7/26/2016

छीन रहा है 'आधार' आपका का अधिकार ?

आधार को एक ऐसी जादुई-छड़ी के रूप में पेश किया गया था, जो सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के सुधार में मददगार होगा. वाकई, यह जादुई-छड़ी का काम कर रहा है. बस फ़र्क़ इतना ही है कि यह उन योजनाओं के लिए हानिकारक साबित हो रहा है.
राज्यों से आ रही ख़बरों से पता चलता है की आधार के तकनीक और बिजली, बायोमेट्रिक्स, इंटरनेट और सर्वर कनेक्टिविटी में परेशानी से लोगों को अपना अधिकार भी नहीं मिल पा रहा है. गुजरात में, जहाँ पॉइंट ऑफ सेल (पीओएस) मशीन लगाई गई है, इंटरनेट कनेक्टिविटी में दिक्कत आने से लोगों को राशन नहीं मिल पाता.
राजस्थान की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) बुरी तरह से बर्बाद होने के कगार पर है. यहाँ राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अधीन परिवारों का चयन पूरा नहीं हुआ था, फिर भी पीडीएस दुकानों पर 'आधार' पर काम करने वाली पीओएस मशीन लगा दी गई.
अब हर महीने राशन लेते समय जब मशीन लोगों के अंगूठे के निशान को पहचानेगी तब उन्हें राशन बिक्री की जाएगी. माना जा रहा है कि मशीन में अंगूठा लगाने से राशन की चोरी ख़त्म हो जाएगी, लेकिन ख़बरों के अनुसार ज़्यादातर लोगों का बायोमेट्रिक्स फेल हो रहा है.
वृद्धवस्था पेंशन योजना, जनधन-आधार-मोबाइल (जेएएम) के पहले कदम पर यानि बैंक से ही लोग परेशान हैं.
आधार कार्ड
पहले हर महीने 500 की पेंशन गाँव में ही डाकिए से मिलती थी. आज उसके लिए बुज़ुर्गों को बैंक जाना पड़ रहा है. कई इलाक़ों में तो आने जाने के साधन भी नहीं होते हैं. बैंक में भीड़ और कागज़ी प्रक्रिया से जूझना भी अलग समस्या है.
गुजरात और राजस्थान में तो यह सिस्टम कुछ ही महीने पहले लागू हुआ है, इसलिए शायद इसमें सुधार की उम्मीद है. लेकिन आंध्र प्रदेश में 2013 से ही पीडीएस, पेंशन और मनरेगा में ही इसे लागू किया गया था.वहाँ के राज्य सरकार की रिपोर्ट ही बताती है कि पिछले दो साल में क़रीब 20 फ़ीसदी मौके पर बायोमेट्रिक्स फेल रहा है. यानी पाँच में से एक व्यक्ति के उंगली के निशानों की पुष्टि नहीं हो पा रही है.
जब ऐसा होता है, तो लोगों को कहा जाता है बाद में आओ, या कुछ लोगों के लिए मोबाइल पर पासवर्ड भेजने की सुविधा रखी गई है.
कुछ को कहा जा रहा है की उन्हें आधार में फिर से नामांकन करवाना होगा, और जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होगी, उन्हें न राशन मिल सकता है, न पेंशन और न मनरेगा और न ही मज़दूरी. इस तरह की नाकामियों को पिछली रिपोर्ट में जगह नहीं दी गई है.
सवाल यह उठता है कि राज्य इस तरह की बिना भरोसे की तकनीक को बिना जाँच किए, इतनी हड़बड़ी में क्यों लागू कर रहे हैं? पीडीएस में केंद्रीय खाद्य मंत्रालय ने पिछले मई में राज्यों को दो विकल्प दिए थे, राशन की जगह नकद दो या आधार पीओएस मशीन लगाओ.
एक और वजह यह भी हो सकती है कि आधार-पीओेएस मशीन से ‘बोगस’ कार्ड पहचाने जा सकते हैं.

प्रेस इन्फ़ॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) की 26 अप्रैल की एक विज्ञप्ति में कहा गया कि 66 लाख बोगस कार्ड डिजिटाइज़ेशन की प्रक्रिया से काटे गए हैं. जबकि दो हफ़्ते बाद 10 मई को ही प्रधानमंत्री की समीक्षा बैठक के बाद की विज्ञप्ति में काटे गये कार्डों की संख्या 1.6 करोड़ तक पहुँच गई और दावा किया गया की यह आधार की वजह से था, डिजिटाइज़ेशन से नही.
हो सकता है कि खाद्य मंत्रालय ने दो हफ्तों में अपने आँकड़े अपडेट किए हों. लेकिन इससे अधिक संभावना है कि 1.6 करोड़ का आँकड़ा पिछले 3 साल में कटे कार्डों का है. यह इसलिए कि 8 दिसंबर 2015 की प्रेस विज्ञप्ति में पिछले 3 सालों में कटे ‘बोगस/अपात्र' कार्डों की संख्या 1.2 करोड़ आई थी.
दूसरी बात, प्रेस विज्ञप्ति में ‘बोगस/अपात्र’ का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन दोनों बार हेडलाइन में ‘अपात्र’ शब्द को हटा दिया गया. यह अंतर महत्वपूर्ण है क्योंकि ‘बोगस’ कार्ड काटने में आधार की भूमिका है, लेकिन खाद्य सुरक्षा क़ानून के अंतर्गत 'अपात्र' परिवारों की पहचान में आधार की कोई भूमिका नहीं.
तीसरी बात, विज्ञप्ति में ज़्यादातर राज्य, परिवारों की संख्या बताते हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल ने व्यक्तियों की संख्या बताई है. काटे गये 1.6 करोड़ कार्डों में से 62 लाख बंगाल के हैं यानी काटे गए परिवारों की संख्या ग़लत तरीके से बढ़ा दी गई है.
आख़िरी बात, 2013 में खाद्य सुरक्षा अधिनियम के लागू होने के बाद, राज्यों ने नए सिरे से राशन कार्ड सूची बनाने की प्रक्रिया शुरू की, जिसमें पुराने डुप्लिकेट, बोगस कार्ड काटे जा रहे हैं. हो सकता है कि कार्डों की संख्या में जो बदलाव है, वो इस सूची बनाने की प्रक्रिया की वजह से हो ना कि आधार या डिजिटाइज़ेशन की वजह से.
लेकिन सरकार 'जेएएम' के 'ए' (आधार) को सफल दिखाने के लिए इतनी उत्सुक है कि कोई सवाल ही नहीं पूछ रहा है. मंत्रालय में जिन्हें सच पता है, वो कुछ नहीं बोल रहे, क्योंकि पीएमओ से सफलता दिखाने का आदेश है.
डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांस्फर और आधार पर चर्चा का एक गंभीर पहलू है इस पर किया जा रहा ‘प्रोपेगेंडा’.
यूपीए-2 में राजस्थान में कांग्रेस की सरकार ने केरोसिन में डीबीटी को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया था. इसमें जब केरोसिन की बिक्री में 80% की गिरावट आई तो सरकार ने दावा किया की डीबीटी से केरोसिन की कालाबाज़ारी ख़त्म हो गई है. फिर पता चला कि गिरावट के दो कारण थे लोगों के खाते नहीं खुले थे इसलिए उन्हें सब्सिडी नहीं मिली और उन्होंने केरोसिन ख़रीदना छोड़ दिया.
इसी तरह इस सरकार में भी प्रचार-प्रसार के भरोसे काम किया जा रहा है. तीन साल से चल रहे, एलपीजी में डीबीटी, आधार, गिव इट अप, से बचत का कोई भरोसेमंद अनुमान नहीं है.
जुलाई 2015 में मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम और सिद्धार्थ जॉर्ज ने लिखा कि इसकी वजह से दो अरब डॉलर की बचत हुई. जब तीन अख़बारों ने सवाल उठाए तो उन्हें स्पष्टीकरण देना पड़ा कि वे ‘वास्तविक’ बचत की बात नहीं कर रहे थे, केवल ‘संभावित’ बचत का अंदाज़ा दे रहे थे.
साथ ही यह भी माना कि बचत में आधार-डीबीटी के अलावा बाज़ारी भाव की भी भूमिका है. इस स्पष्टीकरण के बावज़ूद, सरकारी विज्ञप्तियां और नीति आयोग भी, ‘संभावित’ बचत को हमेशा ‘वास्तविक’ बचत की तरह प्रस्तुत करते है.
विश्व बैंक भी पीछे नहीं रहा, जब वर्ल्ड डेवेलपमेंट रिपोर्ट 2016 लाँच हुई तो चीफ़ एकॉनमिस्ट ने कहा कि आधार से हर साल 1 अरब डॉलर की बचत हो रही है.
यही नहीं, उस रिपोर्ट में कहा गया कि आधार को और योजनाओं में लाने से 11 अरब डॉलर की बचत होने की संभावना है. जब मैंने इस अनुमान की परख ले लिए पेपर को खोजा तो पाया कि उसमें केवल इतना ही लिखा है कि भारत सरकार का नकद हस्तांतरण योजनयों पर बजट 11 अरब डॉलर है. विश्व बैंक ने ‘बचत’ की नई परिभाषा दी है, जिसमें सारे बजट ही ख़त्म कर देने को ‘बचत’ कहा गया है.
अब सीएजी की रिपोर्ट आई है, जिसमें उन्होंने कहा है कि एलपीजी-डीबीटी की वजह से केवल 2000 करोड़ रुपये बचे हैं न कि 12,000 करोड़ रुपये और बचत कीमतों की गिरावट से हुई है. जबकि सरकार ने इस रिपोर्ट को नकार दिया है.
आधार और सामाजिक सुरक्षा को छोड़ दें, तो भी इससे हम सब का सरोकार है. सरकारें प्रोपगेंडा का इस्तेमाल हमेशा से करती आ रही हैं, इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है. लेकिन सूचना के सब स्रोत अगर सरकारी प्रोपगेंडा ही फैलाने लगे, तो इससे सभी को नुक़सान है. सरकार को, लोगों को और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को.
साभार
बीबीसी हिंदी डॉट कॉम

7/18/2016

भूमि अधिग्रहण पर आखिरकार घुटने टेकने ही वाली है मोदी सरकार!

आज से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में केंद्र सरकार भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक को वापस लेने पर विचार कर रही है. यह वही विधेयक है जिसे कानून की शक्ल देने के लिए मोदी सरकार पिछले लगभग डेढ़ साल से साम-दाम-दंड-भेद सब करती रही है. वह दो बार इस विधेयक को संसद में पेश कर चुकी है, तीन बार इससे संबंधित अध्यादेश लागू कर चुकी है, कई बार उस संयुक्त समिति को एक्सटेंशन दे चुकी है जो इसकी समीक्षा के लिए बनाई गई थी और तमाम विरोध के बावजूद इसे लोकसभा से पारित भी करा चुकी है. इतना सब करने और इस विधेयक को अपनी नाक का सवाल बना लेने के बाद आखिर मोदी सरकार इसे वापस क्यों ले रही है? इस सवाल का जवाब तलाशने से पहले भूमि अधिग्रहण के उन पहलुओं को समझते हैं जिनके चलते सरकार को यह विधेयक लाने की जरूरत पड़ी थी.

2013 तक देश में जमीनों का अधिग्रहण ‘भूमि अधिकरण अधिनियम, 1894’ के तहत होता था. पिछली यूपीए सरकार ने अपने कार्यकाल के अंतिम दौर में इस 110 साल पुराने कानून को बदला और इसकी जगह ‘भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार, पुनर्वास और पुनर्स्‍थापन अधिनियम, 2013’ लागू किया गया. संक्षेप में इसे ‘भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013’ भी कहा जाता है. एक जनवरी 2014 से प्रभाव में आए इस कानून का तब भाजपा ने भी समर्थन किया था. लेकिन जब देश की सत्ता की कमान भाजपा के हाथों में गई तो उसने इस कानून में संशोधन का मन बना लिया. जानकारों की मानें तो ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि 2013 के कानून के बाद भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया बेहद जटिल हो गई थी. नया कानून किसानों के हित में तो था लेकिन इसके तहत सरकार के लिए विकास कार्यों को अंजाम देना बेहद मुश्किल हो गया था. विशेष तौर से मोदी सरकार की ‘स्मार्ट सिटी’ जैसी परियोजनाओं के लिए यह कानून एक बड़ी बाधा बन गया था. लिहाजा उसने इस कानून में संशोधन का मन बनाया.

भाजपा के कई सहयोगी दल भी इस मुद्दे पर प्रमुखता से उसके विरोध में उतर आए. शिवसेना ने तो इस मुद्दे पर भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और शिवसैनिकों को निर्देश दिए कि वे किसानों को भूमि अधिग्रहण के कुप्रभाव बताएं

सत्ता में आने के कुछ महीनों बाद ही दिसंबर 2014 में मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण से संबंधित एक अध्यादेश जारी कर दिया. इस अध्यादेश को समर्थन देने और 2013 के कानून को संशोधित करने के लिए ‘भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार, पुनर्वास और पुनर्स्‍थापन (संशोधन) विधेयक, 2015’ लाया गया. मोदी सरकार के इस फैसले का जमकर विरोध हुआ. विपक्ष ही नहीं बल्कि भाजपा के कई सहयोगी दल भी इस मुद्दे पर प्रमुखता से उसके विरोध में उतर आए. शिवसेना ने तो इस मुद्दे पर भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और शिवसैनिकों को निर्देश दिए कि वे किसानों को भूमि अधिग्रहण के कुप्रभाव बताएं. इसके अलावा अकाली दल और लोजपा ने भी इस विधेयक के कई प्रावधानों के खिलाफ सार्वजनिक तौर से नाराजगी जताई.

मोदी सरकार द्वारा लाए गए इस विधेयक का इतना व्यापक विरोध इसलिए हुआ क्योंकि इससे जो बदलाव 2013 के कानून में होने वाले थे, उन्हें पूरी तरह से किसान विरोधी माना जा रहा था. उदाहरण के लिए, इस विधेयक में भूमि उपयोग के आधार पर पांच विशेष श्रेणियां बनाई गईं और इन श्रेणियों को भूमि अधिग्रहण अधिनियम के कई प्रावधानों के दायरे से बाहर कर दिया गया. 2013 के कानून में यह भी प्रावधान था कि कोई भी जमीन सिर्फ तभी अधिग्रहीत की जा सकती है जब कम-से-कम 70 प्रतिशत जमीन मालिक इसके लिए अनुमति दें. इस प्रावधान को किसानों के लिए सबसे हितकारी माना जाता है. लेकिन संशोधन विधेयक में इस प्रावधान को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया था. साथ ही भूमि अधिग्रहण से प्रभावित होने वाले परिवारों और उन पर पड़ने वाले सामाजिक-आर्थिक प्रभावों के मूल्यांकन का जो प्रावधान 2013 के कानून में था, उसे भी इस विधेयक में हटाया जा चुका था. 2013 के कानून में यह भी प्रावधान है कि यदि अधिग्रहण के पांच साल के भीतर ज़मीन पर वह कार्य शुरू नहीं किया जाता जिसके लिए वह अधिग्रहीत की गई थी, तो वह ज़मीन उसके मूल मालिकों को वापस कर दी जाएगी. इस प्रावधान को कुंद करने के उपाय भी संशोधन विधेयक में किये गए थे.

मोदी सरकार पर इस संशोधन विधेयक के चलते यह भी आरोप लग रहे थे कि वह इसके जरिये दोषी अधिकारियों को बचाने की कोशिश कर रही है. दरअसल 2013 के कानून में प्रावधान है कि यदि भूमि अधिग्रहण के दौरान सरकार कोई बेमानी या अपराध करती है तो संबंधित विभाग के अध्यक्ष को इसका दोषी माना जाएगा. लेकिन संशोधन विधेयक में इस प्रावधान को बदलकर यह व्यवस्था बनाई गई कि अपराध के आरोपित किसी सरकारी अधिकारी पर सरकार की अनुमति के बिना कोई मुकदमा दायर नहीं किया जा सकेगा. इन्हीं तमाम विवादास्पद पहलुओं के चलते मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण पर चौतरफा घिरने लगी थी. जनता के बीच यह संदेश बेहद मजबूती से जा चुका था कि भूमि अधिग्रहण में जो संशोधन मोदी सरकार करना चाहती है वे पूरी तरह से किसान-विरोधी और कॉरपोरेट के हित साधने वाले हैं.

मोदी सरकार के इन प्रयासों और अध्यादेशों का यह सिलसिला आखिरकार तब थमा जब बिहार विधान सभा चुनाव सर पर आ गए. भाजपा जानती थी कि इस प्रदेश में ‘किसान-विरोधी’ होने की पहचान उसके लिए घातक हो सकती है

भूमि अधिग्रहण विधेयक के चलते मोदी सरकार की छवि लगातार खराब हो रही थी लेकिन फिर भी सरकार पीछे हटने को तैयार नहीं थी. जानकारों की मानें तो इसके दो मुख्य कारण थे. पहला तो यह कि यदि अपने कार्यकाल के पहले ही साल में मोदी सरकार अपने फैसले से पीछे हट जाती तो उसकी ‘मजबूर नेता और दृढ नेतृत्व’ की छवि को बड़ा झटका लग सकता था. दूसरा कारण यह था कि 2013 के क़ानून में संशोधन किये बिना किसानों से जमीन लेना बेहद मुश्किल था. लिहाजा स्मार्ट सिटी बसाने से लेकर मेक इन इंडिया तक की रफ़्तार धीमी होती दिख रही थी. इसलिए मोदी सरकार ने इस विधेयक को कानून का रूप देने के लिए कभी विरोधियों को मनाने की कोशिशें की तो कभी संसद में इसका जमकर बचाव किया, कभी सीधे किसानों को अपने पक्ष में करने के प्रयत्न किये तो कभी एक के बाद एक अध्यादेश लाकर भूमि अधिग्रहण को अपने अनुकूल बनाया चाहा. मोदी सरकार के इन प्रयासों और अध्यादेशों का यह सिलसिला आखिरकार तब थमा जब बिहार विधान सभा चुनाव सर पर आ गए. भाजपा जानती थी कि इस प्रदेश में ‘किसान-विरोधी’ होने की पहचान उसके लिए घातक हो सकती है.

बिहार चुनावों से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम के जरिये लोगों को बताया कि भूमि अधिग्रहण पर अब उनकी सरकार चौथा अध्यादेश नहीं लाएगी. जानकार मानते हैं कि बिहार के मतदाताओं और मुख्यतः किसानों को लुभाने के लिए मोदी सरकार ने जब यह कदम उठाया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. इसीलिए अब भाजपा उत्तर प्रदेश में वही गलती नहीं दोहराना चाहती. सूत्रों की मानें तो आने वाले संसद सत्र में भूमि अधिग्रहण विधेयक वापस लेना का जो फैसला मोदी सरकार ने किया है, वह इसी गलती को सुधरने की दिशा में उठाया गया कदम है. उत्तर प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्य में भाजपा विपक्ष को ऐसा कोई मौक़ा नहीं देना चाहती जिससे वे उस पर किसान विरोधी होने का आरोप लगा सकें.

भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक फिलहाल राज्यसभा में लंबित है. इस पर संसद की उस संयुक्त समिति की रिपोर्ट आना भी बाकी है जिसे इसकी समीक्षा के लिए बना गया था. इस 30 सदस्यीय समिति के अध्यक्ष एसएस अहलुवालिया अब केन्द्रीय मंत्री हैं लिहाजा उनकी जगह किसी और को इस समिति का अध्यक्ष बनाया जाना है जिसके बाद ही समिति अपनी रिपोर्ट सौंप सकेगी. चर्चा है कि यह समिति इस विधेयक के अधिकांश बिन्दुओं पर अपनी रिपोर्ट तैयार कर चुकी है और यह मोदी सरकार के अनुकूल नहीं होने जा रही है. लिहाजा मोदी सरकार के पास इस विधेयक पर अड़े रहने के लगभग सभी कारण समाप्त होते दिख रहे हैं.

राज्यसभा में बहुमत न होने के चलते भाजपा के लिए वैसे भी यह असंभव ही था कि वह इस विधेयक को कानून की शक्ल दे सके. हालांकि संयुक्त सत्र बुलाने का एक अंतिम विकल्प भाजपा के पास जरूर था जो इस विधेयक को कानून में बदल सकता था. लेकिन देश के सबसे बड़े राज्य में चुनावों के लिए जाने से ठीक पहले ऐसा कोई कदम उठाना भाजपा के लिए निश्चित ही आत्मघाती साबित होता. इसलिए भाजपा स्वयं ही इस विधेयक को वापस लेकर ‘डैमेज कंट्रोल’ कर लेना चाहती है.

7/17/2016

सुकन्या समृद्धि योजना,कन्याओं का बेहतर भविष्य

जनवरी में प्रधानमंत्री मोदी ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ कैंपेन के तहत सुकन्या समृद्धि योजना की शुरुआत की थी। पिछले बजट में वित्त मंत्री ने घोषणा की कि इस योजना पर मिलने वाला ब्याज टैक्स फ्री होगा। बेटी की हायर एजुकेशन और शादी के लिए पैसा जमा करने के लिए हालांकि पीपीएफ और आरडी जैसे तरीके भी हैं, लेकिन यह योजना उन पर भारी पड़ती है। आज हम आपको इस सुकन्या समृद्धि योजना के बारे में बता रहे हैं जिससे कि आप आसानी से इस योजना का फायदा उठा सकें और अपनी बिटिया का सुनहरा भविष्य सुनिश्चित कर सकें।
क्या है योजना?पीएम नरेंद्र मोदी ने सुकन्या समृद्धि योजना की शुरूआत 4 दिसंबर, 2014 को थी। यह एक लॉन्ग-टर्म डेट स्कीम है, जिसमें कोई भी शख्स बेटी के जन्म से लेकर उसके 10 साल की हो जाने तक कभी भी अकाउंट खुलवा सकता है। यह अकाउंट बैंक या पोस्ट ऑफिस में खुलवाया जा सकता है। यह अकाउंट बच्ची के 21 साल की होने तक जारी रहेगा।
बेटी की पढ़ाई व शादी की टेंशन होगी दूरखाता खुलवाने के समय 1000 रुपए की जरूरत होगी। जो कैश, चैक, और ड्राफ्ट में जमा हो सकते हैं। यह योजना बालिका के जन्म से लेकर शादी करने तक परिजनों को आर्थिक मजबूती प्रदान करती है। यह योजना घटते लिंगानुपात के बीच कन्या जन्म दर को प्रोत्साहन देने में मदद करेगी। मां-पिता की बेटी की पढ़ाई व शादी के लिए पैसे की टेंशन दूर करने में मदद करेगी।
इन चीजों की होगी जरूरतखाते के लिए लड़की का जन्म प्रमाणपत्र, अभिभावक का पहचान प्रमाण पत्र और निवास प्रमाण-पत्र की आवश्यकता होगी। यह खाता पोस्ट ऑफिस और केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत किसी भी बैंक ( भारतीय स्टेट बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, पंजाब नेशनल बैंक, बैंक ऑफ इंडिया, केनरा बैंक, आंध्रा बैंक, यूसीओ बैंक और इलाहाबाद बैंक) में खोला जा सकेगा।
देनी होगी इतनी रकममाता-पिता दोनों, या फिर दोनों में से एक अथवा दोनों के न होने की स्थिति में कानूनी अभिभावक पैसा जमा कर सकते हैं। कम से कम 1 हजार रुपए से अकाउंट खुलवाया जा सकता है। साल में 1 हजार रुपए और अधिकतम डेढ़ लाख रुपए जमा कराए जा सकते हैं। किसी साल मिनिमम जमा नहीं करा पाते हैं तो अगले साल पिछले साल की ड्यू रकम के अलावा 50 रुपए पेनल्टी देनी होगी। खाता खोलने से 14 साल तक इस स्कीम में पैसा जमा कराना होगा। 14 साल पूरे होने से पहले ही बच्ची 21 साल की हो जाती है तो भी खाता बच्ची के 21 साल की होने पर ही बंद हो जाएगा। अकाउंट में 1 हजार से डेढ़ लाख के बीच कितनी भी रकम साल में जमा करा सकते हैं।
इतने पैसे मिलेंगे वापसजब बच्ची 21 साल की हो जाएगी तो यह योजना मैच्योर होगी। उस वक्त उसे पैसा मिलेगा। हां, बच्ची की हायर एजुकेशन और शादी के लिए समय से पहले भी पैसा निकाला जा सकता है। बच्ची की उम्र 18 साल होने के बाद 50 फीसदी पैसा निकाल सकते हैं। मान लीजिए 2015 में कोई शख्स 1000 रुपए महीने से अकाउंट खोलता है यानी हर साल 12 हजार रुपए अकाउंट में डालता है। उसे 14 साल तक यानी 2028 तक हर साल 12 हजार रुपए डालने होंगे। अगर यह माना जाए कि उसे हर साल 9.1 फीसदी की दर से ब्याज मिलता रहेगा तो जब बच्ची 21 साल की होगी तो उसे मिलेंगे 6,07,128 रुपए। यहां आपको बता दें कि इस शख्स के द्वारा 14 साल में जमा किया गया कुल मूलधन 1,68,000 रुपए ही है। इसके अलावा बाकी की रकम ब्याज की है। जाहिर है, इससे ज्यादा रकम हर साल जमा करने वाले लोगों को इसी अनुपात में मैच्योरिटी का अमाउंट बढ़कर मिलेगा।
टैक्स में मिलेगी छूटइस योजना में किए गए इन्वेस्टमेंट को 80 सी में शामिल किया जाएगा। ऐसा फाइनेंशियल इयर 2015-16 से होगा। 80 सी में छूट की अधिकतम सीमा डेढ़ लाख है। खास बात यह है कि मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम पर भी कोई इनकम टैक्स नहीं देना होगा। फाइनेंशियल इयर 2014-15 के लिए इस पर 9.1 फीसदी की सालाना दर से ब्याज मिलेगा। ब्याज की दर हर साल के लिए अलग से घोषित की जाएगी।
इतनी बच्चियों का खुल सकता है खाताएक बच्ची के नाम पर एक ही खाता खुल सकेगा। और एक परिवार की अधिकतम दो बच्चियों के नाम पर ये खाता खुल सकेगा। लेकिन, यदि एक बार में तीन बच्चियां जन्म लें, या फिर एक बच्ची पहले से हो और फिर जुड़वां बच्चियां हों, इस सूरत में तीनों बच्चियों के नाम एक-एक खाता खुलवाया जा सकेगा। इस योजना को खाता खुलने के 21 साल बाद ही बंद किया जा सकेगा। अगर 21 साल होने से पहले बच्ची की शादी हो जाए तो खाते को पहले ही बंद करवाना पड़ेगा। शादी न होने की सूरत में खाते को 21 साल के बाद भी जारी रखा जा सकेगा।
दूसरी जगह भी शिफ्ट हो सकता है खाताकन्या की मृत्यु हो होने कि स्थिति में, डेथ सर्टिफिकेट जमा करने के बाद ही ये खाता बंद किया जाएगा। इस सूरत में खाते का बैंलेंस के साथ ब्याज का भुगतान परिजनों को किया जाएगा। कन्या एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट होने की सूरत में खाते को दूसरी जगह स्थानांतरित करना भी संभव होगा। जब कन्या की उम्र 18 साल की हो जाएगी। तो जमा राशि का 50 फीसदी राशि शादी या शिक्षा के लिए निकाला जा सकेगा।

7/16/2016

हमारी दुनिया: सक्षम ने सालभर में 50 किलो वज़न घटाया, जानिये कैसे हुआ ये चमत्कार

हमारी दुनिया: सक्षम ने सालभर में 50 किलो वज़न घटाया, जानिये कैसे हुआ ये चमत्कार

सक्षम ने सालभर में 50 किलो वज़न घटाया, जानिये कैसे हुआ ये चमत्कार

सक्षम कुमार, अंबाला का स्टूडेंट है और वह दूसरे स्टूडेंट के तरह ही कॉलेज जाता है, दोस्तों के साथ मस्ती करता है। लेकिन एक साल पहले घर जाकर मैंने देखा कि उसने खुद को बिल्कुल बदल दिया है। पहले उसका वज़न 115 किलो था और तब उसका वज़न 57 किलो था। अब उसका मिशन है मसल्स बनाने का। उससे बातचीत के दौरान उसने अपने वज़न घटाने की पूरी कहानी बताई।

तुम्हारा वज़न कैसे इतना बढ़ गया? तुम क्या हमेशा से ही ऐसे थे?

मैं बचपन से ही थोड़ा गोलू-गोलू जैसा था लेकिन दसवीं पास करने के बाद मेरा वज़न बढ़ने लगा। 17 से 19 साल के बीच मैंने इस तरफ उतना ध्यान नहीं दिया। मेरा पूरा ध्यान पढ़ाई पर रहने के कारण ट्यूशन ,स्टडी को लेकर ही व्यस्त रहता है। जंक फूड्स बहुत खाता था और कोई फिज़िकल एक्टिवीटी नहीं था। घर पर रहने के बावजूद घर का खाना न के बराबर खाता था। देर रात पढ़ने की आदत होने के कारण चिप्स, बिस्किट, कोल्ड ड्रिंक ज्यादा लेता था। और फिर वज़न बढ़कर 115 किलो हो गया।

कब तुम्हें महसूस हुआ कि वेट लॉस करना है?

जब मैं कॉलेज जाने लगा तब मुझे अपने लुक का ध्यान आया। सब कोई फिट और स्लिम हैं और मैं थुलथुला मोटा। मैंने सोचा अगर मैं ऐसा ही मोटा रहा तो किसी भी खेल में भाग नहीं ले पाऊंगा। इसलिए 19 साल के उम्र में मैंने वज़न घटाने का निर्णय ले लिया। इस काम में मेरे एक स्कुल के दोस्त ने मुझे प्रेरणा दी। वह भी मोटा था, और किसी हेल्थ प्रॉबल्म के कारण उसको वज़न घटाना पड़ा। उसने मुझे बताया कि क्या करना चाहिए। उसने सबसे अच्छे जिम को ज्वाइन करने की सलाह दी और मैंने वही जिम ज्वाइन किया।

तुम्हारा वर्कआउट रूटीन क्या था?

मेरे पास खुद का कोई पर्सनल ट्रेनर नहीं था। मैंने इंटरनेट पर सर्च किया और वर्कआउट रूटीन और वेट लॉस डायट प्लान बनाया। मैंने वर्कआउट करना शुरू किया, विशेषकर कार्डियो एक्सरसाइज़। मैं ज्यादा वेट ट्रेनिंग नहीं करता था।
मैं 1.5 घंटे जिम में रहता था और 40 मिनट तक ट्रेडमिल, इलेप्टिकल ट्रेनर करता था फिर रन, स्किप, जंप, साइकिल आदि करता था। मेरा एक ही गोल होता था वह है ज्यादा से ज्यादा कैलोरी बर्न करना।

क्या जिम जाने के लिए तुम कॉलेज बंक करते थे?

नहीं मैं शाम को 7.30 बजे जिम जाता था। जिम जाने के पहले ब्राउन ब्रेड पिनट बटर के साथ खाता था और वर्कआउट करने के बाद सोयाबीन या उबला दाल रात खाता था।

तुम कैसा डायट फॉलो करते थे?

मैं दिन की शुरूआत नींबू पानी से करता था, फिर एक मुट्ठी नट्स खाता था। कॉलेज जाने से पहले हाइ फाइबर और डाइजेस्टिव बिस्किट खाता था। लंच और डिनर में चना, दाल सूप, सोयाबीन आदि खाता था। कॉलेज से आने के बाद फल खाता था। शाकाहारी होने के कारण मीट नहीं खाता था। एक साल तक मैंने रोटी और चावल नहीं खाया।

तुमने कोई प्रोटीन सप्लीमेंट लिया था?

नहीं, मेरे पिता ने इसका परमिशन नहीं दिया। उनका पहला शर्त था कि मुझे नैचुरल तरीके से वज़न घटाना है, सप्लीमेंट का सहारा लिये बिना।

तुम अपने क्रेविंग को कैसे कंट्रोल करते थे?

मुझे कुछ हंगर पैंग्स नहीं होता था लेकिन जब मुझे भुख लगती थी तब मैं सलाद, स्टीम्ड ढोकला, ग्रीट टी आदि लेता था। मैंने घर का खाना खाना शुरू किया।

इस काम में क्या तुम्हारे घर के लोग तुम्हारी सहायता कर रहे थे?

हमारे यहाँ बहुत त्योहार मानाया जाता है और त्योहार में मिठाई तो लाज़मी होते हैं। लेकिन मैंने अपने घरवालों को कह दिया था कि मैं अपने डायट प्लान पर ही स्टिक रहूंगा। यहां तक के मेरे रिश्तेदार भी मुझे मिठाई नहीं देते थे।
यहां तक कि मेरे इस सफलता में सबने मेरा पूरा साथ दिया था। जिम के मेम्बरशिप का फी भी उन्होंने ही दिया था। पढ़े-  कैसे 115 किलो वज़न वाले रोहण ने अपना वज़न घटाया?

क्या तुमने कॉलेज पार्टी एटैन्ड नहीं किया? वहाँ तुम क्या खाते थे?

कॉलेज पार्टी में मैं कुछ खाता नहीं था। बाहर जाने पर मैं सलाद आदि ही ऑडर करता था। मैंने बाहर जंक फूड्स, कोल्ड ड्रिंक जैसे हाइ कैलोरी फूड्स न खाने का खुद से वादा किया था।

वेट लॉस करने के बाद तुम्हें कैसा महसूस हो रहा है?

पहले के चार महीनों में मैंने चार किलो वज़न घटाया था। वज़न घटते देखकर मुझे खुशी का एहसास हुआ और मैं और मेहनत करने लगा। लेकिन इस ओर भी मुझे इस बात पर ध्यान रखना था कि मेरा वज़न घटाने का एक्शन सही समय पर रोकना है।

तुम्हें कभी भी इस डायट प्लैन को गीभ अप करने का मन नहीं किया था?

कॉलेज में दोस्तों को खाते देख कर मन तो करता था मगर खुद के निर्णय को याद करके कंट्रोल कर लेता था। मैं फिर से वज़न बढ़ाना नहीं चाहता था।

तुम्हारा वज़न घटने पर लोगों की क्या प्रतिक्रिया थी?

पहले तो लोगों को विश्वास ही नहीं हुआ कि मैंने सिर्फ अपने प्रयास से ही इतना वज़न घटाया है। उन्हें लगा कि मैंने कोई सर्जरी किया है लेकिन मैंने उन्हें बताया कि कैसे जिमिंग और डाइटिंग के मदद से वेट लॉस किया।

वेट लॉस करने के बाद तुम्हारे लाइफ में क्या बदलाव आया?

मुझ में पहले से ज्यादा आत्मविश्वास आ गया है। मैं लोगों से पूरे आत्मविश्वास से बात करता हूं कि बिना यह सोचे कि वे क्या सोचेंगे। मैं अब खेल सकता हूं और पहले से ज्यादा एक्टिव हूं।

जो लोग वज़न घटाते हैं उन्हें स्ट्रेच मार्क्स या सैगी स्किन की समस्या होती है। तुम्हें हुआ क्या?

हाँ, वज़न घटने के बाद स्किन में ढीलापन आ गया और पूरे बॉडी में स्ट्रेच मार्क्स आ गए। स्किन को टाइट करने के लिए वेट ट्रेनिंग करने लगा। मैं नारियल का तेल और बाजार से स्ट्रेच मार्क्स के क्रीम का इस्तेमाल करने लगा।

आज तुम्हारा वज़न कितना है?

एक साल तक डायटिंग और वर्कआउट करने के बाद आज मेरा वज़न 57 किलो है।

क्या ये वज़न तुम्हारे हाइट और एज से कम है?

हाँ, मेरा हाइट 5 फिट 7 इंच है और मेरा इस ओर भी ध्यान है। मैं वेट ट्रेनिंग के मदद से जिम में मसल मास को थोड़ा बढ़ा रहा हूं। मेरा फिटनेस प्रोग्राम थोड़ा बदल गया- वेट लॉस से वेट गेन की ओर। मैं अपना वज़न 66 किलो करना चाहता हूं।

तो तुम्हारा नया वर्कआउट रूटीन क्या है?

मैं स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, वार्म अप और कुल डाउन करने के लिए कार्डियो करता हूं। मैं अलग-अलग बॉडी पार्टस पर काम करती हूं, जैसे- चेस्ट, बैक और बाइसेप, लेग्स, ट्राइसेप्स और थ्री सेट्स ऑफ 15 रेप्स करता हूं। सुबह-शाम वाक करने के सिवा क्रिकेट खेलता हूं।

क्या फिर तुमने डायट में भी बदलाव किया?

मैंने रोटी और ब्राउन राइस खाना शुरू किया है। वेट ट्रेन के बाद ज्यादा खाता हूं क्योंकि तब शरीर ज्यादा कैलोरी बर्न करता है। मैं अब भी जंक फूड्स नहीं खाता हूं और आहार विशेषज्ञ से भी सलाह लेता हूं।

क्या तुम वेट लॉस करने के लिए किसी को प्रेरणा देना चाहते हो?

वज़न घटाने के बाद मेरे बहुत दोस्त और रिश्तेदार मुझसे पुछने आये कि मैंने वज़न घटाने के लिए क्या किया? मुझे बस एक ही बात कहना है कि खुद को वेट लॉस करने के लिए प्रेरित करे और अपने निर्णय पर अडिग रहे।

जो लोग वज़ घटाना चाहते हैं उन्हे कुछ टिप्स देना चाहोगे?

खुद पर विश्वास रखो। ग्रीन टी पियो, शुगर और हाई कैलोरी डायट से दूर रहो, नट्स खाओ। सही डायट और एक्सरसाइज़ से वज़न घटाया जा सकता है।

साभार
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नोट: TheHealthSite साक्षात्कार व्यक्ति के विचार और राय का समर्थन नहीं करता। यह उनकी फिटनेस यात्रा शुरू करने के लिए लोगों को प्रेरित करने में मदद करने के लिए एक प्रेरणादायक जानकारी  है।

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