कांग्रेस ने इस युद्ध को साम्राजयवादी युद्ध की संज्ञा दी थी और यही समय था जब नेताजी 'आज़ाद हिंद सेना' खड़ी करके एक सैनिक अभियान दुवारा देश को अंग्रेज़ी चुंगल से मुक्त कारण चाहते थे। हिन्दू महासभा लुटेरे अंग्रेज़ शासकों की किस  हद तक मदद करना चाहती थी इस का अंदाज़ा 'वीर' सावरकर के निम्नलिखित आदेश से लगाया जा सकता है जो उनहूँ ने देश के हिन्दुओं के लिए जारी किया था:

"जहां भारत की सुरक्षा का सवाल है, हिन्दू समाज को भारत सरकार [अंग्रेज़ सरकार] के युद्ध सम्बन्धी प्रयासों में सहानभूतिपूर्ण सहयोग की भावना से बेहिचक जुड़ जाना चाहिए जब तक यह हिन्दू हित के फायदे में हो।  हिन्दुओं को बड़ी संखिया में  थल सेना, नौ सेना और वायु सेना में शामिल होना चाहिए और सभी आयुध, गोला-बारूद और जंग का सामान बनाने वाले कारखानों वग़ैरा में प्रवेश करना चाहिए...ग़ौरतलब है की युद्ध में जापान के कूदने के कारण हम ब्रिटेन के शत्रुओं के सीधे निशाने पर आ गये हैं। इस लिए हम चाहें या ना चाहें, हमें युद्ध के क़हर से अपने परिवार और घर को बचना है, और यह भारत की सुरक्षा के सरकारी युद्ध प्रयासों को ताक़त पहुंचाकर ही किया जा सकता है। इस लिए हिन्दू महासभायों को खास कर बंगाल और असम के प्रांतों में, जितना असरदार तरीक़े से संभव हो, हिन्दुओं को अविलम्ब सेनाओं  में भर्ती होने के लिए प्रेरित करना चाहिए।"

(6) मुखर्जी ने जम्मू और कश्मीर के लिए विशेष दर्जे की वकालत की थी।

हिंदुत्व टोली के दावों के बरक्स मुखर्जी ने जम्मू और कश्मीर की विशेष हैसियत को स्वीकारा था। इस सिलसिले में प्रधान मंत्री नेहरू और उनके बीच चिट्ठी-पत्री का एक लम्बा दौर चला था। उन्हों ने नेहरू को 17 फ़रवरी 1953 के दिन लिखे ख़त में निम्नलिखित मांग की थी:
"दोनों पक्ष इस पर सहमत हों कि राज्य की एकता बनी रहेगी और स्वयत्तता का सिद्धांत जम्मू लद्दाख़ और कश्मीर पर लागू होगा।"