2002 और 2008 की परीक्षाओं में हिंदी माध्यम का शानदार परिणाम था. 2002 में ‘अजय मिश्र’ की पांचवीं रैंक. 2008 में ‘किरण कौशल’ का तीसरी रैंक. और इन दोनों ही वर्षों में पहले 100 स्थानों में कम से कम 10-20 स्थानों पर हिंदी माध्यम के उम्मीदवारों का कब्जा. वैसा आजकल क्यों नहीं हो पा रहा है? क्या 2008 के बाद परीक्षा देने वाले उम्मीदवारों की बौद्धिक योग्यता कम हो गई है या वे मेहनत नहीं करते?
असली बात यह है कि अभी तक हिंदी संसार सिविल सेवा परीक्षा की संरचना में हुए बदलाव को पूरी तरह पचा नहीं सका है. इन बदलावों में से कुछ को पूरी तरह संतुलित करना तो शायद संभव नहीं है. किंतु जिस अनुपात में संभव है, हिंदी संसार अभी तक उसे भी नहीं साध पा रहा है.
जहां तक मेरी समझ है, इस मामले में ये दोनों ही पहलू महत्त्वपूर्ण हैं. खुद इस परीक्षा का लंबा और प्रत्यक्ष अनुभव रखने के आधार पर मेरी समझ यह है कि 2013 से हुए संरचनात्मक बदलावों के बाद हिंदी माध्यम के उम्मीदवारों के लिये डगर कुछ मुश्किल हो गई है. इससे पहले की परीक्षा पद्धति में 2 वैकल्पिक विषय होते थे. मुख्य परीक्षा में इन दोनों की सामूहिक हिस्सेदारी 60% (1200/2000) अंकों की थी. सामान्य अध्ययन की भूमिका सिर्फ 30% (600/2000) थी. गौरतलब है कि सामान्य अध्ययन में हिंदी माध्यम के उम्मीदवारों को पिछले 20 वर्षों में कभी भी अंग्रेज़ी माध्यम की तुलना में बराबर या अधिक अंक नहीं मिले हैं. इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे – अंग्रेज़ी माध्यम में बेहतर और नई पाठ्य सामग्री का होना, ‘द हिंदू’ जैसे अखबार की उपस्थिति, मॉडल उत्तरों का सिर्फ अंग्रेज़ी भाषा में होना और कुछ परीक्षकों का हिंदी व भारतीय भाषाओं के प्रति अस्वस्थ नज़रिया इत्यादि.
माध्यम से करते रहे हैं. आप 2013 से पहले हिंदी माध्यम के किसी भी टॉपर की अंक तालिका उठाकर देख लीजिये. आप पाएंगे कि उसने अपने वैकल्पिक विषयों और निबंध में उस नुकसान की भरपाई की होगी जो उसे सामान्य अध्ययन में हुआ था.
2013 से हुआ यह है कि अब सामान्य अध्ययन का वज़न बढ़कर लगभग 57% (1000/1750) हो गया है जबकि वैकल्पिक विषय (जो कि अब 2 के बजाय 1 रह गया है) का वज़न घटकर सिर्फ 29% (500/1750) रह गया है. इसका सीधा मतलब है कि अब युद्ध का मैदान और उसके नियम बदल गए हैं. जो लोग आज भी परंपरागत प्रणाली से इस रण में जुटे हैं, वे समझ नहीं पा रहे कि सफल होने के लिये किस रण-नीति की ज़रूरत है? वे रात-दिन मेहनत करते हैं पर परीक्षा प्रणाली के बदलाव को ठीक से नहीं समझ पाने के कारण उनकी कोशिशें नाकाम हो जाती हैं.
बात धीरे-धीरे खुलती है. रावण ने युद्ध से पहले कठोर साधना की बदौलत शक्ति अर्थात् दुर्गा को ही अपने पक्ष में कर लिया है. राम नैतिक तो हैं किंतु शक्ति उनके पक्ष में नहीं है. खुद राम नहीं समझ पा रहे कि इस संकट का क्या समाधान हो सकता है? तभी उनके एक सहयोगी उन्हें सुझाव देते हुए कहते हैं- ‘शक्ति की करो मौलिक कल्पना’ . वे शक्ति की मौलिक कल्पना का अर्थ भी समझाते हैं- ‘आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर’ यानी जितनी कठोर साधना रावण ने की है, आप उससे भी अधिक कठोर साधना करें. क्योंकि शक्ति सिर्फ नैतिक होने से हासिल नहीं होती, उसके लिये ‘कठोर साधना’ करनी ही पड़ती है.
जब राम फूल उठाने के लिये हाथ बढ़ाते हैं तो कुछ हाथ नहीं लगता है. वे घोर हताशा और आत्म-धिक्कार से भर उठते हैं. फिर उन्हें याद आता है कि उनकी मां उनकी आंखों को कमल के फूल जैसा बताती थीं. बस, वे निश्चय कर लेते हैं कि 108वें फूल की जगह वे अपनी एक आंख अर्पित करेंगे. जैसे ही वे अपनी आंख निकालने के लिये हाथ में तीर को कसकर पकड़ लेते हैं, ब्रह्मांड कांपने लगता है. दुर्गा को मजबूरन आकर उन्हें विजय का आशीर्वाद देना पड़ता है. इसी बिंदु पर यह कविता समाप्त होती है.
वैकल्पिक विषय का चयन करते समय भी बेहद सावधानी बरतें. किसी की ऊट-पटांग सलाह को मानने की बजाय वही विषय चुनें जो हिंदी माध्यम में अच्छे अंकों की प्रबल संभावना से भरे हैं. साहित्य के विषय इस पैमाने पर सबसे बेहतर हैं. उसके बाद एक-दो विषय ही हिंदी माध्यम को संभालने की कुव्वत रखते है. सही विषय चुनकर उसे इस तरह तैयार करें कि एक-एक उत्तर पढ़कर परीक्षक आपकी परिपक्वता और गहराई का मुरीद हो उठे.
अपनी भाषा को धारदार बनाने के लिये रोज़ाना कम से कम एक घंटा दें. समय-सीमा का पालन करते हुए प्रश्नों का उत्तर लिखें. मुख्य परीक्षा संपन्न होते ही इंटरव्यू की तैयारी में विधिवत जुट जाएं. बिना इस बात की परवाह किये कि मुख्य परीक्षा में सफलता मिलेगी या नहीं. आप इतनी तपस्या करेंगे तो अंतिम सफलता कैसे नहीं मिलेगी?
शुभकामनाओं सहित,
(विकास दिव्यकीर्ति)