10/27/2016

समाजवादी पार्टी का ड्रामा

एकता कपूर के नाटक अगर देखे होंगे, तो आपको सपा का ड्रामा बड़ी ही आसानी से समझ आ सकता है. एकता कपूर के सीरियल में लीड किरदार के चारों तरफ ऐसा जाल बुना जाता है कि शुरू में उसको हर तरफ से हार मिलती है और फिर एकदम से वो किरदार उन सब परेशानियों से उभरता है कि दुश्मनों की सारी साजिशें नाकाम हो जाती हैं. कुछ ऐसा ही अखिलेश यादव के साथ हुआ है. चाचा से भतीजा गुस्सा गया. और इस वजह से मुलायम सिंह बेटे अखिलेश से नाराज हो गए. ये ड्रामा अभी पता नहीं कब तक चले, लेकिन इसमें बाजी अखिलेश यादव के हाथ में है. इसकी वजह है पार्टी कार्यकर्ताओं का सपोर्ट और मुलायम सिंह का तकनीकी साथ. क्योंकि सारा जाल तो मुलायम सिंह का ही बुना नजर आता है जैसे उन्होंने अपने बेटे को प्रोजेक्ट करने के लिए ही ये भाई-भाई वाला नाटक खेला हो. खैर परदे के पीछे चाहे कुछ भी हो इस ड्रामे के हीरो तो अखिलेश बन ही चुके हैं.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक अखिलेश क्यों आगे हैं, उनमें सबसे पहली वजह उनके साथ विधायकों और ग्राउंड वर्कर्स का नंबर ज्यादा होना है. दूसरा वजह उनकी पीआर टीम है, जिसमें टॉप ब्यूरोक्रेट्स शामिल हैं. तीसरा पार्टी मेंबर उन्हें अपना यंग फेस लीडर मान रहे हैं, न कि शिवपाल और मुलायम को.

परिवार और पार्टी की लड़ाई ने अखिलेश को अपना किरदार चमकाने का मौका दिया है. और इस लड़ाई में वो जीते भी. उनकी इस जीत का ऐलान तो उसी दिन हो गया, जब मुलायम सिंह की मीटिंग में अखिलेश के फेवर में कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी की. हुआ ये था कि शिवपाल यादव बोल रहे थे. उन्होंने अखिलेश के खिलाफ बोलना शुरू किया तो कार्यकर्ता नारेबाजी करने लगे. यानी ये मैसेज क्लियर था कि पार्टी कार्यकर्ताओं को मुलायम और शिवपाल के मुकाबले अपना लीडर अखिलेश को मानने में कोई हिचक नहीं.

अखिलेश की जीत का दूसरा ऐलान उस वक्त हुआ जब मुलायम सिंह ने कहा कि सीएम पद के उम्मीदवार अखिलेश ही होंगे. और वो ही तय करेंगे कि जिन चार मंत्रियों को कैबिनेट से बाहर किया गया है, उन्हें वापस लिया जाएगा या नहीं.

अखिलेश की जीत का तीसरा ऐलान थोड़ा तकनीकी है. वो ये है कि अखिलेश यादव ने मीटिंग में कहा, वो मुख्यमंत्री हैं, उन्हें इस बात का हक़ होना चाहिए कि वो ही इलेक्शन के लिए टिकट बांटें. और इस बात पर मुलायम सिंह चुप्पी साध गए. क्योंकि वो शिवपाल को राजी रखने के साथ-साथ अखिलेश को नाराज नहीं करना चाहते. क्योंकि आगामी चुनाव में सपा के पास कुछ ऐसा नहीं है, जिसके जरिए वो चुनाव में उतर सके. अगर कुछ है तो सिर्फ अखिलेश का ही चेहरा.
दूसरी तरफ अखिलेश की पीआर टीम भी उन्हें प्रोजेक्ट करने में जुट गई है. अखिलेश को पार्टी में ईमानदार और कायापलट करने वाले शासक के तौर पर पेश किया जा रहा है, जो करप्ट और पुरानी खस्ताहाल व्यवस्था के खिलाफ लड़ रहे हैं. कहा जा रहा है कि पांच साल में अखिलेश पर कोई दाग नहीं. जबकि दूसरा खेमा करप्शन और साम्प्रदायिक हिंसा से स्टेट और पार्टी को बीमार बना रहा है.

इस लड़ाई में अखिलेश ने यूथ को खुद से जोड़ लिया है. इसका सबूत ये है कि जब मंगलवार को सपा हेडक्वॉर्टर में मुलायम सिंह मीटिंग कर रहे थे, तो बाहर अखिलेश के फेवर में नारेबाजी हो रही थी. अखिलेश के सपोर्टर की भीड़ शिवपाल के घर के बाहर जुटती है. सपोर्टर कहते हैं कि मुख्यमंत्री जी गुंडे हैं, ये गलत मैसेज फैलाया जा रहा है. वो पूछते हैं कि क्या वो एक ऐसा उदहारण अखिलेश के खिलाफ दे सकते हैं. अब ऐसे में शिवपाल के समर्थक सिर्फ मचल ही सकते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री के खिलाफ बोल नहीं सकते. तभी तो शिवपाल समर्थक सिर्फ इतना ही कह पाते हैं कि वो हमारे मुख्यमंत्री हैं. और उनके अंडर में ही इलेक्शन लड़ा जाएगा. लेकिन बाकी लोगों का भी सम्मान होना चाहिए.

अखिलेश के सपोर्टर मुलायम सिंह के सामने जमके नारेबाजी करते हैं. यहां तक बोलते हैं कि सब कुछ अखिलेश के हाथ में होना चाहिए. यानी स्टेट पार्टी प्रेसिडेंट होने के साथ साथ उन्हें ही टिकट बांटने का अधिकार होना चाहिए.
वीमेन सपोर्टर भी उस भीड़ में थीं. जिनमें वीमेन कमीशन की मेंबर शीला चतुर्वेदी भी मौजूद थीं. सपा की वीमेन विंग की स्टेट सेक्रेटरी तरन्नुम परवीन कहती हैं कि जब चीफ मिनिस्टर के नाम पर ही वोट मांगे जाने हैं, तो उन्हें ही टिकट बांटने का अधिकार होना चाहिए. बहुत से स्टेट ब्यूरोक्रेट्स अखिलेश के पीछे हैं. जो लोगों को इस बात पर यकीन दिला रहे हैं कि अखिलेश बाकी सीनियर नेताओं के मुकाबले सही फैसले ले सकते हैं.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक ये वक्त अखिलेश यादव के लिए अपनी पॉलिटिकल इमेज गढ़ने और मजबूत युवा नेता के तौर पर उभरने का अहम मौका है. हालांकि वो ऐसे वक्त पर एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं, जब इलेक्शन बेहद नजदीक हैं. अब तक उन्हें साढ़े चार साल में साढ़े चार सीएम में से आधा सीएम ही कहा जाता रहा है, क्योंकि आजम खान और शिवपाल यादव का सरकार में दखल रहा है. अखिलेश ने ये दम थोड़ी देर से दिखाया. इस संघर्ष में समाजवादी पार्टी का वोटर खिसक भी सकता है.

टाटा संस

इन दिनों राजनीति से लेकर बिजनेस घरानों तक में उठापटक मची है. एक बड़ा कॉर्पोरेट ग्रुप है. टाटा संस. अमीर लोग हैं. लेकिन हैं तो इंसान ही. सो ऊंच नीच होती रहती है. ग्रुप के चेयरमैन साइरस मिस्त्री को बगैर किसी चेतावनी के चलता कर दिया गया. साइरस मिस्त्री को इस्तीफा देने का मौका भी नहीं मिला. अब उन्होंने बोर्ड के मेम्बर्स को ई-मेल किया है कि उन्हें अपना पक्ष नहीं रखने दिया गया. उन्हें इस तरह हटाया जाना अजीब है. बोर्ड में नौ लोग हैं जिनमें से 6 लोगों ने मिस्त्री के खिलाफ वोट किया. दो लोग आये ही नहीं. टाटा ने मिस्त्री के खिलाफ कई केविएट (विरोध-पत्र) भी फाइल किए हैं. मिस्त्री के ऑफिस का कहना है फिलहाल मिस्त्री कोई लीगल एक्शन नहीं लेंगे. रतन टाटा को अभी फिलहाल फिर से चेयरमैन बना दिया गया है. उनके और रतन टाटा के बीच अविश्वास वाली स्थिति आ गयी है.

टाटा वालों का पक्ष भी सामने आया है. टाटा ग्रुप के दो बड़े ट्रस्ट हैं- सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट. इकॉनॉमिक टाइम्स के मुताबिक टाटा संस में इन दोनों ट्रस्टों का शेयर 66% है. अब टाटा ग्रुप वालों का कहना है मिस्त्री ने वेल्सपन सोलर फार्म्स के अधिग्रहण को टाटा या इसके शेयरहोल्डर से बिना कंसल्ट किए क्लियर कर दिया. इसका अमांउट 1.4 बिलियन डॉलर है.

साइरस मिस्त्री  पारसी समुदाय से आते हैं. मुंबई के हैं. बिलियनेयर शपूरजी पल्लोनजी मिस्त्री के बेटे हैं. साइरस की मां आयरलैंड की हैं और शादी के बाद साइरस के पापा ने आयरलैंड की नागरिकता ले ली. साइरस के पास भी आइरिश  नागरिकता है और भारत के परमानेंट रेज़िडेंट हैं.

साइरस शपूरजी पल्लोनजी एंड कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर, 1990 से 2009 तक टाटा एल्क्सी लिमिटेड के डायरेक्टर रहे. फिर 1 सितंबर, 2006 को टाटा संस के बोर्ड को ज्वाइन किया. इसके बाद टाटा पॉवर के डायरेक्टर का पद संभाला. 2012 में टाटा संस के डायरेक्टर बने. इसके अलावा टाटा की दूसरी कंपनियों टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाटा पॉवर, इंडियन होटल, टाटा केमिकल्स के भी डायरेक्टर रहे. ‘द इकनॉमिस्ट’ ने उन्हें ब्रिटेन, इंडिया और आयरलैंड का ‘मोस्ट इंप़ॉर्टेंट इंडस्ट्रियलिस्ट’ कहा था.

आइए पढ़ते हैं, क्या-क्या हुआ:

1. जब मिस्त्री को चेयरमैन बनाया गया था तब इसे टाटा ग्रुप में यूथ की जीत माना गया. तब टाटा ने मिस्त्री को एडवाइस दी थी खुद के आदमी बनो.

2. रतन टाटा और मिस्त्री के बीच खिटपिट की शुरुआत काफी पहले से हो गयी थी. दो साल पहले जब इंडियन सेंटर फॉर दी परफार्मिंग आर्ट्स में शपूरजी पलोनजी, जो साइरस के पापा थे, उनका शताब्दी वर्ष मनाया गया तो इंडिया इंक के सारे लोग वहां थे, रतन टाटा को छोड़कर. उन्हें वहां होना चाहिए था. वो थाई पवेलिन में मिस्त्री के भतीजे के साथ आराम से बैठे खाना खा रहे थे.

3. मिस्त्री के और भी कई फैसलों से ट्रस्ट वाले खुश नहीं थे. चाहे वो इंडियन होटल कंपनी की कई ओवरसीज प्रॉपर्टीज़ बेचने का फैसला हो या यूरोप के स्टील प्लांट बेचने का. रतन टाटा के करीबी बताते हैं वो इन फ़ैसलों से खुश नहीं थे.

4. मिस्त्री ने 2014 में इंडियन होटल के मैनेजिंग डायरेक्टर रेमंड बिक्सन को हटा दिया था. रेमंड बिक्सन टाटा के करीबी थे. मिस्त्री ने हयात के राकेश सरना को ये काम सौंपा. सरना के खिलाफ कई शिकायतें आयीं फिर भी उसे मिस्त्री ने नहीं हटाया.

5. टाटा मोटर्स के एक एक्जीक्यूटिव ने साइरस की शिकायत की- वो ढंग के लोगों की पहचान नहीं कर पाते. जिन लोगों को उन्होंने चुना है वो योग्य लोग नहीं हैं.

6. मिस्त्री ने अपनी एक काउंसिल बना ली थी. टाटा संस के ट्रस्टी बोले ये पैरलल बॉडी बन गयी है और कुछ खास लोगों की ही यहां चलती है. इसीलिए उनके कुछ चहेतों मधु कन्नन, एन एस राजन, निर्मल्य कुमार को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.

7. ग्रुप के एक और शख्स ने कहा कि साइरस ने अभी तक अपनी आयरलैंड की नागरिकता भी नहीं छोड़ी है जो उन्हें चेयरमैन होने के नाते छोड़ देनी चाहिए थी.

सोमवार को मिस्त्री को बाहर निकालने की मीटिंग हुई. गहमागहमी रही. मिस्त्री ने खुद के पक्ष में वोट दिया. टाटा ग्रुप के एक पुराने आदमी ने बताया ये तख्तापलट पहले से तय था. अब तो बस नतीजा आया है. मोहन परासर, जिन्होंने एक महीने पहले बोर्ड को मिस्त्री को हटाने की सलाह दी, उन्होंने कहा मीटिंग से पहले रतन टाटा साइरस मिस्त्री से मिले थे लेकिन वो माने नहीं. टाटा ग्रुप की तरफ से ये भी कहा गया कि हमें बाद में पता चला कि वो काफी अक्खड़ हैं. मैच्योर नहीं हैं. 148 साल पुराने टाटा ग्रुप के मूल्यों को बर्बाद कर रहे हैं.

10/24/2016

स्वस्थ रहने के लिए रोज़ कम से कम आठ गिलास पानी पीना ज़रूरी नहीं है

माना जाता है कि 1945 के दौरान अमेरिका में जारी एक आहार संबंधी अनुशंसा की वजह से यह मिथक दुनियाभर में फैला है.

युवा शरीर में उसके कुल वजन का लगभग 60 फीसदी पानी होता है. यह शरीर के लिए एक अहम पौष्टिक तत्व भी है और बाकी तमाम चीजों से ज्यादा जरूरी भी. यह हमारे शरीर का तापमान सामान्य रखने में मदद करता है. शरीर के विभिन्न हिस्सों में पौष्टिक तत्वों की आपूर्ति करने और अपशिष्ट (बेकार चीजें) को बाहर निकालने में मददगार होता है. खून को शरीर के हर हिस्से में पहुंचाता है और सभी तरह की रस प्रक्रियाओं-प्रतिक्रियाओं (मेटाबॉलिज्म रिएक्शंस) को संभव बनाता है. शरीर के जोड़ों में लुब्रीकेन्ट (चिकनाई) की तरह रहता है, ताकि उनमें घर्षण न हो.

इस तमाम संदर्भ के साथ यह जानना बड़ा दिलचस्प है कि शरीर के लिए रोज आठ गिलास पानी की जरूरत संबंधी भ्रान्ति 1945 से चली आ रही है. उस वक्त अमेरिका में सुझाई गई आहार संबंधी अनुशंसाओं में (डाइटरी अलाउंस) में एक यह भी थी. हालांकि इन अनुशंसाओं में आगे यह भी कहा गया था कि युवा व्यक्ति को दिनभर में कम से कम ढाई लीटर पानी की जरूरत होती है और यह जरूरत खाने-पीने की विभिन्न चीजों से ही पूरी हो सकती है. ऐसे में अगर इस अनुशंसा के आखिरी हिस्से पर गौर न करें तो फिर इसकी व्याख्या इस स्पष्ट निर्देश के रूप में की जा सकती है कि रोज आठ गिलास पानी पीना जरूरी है.

जबकि वैज्ञानिक साहित्य में व्यापक खोजबीन के बाद भी ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता, जिससे ‘आठ गिलास पानी रोज’ वाला यह मिथक सही साबित हो सके. और इस ‘निर्देशात्मक सलाह’ के पक्ष में कोई सबूत न मिलने के पीछे एक बड़ी वजह यह है कि व्यक्ति अपनी जरूरतभर का पानी इसका एक गिलास उठाए बिना भी हासिल कर सकता है. सॉफ्ट ड्रिंक, फलों के जूस, दही, चाय-कॉफी, दूध-दही, फल, सूप, उबली चीजों आदि सभी खाद्य पदार्थों में पर्याप्त मात्रा में पानी होता है. यह भी हमारे शरीर में पानी की जरूरत को पूरा करते ही हैं.

यहां यह भी बता देना जरूरी हो जाता है कि ऑस्ट्रेलिया में की गई खुराक संबंधी अनुशंसाओं में भी ‘राेज आठ गिलास पानी’ पीने संबंधी सिफारिश को एक तरह से खारिज कर दिया गया है. यहां की आधिकारिक अनुशंसाओं में कहा गया है, ‘पानी पीने का कोई एक एेसा मानक स्तर पर नहीं है, जो यह सुनिश्चित करता हो कि स्वस्थ लोगों को न्यूनतम या अधिकतम इतना पानी पीना चाहिए तभी उनके शरीर पानी का सही संतुलन बरकरार रह सकता है.’

इसी तरह का ही एक मिथक और है कि ‘काॅफी पीने से शरीर में पानी की कमी हो जाती है.’ इस मिथक को भी तोड़े जाने की जरूरत है. यह सच है कि कॉफी, चाय और शीतल पेय पदार्थ पीने से शरीर में मूत्रवर्धक प्रणाली भी सक्रिय हो जाती है. इससे मूत्र के माध्यम से कुछ पानी शरीर से बाहर निकल सकता है. लेकिन इन पेय पदार्थों से जितनी मात्रा में पानी शरीर को मिलता है, उसकी तुलना में बाहर निकलने वाला पानी बहुत ही कम होता है. हां, जिन पेय पदार्थों में अल्कोहल की मात्रा अधिक होती है (जैसे शराब), उनसे जरूर शरीर में पानी की कमी हो जाती है.

लिहाजा, अब सवाल हो सकता है कि अगर ‘रोज आठ गिलास’ नहीं तो फिर किसको कितने पानी की जरूरत होती है? आप खुद यह कैसे पता कर सकते हैं, आपको रोज कितना पानी पीने की जरूरत है?

इसका जवाब बड़ा आसान है. हर घंटे में आप यह पता कर सकते हैं कि आपके शरीर में पानी का संतुलन ठीक है या कुछ कमी हो गई है. इसका तरीका ये है कि अगर मूत्र हल्का रंगीन या एकदम साफ है तो आप पर्याप्त मात्रा में पानी पी रहे हैं. या यूं कह लीजिए कि आपके शरीर में पानी का संतुलन ठीक है. लेकिन अगर मूत्र गहरा पीलापन-मटमैलापन लिए है, तो मतलब ये कि शरीर में पानी की कमी हो रही है और आपको तुरंत पानी पी लेना चाहिए.

(ऑस्ट्रेलिया की डैकिन यूनिवर्सिटी में पोषण आहार विभाग के प्रोफेसर टिम क्रो का यह आलेख ‘द कनवर्जेशन’ पर प्रकाशित हुआ था)

10/23/2016

हम सपने में भाग क्यों नहीं पाते और कभी मरते क्यों नहीं हैं?

अक्सर ऐसा होता है कि जो काम हम रोजमर्रा की जिंदगी में बड़ी आसानी से कर लेते हैं उन्हें सपनों में पूरा करते-करते हमें पसीने आ जाते हैं. यह बात हममें से हर किसी ने महसूस की होगी कि अगर सपने देखते हुए हमें भागने की नौबत आ जाए तो हम उतनी तेजी से नहीं भाग पाते जितनी तेज दौड़ने की हमें जरूरत होती है. ऐसा ही सपने में मुक्के मारने या चीखने की कोशिश करते वक्त भी होता है. यहां तक कि सपने में तो हमें मरना भी नसीब नहीं होता.

सपने मनोविज्ञान के लिए अभी भी पहेली बने हुए हैं. उनके स्पष्ट परिभाषित न हो सकने के कारण उनमें देखी गई घटनाओं की हमें तरह-तरह की व्याख्याएं सुनने-पढ़ने को मिलती हैं. सपनों पर किये गये कई शोध बताते हैं कि हमारी बाहरी परिस्थितियों हमारे द्वारा देखे गये सपनों को प्रभावित करती हैं. जैसे अगर आप लगातार किसी काम के लिए मेहनत कर रहे हैं और उसमें सफल नहीं हो पा रहे हैं तो आपको न दौड़ पाने या न बोल पाने जैसे सपने आते हैं. इस तरह के सपने किसी व्यक्ति के चेतन और अचेतन मन में लगातार चल रहे संघर्ष को दिखाते हैं. अचेतन मन सपनों के जरिये लगातार यह इशारा देने की कोशिश कर रहा होता है कि कुछ ऐसा है जो उसे सफल होने से रोक रहा है.

सपनों के विश्लेषक लगातार या तेजी से न दौड़ पाने की स्थिति को आत्मविश्वास की कमी से भी जोड़कर देखते हैं. उसी तरह से अगर आप सपने में बोल नहीं पा रहे हैं तो इसका अर्थ यह समझा जाता है कि आप दूसरों तक अपनी सोच नहीं पहुंचा पा रहे हैं. आपको ऐसा लगता है कि आपके विचारों से कोई सहमत नहीं होगा.

मनोविज्ञान का दूसरा विचार यह कहता है कि किसी को मुक्का मारना या भागना शरीर के कई अंगों के समन्वय से होने वाली गतिविधि है. इस तरह के कामों में शरीर के अलग-अलग अंग अलग-अलग भूमिका निभा रहे होते हैं. वहीं जब हम सपने देख रहे होते हैं तो शरीर के बाकी अंग शिथिल होते हैं केवल दिमाग ही सक्रिय होता है और शरीर को निर्देश भेज रहा होता है. लेकिन दिमाग के पास इसकी जो प्रतिक्रिया वापस पहुंचती है वह बताती है कि शरीर उसके निर्देश का पालन करने में असमर्थ है. ऐसा ही कुछ हमें सपने में दिखाई देता है.

कुछ वैज्ञानिक प्रयोग बताते हैं कि सपने असलियत के मुकाबले काफी धीमी गति से घटते हैं. स्विट्ज़रलैंड की बर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेनियल एर्लाकर ने नींद में सपने देखते हुए दिमाग की क्रियाओं का विश्लेषण किया और पाया कि सपने देखते हुए इंसान किसी भी काम को करने में सामान्य से डेढ़ गुना ज्यादा समय लेता है. यानी कि अगर आप सपने में भागने की कोशिश करते हुए अपने पैरों को आगे बढ़ा रहे हैं तो वे बहुत धीमी गति से आगे बढ़ेंगे. उस समय आपको महसूस होगा कि कोई आपको आगे बढ़ने से रोक रहा है.

इसी तरह से नींद में आपको बार-बार लगता है कि आप मरने वाले हैं लेकिन ऐसा कभी होता नहीं है. इसका कारण दौड़ने-भागने के कारणों से बिलकुल अलग है. सपने में हम जो भी देखते हैं, सुनते हैं या महसूस करते हैं वह हमारे पिछले अनुभवों पर आधारित ही होता है. लेकिन हमारे दिमाग को यह मालूम ही नहीं होता कि मरने का अनुभव कैसा होता है. इसलिए आप सपने में खुद को कभी मरता हुआ नहीं देख पाते.

इस अकल्पनीय फिगर वाली कैरेक्टर ने महिलाओं के लिए क्या किया है?

शुक्रवार को यूनाइटेड नेशंस ने कॉमिक्स कैरेक्टर ‘वंडर वुमन’ को औरतों के सशक्तिकरण का एंबेसडर बनाया है. ये मौका था यूनाइटेड नेशंस के लगभग साल भर के सोशल मीडिया कैंपेन शुरू होने का. जिसमें औरतों के सशक्तिकरण और जेंडर इक्वैलिटी को प्रमोट किया जायेगा.

शुक्रवार को वंडर वुमन का 75वां बर्थडे था. 1941 में पहली बार इनका कॉमिक्स आया था. इनको ‘प्रिंसेस ऑफ थर्मिस्काइरा’ भी कहा जाता है.

पर ये कोई इमोशनल करने वाला मौका नहीं था. यूनाइटेड नेशंस के ही 1000 लोगों ने तुरंत ऑनलाइन पेटीशन दिया कि वंडर वुमन इस काम के लिये उपयुक्त चॉइस नहीं है. कहा गया कि,

‘बड़े-बड़े स्तनों वाली एक व्हाइट लड़की, जिसने छोटे कपड़े पहने हुये हैं. जिसके शरीर के अंग इस कदर हैं जो रियल लाइफ में हो नहीं सकते. थाई दिखाते हुये बूट पहने हुये ये लड़की पिन-अप गर्ल है. जो मर्दों के मन की उपज है.’

जिन लोगों ने साइन किया, उन्होंने कहा कि यूएन से ये उम्मीद नहीं थी. ये लोग एक रियल लाइफ लड़की नहीं खोज पाये. और ये बात करते हैं वुमन इम्पावरमेंट और जेंडर इक्वलिटी की.

वंडर वुमन पर फिल्म भी आ रही है 2017 में. इसमें इजराइली एक्ट्रेस गेल गडोट वंडर वुमन बनी हैं. 1941 में इस कैरेक्टर को एक साइकॉलॉजिस्ट विलियम मार्सटन ने बनाया था. इस कैरेक्टर ने को फेमिनिस्ट आइकन भी माना जाता है.

यूनाइटेड नेशंस का जवाब था,

‘हमने इसका फेमिनिस्ट बैकग्राउंड देखा. पहली औरत जो सुपरहीरो बनी. जिस दुनिया में सिर्फ मर्द सुपरहीरो हुआ करते थे. इस लड़की ने हमेशा ही फेयरनेस, जस्टिस और पीस के लिये लड़ाई की है.’

लेकिन यूनाइटेड नेशंस का जवाब बड़ा ही बचकाना है. क्योंकि अभी पुर्तगाल के एंटोनियो गटरेस को यूएन का अगला सेक्रेटरी जनरल चुना गया है. जबकि पूरी दुनिया में ये मांग चल रही थी कि एक औरत को चुना जाये. ये भी पता चला है कि यूएन के टॉप 10 पोस्ट में से 9 मर्दों को ही जाते हैं. ऐसा नहीं था कि टॉप पोस्ट के लिये औरतों की कमी थी. इसमें न्यूजीलैंड की पूर्व प्रधानमंत्री, यूनेस्को की डायरेक्टर जनरल और यूरोपियन यूनियन की एक अधिकारी भी हैं. इनके अलावा खोजा जाए तो दुनिया में इस पोस्ट के लिये औरतों की कमी नहीं है. कितनी औरतें तो ऐसी हैं जो शांति के लिये नोबल जीत चुकी हैं. दूसरे देशों में जाकर लोगों के लिये काम कर रही हैं. बाकी पोस्टों के लिये भी तो औरतें चुनी जा सकती हैं.

सबसे मजेदार बात है कि वंडर वुमन 1941 में जन्मी थी और यूएन 1945 में. और वंडर वुमन को लड़कियों के इम्पॉवरमेंट के लिये चुना गया है. कॉमिक्स में वंडर वुमन एक बार अमेरिकी प्रेसिडेंट के लिये लड़ी भी थी और हार गई थी. वहां भी नहीं जिता पाये.

मतलब वुमन इम्पॉवरमेंट सिर्फ कल्पना में हो रहा है. असल जिंदगी में पावर शेयर नहीं किया जायेगा. जब भी औरत को दिखाना हो तो उसी तरह दिखाइये जैसा लोग कल्पना में औरतों को देखते हैं. एकदम अकल्पनीय फिगर. जो मर्दों के तन-मन को सुख पहुंचाये. जो औरत लड़-झगड़ के अपना मुकाम बना रही है, वो एम्बेसडर बनने लायक भी नहीं है.

सेक्रेटरी जनरल और प्रेसिडेंट तो दूर की बात है. हिलेरी क्लिंटन जब से चुनाव लड़ रही हैं तब से डॉनल्ड ट्रंप उन के चरित्र पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं. जबकि उनके खुद के बारे में तरह-तरह की चीजें सामने आ रही हैं. यूएन का ये फैसला अंतत: मर्दवादी सोच का ही नतीजा है, जिसमें एम्पावर्ड औरत वह है जिसके स्तन बड़े हैं और जिसे देखकर कामुक हुआ जा सकता है. अगर वो प्रेसिडेंट का चुनाव कॉमिक्स में भी लड़े तो जीतने नहीं देना है.

10/10/2016

रिलायंस जियो बंद होने वाला है

बना हुआ है. जियो के सिम से बतिया रही जनता को देखकर सीधे एलजी के सेट पर रिलायंस CDMA वाला जमाना याद आता है. लै बातें… दै बातें… भर-भरकर बातें. और अब तो स्मार्टफोन का जमाना है. लौंडों को नेट का सही यूज करना भी आता है. ऐसे लौंडों की वजह से ही तो टॉरेंट वालों का करियर चल रहा है. लेकिन गुरू… अब मौज के दिन खत्म हो गए हैं. रिलायंस जियो बंद हो जाएगा.
क्या हुआ. छाती दरक गई? कलेजा हुलसने लगा. आंखें चौंधिया गईं. पर क्या बताएं मौसी… काम ही मुकेश अंबानी ने कुछ ऐसा किया है. यहां जनता देशप्रेम वाली गोटी खेल रही है और अंबानी चीन से सिम पर सिम मंगाए जा रहे हैं. खुलेआम, दिनदहाड़े, सरेराह… देशद्रोह!
पहिले आंकड़े समझो. जनवरी, 2016 के पहले ही हफ्ते में जियो के साढ़े चार लाख सिम चीन से मंगाए गए थे. मंगाए क्या गए थे, बनते ही वहीं हैं. एक तरफ मोदी जी हलकान हुए जा रहे हैं मेक इन इंडिया के प्रमोशन में, दूसरी तरफ अंबानी चीन से ऐसे-ऐसे बिन्निस कर रहे हैं. 12 जनवरी को चीन से एक और कन्साइन्मेंट आया था. उसमें फिर जियो के पांच लाख सिम आए थे. 16 जनवरी को फिर सवा चार लाख सिम आए. ये सिलसिला पूरे साल चलता रहा. अभी 28 सितंबर को ही ढाई लाख सिम आए हैं चीन से. ये देखो.
देखो, कब कित्ते सिम आए हैं चीन से (डेटा सोर्स: zauba)
अब बताओ. इस समय हर जगह देशप्रेम की लहर है. चीनी सामान का विरोध हो रहा है. कहा जा रहा है कि हम चीन का सामान खरीदकर उस पर पैसा लुटाते हैं और वो वही पैसा नवाज शरीफ को दे देता है हमारे जवानों को मारने के लिए. तो अच्छा है कि चीन का सामान खरीदा ही न जाए. बिजनेस अपनी जगह है, लेकिन देशप्रेम से बढ़कर थोड़ी न है.
अब जब ये पक्का पता चल गया है कि जियो के सिम चीन से आ रहे हैं तो पूरे भारत के देशभक्त तो इन्हें यूज करेंगे नहीं. जिन्होंने मुफत का माल समझकर ले लिया था, वो भी इसके 56 टुकड़े करके आग लगा देंगे. वैसे भी हमारे यहां देशभक्तों की कमी तो है नहीं. हर चौराहे पर चाट-पकौड़ी खाते रहते हैं देशभक्त. ऐसे में गद्दार बचे ही कितने हैं. गद्दार उतने ही बचे हैं, जितने परशुराम के सर्जिकल स्ट्राइक के बाद धरती पर ठाकुर बचे थे. ससुरा इतने सर्जिकल स्ट्राइक के बावजूद न जाने कहां से पैदा हो जाते थे.
तो ये जो छिटपुटिए गद्दार बचे हैं, इनके सहारे तो मुकेश अंबानी जियो का कारोबार चला नहीं पाएंगे. हर खेप में लाखों सिम आ रहे हैं, चीन वाली बात पता चलने के बाद तो यूज करने वाले सौ-पचास या कुछ हजार बचेंगे, तो कहां से काम चलेगा. ऐसे में कंपनी तो बंद करनी ही पड़ेगी न. अच्छा वैसे जिनके हलक से अब तक ये बात नहीं उतर रही है कि सिम चीन से आ रहे हैं वो एक फोटो और देख लें.
और अंदर की बात बताएं दोस्त. जब से मुकेश अंबानी ने लोगों को चीनी सामान का विरोध करते देखा है न, तब से उनकी हालत बड़ी दयनीय हो गई है. सुना है आज-कल दिनभर कांपते रहिते हैं. दो-चार आदमी आस-पास बिठा रखे हैं जो जियो के बढ़ते ग्राहकों की गिनती करते रहते हैं ताकि उनके होशो-हवास में कुछ सुधार हो. अब चीनी सामान के विरोध की फोटो हैं ही ऐसी कि किसी की भी जान हलक में अटक जाए. अपने यहां तो सीधे प्रधानमंत्री से बैन लगवाया जाता है. ये अलग बात है कि PMO ने सफाई देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की तरफ से ऐसा कुछ नहीं कहा गया है.
अच्छा हां, एक और बात तो बताना भूल ही गए. एक हैक्टिविस्ट ग्रुप ने खुलासा किया था कि जियो के ग्राहकों की जानकारी अमेरिका और सिंगापुर में भेजी जा रही है. देखो होता क्या है कि आप इंटरनेट पर जो भी ज्यादा देखते-सुनते हैं, उसके आधार पर ये तय किया जाता है कि आपको कौन से विज्ञापन दिखाए जाएंगे. तो आरोप यही है कि जियो अपने ग्राहकों की जानकारी बेच रही है ताकि कंपनियां अपने हिसाब से विज्ञापन दिखा सकें.
एक चीज और नहीं समझ आ रही है. जियो बेचने के विज्ञापन को डिजिटल इंडिया से जोड़ा गया था, लेकिन इसमें मेड इन इंडिया जैसा तो कुछ है ही नहीं. सिम बन रहे हैं चीन में और नेटवर्क वाले उपकरण आ रहे हैं फ्रांस और जर्मनी से. और इंडियावाले यूज कर रहे हैं फ्री में. ये मुफत वाली आदत जाएगी थोड़ी न हम लोगों की. वैसे अब क्या दिक्कत है. अब तो देशभक्त सारा काम संभाल ही लेंगे. कसम पैदा करने वाले की, देशद्रोही जियो तो बंद करवाकर ही रहेंगे. जय भद्रकाली.