8/20/2016

पाकिस्तान में कभी नहीं हुआ बलूचिस्तान का 'विलय', 1947 से ही होते रहे हैं संघर्ष

नई दिल्ली। 15 अगस्त के अपने भाषण के अंत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई एक टिप्पणी ने पाकिस्तान के रिसते बलूचिस्तान के घाव को सबके सामने लाकर रख दिया। भारत लंबे समय से जम्मू एवं कश्मीर में अशांति के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराता रहा है।

अब पाकिस्तान को उसी के अंदाज में जवाब देने की मोदी की रणनीति ने एक ऐसे भानुमति के पिटारे को खोल दिया है, जिसके अपने भू-राजनैतिक निहितार्थ हैं और जो भारत की विदेश नीति की दिशा को बदलने का माद्दा रखती है।
बलूचिस्तान, पाकिस्तान के लिए उतना ही तकलीफ देने वाला रहा है जितना कश्मीर भारत के लिए है, लेकिन पाकिस्तान के इस सबसे बड़े प्रांत पर दुनिया का ध्यान उस तरह से नहीं गया जिस तरह कश्मीर पर गया है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि इस प्रांत को एक ऐसा 'ब्लैक होल' समझा जाता रहा है जहां पत्रकारों को जाने की इजाजत नहीं मिलती। कश्मीर के साथ मामला ऐसा नहीं है।

पाकिस्तान वैश्विक मंचों पर कश्मीर का मुद्दा और भारत के इस एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य में मानवाधिकारों के कथित उल्लंघन को उठाता रहा है। बलूचिस्तान प्रांत क्षेत्रफल के हिसाब से पाकिस्तान में सबसे बड़ा है। इसका क्षेत्रफाल फ्रांस के बराबर है। गैस, सोना, तांबा, तेल, यूरेनियम जैसे संसाधनों से लैस होने के बावजूद यह इलाका विकास में बहुत पीछे है।
1947 में भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान अस्तित्व में आया और वह दिन है और आज का दिन है कि इस प्रांत को शांति की एक मुकम्मल सांस नहीं नसीब हुई। पाकिस्तान के कुल क्षेत्रफल का 40 फीसदी हिस्सा बलूचिस्तान में आता है, लेकिन देश की कुल जनसंख्या की महज चार फीसदी ही यहां रहती है। बलूचिस्तान के अधिकारों के लिए लड़ने वाले कहते हैं कि बलूचियों की स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र की आकांक्षा को पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा रौंदे जाने और बलूचियों के संहार के बावजूद दुनिया की निगाह इस पर नहीं गई है।
इस क्षेत्र का इतिहास टूटे हुए वादों, मानवाधिकार उल्लंघन, गरीबी और प्रभावशाली पंजाबियों के दमनकारी शासन की गवाही देता है। पाकिस्तान का कहना है कि बलूचिस्तान की अशांति के पीछे भारत की खुफिया संस्था रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) का हाथ है। भारत इसे गलत बताता है। ऐतिहासिक रूप से बलूचिस्तान कभी भी उपमहाद्वीप का हिस्सा नहीं रहा। यह ब्रिटिश राज के तहत चार शाही सत्ताओं, कलात, लासबेला, खारन और मकरान को मिलाकर बना था। यह क्षेत्र भारत या पाकिस्तान के बजाय अफगानिस्तान और ईरान से अधिक मिलता-जुलता दिखता है।

यह आमतौर से माना जाता है कि पाकिस्तान के संस्थापक और प्रथम गवर्नर-जनरल मोहम्मद अली जिन्ना ने अंतिम स्वाधीन बलूच शासक मीर अहमद यार खान को पाकिस्तान में शामिल होने के समझौते पर दस्तखत करने के लिए मजबूर किया था।
इतिहास के कुछ पन्नों में यह भी दर्ज है कि जिन्ना ने पाकिस्तान के अस्तित्व में आने से कुछ पहले ब्रिटिश हुक्मरानों से बलूचिस्तान की आजादी पर सौदा किया था। हालांकि, इस बात को गलत बताने वाले भी मौजूद हैं।

11 अगस्त 1947 की एक शासकीय सूचना से पता चलता है कि पाकिस्तान और इस इलाके के बीच एक समझौता हुआ था। यह तय हुआ था कि पाकिस्तान और खान के बीच रक्षा, विदेश मामले और संचार के मामलों में सहमति तक पहुंचने के लिए चर्चा होगी। इस समझौते के बावजूद पाकिस्तानी सेना 26 मार्च 1948 को बलूचिस्तान के तटीय इलाकों में घुस आई। कुछ दिन बाद कराची में ऐलान किया गया कि खान अपने राज्य के पाकिस्तान में विलय पर राजी हो गए हैं।
इसके बाद जो हुआ, वह रक्तपात, मूल अधिकारों के हनन, हर तरह से वंचित किए जाने और क्षेत्र की आजादी के लिए उठने वाली किसी भी आवाज को बर्बरतापूर्वक कुचले जाने की दास्तान है। पिछले साल जिनेवा में 'बलूचिस्तान इन द शैडोज' नाम से कांफ्रेंस हुई थी। कांफ्रेंस के बाद तैयार एक रिपोर्ट में कहा गया था, "बलूचिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति बुरी तरह से खराब हो रही है। नागरिकों को सुरक्षा देने और कानून का राज कायम रखने के बुनियादी कर्तव्य में क्षेत्र की सरकारें नाकाम साबित हुई हैं।
पाकिस्तान द्वारा संसाधनों की लूट और दमनकारी शासन के खिलाफ बलूची 1948 से अब तक पांच बार कम तीव्रता का सशस्त्र संघर्ष छेड़ चुके हैं। मशहूर बलूच कार्यकर्ता नाएला कादरी ने अप्रैल में आईएएनएस से एक खास मुलाकात में आरोप लगाया था कि 'राजनैतिक, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष स्वतंत्रता संघर्ष को दबाने के लिए पाकिस्तान नरंसहार कर रहा है।'

कादरी ने कहा था, बीते एक दशक में 2 लाख बलूचियों को मार डाला गया है। 25000 मर्द और औरतें लापता हुई हैं, जिनमें पाकिस्तान की सेना का हाथ रहा है। वो लोग नरंसहार की पहचान के लिए निर्धारित संयुक्त राष्ट्र के सभी आठ संकेतों पर अमल कर रहे हैं और इसमें अमानवीयकरण, ध्रुवीकरण, विनाश और अस्वीकार भी शामिल हैं।

बेटी बचाओ अभियान की शुरुआत लगभग 1450 साल पहले ”मुहम्मद मुस्तफा सअव’ ने की थी


बेटी बचाओ अभियान की शुरुआत लगभग 1450 साल पहले ”मुहम्मद मुस्तफा सअव’ ने की थी।

उस जाहिलियत के ज़माने में लोग अपनी मासूम बच्चियों को सामने बिठाकर कब्र खोदते थे, फिर उस बच्ची के हाथ में गुड़िया देकर, उसे मिठाई का टुकड़ा थमाकर, उसे नीले पीले और सुर्ख रंग के कपड़े देकर उस कब्र में बिठा देते थे, बच्ची उसे खेल समझती थी, वो क़ब्र में कपड़ों, मिठाई के टुकड़ों और गुड़ियाओं के साथ खेलने लगती थी फिर ये लोग अचानक उस खेलती, मुस्कुराती और खिलखिलाती बच्ची पर रेत और मिट्टी डालने लगते थे।
बच्ची शुरू-शुरू में उसे भी खेल ही समझती थी, लेकिन जब रेत मिट्टी उसकी गर्दन तक पहुँच जाती तो वो घबराकर अपने वालिद, अपनी माँ को आवाजें देने लगती थी, लेकिन ज़ालिम वालिद मिट्टी डालने की रफ्तार और तेज कर देता था।
ये लोग इस अमल के बाद वापस जाते थे तो उन मासूम बच्चियों की सिसकियाँ घरों के दरवाजों तक उनका पीछा करती थीं, लेकिन उन ज़ालिमों के दिल स्याह हो चुके थे जो नर्म नहीं होते थे।
बहुत से ऐसे भी लोग थे जिनसे “इस्लाम” कुबूल करने से पहले माज़ी में ऐसी गलतियाँ हुई थीं
एक ने वाक़या सुनाया
मैं अपनी बेटी को क़ब्रस्तान लेकर जा रहा था, बच्ची ने मेरी उंगली पकड़ रखी थी, उसे बाप की उंगली पकड़े हुऐ खुशी हो रही थी, वो सारा रस्ता अपनी तोतली
ज़बान में मुझसे फरमाइशें भी करती रही और मैं सारा रस्ता उसे और उसकी फरमाइशों को बहलाता रहा।
मैं उसे लेकर क़ब्रस्तान पहुँचा, मैंने उसके लिये क़ब्र की जगह चुनी, मैं नीचे ज़मीन पर बैठा अपने हाथों से रेत मिट्टी उठाने लगा, मेरी बेटी ने मुझे काम करते देखा तो वो भी मेरा हाथ बँटाने लगी, वो भी अपने नन्हें हाथों से मिट्टी खोदने लगी, हम दोनों बाप बेटी मिलकर मिट्टी खोदते रहे, मैंने उस दिन साफ कपड़े पहन रखे थे, मिट्टी खोदने के दौरान मेरे कपड़ों पर मिट्टी लग गई, मेरी बेटी ने कपड़ों पर मिट्टी देखा तो उसने अपने हाथ झाड़े, अपने हाथ अपनी कमीज़ में पोंछे और मेरे कपड़ों में लगी मिट्टी साफ़ करने लगी…।
क़ब्र तय्यार हुई तो मैंने उसे क़ब्र में बैठाया और उस पर मिट्टी डालना शुरू कर दिया, वो भी अपने नन्हे हाथों से अपने ऊपर मिट्टी डालने लगी, वो मिट्टी डालती जाती खिलखिलाती रहती और मुझ से फरमाइशें करती जाती थी, लेकिन मैं दिल ही दिल में अपने झूठे खुदाओं से दुवा कर रहा था कि तुम मेरी बेटी की कुरबानी कुबूल कर लो और मुझे अगले साल बेटा दे दो…। मैं दुवा करता रहा और बेटी मिट्टी में दफ़्न होती रही…।
मैंने आखिर में जब उसके सर पर मिट्टी डालना शुरू किया तो उसने सहमी सी नज़रों से मुझे देखा और तोतली ज़बान में पूछा: “अब्बाजान! मेरी जान आप पर कुरबान मगर आप मुझे मिट्टी में दफ़्न क्यूँ कर रहे हो…” ?
मैंने अपने दिल पर पत्थर रख लिया और दोनों हाथों से और तेजी के साथ कब्र पर मिट्टी फेंकने लगा…।
मेरी बेटी रोती रही, चींखती रही, दुहाइयाँ देती रही लेकिन मैंने उसे मिट्टी में दफ़्न कर दिया…।
ये वो आखिरी अल्फ़ाज़ थे, जहाँ रहमतुल आलमीन नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का ज़ब्त जवाब दे गया… आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हिचकियाँ बँध गईं, दाढ़ी मुबारक आँसुओं से तर हो गई और आवाज़ हलक मुबारक में फंसने लगी…।
वो शख्स दहाड़े मार-मार के रो रहा था और रहमतुल आलमीन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हिचकियाँ ले रहे थे, उसने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा- “या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) क्या मेरा ये गुनाह भी माफ हो जायेगा…” ?
रहमतुल आलमीन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की आँखों से अश्क़ों की नहरें बह रही थीं…।
अरब के ऐसे माहौल में अल्लाह के रसूल ने उन लोगों को दीन-ए-इस्लाम का सन्देश सुनाया और तमाम मुसीबतें उठा कर दीन को उनके दिलों में उतरा, ये रसूल की बरकत और क़ुरआन की शिक्षा का असर था कि अरब के तमाम बुरे रस्मो रवाज़ एक के बाद एक ख़तम होते चले गए और जो लोग गर्दनों तक बुराइयों में डूबे हुए थे उन्होंने इस्लाम मज़हब अपनाने के बाद मिसालें कायम कर दीं।

वोट की राजनीति

राजनीतिक पार्टियों का क्या है, उन्हें तो बस वोट लेना है, अब वो वोट चाहे समाज को बाँट कर मिले या इंसान को काट कर l समाज में दलित और सवर्ण की राजनीती करने वाले नेताओं को ये सच्चाई शायद समझ ना में आये, लेकिन सवर्ण और दलित के सदभाव और सहयोग की भावना का बेजोड़ उदाहारण है, महाराज सयाजी के मदद की कहानी l जिन सवर्णों के खिलाफ बाबा साहब के नाम का इस्तेमाल किया जाता है, उन्हीं भारत रत्न अम्बेडकर को उनके एक ब्राह्मण शिक्षक महादेव अम्बेडकर ने सामाजिक रूप से भेदभाव होने के कारण अपने नाम के आगे “अम्बेडकर” जोड़ने को कहा था l आज आज़ादी के इतने साल हो गये है, लेकिन ये सामाजिक भेदभाव और दलित-सवर्ण की राजनीती खत्म होने का नाम ही नही ले रही lऐसा कौन होगा जो बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर को नही जानता होगा, जिन्होंने हमारे देश के संविधान को एक बेहतरीन रूप दिया l अम्बेडकर साहब ने तो संविधान को किसी विशेष धर्म या जाति के लिए नही बनाया था, लेकिन आज का परिवेश ऐसा हो गया है, कि अम्बेडकर को राजनीती के तहत जाति विशेष से जोड़ कर देखा जाता है l कुछ राजनैतिक पार्टियाँ तो उन्हें दलित बताकर चुनाव में वोट हड़पने की घटिया राजनीती भी करती हैं l राजनीती भी ऐसी कि बाबा साहब पर सिर्फ और सिर्फ अपना अधिकार समझती हैं l हद तो तब हो जाती है, जब यही राजनीतिक पार्टियाँ भाषण देकर समाज में दलितों को सवर्णों के खिलाफ भड़काती हैं l जिसको आप “तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार” जैसे नारों से समझ सकते हैं, लेकिन आज हम आपको बताते हैं कि आखिर वो कौन थे, जिन्होंने, दलितों के आदर्श माने जाने वाले भीमराव को बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर बनाया l

आपने नेताओं से भाषण के दौरान भीमराव अम्बेडकर का नाम अक्सर सुना होगा, लेकिन जिन्होंने अम्बेडकर को आर्थिक सहायता की, जिससे भीमराव विदेशों में जाकर अपनी पढ़ाई पूरी कर सके, उनका नाम कभी नही सुना होगा l जिनकी वजह से अम्बेडकर ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में जाकर अपनी पढ़ाई पूरी कर पाये उनका नाम कोई नही लेता l अब इसे दलितों की राजनीति का हिस्सा समझ लीजिये, या फिर कुछ और लेकिन किसी नेता ने कभी नही बताया कि आखिर कौन था वो, जिसने अम्बेडकर को आर्थिक मदद कर उनकी पढ़ाई पूरी करवाई, और इस लायक बनाया कि देश का संविधान बनाने में देश की मदद कर सके l तो चलिए हम आपको बताते हैं, कि क्या है पूरी कहानी l

बड़ोदरा रियासत के महाराजा सयाजी गायकवाड़ जी को एक बार एक दलित युवक ने चिट्ठी लिखी, और पढ़ाई के लिए ब्रिटेन और अमेरिका जाने के लिए आर्थिक मदद लिए निवेदन किया l चिट्ठी के साथ उसने अपनी मार्कशीट भी लगाकर भेजी थी l पत्र के बाद महाराज ने उस युवक को बुलाने का आदेश दिया, और जब युवक महाराज के सामने आया तो राजा ने उसकी प्रशंसा करते हुए कहा, कि ‘पढने में अच्छे हो’, उसके बाद महाराजा ने उसे पूरा खर्च दिया, और पढने के लिए भेज दिया l इतना ही नहीं उन्होंने उसके रहने का इन्तजाम भी करवा दिया l

राजनीतिक पार्टियों का क्या है, उन्हें तो बस वोट लेना है, अब वो वोट चाहे समाज को बाँट कर मिले या इंसान को काट कर l समाज में दलित और सवर्ण की राजनीती करने वाले नेताओं को ये सच्चाई शायद समझ ना में आये, लेकिन सवर्ण और दलित के सदभाव और सहयोग की भावना का बेजोड़ उदाहारण है, महाराज सयाजी के मदद की कहानी l जिन सवर्णों के खिलाफ बाबा साहब के नाम का इस्तेमाल किया जाता है, उन्हीं भारत रत्न अम्बेडकर को उनके एक ब्राह्मण शिक्षक महादेव अम्बेडकर ने सामाजिक रूप से भेदभाव होने के कारण अपने नाम के आगे “अम्बेडकर” जोड़ने को कहा था l आज आज़ादी के इतने साल हो गये है, लेकिन ये सामाजिक भेदभाव और दलित-सवर्ण की राजनीती खत्म होने का नाम ही नही ले रही l

अब 6 GB-8 GB डेटा पैक के साथ कीजिए अनलिमिटेड फोन कॉल, फ्री रोमिंग भी

वोडाफोन ने डाटा और फ्री कॉल्‍स ऑफर के बाद अब पोस्‍टपेड कस्‍टमर्स को लुभाने के लिए नए ऑफर जारी किए हैं। कंपनी ने गुरुवार को वोडाफोन रेड नाम से प्‍लान जारी किया। यह प्‍लान ज्‍यादातर सफर करने वाले और वॉइस कॉल्‍स व डाटा इस्‍तेमाल करने वाले लोगों को ध्‍यान में रखते हुए तैयार किया गया है। यह प्‍लान 499 रुपये से शुरू होता है और 1999 रुपये तक जारी रहता है। इसमें रोमिंग सुविधा के साथ ही फ्री कॉलिंग और सस्‍ता डाटा भी मिलता है। उदाहरण के लिए 1999 रुपये के पैक में पोस्‍टपेड कस्‍टमर्स को अनलिमिटेड रोमिंग, अनलिमिटेड वॉइस कॉलिंग और 8 जीबी डाटा मिलेगा।
वहीं 1699 रुपये के प्‍लान में फ्री रोमिंग(इनकमिंग कॉल्‍स), अनलिमिटेड वॉइस कालिंग और 6 जीबी डाटा मिलता है। वोडाफोन रेड में शुरुआती स्‍तर के प्‍लान भी शामिल है। इनकी कीमतें 499, 699 और 999 रुपये है। इनमें डबल डाटा और आकर्षक टॉकटाइम की सुविधा मिलती है। इससे पहले महीने की शुरुआत में वोडाफोन ने एलान किया था कि जिन ग्राहकों के फोन किसी कारण से कट जाएंगे उन्‍हें बात करने के लिए 10 मिनट दिए जाएंगे। कंपनी की ओर से कहा गया है, ”वोडाफोन रेड ऑल इन वन प्‍लान है। इसे हाई वैल्‍यू पोस्‍टपेड उपभोक्‍ताओं के लिए बनाया गया है। पोस्‍टपेड कस्‍टमर के व्‍यवहार में देखा गया है कि वह काफी समय रोमिंग में गुजारते हैं और डाटा यूज करते हैं।”
हाल के दिनों में एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया सेल्‍युलर ने डाटा टैरिफ में 67 प्रतिशत तक की कटौती की है। बताया जा रहा है कि यह सब मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो के चलते कंपनियां अपने प्‍लान सस्‍ते कर रही हैं। माना जा रहा है कि जियो अगले कुछ महीनों में अपनी सेवाएं जारी कर देगी।

साभार
वोडाफ़ोन डॉट कॉम

7/29/2016

शिक्षा का विकास (वयंग्य)

छठी के छात्र छेदी ने छत्तीस की जगह बत्तीस कहकर जैसे ही बत्तीसी दिखाई, गुरुजी ने छडी उठाई और मारने वाले ही थे की छेदी ने कहा, "खबरदार अगर मुझे मारा तो! मे गिनती नही जानता मगर आरटीई (Right to Education Act 2009) की धाराएँ अच्छी तरह जानता हूँ.
गणित मे नही, हिंदी मे समझाना आता है."
गुरुजी चौराहों पर खड़ी मूर्तियों की तरह जडवत हो गए. जो कल तक बोल नही पाता था, वो आज आँखें दिखा रहा है!
शोरगुल सुनकर प्रधानाध्यापक भी उधर आ धमके. कई दिनों से उनका कार्यालय से निकलना ही नही हुआ था. वे हमेशा विवादों से दूर रहना पसंद करते थे. इसी कारण से उन्होंने बच्चों को पढ़ाना भी बंद कर दिया था. आते ही उन्होंने छडी को तोड़ कर बाहर फेंका और बोले, "सरकार का आदेश नही पढ़ा? प्रताड़ना का केस दर्ज हो सकता है. रिटायरमेंट नजदीक है, निलंबन की मार पड़ गई तो पेंशन के फजीते पड़ जाएँगे. बच्चे न पढ़े न सही, पर प्रेम से पढ़ाओ. उनसे निवेदन करो. अगर कही शिकायत कर दी तो ?"
बेचारे गुरुजी पसीने पसीने हो गए. मानो हर बूँद से प्रायस्चित टपक रहा हो! इधर छेदी "गुरुजी हाय हाय" के नारे लगाता जा रहा था और बाकी बच्चे भी उसके साथ हो लिए.
प्रधानाध्यापर ने छेदी को एक कोने मे ले जाकर कहा, "मुझसे कहो क्या चाहिए?"
छेदी बोला, "जब तक गुरुजी मुझसे माफी नही माँग लेते है, हम विद्यालय का बहिष्कार करेंगे. बताए की शिकायत पेटी कहाँ है?"
समस्त स्टाफ आश्चर्यचकित और भय का वातावरण हो चुका था. छात्र जान चुके थे की उत्तीर्ण होना उनका कानूनी अधिकार है.
बड़े सर ने छेदी से कहा की मे उनकी तरफ से माफी माँगता हूँ, पर छेदी बोला, "आप क्यों मांगोगे ? जिसने किया वही माफी माँगे. मेरा अपमान हुआ है."
आज गुरुजी के सामने बहुत बड़ा संकट था. जिस छेदी के बाप तक को उन्होंने दंड, दृढ़ता और अनुशासन से पढ़ाया था, आज उनकी ये तीनों शक्तिया परास्त हो चुकी थी. वे इतने भयभीत हो चुके थे की एकांत मे छेदी के पैर तक छूने को तैयार थे, लेकिन सार्वजनिक रूप से गुरूता के ग्राफ को गिराना नही चाहते थे. छडी के संग उनका मनोबल ही नही, परंपरा और प्रणाली भी टूट चुकी थी. सारी व्यवस्था नियम कानून एक्सपायर हो चुके थे. कानून क्या कहता है, अब ये बच्चो से सिखना पढ़ेगा!
पाठक्रम मे अधिकारों का वर्णन था, कर्तव्यों का पता नही था. अंतिम पड़ाव पर गुरु द्रोण स्वयं चक्रव्यूह मे फँस जाएँगे!
वे प्रण कर चुके थे की कल से बच्चे जैसा कहेंगे, वैसा ही वे करेंगे. तभी बड़े सर उनके पास आकर बोले, "मे आपको समझ रहा हूँ. वह मान गया है और अंदर आ रहा है. उससे माफी माँग लो, समय की यही जरूरत है."
छेदी अंदर आकर टेबल पर बैठ गया और हवा के तेज झोंके ने शर्मिन्दा होकर द्वार बंद कर दिए.
कलम को चाहिए कि यही थम जाए. कई बार मौन की भाषा संवादों पर भारी पड़ जाती है

7/27/2016

नरेंद्र मोदी की गज़ब विरासत और तथाकथित राष्ट्रवादी मीडिया पर पत्रकार अभिसार शर्मा की खरी-खरी

स राष्ट्रवादी पत्रकार ने अंग्रेजी में दहाड़ते हुए कहा , “तो कहिये दोस्तों ऐसे पाकिस्तान प्रेमियों, आईएसआई परस्तों के साथ क्या सुलूक किया जाए ? क्या वक़्त नहीं आ गया है के उन्हें एक एक करके एक्सपोस किया जाए ?” मैंने सोचा के वाकई , क्या किया जाए ? क्या इन तमाम छद्म उदारवादियों को चौराहे पे लटका दिया जाए ? क्या उन्हें और उनके परिवारों को चिन्हित करके शर्मसार किया जाए ? क्या? कुछ दिनों पहले एक अन्य चैनल ने एक प्रोपेगंडा चलाया था जिसे “अफ़ज़ल प्रेमी गैंग” का नाम दिया गया।

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इन्हें देश विरोधी बताया गया। इन तथाकथित अफ़ज़ल प्रेमियो में से एक वैज्ञानिक गौहर रज़ा की मानें तो इसके ठीक बाद उन्हें धमकियाँ भी मिलने लगी। तब मुझे याद आया के सत्ता पे तो एक राष्ट्रवादी सरकार आसीन है. क्यों न इन आईएसआई फंडेड उदारवादियों और पत्रकार को देश द्रोह के आरोप में जेल भेजा जाए। बिलकुल वैसे, जैसे JNU में ”

भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जंग रहेगी” नारा लगाने वाले , मुँह छिपाये , कश्मीरी लहजे में बोलने वाले लोग जेल में हैं। नहीं हैं न ? अरे ? मुझे तो लगा के के सत्ता में आसीन ताक़तवर सरकार के मज़बूत बाज़ुओं से कोई बच नहीं सकता। फिर मेरे देश को गाली देने वाले वह लोग आज़ाद क्यों घूम रहे हैं ? खैर छोड़िये , हमारे राष्ट्रवादी पत्रकार ये मुद्दे नहीं उठाएंगे।

उन्हें कुछ और मुद्दों से भी परहेज़ है। मसलन , जबसे कश्मीर में नए सिरे से अराजकता का आग़ाज़ हुआ है, तबसे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने एक बार भी, एक बार भी, कश्मीर पे कोई टिपण्णी नहीं की. सोनिया गांधी के अंदाज़ में, उनके दुःख और अफ़सोस की खबरें हम गृह मंत्री राजनाथ सिंह से तो सुनते रहते हैं, मगर लोगों से संपर्क साधने के धनी मोदीजी ने एक बार भी कश्मीर में मारे गए लोगों या सुरक्षाकर्मियों पे वक्तव्य नहीं दिया। मान लिया कश्मीर में इस वक़्त चुनाव नहीं हैं, मगर गुजरात में दलितों पे शर्मनाक हमला भी आपको झकझोर नहीं पाया? म्युनिक पे हुए हमले पे आपकी व्यथा को पूरे देश ने महसूस किया, मगर कश्मीर और दलितों पे आये दिन हमले आपको विचलित नहीं कर पाए? और सबसे बड़ी बात। .. क्या इन राष्ट्रवाद से ओतप्रोत पत्रकारों ने एक बार भी मोदीजी की ख़ामोशी का मुद्दा उठाया? एक बार भी? क्या मोदीजी को बोलने से कोई रोक रहा है? कौन कर रहा है ये साज़िश? और किसने हमारे गौरवशाली पत्रकारों का ध्यान इस ओर नहीं खींचा?

Also Read | टाइम्स नाउ, आजतक, ज़ी न्यूज़ और न्यूज़X आप को कश्मीर के बारे में सच नहीं बताएँगे तो ‘ज़रा होशयार रहिये’

आये दिन देश के उदारवादियों और धर्मनिरपेक्ष लोगों के खिलाफ चैनल्स पर मुहीम देखने को मिलती रहती है। एक और ट्रेंड से परिचय हुआ। ‪#‎PROPAKDOVES‬ यानी पाक समर्थित परिंदे। कभी एक आध बार इन न्यूज़ शोज को देखने का मौका मिलता है तो देशभक्ति की ऐसी गज़ब की ऊर्जा का संचार होने लगता है के पूछो मत। लगता है के बस, उठाओ बन्दूक और दौड़ पड़ो LOC की तरफ। आखिर देश के दुश्मन पाकिस्तान की सरपरस्ती कौन कर सकता है और उससे भी बुरी बात, हमारी राष्ट्रवादी सरकार खामोश क्यों है ? आखिर क्यों देशप्रेम के जज़्बे में डूबे जा रहे इन भक्त पत्रकारों की आवाज़ को अनसुना किया जा रहा है ?

फिर मुझे कुछ याद आया। बात दरसल उस वक़्त की है जब मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री हुआ करते थे। तब UPA की सरकार ने दो चीज़ें की थी. पहला पाकिस्तान के साथ साझा टेरर मैकेनिज्म बनाया और दूसरा, पहली बार किसी साझा बयान में बलोचिस्तान को स्थान मिला। और ये शर्मनाक काम हुआ था शर्म अल शेख में। बतौर पत्रकार मैंने और मेरी तरह बाक़ी सभी राष्ट्रवादी पत्रकारों ने इसके आलोचना की थी। मेरा मानना था के जो देश भारत में आतंक फैला रहा है, उसके साथ साझा आतंकी सहयोग कैसे? आखिर क्यों भारत ने एक साझा बयान में बलोचिस्तान को जगह दे दी, जो एक करारी शिकस्त है?

खैर नयी सरकार आयी। मोदीजी के नेतृत्व में ये स्पष्ट किया गया के अगर पाकिस्तान पृथकतावादियों के साथ बात करेगा , तो हमसे बात न करे। देश को आखिरकार एक ऐसे प्रधानमंत्री मिल गया जिसके ज़ेहन में पाकिस्तान नीति बिलकुल स्पष्ट थी। मोदीजी ने एक लक्ष्मण रेखा खींच दी थी, और खबरदार जो किसी ने इसे पार किया। मगर फिर अचानक , पठानकोट हुआ। इसमें सरकार की किस तरह से छीछालेदर हुई वह चर्चा का अलग विषय है। मगर फिर जो हुआ वह कल्पना से भी विचित्र है।

एक ऐसी संस्था को हमने पठानकोट में आमन्त्रित किया जिसके घोषणा पत्र में भारत को सौ घाव देकर काट देने का ज़िक्र है। वह संस्था जो निर्विवाद रूप से देश में सभी आतंकी समस्याओं की जड़ है। आईएसआई। जी हाँ। ये वही आईएसआई , जो इस देश के कुछ पत्रकारों और #PROPAKDOVES को “फण्ड” कर रही है। कितना खौला था हमारे राष्ट्रवादी पत्रकारों का खून इसकी मिसालें सामने हैं। या नहीं हैं ? और फिर हम कैसे भूल सकते हैं के विदेश मंत्रालय को ताक पर रखकर प्रधानमंत्री पाकिस्तान पहुँच गए। और वो भी नवाज़ शरिफ पारिवारिक समारोह में। मैंने खुद इसे मास्टरस्ट्रोक बताया था। मगर मैं तो मान लिया जाए देशद्रोही हूँ, मगर हमारे राष्ट्रवादी पत्रकार ? इस अपमान के घूँट को कैसे पी गए ?

सच तो ये है मोदी की विदेश नीति में असमंजस झलकता है । मगर इस असमंजस की समीक्षा को न्यूज़ चैनल्स में जगह नहीं मिलती। जनरल बक्शी और अन्य जांबाज़ विशेषज्ञ जिन्हें आप सावरकर की तारीफ करते तो सुन सकते हैं, यहाँ उनकी खामोशी चौंकाने वाली है। प्रधानमंत्री की कश्मीर और दलितों पे खामोशी और पाकिस्तान पे बेतुके तजुर्बे चिंतित वाले हैं , मगर हम इसपर खामोश रहेंगे।

पत्रकारों को गाली देने वाले, ज़रा छत्तीसगढ़ के पत्रकार संतोष यादव की पत्नी से भी मिलकर आएं। जब मैं बस्तर गया था , तब उन्होंने मुझसे कहा था के मेरे पति एक अच्छा काम कर रहे हैं और मैं चाहूंगी के वह पत्रकार बने रहें। वो शब्द मैं कभी नहीं भूलूंगा। मगर वो शक़्स अब भी जेल में बंद है और अब खबर ये है के उसकी जान पे बन आयी है। बेल भाटिया अकेले एक गाँव के छोटे से घर में रहती हैं। बगैर किसी सुरक्षा के।

मगर यह राष्ट्रवादी ऐसे लोगों को नक्ससली समर्थक , देशद्रोही बताते हैं। बस्तर सुपरकॉप कल्लूरी के काम करने के तरीकों से खुद प्रशासन असहज है , मगर ऐसे बेकाबू लोगों पे कोई सवाल नहीं उठाता। ये देशभक्त हैं. राष्ट्र की धरोहर हैं। इन्हें मोदीजी का पूरा समर्थन हासिल है और ये आधिकारिक है।

कश्मीर पे अगर कुछ पत्रकार सवाल उठा रहे हैं, तो उसका ताल्लुक उन बच्चों से है , जो सुरक्षा बालों के पेलेट्स का शिकार हो रहे हैं और चूंकि कश्मीर देश का अभिन्न अंग है , लिहाज़ा उसके बच्चे भी मेरे बहन हैं। क्या उनकी बात करना देश द्रोह है ? अच्छा लगा था जब प्रधानमंत्री ने दिवाली श्रीनगर में बिताई थी , मगर सच तो ये है के अब सब कुछ एक “जुमला” सा लगने लगा है। उस कश्मीर की व्यथा पे आपकी खामोशी चौंकाने वाली है। और मैं जानता हूँ के किसी भी तरह की टिपण्णी करने में आपको असुविधा हो सकती है। क्योंकि चुनाव सर पर हैं। उत्तर प्रदेश के चुनाव। जहाँ सामजिक भाईचारे की मिसाल आपकी पार्टी के होनहार संगीत सोम पेश कर ही रहे हैं।

इस लेख को लिखते समय मेरी निगाह ट्विटर पर एक सरकारी हैंडल पर गयी है , जिसका ताल्लुक मेक इन इंडिया। इस हैंडल ने दो ऐसे ट्वीट्स को रिट्वीट किया जिसमे पत्रकारों को मौत देने का इशारा किया गया था। मुझे हैरत नहीं है अगर यही मेक इन इंडिया का स्वरुप है। क्योंकि हाल में एक और राष्ट्रवादी पत्रकार के ट्विटर हैंडल पे मैंने पत्रकारों को मौत देने की वकालत करने वाला ट्वीट देखा। हम उस काल में जी रहे हैं जब एक आतंकवादी की बात पर हम अपने देश की एक पत्रकार के खिलाफ गन्दा प्रोपेगंडा चलाते हैं, फिर मौत की वकालत करना तो आम बात है। भक्तगण ये भूल गए के बोलने वाला शक़्स एक आतंकवादी तो था ही, उसे इंटरव्यू करने वाला अहमद कुरैशी भी घोर भारत विरोधी था। उनका मक़सद साफ़ था , जिसे कामयाब बनाने में कुछ देशभक्तों ने पूरी मदद की. well done मित्रों!

हम ये भूल रहे हैं के हम बार बार उत्तेजना का एक माहौल पैदा कर रहे हैं , जिसका खामियाज़ा आज नहीं तो कल हमें भुगतना पड़ेगा।

अपनी ही बात करता हूँ। पिछले एक साल में मुझे दो बार सुरक्षा लेनी पड़ी है. पहला जब मैंने सनातन संस्था पे एक शो किया था जिसमे हिन्दू सेना के एक अति उत्साही ने मुझे मारने की धमकी दी थी और दूसरा बिहार से मेरी एक रिपोर्ट , ज्सिके वजह से 67 साल बाद , पहली बार १० गाँव के लोग वोट दे पाए थे।

इस रिपोर्ट में दिक्कत ये थी के ये NDA द्वारा समर्थित प्रत्याशी राहुल शर्मा के नाजायज़ वर्चस्व को चुनौती दे रहा था। और नतीजा भी सुख हुआ जब पहली बार, इस रिपोर्ट के चलते राहुल शर्मा को हार का सामना करना पड़ा, क्योंकि उनके पिता जगदीश शर्मा यहाँ के बेताज बादशाह थे। इस रिपोर्ट की वजह से मुझे और मेरे परिवार को जितनी धमकियाँ और गंदे फ़ोन कॉल्स हुए, उससे मेरे दोस्त वाकिफ हैं। मेरी पत्नी ने मुझे मॉर्निंग वाक करने से रोक दिया है , क्योंकि ज़हन में आशंका है। क्या करें।

हमारे राष्ट्रवादी पत्रकार इन बातों की ओर आपका धयान कभी नहीं खींचेंगे , क्योंकि उनके ज़ेहन में डर है।

मैं सोचता हूँ के मोदीजी जब 5, 10 या 15 साल बाद देश के प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे तो उनकी विरासत क्या होगी ? देशभक्ति , विकास , “सबका साथ” सबका विकास के साथ साथ , दो और शब्द ज़ेहन में आते हैं । कायरता और डर। कायरता मेरी बिरादरी के कुछ पत्रकारों की, जो सुविधावादी पत्रकारिता कर रहे हैं और डर। डर तो बनाया जा रहा है के तुम्हे आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है। वरना!

खामोश तो आप रहते ही हैं और जब आप ऐसे लोगों का अनुमोदन करते हैं मोदीजी जो नफरत फैलाते हैं, तब आप नफरत और हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं। और इसमें हम सब भागीदार हैं। आये दिन न्यूज़ चैनल्स पे किसी कट्टर मुसलमान की स्पेशल रिपोर्ट्स देखने को मिलती हैं। ..ज़ाकिर नाइक का ड्रामा देख ही रहे हैं आप. अभी कुछ हुआ भी नहीं है , मगर नाइक को आतंक के सरगना और डॉक्टर टेरर जैसे जुमलों से नवाज़ जाने लगा है। क्यों?

मैं ये कहने का साहस करना चाहता हूँ के क्या इस वक़्त यानी उत्तर प्रदेश के चुनावों से ठीक पहले ध्रुवीकरण का प्रयास है ? या मुसलमान को नए सिरे से खलनायक पेश करने की कोशिश है ? क्या मक़सद पश्चिमी उत्तर प्रदेश है ? उसकी कोशिश तो भक्त पत्रकारों को करनी भी नहीं चाहिए। क्योंकि भक्त सेना का बस चले सभी मुसलमान और छद्म उदारवादियों को पाकिस्तान छोड़ के आएंगे। हालांकि “पाकिस्तान पर्यटन एजेंसी” के प्रमुख गिरिराज सिंह उस वक़्त बगले झांकते दिखाई दिए जब खुद मोदीजी वहां पहुँच गए थे।

ये एक संकट काल है। मुझे ये कहने में कोई असमंजस नहीं है। हम सब जानते हैं के परदे के पीछे किस तरह से कुछ पत्रकारों और बुद्दिजीवियों को निशाना बनाया जा रहा है। कैसे दावा किया जाता है के मैंने तो उस पत्रकार को ठिकाने लगा दिया। और मैं ये भी जानता हूँ के आप और विवरण चाहते हैं। मेरा मक़सद ये है भी नहीं। इशारा ही करना था सिर्फ। .और आप लोग तो समझदार हैं। क्यों?


अभिसार शर्मा एक वरिष्ठ पत्रकार हैं।यह लेख पहली मर्तबा लेखक के फेसबुक पेज पर प्रकाशित हुआ था।