12/20/2016

नज़रिया: 'जीती हुई लड़ाई में पिछड़ने लगी है बीजेपी'

ऐसा माना जाता है कि उत्तर प्रदेश का सियासी मिज़ाज ही देश का भविष्य तय करता है. जब यूपी में कांग्रेस की तूती बोलती थी तो केंद्र में भी उसी की सरकार बनती रही.
1989 में कांग्रेस के सितारे तभी गर्दिश में चले गए जब वह यूपी में हारी. इसी तरह देश में बीजेपी के उत्थान की मुख्य वजह उसे उत्तर प्रदेश में मिली सफलताएँ हैं.

इसीलिए 2014 के लोकसभा चुनाव में जब बीजेपी ने सहयोगी पार्टी - अपना दल - के साथ मिल कुल 80 में से 73 सीटें जीतीं, तो लगा कि ढाई साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी का पलड़ा भारी जरूर रहेगा.

बीजेपी को यूपी में अकेले 42.63 फ़ीसदी वोट मिले. जबकि 2007 में मायावती और 2012 में अखिलेश यादव जब मुख्यमंत्री बने तो उनकी पार्टियां 29 फ़ीसदी वोट पाकर अपने दम पर बहुमत जुटा लाई थीं.

कहावत है - हाथी दुबला होगा तो चूहा नहीं बन जाएगा. यानी अगर बीजेपी को लोकसभा चुनाव में 42.63 फ़ीसदी वोट मोदी लहर की वजह से मिले थे तो विधानसभा चुनाव में अगर मान लिया जाए कि मोदी की लहर नहीं होगी तो भी उसे 30 फ़ीसदी वोट तो मिल ही जाने की उम्मीद थी.
मोदी।

2014 के बाद हुए सात विधानसभा चुनावों में बीजेपी का मत प्रतिशत सबसे ज्यादा कहीं गिरा तो वह दिल्ली में था - 13 फीसदी. हालाँकि इसके बाद 33 प्रतिशत वोट पाने के बावजूद बीजेपी को वहां 70 में से महज़ तीन सीटें मिल पाई थीं.
दिल्ली में बीजेपी का आम आदमी पार्टी के साथ लगभग सीधा मुकाबला था. लेकिन यूपी में स्थितियाँ भिन्न हैं. यहाँ बीजेपी, सपा, बसपा और कांग्रेस के साथ चतुष्कोणीय मुकाबले में होगी. यदि उसे दिल्ली की तरह 13 फीसदी कम वोट मिलें तो भी 2007 की बसपा और 2012 की सपा जैसे इस बार बीजेपी भी 30 प्रतिशत वोट पाकर सत्ता संभाल सकती थी.

दो महीने पहले तक स्थितियाँ यही थीं. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने चुनाव प्रचार की कमान अपने हाथों में ले रखी थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भीड़ भरी रैलियां संबोधित कर रहे थे. चुनाव पूर्व सर्वेक्षण बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी घोषित कर चुके थे.तभी 8 नवंबर को मोदी ने 1000 और 500 के नोटों पर प्रतिबंध लगा दिया. इससे पूरे देश की तरह उत्तर प्रदेश में भी छोटे और मझोले किसानों और उद्योगों पर जबरदस्त प्रतिकूल असर पड़ा. खास तौर पर गांव में, जहां लोग प्लास्टिक करेंसी या कैशलेस इकॉनोमी का मतलब ही नहीं समझते हैं और सारी अर्थव्यवस्था का आधार नकद रुपया ही है.

बैंकों में पैसा न पहुंचने से लोगों के पास कैश की बड़ी दिक़्क़त हो गई है. किसानों की धान की फ़सल बिक ही नहीं रही है. बिक रही है तो आधे दाम पर - छह सौ से सात सौ रुपए प्रति क्विंटल जबकि सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य है 1400 रुपए प्रति क्विंटन.
जब पैसे नहीं हैं तो अगली फ़सल के लिए बीज कहाँ से आएगा और खाद कहाँ से? सुल्तानपुर ज़िले के किसान हरिलाल कहते हैं - ''भइया, पानी लगाय क (सिंचाई) डीज़ल कहाँ ले ख़रीदें. फ़सल को पाला मार रहो है.''

वहीं, गोमती नदी में मछली पकड़ कर गुज़ारा करने वाले मछुआरे बहोरन प्रसाद कहते हैं - "मंडी में ग्राहक नहीं है. मछली बिकने की जगह सड़ रही है. सुबह हमारा परिवार शकरकंदी उबाल कर खा रहा है और शाम को हम गाँजा पीकर सो जाते हैं."

मज़दूर नेता दुर्गा प्रसाद मिश्रा दावा करते हैं कि उनके संपर्क में कई मज़दूर हैं जिन्हें नौ नवंबर के बाद या तो काम नहीं मिला है और अगर मिला है तो मज़दूरी नहीं मिली है.
जनप्रतिनिधियों द्वारा अपनी और सरकार की मजबूरियों की लाख दुहाई के बावजूद उन्हें लोगों के जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ रहा है. कई जगहों पर दंगे जैसी स्थितियाँ बन गई हैं.

पुलिस को कहीं लाठी चार्ज करना पड रहा है तो कहीं हवाई फ़ायर. सांसदों के ग़ुस्से का जायज़ा पिछले सप्ताह लखनऊ में आरएसएस और बीजेपी की संयुक्त बैठक में दिखा जब पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति में उत्तर प्रदेश के सभी सांसदों ने एक स्वर में एक ही मांग रखी कि अगर चुनाव जीतना है तो उत्तर प्रदेश के बैंकों में तुरंत धन उपलब्ध कराएं.
लेकिन जब पूरे देश पर ही करेंसी की समस्या हो तो अकेले उत्तर प्रदेश में उपलब्धता कैसे सुनिश्चित कराई जा सकती है.
पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने पिछडे कुर्मियों के अपना दल से तालमेल किया था. बीजेपी के लगभग क्लीन स्वीप करने की एक वजह यह भी थी.

इस बार अमित शाह का प्रयास था कि उत्तर प्रदेश में ग़ैर-यादव पिछड़ी जातियों का गठजोड़ बनाने का था.
इसीलिए उन्होंने सोहेल देव पार्टी, पाजभर, मौर्य, कुशवाहा, कुर्मी, काछी, मल्लाह आदि पिछड़ी जातियों को अपने पाले में लाने की जीतोड़ कोशिश की. और किसी हद तक सफल भी हुए.

उत्तर प्रदेश में बैंक में क़तार लगाए लोगों की फ़ाइल तस्वीर
उनका मानना था कि अगड़ी जातियां पहले ही बीजेपी के साथ हैं और अगर पिछड़ी जातियां आ जाती हैं तो विनिंग कंबीनेशन होगा. लेकिन नोटबंदी ने नके इस पूरे प्रयास पर पानी फेर दिया.

इसके अलावा यदि सपा-कांग्रेस का तालमेल हो जाता है तो अल्पसंख्यक, यादव और दूसरी पिछड़ी जातियों और अगड़ी जातियों के एक हिस्सा के उनके साथ जाने की संभावना है.

साभार शरद गुप्ता
वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

प्रस्तुति
एल.के .शर्मा

Paytm की वो असलियत, जो हर भारतीय को जाननी चाहिए

Paytm की वो असलियत, जो हर भारतीय को जाननी चाहिए!

एक बात तो आप सभी मानेंगे कि नोटबंदी से सबसे अधिक फायदा पेटीएम को ही पहुंचा है। पेटीएम से रोजाना 70 लाख सौदे होने लगे हैं जिनका मूल्य करीब 120 करोड़ रूपये तक पहुंच गया है, पेटीएम हर ट्रांजिक्शन मे मोटा कमीशन वसूल रही है। सौदों में आई भारी तेजी से कंपनी को अपने पांच अरब डॉलर मूल्य की सकल उत्पाद बिक्री (जीएमवी) लक्ष्य को तय समय से चार महीने पहले ही प्राप्त कर लिया है।

पर पेटीएम कंपनी है क्या ?

एक वक्त था जब पेटीएम एक भारतीय स्टार्ट-अप कंपनी हुआ करती थी पर आज यह कंपनी चीन के उद्योगपति जैक मा के हाथों का खिलौना बन चुकी है। पर यह तो सभी जानते है कि अलीबाबा की पेटीएम मे हिस्सेदारी है पर यह आधा सच है।

पूरी कहानी समझने के लिए थोड़ा फ्लैश बैक मे जाना होगा

जब जैक मा ने 1998 में अलीबाबा नामक ई कामर्स कंपनी की स्थापना की तो उनको बहुत सी बाधाओं का सामना करना पड़ा। पहले तीन सालों तक इस ब्रांड से उनको कोई लाभ नहीं हुआ। कंपनी की सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि इसके पास भुगतान के रास्ते नहीं थे और बैंक इसके साथ काम करने को तैयार नहीं थे।

मा ने अलीपे के नाम से खुद का पेमेंट प्रोग्राम शुरू करने का निर्णय किया। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय खरीदारों और विक्रेताओं के बीच अलग-अलग करंसीज के पेमेंट्स को ट्रांसफर किया जाता है।

पूरा सच

अलीबाबा का अलीपे ही पेटीएम का सबसे बड़ा हिस्सेदार है। दरअसल चीन या चीन के उद्योगपति भारत के व्यवसाय की “सेवा उन्मुख व्यवसाय आपूर्ति श्रृंखला”(सप्लाई चेन)को तोड़ना चाहते है, ताकि वह आसानी से अपना माल भारत के बड़े बाजार मे खपा सके।

इसके लिए उन्हें अपने नियंत्रण वाली खुद की एक सुरक्षित रसद श्रृंखला (लॉजिस्टिक्स चेन) शुरू करना है और चीन के विक्रेता चीन के ही किसी पेमेंट गेटवे का इस्तेमाल कर भारत मे माल बेचने मे अपने आपको सहज महसूस करेंगे जो पेटीएम उन्हें उपलब्ध करा रहा है।

पेटीएम का मूल उद्देश्य अलीबाबा और चीनी उद्योगपतियों के लिए रास्ता साफ करना है, अलीबाबा के ग्लोबल मैनेजिंग डायरेक्टर के गुरु गौरप्पन को पिछले महीने पेटीएम के बोर्ड में एडिशनल डायरेक्टर के तौर पर शामिल किया गया है और नोटबंदी के ठीक 4 दिन पहले अलीबाबा के सारे टॉप मैनेजर पेटीएम के नोएडा ऑफिस मे कमान सँभाल चुके थे।

अलीबाबा को चीन का पहला प्राइवेट बैंक खोलने की अनुमति मिल गयी है और भारत मे अलीबाबा के पेटीएम को भी पेमेंट बैंक खोलने की अनुमति रिजर्व बैंक ने दे दी है यानी एक ही कंपनी अलीबाबा ने दोनों देशों मे खुद का बैंक और खुद का पेमेंट गेटवे खोल लिया है।

नोटबंदी के बाद 1 महीने मे छोटे और मध्यम उद्योग धंधो की जो बर्बादी हो रही है उस पूरे वैक्यूम को चीनी सामानों को ला लाकर भारतीय बाजार मे पाट दिया जायेगा और देश देखते देखते भारत नयी गुलामी की तरफ बढ़ता चला जायेगा।

आपको अब भी शायद लग रहा है कि पेटीएम इतनी बड़ी कंपनी नहीं है! चलिये ये भ्रम भी आपका दूर कर देते हैं

पेटीएम ने दुनिया की सबसे बड़ी कैब टैक्सी कंपनी उबर से हाथ मिला लिया है। दिल्ली और मुंबई मेट्रो के टिकट पेटीएम के मार्फ़त ख़रीदे बेचे जा रहे है। IRCTC यानि रेलवे के टिकट पेटीएम से ख़रीदे बेचे जा रहे है। IRCTC ने पेमेंट गेटवे के लिए पेटीएम के साथ साझेदारी की है और पेटीएम देश की सबसे बड़ी ट्रैवल बुकिंग प्लैटफॉर्म बनने के लिए पूरी तरह से तैयार है।

पेटीएमने बीसीसीआई से भारत में होने वाले अंतर्राष्ट्रीय एवं घरेलू मैचों के 2015 से 2019 तक के लिए क़रीब 84 अंतरराष्ट्रीय मैचों का क़रार किया गया है। अब रणजी ट्राफी भी पेटीएम के नाम से खेली जायेगी।

इतना ही नहीं मीडिया को भी अपने शिकंजे मे लेने की पूरी तैयारी की गयी है। एनडीटीवी के गैजेट्स 360° के लिए पेटीएम के मालिक कंपनी, वन97 कम्युनिकेशंस ने पूरा निवेश किया है।

सुबह शाम न्यूज़ चैनलों को मन भर के विज्ञापन दिए जा रहे हैं और तो और सरकारी न्यूज चैनल डी डी न्यूज़ भी पेटीएम का प्रचार कर रहा है।

खुदरा क्षेत्र के फ्यूचर समूह ने पेटीएम के साथ समझौता किया है। इसके तहत फ्यूचर समूह पेटीएम के मंच का प्रयोग बिग बाजार के सामान को ऑनलाइन बेचने के लिए करेगा। इस समझौते में पेटीएम के मार्केटप्लेस पर बिग बाजार एक प्रमुख स्टोर बन जाएगा।

सरकार खुद बड़े करेंसी नोट के विमुद्रीकरण के बाद जनकल्याणकारी योजनाओं के जरिए फंड ट्रांसफर के लिए पेटीएम से हाथ मिलाने को तैयार बैठी है।

सरकार किस हद तक पेटीएम का समर्थन कर रही है उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पेटीएम से की गई मात्र सवा छः लाख की धोखाधड़ी की जांच सीधी सीबीआई से करायी जा रही है।

ऐसा भी नहीं है कि इस और किसी का ध्यान नहीं है

आरएसएस की आर्थिक शाखा भी पेटीएम के चीनी संबंध पर बारीक नजर रखे हुए है। आरएसएस से जुड़ा स्वेदशी जागरण मंच (एसजेएम) चीनी उत्पाद और निवेश के खिलाफ लंबे समय से आंदोलन चला रहा है लेकिन इस बार सरकार खुद आगे बढ़कर देश को कैशलेस बनाकर चीनी उद्योगपतियों के खतरनाक मंसूबो को कामयाब बना रही है।

बाड़ ही खेत हड़प रही है भारत की कैशलेस व्यवस्था को जब चीनी कंपनियां नियंत्रित करेंगी, तब आप खुद सोचिये अंजाम क्या होगा………
याद रखिए पार्टी के प्रति निष्ठा या किसी नेता की भक्ति से कही अधिक बड़ा देश का हित होता है।

साभार- न्यूज़ मिडिया,समाचार पत्र
एल.के.शर्मा (अधिवक्ता)



 


12/18/2016

ये देश की पहली ऐसी लड़की है, जो सीएम को प्रोटेक्ट करती है

ब्लैक ट्राउजर, वाइट शर्ट और ब्लैक ब्लेजर में जब सुभासिनी सनकरन लोगों के सामने आती हैं, तो लोग उन्हें वकील समझ लेते हैं. जब वो पुलिसवालों को ऑर्डर देती हैं, तब भी लोग उनका रोल नहीं समझ पाते. ऐसी सिचुएशन्स से निकलने का सुभासिनी का अपना तरीका है. वो हल्का सा सिर झुकाती हैं और मुस्कुराकर आगे बढ़ जाती हैं. सुभासिनी देश की पहली महिली IPS ऑफिसर हैं, जिन्हें आजाद भारत में किसी मुख्यमंत्री की सुरक्षा का जिम्मा दिया गया है.

असम के मुख्यमंत्री सरबानंद सोनोवाल देश के एक संवेदनशील राज्य के सीएम हैं. जब उन्हें कहीं जाना होता है, तो पहले पुलिस की टीम लोकेशन सिक्योर करती है, आसपास के इलाके की जांच करती है और जहां सीएम को आना होता है, वहां की सेफ्टी सिक्योर करती है. और जो टीम ये सब करती है, सुभासिनी उसे लीड करती हैं. उन्हें इस साल जुलाई में सोनोवाल की सुरक्षा के लिए अपॉइंट किया गया है.

सुभासिनी के घर में कोई भी पुलिस बैकग्राउंड से नहीं है. इसके बावजूद वो कई स्टीरियोटाइप्स तोड़ते हुए इस मुकाम तक पहुंची हैं और अब उनके जिम्मे ऐसा काम है, जिसमें गलती की जरा भी गुंजाइश नहीं है. वो बताती हैं, ‘ये हर किसी के लिए नई बात थी. एक लड़की का सीएम की सुरक्षा में लगी टीम को लीड करना सबके लिए अजीब था, लेकिन लोगों ने धीरे-धीरे इसे स्वीकार कर लिया. जब उन्हें अहसास होता है कि सबको एक साथ एक ही टीम में काम करना है, तो उनका व्यवहार अच्छा हो जाता है.‘
मुख्यमंत्री की सिक्योरिटी का काम आसान नहीं है. उनके रूट की जानकारी होना, बहुत ही नजदीक से सुरक्षा देने वालों के साथ कॉर्डिनेट करना, उनके गार्ड्स को निर्देश देना वगैरह वगैरह. ये एक फुल टाइम जॉब है. सुभासिनी दिन के 15 से 18 घंटे तक जॉब पर ही रहती हैं. हां, जब वक्त मिलता है, तो बायोग्राफीज और जैज म्यूजिक में खो जाती हैं.

सुभासिनी तमिलनाडु के तंजावुर शहर की एक मिडल क्लास फैमिली से आती हैं. उनके दादा एम. राजगोपालन ने 1950 में ‘मोटर इंडिया’ और ‘टेक्सटाइल मैगजीन’ के नाम से दो मैगजीन शुरू की थीं, जो आज भी पब्लिश होती हैं. 1980 में सुभासिनी के पैरंट्स मुबंई आ गए थे. उनकी स्कूलिंग मुंबई में ही हुई और ग्रेजुएशन सेंट जेवियर्स से. मास्टर्स और एमफिल के लिए सुभासिनी ने जेएनयू में एडमीशन लिया था. जेएनयू में रहकर ही उन्होंने IPS की तैयारी की. उनके पापा एक प्राइवेट फर्म में काम करते हैं और मां हाउसवाइफ हैं, लेकिन इससे सुभासिनी के सपने पर कोई फर्क नहीं पड़ा. उन्हें जो मुकाम हासिल करना था, उन्होंने किया.

सुभासिनी की IPS ट्रेनिंग हैदराबाद के सरदार वल्लभभाई पुलिस अकैडमी में हुई और असम वो अपनी मर्जी से पहुंचीं. हर IPS को अपना काडर चुनने का मौका दिया जाता है और सुभासिनी ने असम चुना. एक महिला पुलिस अधिकारी के लिए असम बेहद चुनौती भरा राज्य है. लॉ ऐंड ऑर्डर, अपराधियों के साथ जवाबी कार्रवाई, सांप्रदायिक तनाव, स्मगलिंग, जानवरों का अवैध शिकार और ड्रग्स. असम बुरी तरह डूबा हुआ है इन चीजों में. ऐसे में सरकार के मुखिया को प्रोटेक्ट करना कितनी बड़ी जिम्मेदारी है, आप खुद समझ सकते हैं.

वैसे सीएम की सिक्यॉरिटी में लगाए जाने से पहले भी सुभासिनी असम की अलग-अलग जगहों पर काम कर चुकी हैं. असम में उन्हें 4 साल हो चुके हैं. उन्होंने गुवाहाटी में बतौर ASP शुरुआत की थी. फिर वो अडिशनल एसपी के तौर बिश्वनाथ आ गईं. सुभासिनी बताती हैं कि अलग-अलग जगह रहकर काम करने का उन्हें सबसे ज्यादा फायदा ये हुआ कि अब उन्हें लोगों को डील करना आ गया है. कहां बोलना है, कितना बोलना है और कब बोलना है, सुभासिनी अच्छी तरह जानती हैं. उनका फंडा है, ‘तभी बोलो जब जरूरी हो, तभी एक्शन लो, जब जरूरी हो.

सुभासिनी आज लड़कियों के लिए रोल मॉडल हैं. उन्हें जानने वाले लोग उनके पास आते हैं और बड़े गर्व से बताते हैं कि सुभासिनी की वजह से उनकी बेटियां खुद को मजबूत महसूस करती हैं. सुभासिनी कहती हैं कि अगर उनके काम से स्टीरियोटाइप टूटते हैं और लड़कियों को हिम्मत मिलती है, तो वो इससे बहुत खुश हैं.

संकलन

न्यूज़ मिडिया,समाचार पत्र

पं. एल.के.शर्मा (अधिवक्ता)



रूमी: मोहब्बत को जीने वाला फकीर

जलालुद्दीन मोहम्मद रूमी. गालिब से पहले का भी एक शाइर. 13वीं शताब्दी में तजाकिस्तान में पैदा हुए रूमी, फारसी सूफिज़्म के उन नामों में से हैं, जिन्हें पूरी दुनिया में पढ़ा और सराहा जाता है. रूमी का ज़्यादातर लेखन फारसी में है, मगर उन्होंने अरबी, तुर्की और ग्रीक में भी काम किया है.

अगर 13वीं शताब्दी से अब तक देखा जाए तो रूमी दुनिया के बेस्टसेलर कवि हैं. उनकी लिखी लंबी कविता मसनवी में कुल 50हज़ार लाइने हैं और इसे लिखने के लिए 6 किताबें चाहिए होती हैं. कई विद्वान रूमी की कविताओं को इरॉटिज़्म और डिवोशन का मिश्रण मानते हैं. 17 दिसम्बर को दुनिया से गए रूमी की मज़ार पर आज भी उनकी हर बरसी पर लोग जमा होते हैं. अभी हाल ही में रूमी के ऊपर बनने वाली फिल्म को लेकर विवाद उठा था क्योंकि रूमी के किरदार में एक श्वेत अमेरीकी, लिओनार्डो डि कैप्रियो को कास्ट करने की बातें हुई थी.

12/15/2016

कैशलेस होने की भी एक कीमत है, पर इसे जनता क्यों चुकाए?


कैशलेस इकॉनमी भारत का भविष्य है. कहना आसान है, पर करना महंगा है और दिक्कत भरा.

कैशलेस इकॉनमी होने का मतलब है कि जनता अपने पेमेंट डेबिट या क्रेडिट कार्ड से करेगी. कैश से बहुत कम करेगी या नहीं करेगी. केंद्र सरकार इसके लिए प्रयत्नशील है. रिजर्व बैंक भी अपने विजन 2018 डॉक्यूमेंट में ये कह चुका है. जनता भी नई चीज को लेकर उत्साहित है औऱ सशंकित भी.

भारत में सारे पेमेंट का मात्र 5 प्रतिशत ही ऑनलाइन पेमेंट होता है. यहां तक कि मॉल में भी लोग कैश से पे करना बेहतर समझते हैं. अभी इतना होने के बाद 7-8 परसेंट हुआ है ऑनलाइन पेमेंट. देश में कुल 72 करोड़ डेबिट कार्ड हैं. कई लोग तो एक से ज्यादा कार्ड रखते हैं. मतलब बहुत कम लोगों के पास कार्ड है. क्रेडिट कार्ड तो बहुत कम हैं. 3 करोड़. मतलब देश के ज्यादातर लोगों के पास कार्ड नहीं हैं. फिर बहुत सारे लोग ऐसे होते हैं जो कार्ड का इस्तेमाल एटीएम से कैश निकालने में करते हैं.

अब जब बात हो रही है कि कैशलेस इकॉनमी हो तो इसके साथ एक चीज जुड़ी आई है. ऑनलाइन ट्रांजैक्शन फ्री नहीं होते. सर्विस चार्ज, यूजर चार्ज और कन्वीनिएंस फी के नाम पर पैसे देने पड़ते हैं. IRCTC से पेमेंट करने पर भी एक्स्ट्रा पैसे तो देने ही पड़ते हैं. हालांकि इसको लेकर एक दिन प्रेस कांफ्रेंस कर अरुण जेटली ने थोड़ी राहत दी थी, पर ये कम है और अस्थायी है-

1. 2000 रुपये तक के ट्रांजैक्शन पर कोई सर्विस चार्ज नहीं लगेगा. (इसके ऊपर के पेमेंट पर लगेगा. क्रेडिट कार्ड पर 1-2.5 परसेंट चार्ज लगता है. अगर दो परसेंट लें तो 3000 रुपये की खरीददारी किये तो 60 रुपये एक्स्ट्रा देना होगा.)

2. पेट्रोल, डीजल और रेलवे पास पर ट्रांजैक्शन टैक्स में थोड़ा डिस्काउंट मिला. (थोड़ा मतलब थोड़ा तो टैक्स देना ही है.)

3. इंश्योरेंस, हाईवे टॉल टैक्स के ऑनलाइन ट्रांजैक्शन में 8-10 परसेंट डिस्काउंट मिलेगा. ट्रांजैक्शन कॉस्ट में डिस्काउंट. मतलब जो पे कर रहे हैं वो तो करना ही है. बस ऑनलाइन एक्स्ट्रा जो देते थे, उसमें थोड़ी राहत हो जाएगी. पर एक्स्ट्रा तो देना ही है.)

तो जो काम हम कैश से आसानी से और सस्ते में कर सकते थे, उसके लिए हम ज्यादा पैसा क्यों खर्च करें?

ऑनलाइन पेमेंट करने के लिए हमें इंटरनेट चाहिए. इसके लिए एक स्मार्टफोन चाहिए. सिग्नल बढ़िया आना चाहिए. डेटा खर्च करना पड़ेगा. मतलब एक ब्रेड का पैकेट खरीदना है तो पहले इतना सारा जुगाड़ करना ही होगा. अब जब इतना जुगाड़ हो जाएगा कि आईडी-पासवर्ड और कार्ड स्वाइप, ऑनलाइन मोबाइल पेमेंट तो क्या हम अपने बच्चों को दुकान पर सामान लेने के लिए भेज पाएंगे? जिस देश में एटीएम से पैसे निकालने के दौरान लोग पिन चोरी कर लेते हैं, वहां पर चौबीसों घंटे ऑनलाइन पेमेंट होने पर सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा?

फिर अगर सरकार ई-पेमेंट प्रमोट कर ही रही है तो सरकार ने अपनी तरफ से क्या व्यवस्था की है? पेटीएम कोई सरकारी संस्थान नहीं है. अगर डूब जाए तो उसके साथ डूबने वाले पैसे की जिम्मेदारी कौन लेगा? फिर हम क्यों उसी को फायदा पहुंचाने के लिए काम करें? फिर सरकारी बैंक तो पेटीएम जैसी प्राइवेट एजेंसी को अपनी साइट पर जगह भी नहीं देते. बैंक अलग काम कर रहे हैं. प्राइवेट वाले अलग. सरकार अपना अलग घोषणा कर रही है.

तो जनता क्यों खर्च भरे कैशलेस इकॉनमी होने का? अगर ऑनलाइन पेमेंट को ही पॉपुलर करना है तो ये कैश यूज करने के मुकाबले सस्ता होना चाहिए. हम क्यों महंगा सामान लें? सरकार को तो सारे ट्रांजैक्शन टैक्स हटा ही देने चाहिए. नहीं तो जनता को तो कोई फायदा नहीं होगा. उलटे हमेशा इंटरनेट के लिए सिग्नल तलाशते फिरेंगे.

हालांकि सरकार 31 मार्च 2017 तक 10 लाख पॉइंट ऑफ सेल्स लगाएगी देश में. मतलब वहीं से पेमेंट होगा. तो क्या जनता अपने पेमेंट का जिम्मा किसी तीसरे के भरोसे छोड़ के रखेगी? अगर वो लोग गुंडई करने लगे तो किसके पास जाएंगे. जहां केरोसिन और गेहूं बांटने में ठेकेदार नंगई कर देता है, वहां अगर पेमेंट ही उनके हाथ में दे दें तो वो लोग क्या करेंगे? कम पढ़े-लिखे औऱ टेक्नॉल्जी से अनजान लोग तो उनके आसरे पर आ जाएंगे. जो भी देश डिजिटल हुआ है वहां पर पहले से ही इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत है. इंटरनेट की कोई समस्या नहीं है. लोगों को पता भी है. हमारे देश में तो ऐसा नहीं है अभी.

इसका मतलब ये नहीं है कि कैशलेस होना घाटे का काम है. कैशलेस होना फायदेमंद है. पर कैशलेस होने के लिए जो जरूरतें हैं, अगर वो पूरी नहीं की गईं तो घाटे का सौदा हो जाएगा. बुलेट ट्रेन की सबको जरूरत है. पर अगर ट्रैक ढंग का नहीं रहा तो क्या फायदा होगा. पहले ट्रैक तो बनाना ही पड़ेगा ना.


संकलन

न्यूज़ मिडिया,समाचार पत्र

पं. एल.के .शर्मा (अधिवक्ता)

अपने आक्रामक तेवर से हमेशा विपक्ष को बैकफुट पर ला देने वाली केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार खुद ‘बैकफुट’ पर

अपने आक्रामक तेवर से हमेशा विपक्ष को बैकफुट पर ला देने वाली केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार खुद ‘बैकफुट’ पर आती जा रही है। अव्यवस्थित नोटबंदी की वजह से एक साथ कई समस्याओं से घिरी सरकार पर कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का जुबानी हमला पीएम नरेन्द्र मोदी के सियासी ग्राफ को नीचे की ओर खिसका रहा है और सीधे तौर पर सरकार और उसके चिंतकों के लिए चिंता का विषय है।
दरअसल, 8 नवंबर को नोटबंदी के बाद से ही पूरे देश में अफरा-तफरी है। 16 नवंबर से संसद का शीतकालीन-सत्र चल रहा है, लेकिन शायद ही कोई दिन हो, जिस दिन सदन की कार्रवाई सुचारू रूप से चली हो। नोटबंदी पर संसद में हंगामे के बीच 9 नवंबर को भी राज्यसभा व लोकसभा के कामकाज में रुकावट आई। संसद के बाहर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मीडिया से कहा कि सरकार बहस से भाग रही है, अगर मुझे बोलने देंगे तो आप देखेंगे कि भूकंप आ जाएगा। उन्होंने कहा कि नोटबंदी हिंदुस्तान के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला है। नोटबंदी पर संसद के शीतकालीन-सत्र में केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश कर रही विपक्षी पार्टियां प्रधानमंत्री के बयान की मांग कर रही हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री पूरे देश में तो भाषण दे रहे हैं, मगर लोकसभा में आने से डरते हैं। आखिर इतनी घबराहट क्यों? एक महीने से हम विमुद्रीकरण पर बहस की कोशिश कर रहे हैं, हम चाहते हैं दूध का दूध पानी का पानी हो जाए। राजनीति के जानकार बताते हैं कि राहुल का यही सवाल सरकार से जुड़े लोगों को परेशान कर रहा है, और यह समझ से परे है कि आखिर मोदी सदन में आने से क्यों कतरा रहे हैं?

बड़े नोटों को अमान्य करने के ऐलान के एक महीना (8 नवम्बर) पूरा होने पर विपक्ष ने संसद और संसद के बाहर ‘काला दिवस’ मनाया। संसद परिसर में महात्मा गांधी की मूर्ति के पास सांसदों ने प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन में शामिल कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पीएम मोदी पर तीखा हमला करते हुए कहा कि उनके मूर्खतापूर्ण फैसले ने देश को बर्बाद कर दिया है। प्रधानमंत्री संसद में जवाब देने से बच रहे हैं, लेकिन हम लोग उन्हें भागने नहीं देंगे। संसद में चर्चा में प्रधानमंत्री हिस्सा लें, सभी चीजें स्वत: स्पष्ट हो जाएंगी। विमुद्रीकरण के फैसले ने मजदूरों और किसानों को बर्बाद कर दिया है। हम बहस चाहते हैं, वोटिंग चाहते हैं। लेकिन सरकार ऐसा नहीं चाहती। राहुल गांधी ने कहा कि लोकसभा में मैं सब बता दूंगा कि पेटीएम कैसे पे टू मोदी हो जाता है। पिछले एक महीने से इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री अपनी बातें बदल रहे हैं। लोग कठिनाइयों के बोझ में दबते जा रहे हैं। प्रधानमंत्री मुस्करा रहे हैं। वह अच्छा समय व्यतीत कर रहे हैं, जबकि देश की जनता परेशान है, इसलिए वे एक मुद्दे से दूसरे मुद्दे पर जा रहे हैं। हम उन्हें सदन में घेरेंगे। वे सदन से भाग नहीं पाएंगे।
इस प्रकार आप देखेंगे कि सत्तापक्ष के अक्रामक रूख के कारण हमेशा कथित रक्षात्मक रुख अपनाने वाले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी आक्रामक हैं, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत उनकी पूरी जम्बोजेट कैबिनेट रक्षात्मक मुद्रा में नजर आ रही है। निश्चित रूप से प्रधानमंत्री के बारे में लोगों के मन में जो छवि बनी थी, वह धीरे-धीरे खत्म हो रही है।
दरअसल, विपक्ष का आरोप है कि नोटबंदी की घोषणा को चुनिंदा तरीके से लीक किया गया, जिन लोगों को उन्हें बताना था, उन्हें बता दिया गया था। यदि मामले लीक नहीं हुए होते तो भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई ने बैंकों में करोड़ों रुपये जमा किए, पार्टी ने बिहार में जमीन खरीदी, ये सब नहीं हो पाता। कर्नाटक में भाजपा सरकार में पूर्व मंत्री रहे एक नेता ने अपनी पुत्री के विवाह में 500 करोड़ रुपए खर्च किए। नोटबंदी के कारण हजारों की संख्या में लोगों की नौकरियों से छंटनी हो रही है। किसान मर रहे हैं। अब तक 100 से अधिक लोग कतारों में मर चुके हैं।
आपको बता दें कि 8 नवम्बर को हुई नोटबंदी का मकसद कालेधन पर चोट करना था, लेकिन सरकार को इसमें कोई कामयाबी नहीं मिल सकी है। कालेधन वालों ने देश की कथित भ्रष्ट बैंकिग सिस्टम से सेटिंग कर अपने पुराने नोट को बदल लिया। जबकि आम जनता नोटबंदी के एक माह बाद तक कतार में खड़ी होकर धक्के खा रही है और सरकार को कोस रही है। नोटबंदी के बाद से आम लोगों को काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। सरकार कहती है कि नोटबंदी की वजह से साढ़े ग्यारह लाख करोड़ रुपए बैंकों में जमा हो गए। इसमें से चार लाख करोड़ रुपए बैंकों ने लोगों को दे दिए। इस हिसाब से बैंकों के पास साढ़े सात लाख करोड़ रुपए जमा हो गए। सरकार के पास पैसे आ गए, पर लोगों के पास नहीं रहे।

बताते हैं कि नोटबंदी का जीडीपी पर तीन तरह से असर पड़ेगा। भारत का कालाधन अब विदेश चला जाएगा, क्योंकि लोगों के मन में डर बन गया है। लोग डॉलर खरीदने लगे हैं, इसका सबूत यह है कि डॉलर के मुक़ाबले रुपया लगातार टूट रहा है। छोटे उद्योगों को भी नकद न होने से दिक्कतें हो रही है। आशंका है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ सकती है।
खैर, पांच सौ, हजार रुपए की नोटबंदी के अच्छे नतीजे तो जाने कब दिखाई देंगे, मगर उसके खराब पहलू पूरी तरह सामने आ गए हैं। दावे के हिसाब से न कालाधन पकड़ा गया न ही भ्रष्टाचार में कोई कमी आई है। मकान-दुकान आदि के सस्ते होने की बात कही गई थी, बैंकों के कर्ज की ब्याज-दरों में कमी आने का भी दावा था, मगर ऐसा कुछ खास नहीं हुआ है। रिजर्व बैंक ने अपनी ताजा मौद्रिक नीति में ब्याज दरें यथावत रखी हैं और विकास दर का अनुमान घटा दिया है। मगर प्रधानमंत्री दिवास्वप्न दिखाए जा रहे हैं।
नोटबंदी का सबसे बड़ा कहर आम आदमी पर टूटा है, चाहे वह शहरी हो या ग्रामीण। बैंकों और एटीएम के सामने दो-चार हजार रुपए निकालने के लिए लग रही कतारें टूटने का नाम नहीं ले रहीं। राहत की सरकारी घोषणाओं और उनके अमल में कोई तालमेल नहीं है। सरकार का कहना है कि कोई भी खाताधारक एक हफ्ते में बैंक से चौबीस हजार और एटीएम से एक दिन में ढाई हजार रुपए निकाल सकता है, मगर बैंकों और एटीम में जब पैसे ही नहीं होते, तो इस फरमान का क्या मतलब है?

इधर, केन्द्र सरकार की नाकामी पर विपक्ष को उस वक्त और बल मिल गया जब सत्तारूढ़ भाजपा के वरिष्ठ सांसद लालकृष्ण आडवाणी ने संसद ठप्प रहने पर सरकार को घेरा। आडवाणी ने सदन बाधित होने पर लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन और संसदीय कार्य मंत्री अनंत कुमार को ठहराया। आडवाणी अपने वाणी-संयम के लिए विख्यात हैं, फिर भी लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन की आलोचना करनी पड़ी।
उधर, इस मसले पर सोशल मीडिया पर जबर्दस्त गर्माहट दिख रही है। दिल्ली कांग्रेस आईटी सेल के कन्वेनर विशाल कुन्द्रा फेसबुक, ट्वीटर और व्हाट्स एप्प के जरिए ताबड़तोड़ हमले कर रहे हैं। बिना तैयारी की गई नोटबंदी को जनविरोधी करार देते हुए ट्वीटर पर विशाल कुन्द्रा लिखते हैं-‘इस सरकार ने देश के आम नागरिकों का निवाला छीन लिया है।’
दरअसल, नोटबंदी के मुद्दे पर संसद में प्रधानमंत्री के बयान देने की मांग लेकर विपक्ष द्वारा हंगामा किया जा रहा है। जबकि भाजपा बहस तो चाहती है लेकिन नोटबंदी पर मतदान नहीं चाहती। वजह स्पष्ट है कि यदि मतदान होगा तो राज्यसभा में सरकार निश्‍चित ही हार जाएगी, जबकि विपक्ष मतदान पर जोर दे रहा है। बहरहाल, सरकार का डर विपक्ष के आरोप के अनुसार किसी बड़े घपले-घोटाले की ओर इशारा कर रहा है। वैसे सच्चाई का पता तो तब चलेगा जब प्रधानमंत्री जिद छोड़कर सदन में आएं और बहस में हिस्सा लें, जो सम्भव होता नहीं दिख रहा है।

12/13/2016

मोदी सरकार ने दबा रखी है दलित छात्रों की 8,000 करोड़ की छात्रवृत्ति

देश में अनुसूचित जाति के मेधावी छात्रों की स्कॉलरशिप के 8000 करोड़ रुपए मोदी सरकार पर बकाया हैं। शोसल जस्टिस एवं एम्पॉवरमेंट मिनिस्ट्री को यह रकम चुकानी है। लेकिन यह उसके सालाना योजनागत खर्च से भी अधिक है। मेधावी छात्रों के लिए मैट्रिक के बाद स्कॉलरशिप केंद्र की प्राथमिकता वाली योजनाओं में से एक है। इसके तहत छात्रों की ओर से किए गए खर्च के लिए सहायता दी जाती है।

आपके बता दें कि देश की राज्य सरकारें विभिन्न योजनाओं के तहत अनुसूचित जाति के मेधावी छात्रों को मैट्रिक के बाद स्कॉलरशिप देती हैं। इस रकम की भरपाई केंद्र सरकार की सोशल जस्टिस एंड एम्पावरमेंट मिनिस्ट्री की ओर से की जाती है। अनुसूचित जातियों के कल्याण के जुड़ी योजनाओं के लिए यह नोडल मिनिस्ट्री है।

केंद्र सरकार पिछले कुछ समय से अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए इस स्कॉलरशिप की रकम को रिअम्बर्स करने में नाकाम रही है और अब बकाया रकम बढ़कर 8,000 करोड़ पहुंच गई है। राज्यों को इस वर्ष के लिए बकाया रकम का अभी तक भुगतान नहीं किया गया है। इसके अलावा पिछले वर्ष की बकाया रकम को चुकाने के लिए अतिरिक्त फंड की जरूरत है।


सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत ने इस बाबत इकनॉमिक टाइम्स से बात करते हुए कहा, 'हम इस समस्या को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। सिस्टम में सुधार के लिए राज्यों से बात की जा रही है। उन्हें डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर के जरिए स्कॉलरशिप का भुगतान करना चाहिए। इसके अलावा राज्यों को विभिन्न इंस्टीट्यूशंस की फीस में बड़े अंतर पर भी विचार करने की जरूरत है।'

गहलोत ने कहा कि स्कॉलरशिप का मुद्दा वित्त मंत्रालय के सामने उठाया गया है। सोशल जस्टिस एंड एम्पावरमेंट मिनिस्ट्री का योजनागत बजट 6,500 करोड़ रुपए का है। इसमें से 4,667 करोड़ रुपए सितंबर के अंत तक जारी कर दिया है। लेकिन, स्कॉलरशिप की 8,000 करोड़ रुपए बकाया रकम को चुकाने के लिए अतिरिक्त फंड आवंटित करने की जरूरत है।

8,000 करोड़ रुपए में से 5,400 करोड़ रुपए 2015-16 के फाइनेंशियल ईयर तक का एरियर है और यह मौजूदा फाइंनेंशियल ईयर के लिए जरूरत का एक तिहाई है। एरियर को चुकाने के लिए एक्सपेंडिचर फाइंनेंस कमेटी को एक नोट भेजा गया है। सोशल जस्टिस एंड फाइंनेंस मिनिस्ट्री ने फाइंनेंस मिनिस्ट्री से कहा है कि 5,400 करोड़ रुपए तुरंत जारी करने की जरूरत है।

इस बारे में एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना था, स्कॉलरशिप स्कीम के तहत अधिक खर्च की वजह फ्रॉड भी है क्योंकि एक व्यक्ति दो-तीन जगहों से स्कॉलरशिप ले रहा है। मिनिस्ट्री ने राज्यों से डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर के जरिए स्कॉलरशिप देने को कहा है। इससे वास्तविक मेधावी छात्रों को स्कॉलरशिप देना सुनिश्चित किया जा सकेगा।