11/21/2016

2000 रुपए के नोट जारी करना पीएम मोदी का गैरकानूनी कदम : शर्मा

2000 रुपए के नोट जारी करना पीएम मोदी का गैरकानूनी कदम : शर्मा

कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर 2000 रुपए के नोट जारी करते समय कानून का पालन नहीं करने का सोमवार को आरोप लगाया और इस मामले को संसद के भीतर एवं बाहर उठाने का संकल्प लिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा ने दावा किया कि प्रधानमंत्री ने देश को वित्तीय अराजकता की स्थिति में डाल दिया है।

शर्मा ने कहा कि सरकार को नोटबंदी मामले में जेपीसी से जांच कराना चाहिए। इससे पता चल जाएगा कि नोटबंदी के बारे में और किन लोगों को जानकारी थी। 

उन्होंने कहा कि 2000 रुपए के नोटों को लाना एक अवैध कृत्य है क्योंकि नए नोट छापने के लिए आरबीआई अधिनियम के तहत जो अधिसूचना जारी करना आवश्यक होता है, वह जारी नहीं की गई और कानून के तहत अनिवार्य बात को नजरअंदाज किया गया। शर्मा ने नोट बदलवाने वालों की उंगलियों पर अमिट स्याही लगाए जाने के सरकार के कदम की भी आलोचना की। कांग्रेस ने कहा कि एकजुट विपक्ष इस मामले को जन आंदोलन का विषय बनाने के अलावा संसद में जोरदार तरीके से उठाएगा।

राज्यसभा में कांग्रेस के उपनेता ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री जानबूझकर अहम मामलों से ध्यान हटाने की कोशिश कर रहे हैं और राष्‍ट्रवाद की आड़ में कालेधन के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले का ढाेंग करके गरीब लोगों को मूर्ख बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री और इस कदम को सही बताते हुए उनके तर्कों का समर्थन कर रहे लोग संविधान और कानून के मामले में अनपढ़ हैं। शर्मा ने कहा, देश को वित्तीय अराजकता की स्थिति में डालने के लिए पूरी तरह से प्रधानमंत्री जिम्मेदार हैं। संविधान के अनुच्छेद 360 के प्रावधानों को लागू किए बिना ही देश में अघोषित वित्तीय आपातकाल लग गया है।

उन्होंने कहा, नोटों का चलन बंद करने के संबंध में प्रधानमंत्री ने आठ नवंबर को जो सनसनीखेज और नाटकीय घोषणा की थी उसका कोई कानूनी आधार नहीं है क्योंकि मौद्रिक नीति भारतीय रिजर्व बैंक का क्षेत्राधिकार है।शर्मा ने कहा कि 2000 रुपए के नोट जारी करना एक अवैध कदम है क्योंकि आरबीआई अधिनियम के तहत कोई अधिसूचना जारी नहीं की गई थी और कोई नया नोट लाने से पहले इस प्रकार की अधिसूचना जारी करना अनिवार्य है। उन्होंने कहा, 2000 रुपए के इन अवैध नए नोटों का चलन काले धन के प्रसार को नियंत्रित करने के सरकार के कदम के विपरीत है।

कांग्रेस नेता ने प्रधानमंत्री पर कई बार कानून एवं संविधान का उल्लंघन करने और भ्रामक बयान देने का आरोप लगाया। शर्मा ने नोट बदलवाने वाले आम लोगों की उंगलियों पर स्याही लगाने के सरकार के कदम पर तीखा प्रहार करते हुए कहा, तानाशाहों ने भी वह काम नहीं किया जो इस सरकार ने किया है। उन्होंने कहा, केवल नाजी लोगों पर निशान लगाते थे। धन निकालने के कारण हमारे नागरिकों एवं विदेशी मेहमानों पर निशान लगाए जा रहे हैं। यह चिंता एवं शर्म की बात है। अतुल्य भारत रात भर में अमिट स्याही वाले भारत में बदल गया। शर्मा ने कहा कि 500 एवं 1000 रुपए के पुराने नोटों की जगह लेने वाले नए नोट अभी तैयार नहीं है और इस कमी के कारण लोगों को असुविधा हो रही है। उन्होंने कहा, इससे लोगों, खासकर गरीबों, किसानों और असंगिठत क्षेत्र एवं खेतों में मजदूरी करने वाले कुल 33 करोड़ भारतीय कार्यबल को बहुत परेशानी हो रही है। शर्मा ने प्रधानमंत्री पर नियम आधारित देश वाली भारत की अंतरराष्‍ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया।

नोटों का चलन बंद करने और इसके क्रियान्वयन को लेकर सरकार को आड़े हाथों लेने के लिए संसद में बड़े राजनीतिक दल पहले ही साथ आ चुके हैं। शर्मा ने कहा कि न तो प्रधानमंत्री और न ही वित्त मंत्री के पास इस बात की कोई कानूनी मंजूरी या अधिकार है कि वे लोगों की उनके अपने ही बैंक खातों तक पहुंच रोक सकें और परिवारों, नागरिकों एवं वेतनभोगी कर्मियों के बचत खातों से धन निकालने को लेकर सीमा लागू कर सके।

उन्होंने कहा, विपक्षी न्यायोचित काम कर रहे हैं और सरकार के कदम की कुछ लोगों को पहले से जानकारी होने के मामले में जेपीसी जांच संबंधी अपनी मांग को लेकर दृढ़ हैं। यह सूचना लीक होना गोपनीयता का उल्लंघन है और इससे काला धन रखने वालों को प्रत्यक्ष मदद मिली, इससे विदेशों में धनशोधन और सोना-चांदी, स्टाॅक, बाॅन्ड एवं सिक्योरिटी के जरिए निवेश परिवर्तित करने में सहायता मिली। शर्मा ने कहा, हम इसे एक तर्कसंगत निष्कर्ष तक पहुंचाने और इस सरकार के कदमों एवं इरादों पर से पर्दाफाश करने को लेकर दृढ है। पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि नोटों का चलन बंद करने के कदम से बड़े स्तर पर रोजगार प्रभावित हुआ है। उन्होंने कहा, यह लोगों का धन है और आप उन्हें अपना ही धन प्राप्त करने के लिए भीख मंगवा रहे है। यह किसी भी देश में कभी नहीं हुआ।

11/20/2016

ये कैसी तैयारी, नए नोट आधे छपे हुए निकल रहे हैं एटीएम से


नोट बंदी को लेकर खूब वावेला मचा हुआ है. कुछ सही ठहरा रहे हैं तो कुछ उससे होने वाली परेशानियों को गिनकर उसको आनन फानन में लिया गया फैसला साबित करने के लिए सबूत जुटा रहे हैं. आनन फानन वाली बात को साबित करने के लिए खूब तस्वीरें वायरल हो रही हैं. पहले आया कि 2 हजार के नोट पर स्पेलिंग मिस्टेक हैं. अब सोशल मीडिया पर कहा जा रहा है कि जो 500 और दो हजार के नोट सरकार ने जारी किए हैं, वो आधे छपे हुए हैं और एटीएम से मिस प्रिंट वाले नोट लोगों को मिल रहे हैं. और ये खबर जहां मुंबई से, वहीं नागालैंड से भी वायरल हो रही है. सच क्या है इस बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है.

ये भी कहा जा रहा है कि लोगों की मुश्किल पहले ही बढ़ रही हैं, क्योंकि घंटों बैंक की कतार में लगने के बाद अब सिर्फ दो हजार रुपये ही मिल पा रहे हैं. जबकि पहले ये रकम 4 हजार रुपये थी. अब लोगों के लिए ये आधे छपे नोट सर दर्द बन गए हैं. लोग एटीएम की कतार में इस खबर की वजह से नहीं लग पा रहे हैं कि कहीं आधे छपे नोट न निकल आएं और फिर उन्हें चलाने में दिक्कत आए.


मुग़ल साम्राज्य के पतन के बाद उसके वंशज गलियों में भीख मांगते थे

ये आर्टिकल मूलत: राना सफवी ने डेली-ओ के लिए लिखा है, जिसका हिंदी तर्जुमा आपके लिए पेश है.

हम हर साल आजादी की पहली लड़ाई लड़ने वालों के बारे में पढ़ते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं. लेकिन, उनके बारे में सोचिए जो मौत से बद्तर जिंदगी जी रहे थे.

अहमद अली ने अपनी किताब ‘Twilight in Delhi’ में 1911 के दिल्ली दरबार के बारे में लिखा है, जहां जॉर्ज पंचम का कुछ महीने पहले राज्याभिषेक हुआ था. जब जार्ज पंचम और क्वीन मेरी ने लाल-किला छोड़ा तो एक राजसी जुलूस निकला था. इसमें लगभग सारे शहजादे और सम्राट यहां आए.

जब ये काफिला आगे बढ़ रहा था, तभी एक भिखारी बहादुरशाह अपनी बेकार हो चुकी टांगों के सहारे शाहजहानाबाद की गलियों में घिसट रहा था. ये भिखारी कौन था? उसे बहादुर शाह नाम क्यों दिया गया?

बहादुर शाह जफर
उत्सुकतावश मैंने इस पर रिसर्च किया कि 14 सितम्बर, 1857 को अंग्रेजों के हाथ में सत्ता आने के बाद और मुग़ल साम्राज्य के पतन के बाद मुगलों का क्या हुआ?

अहमद अली की किताब के अलावा बचे हुए मुगलों पर अंग्रेजी की कोई किताब शायद ही उस स्तर की है, लेकिन 19वीं और 20वीं शताब्दी की उर्दू किताबें इससे भरी पड़ी हैं.

ग़ालिब ने खुद इसे दो किताबों में दर्ज किया है. किताबें हैं दास्तानबू और रोजनामचा-ए-ग़दर. ग़ालिब अंग्रेजों के आलोचक नहीं थे. उन्हें अंग्रेजों से संरक्षण और पेंशन की उम्मीद थी. उन्होंने शाहजहानाबाद के उजड़ेपन के बारे में लिखा है.

इसके अलावा इस बारे में ख्वाजा हसन निजामी की किताब ‘बेगमात के आंसू’, ज़ाहिर देहलवी की ‘दास्तान-ए-ग़दर’, मिर्ज़ा अहमद अख्तर की ‘सवानेह दिल्ली’, सैयद वज़ीर हसन देहलवी की ‘दिल्ली का आखिरी दीदार’ और ‘फुगान-ए-दिल्ली’ में ज़िक्र मिलता है. बहुत से उर्दू शायरों ने दिल्ली के सम्राटों के बारे में शोकगीत लिखे हैं.

शहज़ादे के भीख मांगने का ज़िक्र ख्वाजा हसन निजामी (1873-जुलाई 1955) की किताब ‘बेगमात के आंसू’ में मिलता है. उसका नाम मिर्ज़ा नासिर-उल मुल्क था. अंग्रेजों से बचने के बाद उसने शाहजहानाबाद में अपनी बहन के साथ एक व्यापारी के घर में नौकरी कर ली. बाद में जब अंग्रेजों की सरकार बनी, तो दोनों को पांच रूपए महीने की पेंशन मिलने लगी. तब उन्होंने नौकरी छोड़ दी. बाद में पेंशन भी बंद कर दी गई और वो क़र्ज़ में डूब गए.

कुछ सालों बाद एक पीर बाबा, जो दिखने में चंगेज़ के खानदान के लगते थे, चितली कब्र और कमर बंगाश के इलाके में दिखाई देते थे. वो ठीक से चल भी नहीं सकते थे. उनके गले में एक झोला होता था और वो आने-जाने वालों से चुपचाप मदद मांगते थे. जो लोग जानते थे कि वो कौन हैं, वो उनके झोले में कुछ सिक्के डाल देते थे.

किसी ने पूछा वो कौन हैं, तो बताया गया उनका नाम मिर्ज़ा नासिर-उल-मुल्क है और वो बहादुरशाह के पोते हैं. बहादुरशाह ज़फर की बेटी कुरैशिया बेगम का बेटा भी शाहजहानाबाद की गलियों में भीख मांग रहा था, जिसे एक समय साहिब-ए-आलम मिर्ज़ा कमर सुल्तान बहादुर कहा जाता था. वो केवल रातों में निकलता था, क्योंकि दिन में जब उसे जानने वाले उसे देखते थे, तो उसे सलाम करते थे और उन्हें इस बात से शर्म आती थी. मिर्ज़ा सुल्तान भीख मांगते हुए कहते थे, ‘या अल्लाह, मुझे इतना दो कि मैं अपने खाने के लिए सामान खरीद सकूं.’

ख्वाजा हसन निजामी
ख्वाजा हसन निज़ामी ने 1857 की घटनाओं पर बहुत सी किताबें लिखीं हैं, जो लोगों की आंखों देखी हैं. मिर्ज़ा कवैश की बेटियों के बारे में एक और दिल को छूने वाली कहानी मुझे मिली, जिन्हें बहादुर शाह ज़फर का उत्तराधिकारी घोषित किया गया था. ‘बेगमात के आंसू’ में ख्वाजा हसन निजामी ने लिखा कि ये कहानी उन्होंने खुद शहज़ादी से सुनी है.उसका नाम सुल्तान बानो था और वो मिर्ज़ा कवैश बहादुर की बेटी थीं. जब वो ख्वाजा हसन निज़ामी से मिलीं, तब वो 66 साल की थीं, लेकिन उन्हें सब कुछ अच्छे से याद था. निज़ामी ने ‘बेगमात के आंसू’ में इसे ‘शहज़ादी की बिपता’ के नाम से दर्ज किया है. वो बताती हैं:

‘हालांकि, ग़दर हुए 50 साल हो चुके हैं, लेकिन मुझे अब भी साफ़ याद है जैसे ये कल की ही बात हो. तब मैं 16 साल की थी. मैं अपने भाई मिर्ज़ा यावर शाह से दो साल छोटी थी और अपनी बहन नाज़ बानो से छह साल बड़ी थी. हमें अपने भाई यावर शाह से लगाव था. अका भाई के पास बहुत से पढ़ाने वाले थे, जो उन्हें कई विषय और कला के बारे में सिखाते थे. वो उन्हें अरबी, फ़ारसी और तीरंदाजी सिखाते थे. हम कढ़ाई, सिलाई और कई घरेलू काम सीखते थे.

हुज़ूर-ए-वाला को बच्चे पसंद थे, जो उनके साथ नाश्ता करते थे. जिल्ले-सुबहानी को मुझसे लगाव था और मुझे भी उनके साथ नाश्ता करने का मौका मिलता था. हम तब पर्दा नहीं करते थे. अजनबी लोग जनाना महल में बिना किसी हिचकिचाहट के आते थे, लेकिन मैं शर्मीली थी और जब भी किसी अजनबी के सामने आती थी, अपना चेहरा छिपा लेती थी. लेकिन, हमें हुजूर के आदेशों को मानना पड़ता था. हमारे बहुत से चचेरे भाई भी वहां आते थे. सम्राट की मौजूदगी में सबकी नज़रें नीची रहती थीं. कोई भी ऊपर नहीं देखता था और न ही तेज बोलता था.

रिवाज़ के मुताबिक़, हुज़ूर-ए-मौला कुछ बच्चों को पकवान में से कुछ निवाले अपने हाथों से खिलाते थे. चाहे जवान हो या बूढ़ा, उसे झुककर तीन बार सलाम करना पड़ता था.

एक दिन मुझे बुलाया गया और हुज़ूर ने एक ख़ास ईरानी पकवान से एक निवाला खिलाया. उन्होंने कहा,”सुल्ताना, तुम सिर्फ अपने खाने पर ध्यान दो. लिहाज़ करना अच्छा है, लेकिन इतना भी नहीं कि तुम दस्तरख्वान से भूखी ही उठ जाओ.”

मैंने उन्हें तीन बार सलाम किया, लेकिन मैं ही जानती हूं कि मैं कैसे वहां गई और वहां से वापस आई. मेरे पैर कांप रहे थे. आह! वो खुशनुमा दिन न जाने कहां चले गए? पता नहीं उस ज़माने को क्या हो गया?

हम अपने महलों में ऐसे ही घूमते रहते थे. जिल्ले-सुबहानी की परछाईं हमारे दिमाग में थी और हमें मलिका-ए-आलम कहा जाता था. जिंदगी के उतार चढ़ाव ऐसे ही हैं.

मुझे याद है जब हुज़ूर-ए-मौला को हुमायूं के मकबरे पर गिरफ्तार कर लिया गया था. एक गोरे ने मेरे चचाजान मिर्ज़ा अबू बकर बहादुर को गोली मार दी थी. तब मिर्ज़ा सोहराब उनके पास नंगी तलवार लेकर दौड़े. उन्हें एक दूसरे गोरे ने गोली मार दी और वो भी आह करते हुए चचाजान के शरीर के ऊपर गिर गए. मैं वहां बुत बनी खड़ी थी.
ख्वाजा सारा आया और उसने कहा, ”बेगम, आप यहां क्यों खड़ी हैं? आपके अब्बाजान आपको बुला रहे हैं.” मैं उसके पीछे चल दी.

नदी के दरवाजे के पास मेरे अब्बाजान, मिर्ज़ा कवैश बहादुर एक घोड़े पर थे. खुले सिर और परेशान. अब्बाजान का सर धूल और तिनकों से भरा था. वो चिल्लाने लगे और उन्होंने कहा, ”खुदा हाफिज सुल्ताना, मैं भी तुम लोगों को छोड़कर जा रहा हूं. मेरी जिंदगी का तारा, मेरा बेटा, उसे एक सैनिक ने मेरी आंखों के सामने मार दिया.” मैं तेजी से चीखी, ”अरे मेरे भाई यावर.”

उन्होंने मुझे और नाज़ बानो को शांत कराया और कहा, ”बेटी, अब गोरे मुझे खोज रहे हैं. मुझे नहीं पता मैं कितनी देर तक बच पाऊंगा. माशाअल्लाह आप लोगों के सामने उम्र पड़ी है. अल्लाह पर भरोसा रखो. मुझे नहीं पता हममें से किसके साथ क्या होगा. मैं तुम लोगों को छोड़ना नहीं चाहता, लेकिन एक दिन तुम लोग अनाथ हो जाओगी. नाज़ बानो अभी बच्ची है. उसका ख्याल रखना और अच्छे से रहना.”

”नाज़ बानो अब तुम शहज़ादी नहीं रही. कोई मांग मत करो. सिर्फ अल्लाह को शुक्रिया कहो और जो मिले वो खा लो. अगर कोई खा रहा है, उसकी तरफ मत देखो, वरना लोग कहेंगे ये शहजादियां लालची हैं. उन्होंने हमें ख्वाजा सारा के हवाले कर दिया और कहा,” इन्हें वहां ले जाओ, जहां हमारे परिवार के बाकी लोग हैं.”

उन्होंने हमें गले लगाया और अपना घोड़ा जंगल की तरफ दौड़ा दिया. ये आखिरी मौक़ा था, जब हमने उन्हें देखा और हमें कोई अंदाज़ा नहीं इसके बाद उनके साथ क्या हुआ. ख्वाजा सारा हमारे परिवार का पुराना नौकर था और वो हमारे साथ था. नाज़ बानो कुछ देर तक चलती रही, लेकिन जल्द ही उसके पैर थक गए. वो रोने लगी. मैं खुद कभी इतना नहीं चली थी, लेकिन किसी तरह मैं चलती रही और बानो को पकड़े रही. हम उन गलियों से गुजरे, जहां हम कभी हाथियों से चलते थे.

नाज़ बानो के पैर में एक कांटा चुभ गया और वो गिरकर रोने लगी. मैंने उसे उठाया और कांटा निकालने की कोशिश की. ख्वाजा सारा चुपचाप खड़ा देखता रहा और उसने हमसे जल्दी चलने को कहा.
नाज़ ने कहा, ”आपाजान, मैं अब और नहीं चल सकती. इससे कहो न हमारे लिए पालकी ले आए.”

मैं उसके आंसू पोछकर उसे शांत कराने लगी. मुझे लगा मेरा दिल ग़म के मारे फट जाएगा.
ख्वाजा सारा ने रूखे होकर कहा, ”बस बहुत हो गया. अब चलो.”

नाज़ बानो अच्छी लड़की थी और नौकरों का सम्मान करती थी. उसने ख्वाजा सारा को डांट लगाई. उस कमीने आदमी ने तैश में आकर शहज़ादी को थप्पड़ मार दिया.

बानो झटके से गिर गई. कभी किसी ने उस पर हाथ नहीं उठाया था. यहां तक कि मैं भी उसके साथ रोने लगी. ख्वाजा हम दोनों को रोता हुआ छोड़कर चला गया. हम किसी तरह हज़रत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह तक पहुंचे.

हमारे परिवार समेत हजारों लोगों ने वहां पनाह ले रखी थी. सब परेशान और डरे हुए थे. कोई एक-दूसरे से कुछ नहीं बोल रहा था. ग़दर के समय ही महामारी फ़ैल गई, जिसने मेरी बहन की जान ले ली. अब मैं एकदम अकेली थी.

बाद में दिल्ली में अमन लौट तो आया, लेकिन मेरे लिए कोई अमन न था. अंग्रेज सरकार ने पांच रुपए महीने की पेंशन मुक़र्रर कर दी, जो आज भी मुझे मिलती है.”

साभार डेली ओ से
हिंदी रूपान्तरण
प्रस्तुति
पं.एल.के.शर्मा

11/18/2016

कहीं देश दिवालिया तो नहीं हो रहा ,जिसको छिपाने के लिए नोट-बंदी की नोटंकी चल रही है

बात सब जानते है की मोदी गरीबी मिटाने में ,महंगाई को कम करने में विफल रही , बेरोजगारी को मोदी सरकार कम नहीं कर पाई है , यही कारण रहा की मोदी सरकार कभी भी शासन में कम और ध्यान- भंग प्रक्रिया में जयादा लगी रही , कभी रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या हुई , कभी जे एन यु के माध्यम से राष्ट्रवाद को जगाने की कोशिस की गई तो गो आतंक के जरिये हिन्दू वाद , कैराना मुजफरनगर आदि सब होता रहा , और अंत में अपनी पुरानी चाल चलते हुए उडी का हमला करा दिया गया और उसके बाद सैनिको की लाशो का तमाशा दिखा दिखा अपने पक्ष में राष्ट्रवाद को जगाने लग गए और इसी बीच मोदी अपने पूंजीपति आकाओं के पक्ष में निर्णय लेते रहे और देश की अर्थ वाव्यस्था पूरी तरह चरमराने लगी और हालात दिलालियापन तक पहुँच गये।

भारत के इन आर्थिक हालातो को छिपाना बहुत मुश्किल रहा और इसलिए आनन् फानन में मोदी ने अपनी पुरानी चाल चलते हुए नोट्बंदी का आदेश जारी कर दिया और यह निर्णय भी अपने आप में एक अकेले श्री मान मोदी जी का था।

नोटबंदी को लेकर पूरे देश में अफरातफरी का माहौल है, मौतों का आकड़ा लगभग 50 तक पहुँच चुका है। यह वह आकड़ें हैं जो रिपोर्ट हो पाएं हैं वास्तिक आकड़ों का कोई खुलासा नहीं। यूँ अचानक से नोट बंदी के फैसले के पीछे की वजह बताते हुए वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने अपनी वाल पर लिखा है कि

क्या आपको अब भी नोटबंदी का मतलब समझ में नहीं आ रहा है? वित्त मंत्रालय में राज्य मंत्री(श्री संतोष कुमार गंगवार)1- 31 मार्च, 2016 की स्थिति के अनुसार, सरकारी क्षेत्र के बैंकों(पीएसबी) के शीर्ष 100 उधारकर्ताओं की बकाया राशि 13,71,885 करोड रूपये थी।

2-सरकारी क्षेत्रों के बैंकों की सकल अनर्जक आस्तियां 2,16,739 करोड रुपये (वित्तीय वर्ष 2014 के लिए), 2,67,065 करोड रुपये (वित्तीय वर्ष 2015 के लिए) और 4,76,816 करोड़ रुपये (वित्तीय वर्ष 2016 के लिए) थी।
वित्त मंत्रालय का राज्यसभा में जवाब है। सवाल संख्या 2506. जवाब देने की तारीख 9 अगस्त, 2016. मोदी सरकार बनने के बाद सरकारी बैंकों की लूट किस तरह दोगुनी हो गई, यह सरकार ख़ुद बता रही है।

बाज़ार में कुल करेंसी लगभग 18 लाख करोड़ है। उसमें से लगभग पौने पाँच लाख करोड़ कंपनियों ने दबा लिए हैं, जिनके लौटने की उम्मीद भी नहीं है। इसकी भरपाई के लिए हुई है नोटबंदी।

नोटबंदी में अब तक कोई घोटाला नहीं हुआ है। घोटाला जनवरी-फ़रवरी महीने में होगा जब RBI उतने नोट छापेगी, जितने कि बैंकों में वापस नहीं लौट पाए हैं। सरकार इस रक़म को अपनी आमदनी के तौर पर दिखाएगी। यह रक़म पाँच लाख करोड़ तक हो सकती है।

उन नए छापे गए नोटों की लूट भारतीय आर्थिक इतिहास की सबसे बड़ी लूट होगी। इसका बड़ा हिस्सा बड़ी कंपनियों के पास जाएगा। उनका क़र्ज़ माफ होगा। इस वजह से कंगाल हो चुके सरकारी बैंकों में नए सिरे से नक़दी डाली जाएगी।
मिडिल क्लास को ख़ुश रखने के लिए इनकम टैक्स की छूट की सीमा बढाई जाएगी और टैक्स दर में थोड़ी कटौती होना भी मुमकिन है। उस लूट की तलछट पर चंद नोट ग़रीबों के खाते में भी आ सकते है।

सवाल यह है की काला धन की समस्या को दूर करने के लिए मोदी या राजनैतिक पार्टी अपने आप से शुरू क्यों नहीं करते जैसे किसी भी पार्टी का पैन कार्ड नहीं ये लोग अपनी आय के न तो श्रोत बताते है और न ही ऑडिट करते है ?? वरिष्ट पत्रकार ने इन्ही बातो को राष्ट्रवाद और काले धन पर बार बार उठाया है

एक और वरिश पत्रकार प्रकाश रे ने यह बताया की भारत की कुल सम्पति ka 70 % भाग केवल १० % लोगो के पास है
अगर सच में सरकार कला धन वापिस लाना चाहती है तो सबसे पहले पूंजीपतियो से वैट और टैक्स वसूल ले और आम आदमी के पैसे को अपना बना कर दिखा कर दुसरे देशो और देश में भ्रामकता न फैलाए ।

11/17/2016

जिस तैयारी के लिए अब जनता से 50 दिन मांगे जा रहे हैं वह इस फैसले को लागू करने के पहले क्यों नहीं की गई?

जिस तैयारी के लिए अब जनता से 50 दिन मांगे जा रहे हैं वह इस फैसले को लागू करने के पहले क्यों नहीं की गई?

नोटबैंक के जरिए वोटबैंक को साधने की कोशिश में केंद्र सरकार ने देश को कतार में ला खड़ा किया है. वित्त मंत्री अरुण जेटली कहते हैं कि दो से तीन हफ्ते यानी तकरीबन 21 दिन में चीजें पटरी पर आ जाएंगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके लिए 50 दिन मांगते हैं. सवाल उठता है कि बयानों का यह गड़बड़झाला क्यों है. दोनों के अनुमान अलग-अलग क्यों हैं? दरअसल, यह ठोक बजा कर फैसला नहीं किए जाने का नतीजा है.

ढाई साल गुजर चुके हैं देश की बागडोर संभाले, पर व्यवस्थाएं अब तक नहीं संभल पाईं. जनता की उम्मीदों और उससे किए गए वादों पर हम खरे नहीं उतर पाए, यह बात भाजपा शायद शिद्दत के साथ महसूस कर रही थी. उसे शायद यह भी लग रहा था कि देशभक्ति की चाशनी में लिपटे वाक्यों या नारों से छद्म राष्ट्रवाद तो पैदा किया जा सकता है लेकिन, वह टिकाऊ नहीं होता. विदेशों में रखा काला धन हम देश में नहीं ला पाए, पर कम से कम देश में छुपे काले धन को सामने लाकर दिखाएं. जनता को दिखाना बहुत जरूरी है कि हम बदलाव की कोशिशों में लगे हैं, संभवत: यही सब सोच कर बड़े नोटों को अमान्य करने का फैसला झटके में लागू कर दिया गया.

सवाल यह है कि अगर इस योजना को अमल में लाना ही था, तो जो 50 दिन अब जनता से मांगे जा रहे हैं और जो तैयारी अब की जाएगी, वह इसे लागू करने के पहले क्यों नहीं की गई.

बेशक, यह योजना अच्छी है. बहुत हद तक कारगर भी. कम से कम नक्सलियों या आतंकियों के पास रखे पैसे पर कुछ लगाम तो लगेगी. पर इस कदम के पीछे वोटबैंक हासिल करने की जो मंशा दिखती है वह बेहद खतरनाक है. कुछ वैसे ही जैसे जाति, धर्म या आरक्षण के नाम पर देश को बांट देना और फिर इस कवायद से वोटों का इंतजाम करना. कालेधन को बाहर लाने के नाम पर देश की जनता में छद्म राष्ट्रवाद पैदा करने की कोशिश खतरनाक है. खबरें आई हैं कि मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के बैंक खाते में नोटबंदी की घोषणा से एक दिन पहले करोड़ों रुपए जमा कराए गए. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भाजपा के पंजाब शाखा के अध्यक्ष संजीव कंबोज पर आरोप लगाए कि 2000 के नोट बाजार में आने से पहले कंबोज के पास दिखे. अगर यह सच है तो कैसे?


खबरें तो और भी हैं. जैसे कि दिल्ली के कुछ इलाकों में नोटबंदी से परेशान घरेलू सहायिकाओं को खुले नोट देने का प्रलोभन दे रईसजादे कपड़े खोलने को कह रहे हैं. अब तक कतार से परेशान हो कई लोगों ने खुदकुशी कर ली. सच तो यह है कि केंद्र सरकार के इस फैसले से मध्य और निम्न वर्ग बुरी तरह त्रस्त हुआ है. खाने-पीने से लेकर आने-जाने तक का संकट उठ खड़ा हुआ है. महज हफ्ते भर में जिंदगी बेपटरी हो चुकी है. आम आदमी की इस परेशानी को प्रधानमंत्री जैसा खास शख्स नहीं समझ सकता.

सवाल यह है कि अगर इस योजना को अमल में लाना ही था, तो जो 50 दिन अब जनता से मांगे जा रहे हैं और जो तैयारी अब की जाएगी, वह इसे लागू करने के पहले क्यों नहीं की गई? किस बात की हड़बड़ी थी? यह नाटकीय भावुक अपील कर किन मुद्दों से देश का ध्यान हटाने की साजिश रची जा रही है?

इस नोटबंदी के फरमान के बाद बड़ी तेजी से बैंकों में नकदी की सप्लाई हुई है. ये बैंक पैसा आने के बाद दोबारा जो कर्ज देंगे तो आखिर किन बड़े आसामियों को? इस पर नजर रखने की जरूरत है.

2008 की आर्थिक मंदी से अगर यह देश उबर सका था या कहें कि उस तरह चपेट में नहीं आया था जैसे अमेरिका या बाकी यूरोपीय देश तो इसकी एक बड़ी वजह थी कि यहां के बैंक केंद्रीकृत रहे. एक दूसरी बड़ी वजह यह भी थी कि इस देश के मध्य और निम्न वर्ग की महिलाओं के पास घर में एक छुपा हुआ ‘निजी बैंक’ है. यानी वे पैसे जो अपने बुरे दौर के लिए वे अपनी हैसियत के मुताबिक खाद्यानों के डब्बों में घर के पुरुषों से बचाकर रखती रही थीं. यह ‘निजी बैंक’ उन धनाढ्यों के ‘निजी बैंक’ की तरह नहीं जिसका मकसद ही काला धन छुपाना होता है. इस फैसले ने उस निजी बैंक को तोड़ कर रख दिया. इस ‘निजी बैंक’ के पैसे तेजी से देश के केंद्रीकृत और निजी हाथों के बैंकों में जमा होने लग गए.

गौर करें तो ये बैंक अभी नकदी के संकट से जूझ रहे थे. इस नकदी के संकट की दो बड़ी वजहें हैं. एक तो यह कि बड़े उद्योगपतियों ने बैंकों का पैसा दबा लिया है और दूसरा कि रियल एस्टेट के कारोबार में बैंकों का पैसा डूबा है. इस नोटबंदी के फरमान के बाद बड़ी तेजी से बैंकों में नकदी की सप्लाई हुई है. ये बैंक पैसा आने के बाद दोबारा जो कर्ज देंगे तो आखिर किन बड़े आसामियों को? इस पर नजर रखने की जरूरत है.

केंद्र के इस फैसले से जाहिर तौर पर मध्य और निम्न वर्ग के ‘निजी बैंक’ टूट गए. बड़े कारोबारियों के निजी बैंक अब भी सुरक्षित हैं. हम राष्ट्रवाद के नाम पर छले जा रहे हैं. अब जो 50 दिन हमसे मांगे जा रहे हैं और जो तैयारी की जाएगी, पहले कर ली जाती तो शायद इस देश का गरीब तबका न ऐसे परेशान होता, न ही उसके निजी बैंक टूटते.

संकलन
न्यूज़ मिडिया एंव समाचार पत्र

प्रस्तुति
पं.एल.के.शर्मा
अधिवक्ता
राज.उच्च.न्यायालय,जोधपुर।