7/07/2016

मोबाइल मोनिया जानिए आपके लिए कितना खतरनाक है स्मार्ट फोन

स्मार्टफोन ने आज लाइफ को आसान बना दिया है। किसी भी काम को स्मार्टफोन से करना बड़ा सरल हो गया है।  युवा तो स्मार्टफोन से हमेशा चिपके रहते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि इस मोबाइल हैंडसेट को आप हर वक्त अपने साथ रखते हैं वह आपके शरीर और दिमाग के लिए कितना खतरनाक है। वह आपके लिए 'साइलेंट किलर' है। यह बात वैज्ञानिक रिसर्च में साबित हुई। सिर्फ दिल, दिमाग नहीं बल्कि पूरे शरीर के लिए स्मार्टफोन खतरनाक है। आइए जानते हैं स्मार्टफोन से मानव शरीर को होने वाले खतरों के बारे में।

हाथ और उंगलियों के लिए खतरनाक :  स्मार्टफोन पर देर तक वेब ब्राउजिंग, टेक्स्ट, चैटिंग आदि हाथों के लिए नुकसानदेह है। स्मार्टफोन का ज्यादा प्रयोग करने से हाथ, मुट्ठी, उंगलियों और कलाई और बाजुओं को कई प्रकार की परेशानियां होना आम है। इसे टेक्स्ट ब्लॉक कहा जाता है। स्मार्ट फोन के ज्यादा इस्तेमाल से हाथ की मांसपेशियों और हड्डियों में जकड़न, दर्द, सूजन और कमजोरी जैसी परेशानी आती है।

गर्दन और रीढ़ के लिए परेशानी : स्मार्ट फोन पर लगातार नीचे की ओर देखने से सिर के वजन का दबाव गर्दन में दर्द का कारण बनता है। देर तक गर्दन को झुकाने से स्लिप डिस्क या सर्वाइकल स्पाइंडिलाइसिल की आशंका बढ़ जाती है।

स्मार्टफोन लैपटॉप पर टाइप करते हुए अक्सर गर्दन और सिर को आगे की ओर जाते हैं।  इस पर भी दबाव बढ़ जाता है। स्मार्ट फोन की टेक्स्ट सुविधा से देर तक टाइप करना आसान है, लेकिन इसका असर गर्दन की मांसपेशियों पर पड़ता है और उनमें दर्द बढ़ता है।

7/06/2016

कभी स्कूटर से चलने वाले 12 वीं पास अदने से आदमी अडानी कैसे हुए 60 हजार करोड़ के मालिक


किस्मत और सत्ता से नजदीकियों के दम पर एक अदना सा आदमी कैसा देश के सबसे अमीर लोगों में से एक हो जाता है, यह जानना हो तो अडानी को पढ़िए।
कभी अपने दोस्त मलय महादेविया को पीछे बैठाकर ग्रे कलर की बजाज स्कूटर से अहमदाबाद की गली-चौराहे नापते फिरने वाले गौतम अडानी को इसका अंदाजा कतई नहीं रहा होगा कि एक दिन उन पर छप्पर फाड़कर  धनवर्षा होगी। जिससे वे 55 से 60 हजार करोड़ का भारी-भरकम साम्राज्य खड़ा कर लेंगे। उनके क्रोनी कैपिटलिज्म(पूंजीवादी सांठगांठ) का खेल इस कदर सफल होगा कि वे  अनिल अंबानी जैसे दिग्गज को भी देश के टॉप-10 कारोबारियों की लिस्ट से निकालकर बाहर कर देंगे। मगर हाथ की लकीरों में दम हो और 12 साल सीएम और फिर पीएम राज मे मोदी का साथ मिले। भाजपा की सरकार न रहे भी रहे तो कांग्रेस में कमलनाथ व एनसीपी के शरद पवार जैसे खैरख्वाह आप पर मेहरबान हो जाएं तो कुछ भी संभव है। जिससे बिजनेस की दुनिया का पहलवान बनने से आपको कोई रोक नहीं सकता। फोर्ब्स ने तो अंबानी की संपत्ति करीब दस अरब डॉलर से ज्यादा आंकी है।
जी हां बिल्कुल फिल्मी कहानी है देश में सबसे अप्रत्याशित तरीके से खरबपति बनने वाले बहुधंधी गौतम अडानी की।
18 साल में घर छोड़ मुंबई भागे अडानी
गौतम अडानी के दिमाग में हमेशा रातोंरात अमीर बनने के सपने आते थे। 12 वीं पास होते ही बीकाम करने के लिए अहमदाबाद के कॉलेज में दाखिला लिया। मगर मन नहीं लगा तो 18 साल की उम्र में अहमदाबाद में पिता शांतिलाल के कपड़ों का व्यापार छोड़कर मुंबई भाग निकले। यहां हीरे की कंपनी महिंद्रा ब्रदर्स में महज तीन सौ रुपये पगार पर अडानी काम करने लगे। दिमाग तो था ही इधर-उधर से कुछ पैसा जुटा तो 20 साल की उम्र में ही हीरे का ब्रोकरेज आउटफिट खोलकर बैठ गए। किस्मत ने साथ दिया और पहले ही साल कंपनी ने लाखों का टर्नओवर किया। फिर भाई मनसुखलाल के कहने पर अडानी मुंबई से अहमदाबाद आकर भाई की प्लास्टिक फैक्ट्री में काम करने लगे। पीवीसी इंपोर्ट का सफल बिजनेस शुरू हुआ। डेंटिस्ट प्रीति से उन्होंने शादी रचा ली। दोस्त मलय महादेविया को अपने साथ साये की तरह इसलिए अडानी रखते थे क्योंकि कम पढ़ाई के कारण उनकी अंग्रेजी खराब थी। अफसर व कारोबारियों से धारा प्रवाह अंग्रेजी में बिजनेस डील करने में परेशानी होती थी। अडानी की यह खूबी कही जाएगी कि उन्होंने अपनी कंपनियों में आज भी मलय को बड़े पद दे रखे हैं।
1988 में गौतम ने डाली अपने अडानी ग्रुप की नींव
जब प्लास्टिक कारोबार से पूंजी इकट्ठा हुई तो 1988 में गौतम ने अडानी एक्सपोर्ट लिमिटेड की नींव शुरू की। यह कंपनी पॉवर व एग्रीकल्चर कमोडिटीज के सेक्टर में काम करने लगी। गौतम अडानी के पेशेवर हुनर ने तीन साल में ही कंपनी के पैर जमा दिए। इस बीच धीरे-धीरे एक्सपोर्ट का कारोबार गति पकड़ता रहा। अडानी के बारे में बताया जाता है कि एक बार उनकी कंपनी के एकाउंटेंट ने कोई बड़ी गलती कर दी, जिससे लाखों का नुकसान होने पर उसने बिना कुछ कहे-सुने अडानी के सामने इस्तीफा रख दिया। इस्तीफा हाथ में लेकर अडानी ने फाड़ दिया। कहा कि तुम्हें  गलती का अहसास हो गया, यही बहुत है। अब तुम दोबारा गलती नहीं करोगे। अगर तुम्हें रिलीव कर दूंगा तो नुकसान मेरा हुआ और यहां से गलती से जो सीखे हो उसका फायदा दूसरे कंपनी को मिलेगा। इससे पता चलता है कि अडानी किस तरह बिजनेस कार्यकुशलता रखते हैं।
गुजरात दंगे से मोदी के करीबी हुए अडानी
हर किसी के मन में हमेशा उत्सुकता रही कि किसी को भी आमतौर पर भाव नहीं देने वाले मोदी अडानी के मामले में पिघल क्यों जाते हैं। दरअसल जब 2002 में गुजरात का दंगा हुआ तो कारोबार को भारी नुकसान पहुंचने से उद्योगपतियों ने मोदी की आलोचना शुरू की। इस काम में सबसे आगे रहाऔद्यौगिक संगठन कन्फडरेशन आफ इंडियन इंडस्ट्रीज(सीआईआई)। तब गौतम अडानी इकलौते उद्योगपति थे, जो मोदी के साथ चट्टान की तरह खड़े रहे। यही नहीं अडानी ने तब गुजरात व देश के अन्य कारोबारियों के साथ लाबिंग कर गुजरात में मुश्किल हालात के बीज भी निवेश करने के लिए राजी किया। क्योंकि मोदी आलोचकों को दिखाना चाहते थे कि वे दंगे के बाद भी राज्य में कारोबार को फिर से खड़ा करने का माद्दा रखते हैं। जब सीआईआई ने इस पर अडंगा डालने की कोशिश की तो अडानी ने उसके समानांतर नयासंगठन खड़ा करने की चेतावनी दे डाली। तब से मोदी अडानी के मुरीद हो गए। गुजरात सरकार पर अडानी को कौड़ियों के भाव महंगी जमीनें व बंदरगाह देने के आरोप लगे। मोदी से अडानी की नजदीकियां इतनी हैं कि  जब व्हॉटर्न स्कूल आफ बिजनेस ने मोदी का नाम एक बार मुख्य वक्ता के रूप में हटा दिया तो इस आयोजन के सबसे बड़े स्पांसर के रूप में रहे अडानी ने तत्काल आयोजन से हाथ खींच लिए। यानी मोदी के संकट के समय हमेशा अडानी खड़े रहे।
मोदी सीएम रहे तो खूब विदेशी मुद्रा बटोरी, पीएम बने तो पूंजी बढ़ी
जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाया था तभी से गौतम अडानी की अडानी इंटरप्राइजेज, अडानी पोर्ट और अडानी पावर का कुल बाजार पूंजी में चौंकाने वाले रूप से 85.35 प्रतिशत का इजाफा हुआ था। जबकि उस समय सेंसेक्स में बमुश्किल से 14.76 प्रतिशत ही बढ़ोत्तरी हुई थी। इससे पहले 2003-04 में जब मोदी गुजरात में सीएम रहे तो अडानी ने विदेशी पूंजी मुद्रा कमाने में रिकार्ड तोड़ दिया। दो सौ प्रतिशत से  ज्यादा मुनाफा कमाया। अहम बात रही कि तब उनका 76.50 करोड़ डॉलर का कारोबार रहा जो मोदी के पीएम बनने पर दस अरब डॉलर तक पहुंच गया। हर साल करीब तीस हजार करोड़ रुपये का अडानी ग्रुप का टर्नओवर है।
आस्ट्रेलिया से लेकर दुनिया के 28 देशों में कारोबार
करीब 30 चीजों में अडानी का कारोबार आज आस्ट्रेलिया सहित दुनिया के 28 देशों तक फैल गया है। कोयला खनन, बिजली, पोर्ट, अनाज, तेल मुख्य बिजनेस हैं। आस्ट्रेलिया से अडानी ने 15.5 अरब डॉलर का कोयला खनन का प्रोजेक्ट भी रसूख के दम में हाल में हथियाने में सफलता हासिल की। उन्हें आस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड में बंदरगाह भी आवंटित हो चुका है। यही नहीं कोयला उतारने का दुनिया का सबसे बड़ा बंदरगाह मुंरदा भी अडानी के कब्जे में है। जिसमें निजी रेल लाइन व निजी हवाई जहाज पट्टी का अडानी विस्तार कर रहे हैं। 

श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक झूठा देशभक्त

RSS/BJP ने फ़िलहाल अपने अव्वल नंबर के देशभक्त 'वीर' सावरकर की स्तुति काफ़ी हद तक कम करदी है। इस की सब से बड़ी वजह यह है की इस 'वीर' की असली कहानी दुनिया के सामने आगई है ।  हिंदुत्व के इस 'वीर' ने अंग्रेज़ हुक्मरानों से एक बार नहीं बल्कि पांच बार (1911, 1913, 1914, 1918 और 1 920 में) रिहाई पाने के लिए माफ़ी-नामे लिखे जिन में अपने क्रांतिकारी इतिहास के लिए माफ़ी मांगी और आगे अंग्रेज़ी राज का वफ़ादार बने रहने का आश्वासन दिया। अंग्रेज़ हकूमत ने इस 'वीर' के माफ़ी-नामों को स्वीकारते हुवे 50 साल की क़ैद में से 37 साल की कटौती कर दी।

हिंदुत्व टोली के नए 'देश-भक्त'  डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी (1901-1953) हैं। वे स्वतंत्रता-पूर्व हिन्दू-महासभा में सावरकर के बाद सब से अहम नेता थे और यह मानते थे की हिन्दुस्तान केवल हिन्दुओं के लिए है। वे 1944 में हिन्दू-महासभा के मुखिया भी रहे। आज़ादी के बादवे देश के पहले अंतरिम मंत्री मंडल, जिस के मुखिया जवाहरलाल नेहरू थे, में उद्योग और रसद मंत्री थे। उन्हों ने अप्रैल 1950 में नेहरू से पाकिस्तान से किस तरह के सम्बन्ध हैं पर विरोध होने की वजह से इस्तीफ़ा दे दिया था। इस्तीफ़े के बाद उन्होंने आरएसअस का हाथ थाम लिया और उस के आदेश पर आरएसअस के एक राजनैतिक अंग, भारतीय जन संघ की स्थापना की और इस के पहले अध्य्क्ष भी बने। उनकी  मृत्यु 23 जून 1953 को श्रीनगर, जम्मू व कश्मीर के एक जेल में हुई जहां उन्हें उस क्षेत्र में प्रवेश निषेध आदेश के बावजूद दाख़िल होने के लिए गिरफ़्तार करके रख्खा गया था।

2015 तक इन की मृत्यु  के दिन को "द धारा 370 समाप्त करो दिवस' और 'कश्मीर बचाओ दिवस " के रूप में मनाया जाता था लेकिन इस साल (2016 में) इन का दर्जा बढ़ा कर इन्हें देश का 'एक निस्स्वार्थ देशभक्त' (A Selfless Patriot of India) घोषित कर दिया गया। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी कितने महान 'निस्स्वार्थ देशभक्त' थे इसे पर्खने के लिए हमें निम्नलिखित सच्चाइयों पर ग़ौर करना होगा।

(1) डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के स्वतंत्रता-संग्राम में हिस्सेदारी का कोई प्रमाण नहीं है।

अगर देश-भक्त होने का  मतलब है की किसी ने अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ लड़ाई में हिस्सा लिया हो, दमन सहा हो और किसी भी तरह का त्याग किया हो तो यह जानकर ताजुब्ब नहीं होना चाहिए कि मुखर्जी ने आज़ादी की लड़ाई में कभी भी और किसी भी तरह से भाग नहीं लिया। ना ही तो स्वयं मुखर्जी की लेखनी में ना ही उस समय के सरकारी या ग़ैर-सरकारी दस्तावेज़ों और ना ही हिन्दुत्वादी संगठनों के समकालीन अभिलेखागार में उन की आज़ादी की लड़ाई में हिस्सेदारी का कोई ज़िक्र मिलता है। इस के विपरीत आज़ादी की लड़ाई के विरुद्ध किए गए उन के अनगिनित कारनामों का वर्णन ज़रूर मिलता है। आज़ादी से पहले के दस्तावेज़ इस सच्चाई को बार-बार रेखांकित करते हैं कि कैसे इस 'निस्स्वार्थ देशभक्त' ने अंग्रेज़ों की सेवा की और सांझी आज़ादी की लड़ाई को धार्मिक आधार पर विभाजित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। वे जीवन भर सावरकर के मुरीद रहे जो मुस्लिम लीग की तरह हिन्दुओं और मुसलमानों को दो अलग राष्ट्र मानते थे।

(2 ) भारत छोड़ो आंदोलन 1942 में मुखर्जी बंगाल की मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा की मिली-जुली सरकार में उप-मुख्य मंत्री थे।

जब जुलाई 1942 में गांधीजी के नेतृत्व में कांग्रेस ने अगस्त 8 से अंग्रेज़ों भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान किया तब मुखर्जी बंगाल की मुस्लिम लीग के नेतृत्व वाली सरकार , जिस में हिन्दू महासभा भी शामिल थी , के वित्त मंत्री थे और साथ में उप-मुख्य मंत्री भी। इस आंदोलन की घोषणा के साथ ही कांग्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया गया, कांग्रेस के तमाम बड़े नेता जिन में गांधीजी, नेहरू, मौलाना आज़ाद, सरदार पटेल शामिल थे बन्दी बना लिए गए, पूरा देश एक जेल में बदल गया और हज़ारों लोग इस जुर्म में पुलिस और सेना की गोलियों से भून दिए गए की वे तिरंगे झंडे को लहराते हुवे सार्वजनिक स्थानों से गुज़रना चाह रहे थे। हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों जैसे की हिन्दू महासभा व आरएसएस और मुस्लिम  राष्ट्रवादी संगठन, मुस्लिम लीग कांग्रेस दुवारा छेड़े गए भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध नहीं किया बल्कि इस को कुचलने के लिए अंग्रेज़ शासकों को हर प्रकार से मदद करने का फैसला लिया। जब देश में किसी भी प्रकार की राजनीतिक गतविधि पर पाबंदी थी उस समय हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग को एक साथ मिलकर बंगाल, सिँध और NWFP में साझा सरकारें चलाने की अनुमति दी गई। अंग्रेज़ों के दमनकारी विदेशी राज को बनाए रखने  में सहायता हेतु इस शर्मनाक गठबंधन को महामंडित करते हुवे हिन्दू महासभा के अध्यक्ष सावरकर ने 1942 के हिन्दू महासभा के कानपुर अधिवेशन को सम्बोधित करते हुवे बताया कि

"वेवहारिक राजनीति में भी हिन्दू महासभा जानती है कि हमें बुद्धिसम्मत समझौतों के ज़रिये आगे बढ़ना चाहिए। हाल ही में सिंध की सच्चाई को देखें, यहां सिंध हिन्दू महासभा ने निमंत्रण के बाद मुस्लिम लीग के साथ मिली-जुली सरकार चलने की जिम्मेदारी ली। बंगाल का उदहारण भी सब को पता है। उदंड लीगी (अर्थात मुस्लिम लीग) जिन्हें कांग्रेस अपनी तमाम आत्मसमर्पणशीलता के बावजूद  रख सकी, हिन्दू महासभा के साथ संपर्क में आने पर तर्क संगत समझौतों और सामाजिक सम्बन्धों के लिए तैयार हो गए और वहां की मिली-जुली मिस्टर फजलुल हक़ के प्रधानमंत्रित्व और महासभा के क़ाबिल और मान्य नेता श्यामाप्रसाद मुकर्जी के नेतृत्व में दोनों समुदायों के फ़ायदे के लिए एक साल तक सफलतापूर्वक चली।"

(3) बंगाल के उप-मुख्यमंत्री रहते हुवे मुखर्जी ने अंग्रेज़ गवर्नर को चिट्ठी दुवारा भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने के लिए हर संभव मदद का आश्वासन दिया।

मुखर्जी ने एक शर्मनाक काम करते हुवे बंगाल के अंग्रेज़ गवर्नर को जुलाई 26, 1 942 में एक सरकारी पत्र के दुवारा इस देश भर में चल रहे आंदोलन को शुरू होने से पहले ही कुचलने का आह्वान करते हुवे लिखा:
"अब मुझे उस स्तिथि के बारे में  बात करनी है जो कांग्रेस दुवारा छेड़े गए व्यापक आंदोलन के मद्देनज़र पैदा होगी।युद्ध [दूसरा विश्व युद्ध] के दिनों में जो भी  आम लोगों की भावनाएं भड़काने की कोशिश करेगाजिस से बड़े पैमाने पर दंगे या असुरक्षा फैले उसका हर हाल में सत्ताधारी सरकार दुवारा प्रतिरोध करना ही होगा।"

(4) मुखर्जी ने भारत छोड़ो आंदोलन के कुचलने को सही ठहरया और अंग्रेज़ शासकों को देश का मुक्तिदाता बताया।

मुखर्जी ने बंगाल की मुस्लिम लीग-हिन्दू महासभा साझी सरकार की ओर से बंगाल के अंग्रेज़ गवर्नर को लिखी चिट्ठी में अंग्रेज़ हकूमत को प्रांत का मुक्तिदाता बताते हुवे उसे भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने के लिए कई क़दम भी सुझाए:

"प्रशन यह है की बंगाल में भारतछोड़ोआंदोलन से कैसे निपटा जाए? राज्य का शासन इस तरह चलाया जाए की कोंग्रेस की तमाम कोशिशों के बावजूद यह आंदोलन बंगाल में क़दम जमाने में कामयाब न हो सके। हमारे लिए विशेषकर उत्तरदायी मंत्रिओं के लिए जनता को यह समझाना संभव होना चाहिए की आज़ादी जिस के लिए कांग्रेस ने आंदोलन शुरू किया है वह पहले से ही जन-प्रतिनिधिओं  को प्राप्त है। कुछ मामलों में आपातकालीन हालात की वजह से यह सीमित हो सकती है। भारतीयों को अंग्रेज़ों पर भरोसा करना चाहिए, ब्रिटेन के वास्ते नहीं,
इस लिए नहीं के इस से ब्रिटेन को कुछ फायदा होग, बल्कि प्रांत की आज़ादी और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए।"

(5) हिन्दू महासभा के प्रमुख नेता के तौर पर मुखर्जी ने उस समय अंग्रेज़ी सेना के लिए देश भर में 'भर्ती कैंप' लगाए जब सुभाष चन्दर बोस 'आज़ाद हिंद सेना' दुवारा देश को आज़ाद कराना चाहते थे।

एक और शर्मनाक घटनाक्रम में 'वीर' सावरकर और मुखर्जी के नेतृत्व वाली हिन्दू महासभा ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेज़ सरकार को पूर्ण समर्थन देने का फ़ैसला किया। याद रहे की कांग्रेस ने इस युद्ध को साम्राजयवादी युद्ध की संज्ञा दी थी और यही समय था जब नेताजी 'आज़ाद हिंद सेना' खड़ी करके एक सैनिक अभियान दुवारा देश को अंग्रेज़ी चुंगल से मुक्त कारण चाहते थे। हिन्दू महासभा लुटेरे अंग्रेज़ शासकों की किस  हद तक मदद करना चाहती थी इस का अंदाज़ा 'वीर' सावरकर के निम्नलिखित आदेश से लगाया जा सकता है जो उनहूँ ने देश के हिन्दुओं के लिए जारी किया था:

"जहां भारत की सुरक्षा का सवाल है, हिन्दू समाज को भारत सरकार [अंग्रेज़ सरकार] के युद्ध सम्बन्धी प्रयासों में सहानभूतिपूर्ण सहयोग की भावना से बेहिचक जुड़ जाना चाहिए जब तक यह हिन्दू हित के फायदे में हो।  हिन्दुओं को बड़ी संखिया में  थल सेना, नौ सेना और वायु सेना में शामिल होना चाहिए और सभी आयुध, गोला-बारूद और जंग का सामान बनाने वाले कारखानों वग़ैरा में प्रवेश करना चाहिए...ग़ौरतलब है की युद्ध में जापान के कूदने के कारण हम ब्रिटेन के शत्रुओं के सीधे निशाने पर आ गये हैं। इस लिए हम चाहें या ना चाहें, हमें युद्ध के क़हर से अपने परिवार और घर को बचना है, और यह भारत की सुरक्षा के सरकारी युद्ध प्रयासों को ताक़त पहुंचाकर ही किया जा सकता है। इस लिए हिन्दू महासभायों को खास कर बंगाल और असम के प्रांतों में, जितना असरदार तरीक़े से संभव हो, हिन्दुओं को अविलम्ब सेनाओं  में भर्ती होने के लिए प्रेरित करना चाहिए।"

(6) मुखर्जी ने जम्मू और कश्मीर के लिए विशेष दर्जे की वकालत की थी।

हिंदुत्व टोली के दावों के बरक्स मुखर्जी ने जम्मू और कश्मीर की विशेष हैसियत को स्वीकारा था। इस सिलसिले में प्रधान मंत्री नेहरू और उनके बीच चिट्ठी-पत्री का एक लम्बा दौर चला था। उन्हों ने नेहरू को 17 फ़रवरी 1953 के दिन लिखे ख़त में निम्नलिखित मांग की थी:
"दोनों पक्ष इस पर सहमत हों कि राज्य की एकता बनी रहेगी और स्वयत्तता का सिद्धांत जम्मू लद्दाख़ और कश्मीर पर लागू होगा।"

7/02/2016

महाराणा प्रताप

जयपुर।राणा प्रताप की 475वीं जयंती वर्ष पर उन जीवन के अछूते पहलुओं को बता रहे है।आज की कड़ी में हम बता रहे हैं प्रताप की उदारता की कहानी जब प्रताप ने हमलावर रहीम की पत्नी और बेटियों का सम्मान किया और जहांगीर ने रहीम के बेटे का सिर काट कर उन्हें भेजा।यह जानकर हैरानी होगी कि राणा प्रताप के 24 भाइयों में से तीन के नाम खान सिंह, सुलतान और साहेब खान थे।उनके शस्त्रागार का मुखिया और हल्दीघाटी युद्ध में हरावल दस्ते की प्रमुख टुकड़ी का सेनापति हकीम खां सूर था।वे एक तरह से 20 मांओं के प्रतापी पुत्र थे।उनके 24 भाई, 20 बहनें, 14 पत्नियां, पांच बेटियां और 17 बेटे थे। प्रताप ने अपनी मां जयवंता बाई की सलाह पर आखिरी सांस लेने तक अपनी कमर से दो तलवारें बांधे रखीं।
अब्दुल रहीम खानखाना महान बादशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर के नवरत्नों में शामिल था।वह सैनिक टुकड़ी के साथ हमलावर के रूप में शेरपुर पहुंचा तो कुंवर अमरसिंह ने उस पर हमला कर दिया और उसे पत्नियों और बहनों-बेटियों सहित बंदी बना लिया।अमरसिंह रहीम को प्रताप के सामने ले आया। प्रताप ने यह देखा तो वे पुत्र पर बहुत नाराज हुए और बोले :इस कवि को तत्काल रिहा करो और उनके परिवार की महिलाओं को ससम्मान वापस भेजो।वजह यह कि प्रताप खुद भी कवि थे और रहीम का इसीलिए बहुत सम्मान करते थे।शत्रु सैनिक होने के बावजूद।
कुंवर प्रताप की पहली गुरु मां जयवंती बाई ही थी।प्रताप एक बार अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे।वे एक निहत्थे साथी पर प्रहार किए जा रहे थे।मां ने प्रताप को बुलाया और समझाया :बेटा, शूरवीर जीवन में कभी निहत्थे पर वार नहीं करते।तुम शूरवीर हो।अगर दुश्मन की तलवार टूट भी गई हो तो उसे अपनी तलवार दे दो और युद्ध करो।अवाक प्रताप ने पूछा :मां, मैं अपनी तलवार दे दूंगा तो लड़ूंगा कैसे?मां बोली :तुम दो तलवार रखना और इसके बाद प्रताप ने आजीवन दो तलवारें रखीं और कई ऐसे मौके आए जब शत्रु को अपनी तलवार उन्होंने दी।
प्रताप के परिवार के बारे में
20 मां, 24 भाई, 20 बहनें, 14 पत्नियां, पांच बेटियां और 17 बेटे
पिता- महाराणा उदयसिंह।
मां- जयवंता बाई सोनगरा।
भाई- शक्तिसिंह, खान सिंह, विरम देव, जेत सिंह, राय सिंह, जगमल, सगर, अगर, सिंहा, पच्छन, नारायणदास, सुलतान, लूणकरण, महेशदास, चंदा, सरदूल, रुद्र सिंह, भव सिंह, नेतसी, सिंह, बेरिसाल, मानसिंह, साहेब खान।
पत्नियां- अजब दे पंवार, अमोलक दे चौहान, चंपा कंवर झाला, फूल कंवर राठौड़ प्रथम, रत्नकंवर पंवार, फूल कंवर राठौड़ द्वितीय, जसोदा चौहान, रत्नकंवर राठौड़, भगवत कंवर राठौड़, प्यार कंवर सोलंकी, शाहमेता हाड़ी, माधो कंवर राठौड़, आश कंवर खींचण, रणकंवर राठौड़।
बेटे- अमरसिंह, भगवानदास, सहसमल, गोपाल, काचरा, सांवलदास, दुर्जनसिंह, कल्याणदास, चंदा, शेखा, पूर्णमल, हाथी, रामसिंह, जसवंतसिंह, माना, नाथा, रायभान।
बेटियां- रखमावती, राम कंवर, कुसुमावती, दुर्गावती, सुक कंवर।

6/28/2016

अब नरसिम्हा राव की विरासत सबको जरूरी क्यों लगने लगी है?

पीवी नरसिम्हा राव के नाम तक से पल्ला झाड़ने वाली कांग्रेस सहित विभिन्न राजनीतिक दलों और मीडिया विश्लेषकों को अब उनकी विरासत याद करना जरूरी क्यों लगने लगा है?
यह जून, 1991 की बात है. कांग्रेस ने आम चुनाव में सबसे ज्यादा 244 सीटें जीती थीं. यह तय था कि सरकार कांग्रेस के नेतृत्व में बनेगी. लेकिन सवाल था कि इस अल्पमत सरकार का नेतृत्व कौन करेगा. वैसे तो पार्टी में कई दिग्गज नेता थे लेकिन राजीव गांधी की त्रासद हत्या के बाद से यह सुगबुगाहट तेज थी कि यदि पार्टी जीती तो शरद पवार और अर्जुन सिंह प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार होंगे. तीसरा नाम जाहिर तौर पर पीवी नरसिम्हा राव का था क्योंकि वे तब कांग्रेस के अध्यक्ष थे. जब कांग्रेस की तरफ से संसदीय दल का नेता चुनने की बारी आई तब इन तीनों ने अपनी दावेदारी पेश की और यह 20 जून की बात है जिस दिन नरसिम्हा राव संसदीय दल के नेता यानी पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार चुन लिए गए.
20 जून को ही नरसिम्हा राव ने तय किया था कि मनमोहन सिंह उनके वित्तमंत्री होंगे. उस समय प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव रहे पीसी अलेक्जेंडर अपनी आत्मकथा ‘थ्रू कॉरीडोर्स ऑफ पावर : एन इनसाइडर्स स्टोरी’ में बताते हैं कि राव पहले ही उन्हें इशारा दे चुके थे कि वे डॉ मनमोहन सिंह को वित्तमंत्री बनाना चाहते हैं. संसदीय दल का नेता बनने के तुरंत बात उन्होंने अलेक्जेंडर को यह संदेश डॉ मनमोहन सिंह तक पहुंचाने को कहा था.
केंद्र सरकार ने एफडीआई के मुद्दे पर जो बड़ा फैसला किया है वह नरसिम्हा राव की विरासत आगे बढ़ाने जैसा है लेकिन इस फैसले का पूरा श्रेय नरेंद्र मोदी को ही दिया जा रहा है
एक तरह से हम कह सकते हैं कि भारत में आर्थिक उदारीकरण की बुनियाद रखने वाली यह जोड़ी 20 जून को ही बनी थी. इस जोड़ी ने भारत में विदेशी निवेश की खिड़की खोलने की शुरुआत की. यह बड़ा ही विचित्र संयोग है कि इस साल 20 जून को ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई निवेश नीति की घोषणा की है. विशेषज्ञों ने इस नई नीति को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम बदलाव बताया है और इसके बाद प्रधानमंत्री ने बयान भी दिया था कि इसके बाद भारत दुनिया की सबसे खुली अर्थव्यवस्था बन गया है. इस पूरे घटनाक्रम को हम इस तरह भी कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने आर्थिक मोर्चे पर जो बड़ा बदलाव किया वह नरसिम्हा राव की विरासत को आगे बढ़ाने जैसा है. लेकिन बात सिर्फ आर्थिक विरासत की नहीं है, मोदी 2014 के लोकसभा चुनाव के समय से राव की विरासत को भुनाने और उन्हें कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश करते रहे हैं. चुनाव के दौरान आंध्र प्रदेश-तेलंगाना की रैलियों में वे यह दोहराना नहीं भूलते थे कि कांग्रेस ने तेलुगू मूल के इसे 'महान नेता' का अपमान किया था और पार्टी उन्हें वाजिब सम्मान नहीं देती.
पिछले कुछ समय से यह कहा जा सकता है कि मृत्यु (दिसंबर, 2004) के बाद पूरे एक दशक में पीवी नरसिम्हा राव इतनी चर्चा में कभी नहीं रहे जितने अब हैं. कुछ समय पहले तक हर साल उनकी छिटपुट चर्चा 28 जून यानी उनके जन्म के दिन ही हुआ करती थी. लेकिन अब वक्त बदल गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज उन्हें श्रद्धांजलि देने के साथ एक ट्वीट करके यह भी कहा कि उन्होंने देश को बेहद मुश्किल परिस्थितियों में नेतृत्व दिया था.
इस महीने पीवी नरसिम्हा राव दो किताबों के कारण लगातार चर्चा में है. पहली किताब पत्रकार और वकील विनय सीतापति ने उनके ऊपर ही लिखी है. 'हाफ लॉयन : हाउ पीवी नरसिम्हा राव ट्रांसफॉर्म्ड इंडिया' शीर्षक से यह किताब कल बाजार में आई है. इसमें दावा किया गया है कि राव ने बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद आईबी के मार्फत सोनिया गांधी की जासूसी करवाई थी और 1995 में भी खुफिया सूत्रों के माध्यम से यह पता लगाने की कोशिश की थी कि पार्टी के कितने नेता उनके साथ हैं और कितने सोनिया के. दूसरी किताब, 1991- द ईयर दैट चेंज्ड इंडिया, पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार संजय बारू ने लिखी है. यह किताब कुछ दिनों के बाद बाजार में आएगी. इस किताब पर चर्चा करते हुए बारू कह चुके हैं कि राव का भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अमूल्य योगदान रहा है और वे भारत रत्न के हकदार हैं.
नरसिम्हा राव के प्रधान सचिव रहे पीसी एलेक्जेंडर अपनी आत्मकथा ‘थ्रू कॉरीडोर्स ऑफ पावर : एन इनसाइडर्स स्टोरी’ में बताते हैं कि कांग्रेस संसदीय दल का नेता बनने के साथ ही राव ने उन्हें संकेत दे दिया था कि वे डॉ मनमोहन सिंह को वित्तमंत्री बनाना चाहते हैं
राजनीति में निर्वासित जीवन जी रहे किसी व्यक्ति के अचानक महत्वपूर्ण हो जाने के देश में बहुत उदाहरण हैं. लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव शायद अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जो अपनी मृत्यु के एक दशक बाद अब सिर्फ मीडिया में ही नहीं अचानक मुख्यधारा की राजनीति में भी सम्मान के साथ याद किए जा रहे हैं.
इसमें भी खास बात है कि खुद उनकी पार्टी, जिसने कभी उनसे किनारा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी, पिछले साल 28 जून को उनके जन्मदिन पर उन्हें सार्वजनिक रूप से याद कर रही थी. कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह तेलंगाना में इस मौके पर पार्टी द्वारा आयोजित समारोह में पहुंचे थे और कहा कि राव बुद्धिजीवी राजनेता थे जिनमें अपनी विचारधारा के प्रति गजब का समर्पण था. हालांकि इसबार पार्टी के किसी बड़े नेता के तेलंगाना पहुंचने की कोई खबर नहीं है फिर भी पार्टी ने अपने आधिकारिक ट्विटर और फेसबुक अकाउंट से उन्हें श्रद्धांजलि जरूर दी है.
कांग्रेस पार्टी अब जिस तरह पूर्व प्रधानमंत्री को याद कर रही है वह उसके दस साल पहले के रुख से बिल्कुल उलटा है. 23 दिसंबर, 2004 को दिल्ली में नरसिम्हा राव का निधन हुआ था. वैसे तो उनकी मृत्यु से काफी पहले ही कांग्रेस उन्हें राजनीतिक रूप से निर्वासित कर चुकी थी लेकिन लोगों को उम्मीद थी कि शायद मृत्यु के बाद पार्टी उनके प्रति सम्मान दिखाएगी. लेकिन पार्टी मुख्यालय में राव के लिए कोई श्रद्धांजलि सभा तक आयोजित नहीं होने दी गई. कहा जाता है कि केंद्र की यूपीए सरकार ने तुरत-फुरत यह इंतजाम कर दिया कि राव का अंतिम संस्कार दिल्ली की बजाय हैदराबाद में किया जाए. संजय बारू ने अपनी किताब - द एक्सीडंटल प्राइममिनिस्टर - में लिखा है कि राव के बेटे और बेटी उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में ही करना चाहते थे. लेकिन सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल ने बारू से, जो कि खुद भी आंध्र प्रदेश से ही हैं, उन्हें ऐसा न करने के लिए समझाने को कहा था. बाद में इस काम में शिवराज पाटिल और आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वायएस राजशेखर रेड्डी को लगाया गया.
राव के बेटे ने उनके अंतिम संस्कार का फैसला कांग्रेस पर छोड़ दिया था और लेकिन पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने संजय बारू को फोन करके कहा कि नरसिम्हा राव का अंतिम संस्कार दिल्ली में संभव नहीं है
कांग्रेस और एक तरह से देश को ही मुश्किल घड़ी में संभालने वाले राव के बारे में यह प्रचारित है कि पार्टी उन्हें बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले को ठीक से न संभाल पाने का जिम्मेदार मानती थी और इसी कथित दागदार विरासत के चलते उनको हाशिये पर धकेला गया. हालांकि सत्ता के गलियारों से जुड़े जानकार यह भी मानते हैं कि इसकी एक वजह सोनिया गांधी की उनके प्रति नापसंदगी भी रही है. राव ने ही 1991 के चुनाव में कांग्रेस का घोषणा पत्र तैयार किया था. उस समय उनकी तबीयत इतनी खराब थी कि उनके सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की अटकले लगने लगी थीं. लेकिन राजीव गांधी की हत्या के बाद ऐसी परिस्थितियां बनीं कि वे प्रधानमंत्री बन गए. प्रधानमंत्री बनने के बाद वे सोनिया गांधी से नियमित अंतराल पर मिलते रहते थे लेकिन उन्होंने श्रीमती गांधी को कभी-भी सत्ता केंद्र के रूप में उभरने नहीं दिया.
पीवी नरसिम्हा राव उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे लेकिन पार्टी का एक धड़ा लगातार इस कोशिश में था कि सोनिया गांधी को पार्टी की कमान सौंप दी जाए. राव ने हमेशा इसका विरोध किया. पार्टी मंच पर दिया उनका एक बयान उस समय काफी चर्चा में भी रहा. राव का कहना था, ‘जैसे इंजन ट्रेन की बोगियों को खींचता है वैसे ही कांग्रेस के लिए यह जरूरी क्यों है कि वह गांधी-नेहरू परिवार के पीछे-पीछे ही चले?’
1996 के चुनाव में कांग्रेस हार गई थी लेकिन राव के लिए यह बड़ा झटका नहीं था. उनकी प्रतिष्ठा को असली धक्का तब लगा जब 1998 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने उन्हें टिकट देने से ही मना कर दिया. यह अपने आप में ऐतिहासिक घटना थी. बाद में जब सोनिया गांधी अध्यक्ष बनीं तो राव अनौपचारिक रूप से कांग्रेस से बहिष्कृत ही कर दिए गए. इस बहिष्कार की पराकाष्ठा 2004 में उनके निधन के बाद देखने को मिली. इससे जुड़ी एक घटना का जिक्र हमने शुरू में किया है. पूर्व प्रधानमंत्री होने के नाते राव का समाधि स्थल दिल्ली में होना चाहिए था. लेकिन यूपीए सरकार ने फैसला किया कि राजधानी में जगह की कमी है और अब यहां समाधिस्थल नहीं बनाए जा सकते. इस फैसले से साफ था कि कांग्रेस अपने ही पूर्व अध्यक्ष और प्रधानमंत्री के साथ कोई जुड़ाव नहीं रखना चाहती थी.
नरसिम्हा राव का कहना था, ‘जैसे इंजन ट्रेन की बोगियों को खींचता है वैसे ही कांग्रेस के लिए यह जरूरी क्यों है कि वह गांधी-नेहरू परिवार के पीछे-पीछे ही चले?’
तो फिर ऐसा क्या हुआ कि अचानक पार्टी को पीवी नरसिम्हा राव याद आने लगे? राजनीतिक विश्लेषक इसके पीछे कांग्रेस की मजबूरी बता रहे हैं. दरअसल अक्टूबर, 2014 में केंद्र सरकार में सहयोगी दल तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) ने एक प्रस्ताव पारित कर सरकार से मांग की थी कि नई दिल्ली में पीवी नरसिम्हा राव का समाधि स्थल बनाया जाए. इसके बाद पिछले साल मार्च में केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू ने इससे संबंधित प्रस्ताव मंत्रिपरिषद के सामने रखा जिसके बाद राष्ट्रीय राजधानी में पूर्व प्रधानमंत्री के नाम पर भी एक स्मृतिस्थल बन गया है.
कहा जा रहा है कि कांग्रेस केंद्र सरकार के इस कदम को राव की विरासत हथियाने की कोशिश मान रही है. दरअसल राष्ट्रीय स्तर पर भले ही इस बात से कोई फर्क न पड़ता हो लेकिन तेलंगाना (वारंगल जिला यहीं हैं जहां राव का जन्म हुआ था) और आंध्र प्रदेश में राव के प्रति काफी सम्मान और सहानुभूति है. तेलंगाना की टीआरएस सरकार ने तो बाकायदा स्कूली पाठ्यक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री की जीवनी भी शामिल की है. वह उनके जन्मदिन पर हर साल राजकीय कार्यक्रम भी आयोजित करती है. वहीं चंद्रबाबू नायडू की तेलगू देशम पार्टी पहले ही राव के समाधिस्थल का मामला उठाकर इस भावनात्मक मुद्दे पर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर चुकी है. पार्टी उन्हें भारत रत्न देने की मांग भी करती रही है. भाजपा भी नरसिम्हा राव के मामले में इसी नाव पर सवार है.
कांग्रेस को पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में इन दोनों राज्यों में बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही पीवी नरसिम्हा राव को हाशिये पर करने का उसे सीधा नुकसान इन राज्यों में न उठाना पड़ा हो लेकिन आज की परिस्थितियों में टीआरएस, टीडीपी और भाजपा के सामने यहां वह बिल्कुल विरोधी खेमे में खड़ी दिखाई पड़ रही थी. कांग्रेस द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री को अचानक अपनाने और याद करने की यही सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है और उसकी कोशिश बस यही है कि इन राज्यों में उसके नेता की विरासत विरोधी पार्टियां न हथिया लें. वैसे ही जैसे गुजरात में नरेंद्र मोदी, सरदार वल्लभ भाई पटेल के मामले में कर चुके हैं.