11/28/2016

मेहमान हमारे भगवान, नोट बंदी ने इन विदेशी मेहमानों को भी मजबूर किया मदद मांगने की लिये

अतिथि देवो भव और ग्राहक हमारा भगवान होता है, इन दोनों वाक्यों को एक में मिक्स कर दो तो एक विदेशी सैलानी तैयार होता है. एक तो वो दूर देश से आया मेहमान है. दूसरा वो हमारा कस्टमर भी है. तो वो भगवान का होल स्क्वायर होता है. लेकिन इन सैलानियों पर भी नोटबंदी की मार पड़ गई है. राजस्थान में दो टूरिस्ट ग्रुप्स के पास दिल्ली वापस आने के पैसे नहीं बचे. तो उन्होंने पैसे कमाने के लिए भीड़ का मनोरंजन किया.

ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और फ्रांस के 10- 12 लोगों के दो ग्रुप. शनिवार को पुष्कर में गऊ घाट के पास स्ट्रीट परफॉरमेंस करते दिखे. लड़के म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट बजाते और लड़कियां एक्रोबेटिक स्टंट्स करते. हाथ में “You can help us” और “Money problem” वाले पोस्टर पकड़े थे. वहां आने जाने वाले लोग इनकी प्रॉब्लम समझे और काफी हेल्प कर भी दी.

ये लोग 8 नवंबर को इंडिया आए थे. पुष्कर मेला देखने. उसी रात हजार पनसौव्वा नोट बंद हो गए. 14 तारीख को मेला खत्म हो गया. अब इनको घूम घामकर वापस जाना है. उसके लिए दिल्ली जाना है. वहां एटीएम में पैसा नहीं हैं. तो कोई रास्ता बचा नहीं. फिर इस रास्ते से तकरीबन 2600 रुपए कमाए.

हिंदुस्तान टाइम्स को फ्रेंच टूरिस्ट एडेलेन ने बताया. शुक्रवार को मैं और मेरा एक दोस्त तीन घंटे एसबीआई के एटीएम की लाइन में लगे रहे. लेकिन हमारी बारी आई तो पैसा खतम हो गया. नत्थू शर्मा यहां 45 साल से रह रहे हैं. छोटी सी दुकान है. कहा कि इतने सालों में पहली बार देख रहा हूं कि मेहमानों को पैसा पाने के लिए गली में परफॉर्म करना पड़ा.

11/27/2016

क्या नोटबंदी पर मोदी का फैसला नियम के खिलाफ है?


विचार: क्या नोटबंदी पर मोदी का फैसला नियम के खिलाफ है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में नोटबंदी की नीति की घोषणा की और इसका गजेट नोटिफिकेशन भी जारी किया। 1947 के बाद सरकार की शायद ही किसी नीति ने ईमानदार या अन्य देशवासियों को प्रत्यक्ष रूप से इतना प्रभावित किया हो। इस नीति की अच्छाई- इसका असरदार होना, सब पर समान रूप से लागू होना और इससे निकलने वाले परिणाम- बहस के मुद्दे हैं। लेकिन, एक बड़ा सवाल कि यह कितना वैधानिक है?

कम-से-कम आठ हाई कोर्टों के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट तक में इस नीति को चुनौती दी गई है। संयोग से देश की सर्वोच्च अदालत ने याचिकाओं को ट्रांसफर करने और सब पर साझी सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। हालांकि, कुछ अदालतें ऐसी चुनौतियों को खारिज कर चुकी हैं। पहले पहल ऐसा करने वालों में कर्नाटक हाई कोर्ट शामिल था।

11 नवंबर को एक याचिका को खारिज करते हुए कर्नाटक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एसके मुखर्जी ने नोटबंदी के कदम की सराहना की। कथित रूप से उन्होंने कहा कि यह एक 'बढ़िया कदम' है। उन्होंने कहा, 'यह प्रशंसनीय और अर्थव्यवस्था के हित में अच्छा कदम है।' लेकिन, यह अच्छाई का वैधता पर हावी होने जैसा है जबकि दोनों अलग-अलग बातें हैं। इसलिए, दोनों को अलग-अलग ही रखना चाहिए।

क्या कहता है कानून?
नोटबंदी को आरबीई ऐक्ट, 134 की धारा 26 के तहत लागू किया गया। सेंट्रल बोर्ड की सिफारिश पर केंद्र सरकार अधिसूचना के जरिए किसी भी सीरीज के बैंक नोटों की वैधता खत्म कर सकती है। इस प्रावधान की शर्त पर गौर कीजिएः बोर्ड की सिफारिश जरूरी है। सरकार सिर्फ फैसले की वाहक है, यह फैसला नहीं ले सकती। यह सिर्फ सिफारिश को लागू कर सकती है। इसे एक उदाहरण से समझें।

मान लीजिए कोई कानून किसी सरकारी यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर को नियुक्ति करने का अधिकार देता है। तो वाइस-चांसलर को नियुक्ति के वक्त अपना दिमाग जरूर लगाना चाहिए। यह उनकी तरफ से दूसरा कोई नहीं कर सकता। मतलब, वाइस-चांसलर आसानी से अपना अधिकार छोड़ नहीं सकता। उसे तो फैसला करना ही पड़ेगा वरना बिल्कुल अलग हो जाना होगा। ना ही वह किसी दूसरी बॉडी द्वारा की गई नियुक्ति को पूर्व प्रभाव से मंजूरी दे सकता है। ऐसे में उसे नियुक्त करते वक्त अपने दिमाग का हर हाल में इस्तेमाल करना होगा।

इन सबके पीछे बिल्कुल साफ सिद्धांत है। वह यह कि अगर कोई कानून किसी को कुछ अधिकार देता है तो वह अन्य सभी को इसके इस्तेमाल करने से मना भी करता है। यानी, अधिकार प्राप्त बॉडी के सिवा दूसरा कोई भी इसका इस्तेमाल नहीं कर सकता। केएन गुरुस्वामी केस (1954) में सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा, 'कानून की लगाई बेड़ियों को सरकार या इनके अधिकारियों की मर्जी पर यूं ही किनारे नहीं किया जा सकता है।' डीमॉनेटाइजेशन के परिप्रेक्ष्य में भी यह सिद्धांत रिजर्व बैंक और उसके अधिकार पर लागू होता है।

सरकार का दावा
तो क्या, आरबीआई ने डीमॉनेटाइजेशन की सिफारिश की? अगर हां, तो कब की? केंद्रीय ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल ने नोटबंदी की नीति का पक्ष लेते हुए राज्यसभा में दावा किया कि इसका फैसला आरबीआई बोर्ड ने लिया। लेकिन, उन्होंने तुरंत विरोधाभासी बयान दे दिया। उन्होंने कहा कि इस संबंध में अध्यादेश लाने की जरूरत नहीं है क्योंकि प्रधानमंत्री यह कदम उठाने के लिए अधिकृत हैं। गोयल की ये दोनों बातें सही नहीं हो सकतीं क्योंकि अगर पीएम खुद ही अधिकृत हैं तो आरबीआई बोर्ड ने निश्चित रूप से फैसला नहीं लिया होगा। इसके उलट, अगर आरबीआई बोर्ड के पास यह अधिकार है तो पीएम यह काम नहीं कर सकते हैं।

सरकारी दावे के उलट इशारे
खास तौर से गोयल का यह दावा कि आरबीआई बोर्ड ने डीमॉनेटाइजेशन पॉलिसी की सिफारिश की, की किसी ने पुष्टी नहीं की। बल्कि अब तक सारे इशारे इसके विपरीत ही हैं। आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल हैरतअंगेज रूप से चुप्पी साधे हैं। आरबीआई अधिकारियों से संपर्क साधने की तमाम कोशिशों का कोई जवाब नहीं मिला। ना ही आरबीआई ने उस मीटिंग के मिनट्स ही जारी किए हैं जिसमें नोटबंदी की नीति की सिफारिश करने की सहमति बनने की बात कही जा रही है। पटेल की चुप्पी, मिनट्स जारी नहीं होना, लागू करने में जल्दबाजी और करीब-करीब हर दिन कुछ ना कुछ नया ऐलान उस अंदेशे को बल देते हैं कि यह पीएमओ का अचानक और गुप्त रूप से उठाया गया कदम है, ना कि आरबीआई की सिफारिश। यहीं पर कानूनी पेचीदगियों का सहारा लिया जा सकता है।

सरकार को उबार सकता है यह कानून?
सरकार इस संकट से उबरने के लिए आरबीआई ऐक्ट की धारा 7 का हवाला दे सकती है जिसमें 'जनता के हित में रिजर्व बैंक को निर्देश दिए जाने' की बात कही गई है। जनहित में शायद बोर्ड को डीमॉनेटाइज करने का निर्देश दिया गया होगा? लेकिन, सरकार इससे बच नहीं सकती। क्यों? क्योंकि कोई खास प्रावधान किसी सामान्य प्रावधान से हमेशा ऊपर होता है। आरबीआई ऐक्ट में डीमॉनेटाइजेशन का विशेष अधिकार मिला हुआ है जो दूसरे किसी भी स्वीकृत सामान्य अधिकारों पर हावी होगा। वरना, विशेष अधिकारों का तो कोई मायने ही नहीं रहेगा।

आरबीआई ऐक्ट की धारा 30 का एक और प्रावधान इसे स्पष्ट करता है। यह केंद्र सरकार को उन हालात में बोर्ड को दरकिनार करने का अधिकार देता है जब आरबीआई अपने दायित्वों के निर्वहन में असफल रहता है। हालांकि, तब भी सरकार बोर्ड के अधिकारों का इस्तेमाल नहीं कर सकती। इसके लिए उसे किसी अन्य एजेंसी को नियुक्त करना होगा जो बोर्ड की तरफ से काम करे। मतलब स्पष्ट है कि एक दीवार सरकार को आरबीआई से अलग करती है। ये दोनों ना एक हैं और ना एक जैसे। दोनों की अलग-अलग पहचान है, दोनों के अलग-अलग अधिकार हैं और उन्हें इन्हीं आधार पर काम करना चाहिए।

अगर मोरारजी के रास्ते पर चले होते मोदी
1978 में मोरारजी देसाई सरकार ने इसे समझा था। उस सरकार ने नोटिफिकेशन जारी करने की जगह अध्यादेश के जरिए 10,000 रुपये के नोट निरस्त कर दिए। तो क्या पीएम मोदी को भी यही रास्ता अपनाना चाहिए था? शायद उन्होंने राज्यसभा में विपक्ष की ताकत को भांप लिया था। संसद के इस ऊपरी सदन में अब जारी नाटक, लगातार बहानेबाजी, बार-बार के स्थगन ने उन्हें सही साबित किया है। हालांकि, इनमें से कुछ के लिए वह खुद ही जिम्मेदार हैं। उन्हें सदन को संबोधित करना चाहिए था।

अगर राज्यसभा में अध्यादेश को मंजूरी नहीं मिलती तो क्या होता? यहां पर एक संवैधानिक चालबाजी काम आ जाती जिससे राज्यसभा का फैसला कोई मायने नहीं रखता। अध्यादेशों को लेकर मौजूदा कानून के तहत खारिज किए गए किसी अध्यादेश की सभी कार्रवाइयां स्थाई तौर पर वैधानिक होती हैं। एक बार लागू हो जाने के बाद नोटबंदी हमेशा के लिए वैधानिक ही रहती। इसे रोकने के लिए राज्यसभा के पास कोई अधिकार नहीं है। लगता है कि बेहद सतर्कता की वजह से मोदी सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया और वह इस कानूनी पचड़े में फंस गई।

कुल मिलाकर, अधिसूचना गैर-कानूनी है लेकिन अध्यादेश कानूनी होता। यह जनता के समर्थन का सरकार प्रायोजित सबूत तैयार करने की मूखर्तापूर्ण प्रयासों के मुकाबले कहीं बेहतर विकल्प होता।

संकलन 

न्यूज़ मिडिया,आरबीआई एक्ट.

पं.एल.के.शर्मा
(अधिवक्ता) राज.उच्च न्या.जोधपुर ,राज.

14 लाख करोड़ हो गए रद्दी, छपे कुल डेढ़ लाख करोड़, अब तुम ही बताओ कैसे कम हो कतारें

दिल्ली के लोग तो शनिवार से परेशान हैं क्योंकि दो दिन की छुट्टी होने की वजह से पैसा नहीं मिल पा रहा है. और एटीएम खली हो गए हैं. कई एटीएम में पैसा है ही नहीं तो जहां पहुंच रहा था, वहां भी छुट्टी की वजह से खत्म हो लिया. अभी ये परेशानी बनी रहेगी. क्योंकि बैंकों में कतारें और एटीएम खाली होने की एक बड़ी वजह सामने आई है वो ये कि नोट छपे ही नहीं है. जब नोट छपे नही तो मियां आपको मिलेंगे कहां से.

सामने आई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने अबतक कुल डेढ़ लाख करोड़ रुपये के नए नोट छापे हैं. जबकि 500 और 1000 रुपये के रूप में देश के 14.18 लाख करोड़ रुपयों को रद्दी बना दिया गया है. और हां डेढ़ लाख करोड़ रुपये में भी ज्यादातर नोट 2000 रुपये वाली गुलाबी पत्ती वाले हैं. जिससे कुछ सामान लेने जाओ तो छुट्टे नहीं मिलते. यानी गुलाब की पंखुड़ी समझकर बस 2000 वाले नोट को लेकर इतराते फिरो कि मेरे पास पैसे हैं.
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक नोटों के बारे में ये जानकारी Credit Suisse research report में दी गई है. जो 25 नवंबर को सामने आई है. डेढ़ लाख करोड़ रुपये की नई करेंसी के अलावा 1.2 लाख करोड़ रुपये की करेंसी पहले से चलन में है.

आठ नवंबर को नोटबंदी का ऐलान हुआ. देश के पीएम ने दो जुमलों में 500 और हजार के नोट को रद्दी बना दिया. ताकि नकली नोटों और कालेधन से निपटा जा सके. लेकिन न तो नकली नोट बनना रुक पाए और न ही वो काला धन सामने आया जो चुनाव के वक्त देश की जनता के लिए लाने का वादा हुआ था.
रिपोर्ट में कहा गया है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को अभी जल्दी में एक हजार से लेकर दो हजार करोड़ रुपये और छापने होंगे, ताकि ट्रांसेक्शन लेवल काफी हद तक पहले की स्थिति में आ सके. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने भी जानकारी दी थी कि बैंक और एटीएम के जरिए उसने 10 से 18 नवंबर के बीच 1.03 लाख करोड़ रुपये लोगों तक पहुंचा दिए हैं. 14.18 लाख करोड़ रुपये की पुरानी करेंसी में से 6 लाख करोड़ रुपये बैंकों में फिर से जमा हो गए हैं.

रिपोर्ट ने पिछले एक हफ्ते के आंकड़ों पर कहा है कि आरबीआई एक दिन में 500 रुपये के तकरीबन 4 से 5 करोड़ नोट छाप रहा है. ऐसे में अगर देखा जाए तो जनवरी 2017 तक पुरानी करेंसी का सिर्फ 64 फीसदी हिस्सा ही चलन में आ पाएगा.

11/21/2016

2000 रुपए के नोट जारी करना पीएम मोदी का गैरकानूनी कदम : शर्मा

2000 रुपए के नोट जारी करना पीएम मोदी का गैरकानूनी कदम : शर्मा

कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर 2000 रुपए के नोट जारी करते समय कानून का पालन नहीं करने का सोमवार को आरोप लगाया और इस मामले को संसद के भीतर एवं बाहर उठाने का संकल्प लिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा ने दावा किया कि प्रधानमंत्री ने देश को वित्तीय अराजकता की स्थिति में डाल दिया है।

शर्मा ने कहा कि सरकार को नोटबंदी मामले में जेपीसी से जांच कराना चाहिए। इससे पता चल जाएगा कि नोटबंदी के बारे में और किन लोगों को जानकारी थी। 

उन्होंने कहा कि 2000 रुपए के नोटों को लाना एक अवैध कृत्य है क्योंकि नए नोट छापने के लिए आरबीआई अधिनियम के तहत जो अधिसूचना जारी करना आवश्यक होता है, वह जारी नहीं की गई और कानून के तहत अनिवार्य बात को नजरअंदाज किया गया। शर्मा ने नोट बदलवाने वालों की उंगलियों पर अमिट स्याही लगाए जाने के सरकार के कदम की भी आलोचना की। कांग्रेस ने कहा कि एकजुट विपक्ष इस मामले को जन आंदोलन का विषय बनाने के अलावा संसद में जोरदार तरीके से उठाएगा।

राज्यसभा में कांग्रेस के उपनेता ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री जानबूझकर अहम मामलों से ध्यान हटाने की कोशिश कर रहे हैं और राष्‍ट्रवाद की आड़ में कालेधन के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले का ढाेंग करके गरीब लोगों को मूर्ख बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री और इस कदम को सही बताते हुए उनके तर्कों का समर्थन कर रहे लोग संविधान और कानून के मामले में अनपढ़ हैं। शर्मा ने कहा, देश को वित्तीय अराजकता की स्थिति में डालने के लिए पूरी तरह से प्रधानमंत्री जिम्मेदार हैं। संविधान के अनुच्छेद 360 के प्रावधानों को लागू किए बिना ही देश में अघोषित वित्तीय आपातकाल लग गया है।

उन्होंने कहा, नोटों का चलन बंद करने के संबंध में प्रधानमंत्री ने आठ नवंबर को जो सनसनीखेज और नाटकीय घोषणा की थी उसका कोई कानूनी आधार नहीं है क्योंकि मौद्रिक नीति भारतीय रिजर्व बैंक का क्षेत्राधिकार है।शर्मा ने कहा कि 2000 रुपए के नोट जारी करना एक अवैध कदम है क्योंकि आरबीआई अधिनियम के तहत कोई अधिसूचना जारी नहीं की गई थी और कोई नया नोट लाने से पहले इस प्रकार की अधिसूचना जारी करना अनिवार्य है। उन्होंने कहा, 2000 रुपए के इन अवैध नए नोटों का चलन काले धन के प्रसार को नियंत्रित करने के सरकार के कदम के विपरीत है।

कांग्रेस नेता ने प्रधानमंत्री पर कई बार कानून एवं संविधान का उल्लंघन करने और भ्रामक बयान देने का आरोप लगाया। शर्मा ने नोट बदलवाने वाले आम लोगों की उंगलियों पर स्याही लगाने के सरकार के कदम पर तीखा प्रहार करते हुए कहा, तानाशाहों ने भी वह काम नहीं किया जो इस सरकार ने किया है। उन्होंने कहा, केवल नाजी लोगों पर निशान लगाते थे। धन निकालने के कारण हमारे नागरिकों एवं विदेशी मेहमानों पर निशान लगाए जा रहे हैं। यह चिंता एवं शर्म की बात है। अतुल्य भारत रात भर में अमिट स्याही वाले भारत में बदल गया। शर्मा ने कहा कि 500 एवं 1000 रुपए के पुराने नोटों की जगह लेने वाले नए नोट अभी तैयार नहीं है और इस कमी के कारण लोगों को असुविधा हो रही है। उन्होंने कहा, इससे लोगों, खासकर गरीबों, किसानों और असंगिठत क्षेत्र एवं खेतों में मजदूरी करने वाले कुल 33 करोड़ भारतीय कार्यबल को बहुत परेशानी हो रही है। शर्मा ने प्रधानमंत्री पर नियम आधारित देश वाली भारत की अंतरराष्‍ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया।

नोटों का चलन बंद करने और इसके क्रियान्वयन को लेकर सरकार को आड़े हाथों लेने के लिए संसद में बड़े राजनीतिक दल पहले ही साथ आ चुके हैं। शर्मा ने कहा कि न तो प्रधानमंत्री और न ही वित्त मंत्री के पास इस बात की कोई कानूनी मंजूरी या अधिकार है कि वे लोगों की उनके अपने ही बैंक खातों तक पहुंच रोक सकें और परिवारों, नागरिकों एवं वेतनभोगी कर्मियों के बचत खातों से धन निकालने को लेकर सीमा लागू कर सके।

उन्होंने कहा, विपक्षी न्यायोचित काम कर रहे हैं और सरकार के कदम की कुछ लोगों को पहले से जानकारी होने के मामले में जेपीसी जांच संबंधी अपनी मांग को लेकर दृढ़ हैं। यह सूचना लीक होना गोपनीयता का उल्लंघन है और इससे काला धन रखने वालों को प्रत्यक्ष मदद मिली, इससे विदेशों में धनशोधन और सोना-चांदी, स्टाॅक, बाॅन्ड एवं सिक्योरिटी के जरिए निवेश परिवर्तित करने में सहायता मिली। शर्मा ने कहा, हम इसे एक तर्कसंगत निष्कर्ष तक पहुंचाने और इस सरकार के कदमों एवं इरादों पर से पर्दाफाश करने को लेकर दृढ है। पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि नोटों का चलन बंद करने के कदम से बड़े स्तर पर रोजगार प्रभावित हुआ है। उन्होंने कहा, यह लोगों का धन है और आप उन्हें अपना ही धन प्राप्त करने के लिए भीख मंगवा रहे है। यह किसी भी देश में कभी नहीं हुआ।

11/20/2016

ये कैसी तैयारी, नए नोट आधे छपे हुए निकल रहे हैं एटीएम से


नोट बंदी को लेकर खूब वावेला मचा हुआ है. कुछ सही ठहरा रहे हैं तो कुछ उससे होने वाली परेशानियों को गिनकर उसको आनन फानन में लिया गया फैसला साबित करने के लिए सबूत जुटा रहे हैं. आनन फानन वाली बात को साबित करने के लिए खूब तस्वीरें वायरल हो रही हैं. पहले आया कि 2 हजार के नोट पर स्पेलिंग मिस्टेक हैं. अब सोशल मीडिया पर कहा जा रहा है कि जो 500 और दो हजार के नोट सरकार ने जारी किए हैं, वो आधे छपे हुए हैं और एटीएम से मिस प्रिंट वाले नोट लोगों को मिल रहे हैं. और ये खबर जहां मुंबई से, वहीं नागालैंड से भी वायरल हो रही है. सच क्या है इस बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है.

ये भी कहा जा रहा है कि लोगों की मुश्किल पहले ही बढ़ रही हैं, क्योंकि घंटों बैंक की कतार में लगने के बाद अब सिर्फ दो हजार रुपये ही मिल पा रहे हैं. जबकि पहले ये रकम 4 हजार रुपये थी. अब लोगों के लिए ये आधे छपे नोट सर दर्द बन गए हैं. लोग एटीएम की कतार में इस खबर की वजह से नहीं लग पा रहे हैं कि कहीं आधे छपे नोट न निकल आएं और फिर उन्हें चलाने में दिक्कत आए.


मुग़ल साम्राज्य के पतन के बाद उसके वंशज गलियों में भीख मांगते थे

ये आर्टिकल मूलत: राना सफवी ने डेली-ओ के लिए लिखा है, जिसका हिंदी तर्जुमा आपके लिए पेश है.

हम हर साल आजादी की पहली लड़ाई लड़ने वालों के बारे में पढ़ते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं. लेकिन, उनके बारे में सोचिए जो मौत से बद्तर जिंदगी जी रहे थे.

अहमद अली ने अपनी किताब ‘Twilight in Delhi’ में 1911 के दिल्ली दरबार के बारे में लिखा है, जहां जॉर्ज पंचम का कुछ महीने पहले राज्याभिषेक हुआ था. जब जार्ज पंचम और क्वीन मेरी ने लाल-किला छोड़ा तो एक राजसी जुलूस निकला था. इसमें लगभग सारे शहजादे और सम्राट यहां आए.

जब ये काफिला आगे बढ़ रहा था, तभी एक भिखारी बहादुरशाह अपनी बेकार हो चुकी टांगों के सहारे शाहजहानाबाद की गलियों में घिसट रहा था. ये भिखारी कौन था? उसे बहादुर शाह नाम क्यों दिया गया?

बहादुर शाह जफर
उत्सुकतावश मैंने इस पर रिसर्च किया कि 14 सितम्बर, 1857 को अंग्रेजों के हाथ में सत्ता आने के बाद और मुग़ल साम्राज्य के पतन के बाद मुगलों का क्या हुआ?

अहमद अली की किताब के अलावा बचे हुए मुगलों पर अंग्रेजी की कोई किताब शायद ही उस स्तर की है, लेकिन 19वीं और 20वीं शताब्दी की उर्दू किताबें इससे भरी पड़ी हैं.

ग़ालिब ने खुद इसे दो किताबों में दर्ज किया है. किताबें हैं दास्तानबू और रोजनामचा-ए-ग़दर. ग़ालिब अंग्रेजों के आलोचक नहीं थे. उन्हें अंग्रेजों से संरक्षण और पेंशन की उम्मीद थी. उन्होंने शाहजहानाबाद के उजड़ेपन के बारे में लिखा है.

इसके अलावा इस बारे में ख्वाजा हसन निजामी की किताब ‘बेगमात के आंसू’, ज़ाहिर देहलवी की ‘दास्तान-ए-ग़दर’, मिर्ज़ा अहमद अख्तर की ‘सवानेह दिल्ली’, सैयद वज़ीर हसन देहलवी की ‘दिल्ली का आखिरी दीदार’ और ‘फुगान-ए-दिल्ली’ में ज़िक्र मिलता है. बहुत से उर्दू शायरों ने दिल्ली के सम्राटों के बारे में शोकगीत लिखे हैं.

शहज़ादे के भीख मांगने का ज़िक्र ख्वाजा हसन निजामी (1873-जुलाई 1955) की किताब ‘बेगमात के आंसू’ में मिलता है. उसका नाम मिर्ज़ा नासिर-उल मुल्क था. अंग्रेजों से बचने के बाद उसने शाहजहानाबाद में अपनी बहन के साथ एक व्यापारी के घर में नौकरी कर ली. बाद में जब अंग्रेजों की सरकार बनी, तो दोनों को पांच रूपए महीने की पेंशन मिलने लगी. तब उन्होंने नौकरी छोड़ दी. बाद में पेंशन भी बंद कर दी गई और वो क़र्ज़ में डूब गए.

कुछ सालों बाद एक पीर बाबा, जो दिखने में चंगेज़ के खानदान के लगते थे, चितली कब्र और कमर बंगाश के इलाके में दिखाई देते थे. वो ठीक से चल भी नहीं सकते थे. उनके गले में एक झोला होता था और वो आने-जाने वालों से चुपचाप मदद मांगते थे. जो लोग जानते थे कि वो कौन हैं, वो उनके झोले में कुछ सिक्के डाल देते थे.

किसी ने पूछा वो कौन हैं, तो बताया गया उनका नाम मिर्ज़ा नासिर-उल-मुल्क है और वो बहादुरशाह के पोते हैं. बहादुरशाह ज़फर की बेटी कुरैशिया बेगम का बेटा भी शाहजहानाबाद की गलियों में भीख मांग रहा था, जिसे एक समय साहिब-ए-आलम मिर्ज़ा कमर सुल्तान बहादुर कहा जाता था. वो केवल रातों में निकलता था, क्योंकि दिन में जब उसे जानने वाले उसे देखते थे, तो उसे सलाम करते थे और उन्हें इस बात से शर्म आती थी. मिर्ज़ा सुल्तान भीख मांगते हुए कहते थे, ‘या अल्लाह, मुझे इतना दो कि मैं अपने खाने के लिए सामान खरीद सकूं.’

ख्वाजा हसन निजामी
ख्वाजा हसन निज़ामी ने 1857 की घटनाओं पर बहुत सी किताबें लिखीं हैं, जो लोगों की आंखों देखी हैं. मिर्ज़ा कवैश की बेटियों के बारे में एक और दिल को छूने वाली कहानी मुझे मिली, जिन्हें बहादुर शाह ज़फर का उत्तराधिकारी घोषित किया गया था. ‘बेगमात के आंसू’ में ख्वाजा हसन निजामी ने लिखा कि ये कहानी उन्होंने खुद शहज़ादी से सुनी है.उसका नाम सुल्तान बानो था और वो मिर्ज़ा कवैश बहादुर की बेटी थीं. जब वो ख्वाजा हसन निज़ामी से मिलीं, तब वो 66 साल की थीं, लेकिन उन्हें सब कुछ अच्छे से याद था. निज़ामी ने ‘बेगमात के आंसू’ में इसे ‘शहज़ादी की बिपता’ के नाम से दर्ज किया है. वो बताती हैं:

‘हालांकि, ग़दर हुए 50 साल हो चुके हैं, लेकिन मुझे अब भी साफ़ याद है जैसे ये कल की ही बात हो. तब मैं 16 साल की थी. मैं अपने भाई मिर्ज़ा यावर शाह से दो साल छोटी थी और अपनी बहन नाज़ बानो से छह साल बड़ी थी. हमें अपने भाई यावर शाह से लगाव था. अका भाई के पास बहुत से पढ़ाने वाले थे, जो उन्हें कई विषय और कला के बारे में सिखाते थे. वो उन्हें अरबी, फ़ारसी और तीरंदाजी सिखाते थे. हम कढ़ाई, सिलाई और कई घरेलू काम सीखते थे.

हुज़ूर-ए-वाला को बच्चे पसंद थे, जो उनके साथ नाश्ता करते थे. जिल्ले-सुबहानी को मुझसे लगाव था और मुझे भी उनके साथ नाश्ता करने का मौका मिलता था. हम तब पर्दा नहीं करते थे. अजनबी लोग जनाना महल में बिना किसी हिचकिचाहट के आते थे, लेकिन मैं शर्मीली थी और जब भी किसी अजनबी के सामने आती थी, अपना चेहरा छिपा लेती थी. लेकिन, हमें हुजूर के आदेशों को मानना पड़ता था. हमारे बहुत से चचेरे भाई भी वहां आते थे. सम्राट की मौजूदगी में सबकी नज़रें नीची रहती थीं. कोई भी ऊपर नहीं देखता था और न ही तेज बोलता था.

रिवाज़ के मुताबिक़, हुज़ूर-ए-मौला कुछ बच्चों को पकवान में से कुछ निवाले अपने हाथों से खिलाते थे. चाहे जवान हो या बूढ़ा, उसे झुककर तीन बार सलाम करना पड़ता था.

एक दिन मुझे बुलाया गया और हुज़ूर ने एक ख़ास ईरानी पकवान से एक निवाला खिलाया. उन्होंने कहा,”सुल्ताना, तुम सिर्फ अपने खाने पर ध्यान दो. लिहाज़ करना अच्छा है, लेकिन इतना भी नहीं कि तुम दस्तरख्वान से भूखी ही उठ जाओ.”

मैंने उन्हें तीन बार सलाम किया, लेकिन मैं ही जानती हूं कि मैं कैसे वहां गई और वहां से वापस आई. मेरे पैर कांप रहे थे. आह! वो खुशनुमा दिन न जाने कहां चले गए? पता नहीं उस ज़माने को क्या हो गया?

हम अपने महलों में ऐसे ही घूमते रहते थे. जिल्ले-सुबहानी की परछाईं हमारे दिमाग में थी और हमें मलिका-ए-आलम कहा जाता था. जिंदगी के उतार चढ़ाव ऐसे ही हैं.

मुझे याद है जब हुज़ूर-ए-मौला को हुमायूं के मकबरे पर गिरफ्तार कर लिया गया था. एक गोरे ने मेरे चचाजान मिर्ज़ा अबू बकर बहादुर को गोली मार दी थी. तब मिर्ज़ा सोहराब उनके पास नंगी तलवार लेकर दौड़े. उन्हें एक दूसरे गोरे ने गोली मार दी और वो भी आह करते हुए चचाजान के शरीर के ऊपर गिर गए. मैं वहां बुत बनी खड़ी थी.
ख्वाजा सारा आया और उसने कहा, ”बेगम, आप यहां क्यों खड़ी हैं? आपके अब्बाजान आपको बुला रहे हैं.” मैं उसके पीछे चल दी.

नदी के दरवाजे के पास मेरे अब्बाजान, मिर्ज़ा कवैश बहादुर एक घोड़े पर थे. खुले सिर और परेशान. अब्बाजान का सर धूल और तिनकों से भरा था. वो चिल्लाने लगे और उन्होंने कहा, ”खुदा हाफिज सुल्ताना, मैं भी तुम लोगों को छोड़कर जा रहा हूं. मेरी जिंदगी का तारा, मेरा बेटा, उसे एक सैनिक ने मेरी आंखों के सामने मार दिया.” मैं तेजी से चीखी, ”अरे मेरे भाई यावर.”

उन्होंने मुझे और नाज़ बानो को शांत कराया और कहा, ”बेटी, अब गोरे मुझे खोज रहे हैं. मुझे नहीं पता मैं कितनी देर तक बच पाऊंगा. माशाअल्लाह आप लोगों के सामने उम्र पड़ी है. अल्लाह पर भरोसा रखो. मुझे नहीं पता हममें से किसके साथ क्या होगा. मैं तुम लोगों को छोड़ना नहीं चाहता, लेकिन एक दिन तुम लोग अनाथ हो जाओगी. नाज़ बानो अभी बच्ची है. उसका ख्याल रखना और अच्छे से रहना.”

”नाज़ बानो अब तुम शहज़ादी नहीं रही. कोई मांग मत करो. सिर्फ अल्लाह को शुक्रिया कहो और जो मिले वो खा लो. अगर कोई खा रहा है, उसकी तरफ मत देखो, वरना लोग कहेंगे ये शहजादियां लालची हैं. उन्होंने हमें ख्वाजा सारा के हवाले कर दिया और कहा,” इन्हें वहां ले जाओ, जहां हमारे परिवार के बाकी लोग हैं.”

उन्होंने हमें गले लगाया और अपना घोड़ा जंगल की तरफ दौड़ा दिया. ये आखिरी मौक़ा था, जब हमने उन्हें देखा और हमें कोई अंदाज़ा नहीं इसके बाद उनके साथ क्या हुआ. ख्वाजा सारा हमारे परिवार का पुराना नौकर था और वो हमारे साथ था. नाज़ बानो कुछ देर तक चलती रही, लेकिन जल्द ही उसके पैर थक गए. वो रोने लगी. मैं खुद कभी इतना नहीं चली थी, लेकिन किसी तरह मैं चलती रही और बानो को पकड़े रही. हम उन गलियों से गुजरे, जहां हम कभी हाथियों से चलते थे.

नाज़ बानो के पैर में एक कांटा चुभ गया और वो गिरकर रोने लगी. मैंने उसे उठाया और कांटा निकालने की कोशिश की. ख्वाजा सारा चुपचाप खड़ा देखता रहा और उसने हमसे जल्दी चलने को कहा.
नाज़ ने कहा, ”आपाजान, मैं अब और नहीं चल सकती. इससे कहो न हमारे लिए पालकी ले आए.”

मैं उसके आंसू पोछकर उसे शांत कराने लगी. मुझे लगा मेरा दिल ग़म के मारे फट जाएगा.
ख्वाजा सारा ने रूखे होकर कहा, ”बस बहुत हो गया. अब चलो.”

नाज़ बानो अच्छी लड़की थी और नौकरों का सम्मान करती थी. उसने ख्वाजा सारा को डांट लगाई. उस कमीने आदमी ने तैश में आकर शहज़ादी को थप्पड़ मार दिया.

बानो झटके से गिर गई. कभी किसी ने उस पर हाथ नहीं उठाया था. यहां तक कि मैं भी उसके साथ रोने लगी. ख्वाजा हम दोनों को रोता हुआ छोड़कर चला गया. हम किसी तरह हज़रत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह तक पहुंचे.

हमारे परिवार समेत हजारों लोगों ने वहां पनाह ले रखी थी. सब परेशान और डरे हुए थे. कोई एक-दूसरे से कुछ नहीं बोल रहा था. ग़दर के समय ही महामारी फ़ैल गई, जिसने मेरी बहन की जान ले ली. अब मैं एकदम अकेली थी.

बाद में दिल्ली में अमन लौट तो आया, लेकिन मेरे लिए कोई अमन न था. अंग्रेज सरकार ने पांच रुपए महीने की पेंशन मुक़र्रर कर दी, जो आज भी मुझे मिलती है.”

साभार डेली ओ से
हिंदी रूपान्तरण
प्रस्तुति
पं.एल.के.शर्मा